शुक्रवार, 20 मार्च 2015

उमस भरी सुबह और एक फोनकॉल


ट्रिनन्...ट्रिनन्....
गुलमोहर कालोनी के एक एम आई जी फ़्लैट में तीसरी बार फोन की घंटी बजी ।
वैसे तो किसी का फोन आना एकान्त की ऊब और घुटन को तोडता है । सारी एकरसता को भंग कर पलों को तरोताजा कर देता है । हमें याद दिलाता है कि कोई है जो हमें याद कर रहा है किसी बहाने सही । लेकिन कभी-कभी लोग आप अपने आप में ही इतने त्रस्त व उलझे होते हैं कि फोन आना किसी ढीठ पडौसी की अनावश्यक घुसपैठ सी भी महसूस होता है .
बरसात की वह एक पसीने भरी गिजगिजी सी सुबह थी । बादल कभी तो मनमाने तरीके से अपनी भरी गागर उँडेल जाते थे तो कभी धूप चिलचिला उठती थी । हवा का कही नाम नहीं था .
उस समय सुबह तो क्या कहें लगभग दोपहर होने वाली थी । लेकिन छुट्टी का दिन कम से कम कामकाजी लोगों के लिए देर से ही शुरू होता है .
इस घर के चार प्राणी--पैंतालीस पार के गृहस्वामी सुधाकर राय , पत्नी अमला और दो बेटे--बडा बेटा सुधीर और छोटा विकास यानी विक्की , इसके बावजूद कि वे एक ही मंजिल तक जाने वाले एक ही गाड़ी में सवार मुसाफिर हैं वे अक्सर अपने आप में टकराते रहते है डलिया में पड़े बर्तनों की तरह ।
बैठे-बैठे बेडौल से होगए गहरे साँवले रंग के सुधाकर बाबू एक स्थानीय अखबार 'सान्ध्य-सन्देश' के सम्पादक हैं । बाल खिचडी हैं । शक्ल-सूरत बाहरी तौरपर किसी कोण से खूबसूरत नहीं हैं, लेकिन आँखों में एक खास आकर्षण है . उनकी रचनाएँ ,आवाज और बोलने का तरीका भी इतना प्रभावशाली है कि लोग उनसे खासे प्रभावित होजाते हैं । इसीलिये अखबार भले ही कुछ खास नही चलता पर सम्पादक जी का नाम खूब चलने लगा है । यह उनके लिये आने वाले पत्र और फोन बखूबी बता सकते हैं ।  लेकिन घर में उनकी हैसियत ‘घर की मुर्गी ‘जितनी भी नहीं है .बच्चों के लिए  ,खास तौर पर छोटे बेटे के लिए वे सिर्फ स्कूल की फ़ीस भरने या किसी कागज पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति भर हैं और पत्नी के लिए बहुत जरुरी जरूरतों को पूरा करने वाला साधन वैचारिक स्तर पर उनमें कोई समानता नहीं है .     
अमलादेवी छोटे कद और गेहुँआ रंग की सामान्य चेहरे वाली एक बेबाक और रूखी महिला है । वह यों तो स्नातक है लेकिन बातों से ऐसा लगता नहीं हैं .हाँ दुनियादारी के मामलों में उनकी छठी इन्द्रिय पति सुधाकर से भी बहुत आगे चलती है .यही कारण है कि शहर से दूर गाँव में बसे परिचित और परिजन ,जो 'सुधाकर भैया’ के घर आए दिन आ धमकते थे ,धीरे-धीरे आना भूल गए हैं ।
सुधीर बढती हुई उम्र का साँवला और सलोना लडका है । उसकी एक उपलब्धि तो यही है कि इन्टर की परीक्षा उसने बिना किसी रुकावट के सेकण्ड डिविजन से पास करली है । दसवीं बोर्ड में दो विषयों में रह गया था । इस बात को लेकर सुधाकर बाबू जब तब कहते रहते हैं कि’--"इसका कोई भविष्य नही है । पता नही क्यों पढाई में मन ही नही लगता इसका..?"
अमलादेवी को पति की ऐसी बातें अनाधिकृत चेष्टा लगती हैं । वह तुरन्त पति की बोलती बन्द करने के लिये एक अचूक अस्त्र का प्रयोग करती है ---
तो तुमने खुद कौनसे तीर मार दिये ? रो धोकर बी एस सी तो किसी तरह होगई पर एम. . की डिग्री तो आर्ट की बदौलत ही मिल पाई थी न ?
बीच में बोलना जरूरी है ?
मैंने तो सिर्फ सच कहा है .
सच कहने का दूसरा तरीका भी हो सकता है.
मुझे तो यही तरीका का  आता है । साफ कहना और खुश रहना .लपेटकर कहना तो मैंने सीखा ही नही है .
अच्छा ठीक है । अपना काम करो ..
काम ही कर रही थी । तुम्हारी तरह नही कि फालतू कागज-पत्तर फैलाए सबेरे से बैठे हो । बच्चों को समझाने का भी एक तरीका होता है ...
अगर तुम वह तरीका जानती हो तो समझाती क्यों नही हो .
क्यों ,सारी जिम्मेदारियाँ मेरी ही हैं ? तुम तो बस पत्र-पत्रिकाएं पलटते रहो , फोन पर बतियाते रहो अपने मित्र--मित्राणियों से ..
मित्राणियों से तुम्हें जलन होती है न ?
“ऐसी ऐरी-गैरी औरतों से  जलती है मेरी जूती .
तुम लोग आराम से आपस में बहस करो । तब तक मैं लौटकर आता हूँ
सुधीर माता-पिता की इस तरह की फालतू बहस का फायदा उठाकर अक्सर बाहर निकल जाता है । अब उसे जाने के लिए पूछने की भी जरूरत महसूस नही होती । जब चाहे वह दोस्तों के साथ फिल्म देखने या क्रिकेट खेलने चला जाता है । पिता के कई बार यह समझाने पर भी कि ये खेल-वेल छोड किसी कम्प्टीशन की तैयारी करले ,वह रोज सुबह-सुबह बैट थामे घर से निकल जाता है ।
विक्की जब देखो टी.वी.से चिपका कार्टून देखता रहता है ।
अपनी उम्र से कही ज्यादा आगे निकल गए लगते ये महाशय चूँकि परिवार में अकेले हैं जो कान्वेन्ट में अँग्रेजी माध्यम से पढ रहे हैं इसलिये अपने भाई से ही नही खुद को अपनी माँ और पिता से भी अधिक समझदार मानते हैं । और उनकी हर बात में मीनमेख निकालते रहते हैं ।
पापा क्या बोला आपने’ डीफ’ ? यानी बहरा ?..इसे डीफ नही ‘डेफ’ कहते हैं ।...हद है .. पापा शॅार्ट नही ‘शॅाट’ बोला जाता है । ‘आर’ साइलेंट है यहाँ  .” 
विक्की इस बात से भी अक्सर नाराज रहता है कि पापा अपने पुराने तरीकों को छोड़ना ही नहीं चाहते .कही भी जाएंगे ,पैरों में वही पुरानी चप्पलें ,कंधे में लम्बा झोला लटकाए रहेंगे . विक्की कई बार टोक चुका है कि लेखक-संपादकों की यह कोई यूनिफार्म है क्या जो...पर पापा हमेशा अपनी राह चलते हैं . उधर मम्मी हैं... नाश्ता बनाने की बजाय या तो टी.वीपर मैच देखने बैठ जाती हैं या पापा से उलझने लगती हैं कि 'क्यों जी दाढी बनाते समय एक तरफ मुँह क्यों फुला लेते हो ? भद्दा लगता है । या तुम्हें शाहरुख क्यों पसन्द नही है सारी दुनिया क्या पागल है जो उसे पसन्द करती है ?
बिक्की ,बहुत होचुका अब टी वी बन्द करो और नहा लो ."--अमलादेवी इधर से उधर उसे टोकती निकलती हैं पर विक्की उतनी ही लापरवाही से चैनल बदलता रहता है ।
सुधाकरबाबू कुछ देर गहरी और कुछ समझने की कोशिश भरी नजरों से उधर देखते हैं .
विकास, सुना नही माँ ने क्या कहा ?
किसकी माँ ने ? आपकी या मेरी ? विक्की फिक् से हँस पडता है ।
देखा, कितना ढीठ होता जा रहा है ?
और क्या होगा !  जब बच्चों को कोई देखने समझाने वाला न हो .
क्यों ,तुम्ही तो हर बार टोक देती हो ,मैं जब भी उन्हें कुछ समझाना चाहता हूँ कि ,रहने दो अभी वह थका हुआ है ..कि अब तो वह पहले से समझदार हो गया है, कि मैं कह रही हूँ ना ?, कि बच्चों को कहीं ऐसे समझाया जाता है ? जैसे पुलिस अपराधी को .ऐसे में बच्चे क्या सीखेंगे ?
“क्या आज मुझसे लड़ने की ठान ली है? मेरा तो सिर वैसे ही भन्ना रहा है
कमाल है . चोरी और सीनाजोरी इसे कहते हैं .”
सुधाकरबाबू निःशब्द मन मसोस कर रह जाते हैं । आगे कुछ कहने का सवाल ही नही उठता । पत्नी से एक कहो ,बीस सुनो--कि ...‘मेरा तो सिर चकरा रहा है । ..कि घुटनों का दर्द जाता ही नही कि मैं ही जानती हूँ कि कैसे काम चला रही हूँ । महाशय को तो दफ्तर से फुरसत ही नही है । और कैसे मिले ? दफ्तर घर में जो आजाता है । खाना भी ऐसे खाते हैं जैसे खाकर एहसान कर रहे हों । मेरे भाई को देखो कैसे भाभी के हर काम में हाथ बँटाता है । मेरी तो जिन्दगी चूल्हे-चौके में ही गुजर चली...." वगैरा..वगैरा ।
ऐसे में विवाद और तनाव से बचने के लिए सुधाकर राय का मन कोई 'खिड़की' तलाशता है जो इस बंद कमरे में कुछ ताजगी का अहसास हो.आने वाले फोन कॉल भी उनके लिये एक तरह की खिड़की ही होते हैं . 
शायद अमला भी इस तथ्य से अनजान नहीं है. इसीलिए उसका ध्यान 'जो मिला है' उससे ज्यादा 'जो नहीं मिला या छूट गया' ,उस पर रहता है . इस तरह घर में अक्सर शीतयुद्ध का माहौल बना रहता है. 
अब भी जबकि सूरज को सिर पर आने में कम से कम ढाई-तीन घंटे थे, गुलमोहर कालोनी के उस एम.आई.जीफ्लैट के माहौल में जाने किस बात पर पहले से ही अजीब सी खुन्नस थी . मौसम की उमस से ज्यादा चुभने वाली थी विचारों की उमस. जैसा कि अक्सर होता है. ऐसे में छोटी छोटी बातें भी उस खुन्नस को बढ़ाने वाली होतीं हैं . बार बार फोन का बज उठना भी उन कई बातों में से एक है .
सुधाकर राय अपने आसपास ढेर सारी पत्रिकाएं बिखराए पसीने में नहाए हुए जैसे किसी 'खिड़की' के खुलने की उम्मीद में बैठे थे .पंखा ऐसे चल रहा था जैसे अभी लम्बी बीमारी से उठा हो . सुधाकर ने उठकर पंखा तेज किया लेकिन अमला ने तुरन्त आकर धीमा कर दिया ।
यह क्या मजाक है ?
मजाक नही जरुरी और सीरियस बात है । बिल कितना भरना पडता है मालूम है ?
नही ..बिल तो तुम भरने जाती हो न ?
मैं क्यों जाऊँ तुम्हारे होते ? मेरे तो घर में ही इतने काम हैं कि ....
हाँ देख रहा हूँ .बहुत सारे काम हैं तभी तो दस बज रहे हैं । एक कप चाय तक नही मिली .
क्यों ? कभी खुद भी बना कर पी लिया करो. पता तो चले कि चाय बैठे-बैठे नहीं बन जाती ...सुबह से फालतू बैठे हैं । कभी किसी प्रकाशक को फोन लगाते हैं कभी इस लेखक को और कभी उस लेखिका को . लेखिकाओं के लिए तो .. ..यह कोई काम है ?
अरे यार, बन्द करो अपनी ये बकवास । जो काम हो सके करलो नही हो ,मत करो । बात खतम..."
अमला को इस बात की चिढ है कि पढने-लिखने की आदत ने सुधाकर की आदतें ही नही बिगाड दी हैं बल्कि घर का माहौल भी उबाऊ बना दिया है । छुट्टी के दिन भी महाशय दफ्तर फैला कर बैठ जाते हैं । या किताबों में आँखें गडाए रहते हैं और कुछ नहीं तो फोन पर कान चिपकाए रहते हैं और घंटों तक फुनियाते रहते हैं । खासतौर पर महिलाओं से कुछ ज्यादा ही रूचि लेकर....कहो तो दो-दो हफ्ता शेव नही करें । दाढी को कटेरी के काँटों सी उगालें और कहो रोज ही साबुन-रेजर लेकर बैठ जाएं ।
अब भी वह किसी बात पर कुढ़ी हुई थी और पति को सुनाती हुई बडबडाती जा रही थी—
सम्पादक होने का मतलब यह थोडी है कि घर-बार और बीबी-बच्चों को देखो ही मत ? यह तो नही कि पन्तनगर जाकर भैया से मिल आएं .शिल्पा की पढाई के बारे में राय लेने कितनी बार बुला चुके हैं पर महाशय के भाव मिलें तब ना ?कुछ नहीं तो बडी मण्डी जाकर हफ्ते भर की सब्जी ले आएं। किफायती पड जाती है और सब्जी की चिन्ता नही करनी पडती । नही तो ठेले वालों से दुगने दाम देकर खरीदो वह भी पानी के छींटों से जबरन ताजी बनाई हुई .
" रोज सुबह एक ठेले वाला  तो एकदम ताज़ी  सब्जी लेकर निकलता है . वह नहीं खरीदी जाती . भला फिर मुझे टोकने का मौका कहाँ मिलेगा ?"
" हाँ खूब ताज़ी लाता है ! बीस रुपए किलो टमाटर चालीस में बेचता है .यह तो नहीं कि आदमी बचत की सोचे . मेरे भैया को देखो ..."
“ अरे यार ! तुम और तुम्हारा भाई ! अपने काम से काम रखो । मेरे काम में अपनी नाक मत घुसेडा करो समझी .----ऐसे में सुधाकर का धैर्य भी जबाब दे जाता है ।
हाँ..हाँ एक मैं ही हूँ जो तुम्हें निभा रही हूँ । तुम्हारे साथ कौनसा सुख मिला है ?
तो जहाँ मिले वहाँ चली जाओ न ? हद होगई यार... अपने अलावा किसी और को भी देखती हो ?
मैं नही देखती तो तुम्हारी और कौन बैठी है जो जिमा जाएगी गरम-गरम फुलके ?
बन्द करो यह नाटकबाजी .
विक्की चीख उठा । इस समय वह नमकीन का पूरा डिब्बा सामने रखे बैठा था और मुट्ठी भर--भर के खा रहा था ।
यह नमकीन क्यों खाया जारहा है ? नुक्सान नही करेगा ? सुधाकर ने तल्ख अन्दाज में कहा ।
इसकी परवाह किसे है ?-- विक्की की आवाज भी जितनी तीखी है ,लहजा भी उतनी ही रूखा है ।
घर में ग्यारह-ग्यारह बजे तक नाश्ता नही बनता । कुछ तो खाना पडेगा न ?
सुधाकर ने कुढते हुए घड़ी को देखा और एक असहाय सी दृष्टि पत्नी पर डाली जो लम्बे फूल झाडू से खडे-खडे ही आँगन में झाडू लगा रही थी । कमर स्थूल होगई है और पेट इतना निकल आया है कि झुकते नही बनता । आलू-चावल छूटते नही हैं ।
गृहमंत्री जी ! बालक क्या कह रहा है ?-- पत्नी के मूड को ठीक करने और माहौल को हल्का बनाने की गरज से कुछ परिहास के लहजे में सुधाकर ने कहा पर अमलादेवी हैं जो खीज के खजूर पर चढ गई तो उतरती नही है आसानी से । झाड़ू लगाना रोक दिया और चिढ कर बोली--
तुम्ही सुन लिया करो कभी-कभी । मैं अकेली कहाँ-कहाँ मरूँ ? गेहूं धोकर सुखाने हैं .पलंग की दरारों में खटमल होगए हैं । दवाई डालनी है । तीन दिन से कपडे इकट्ठे हो रहे हैं उन्हें...
“ बस ,बस सुन लिया ."--सुधाकर ने उकता कर कहा । अमला इतने कर्कश लहजे में बोलती है कि सिर दुखने लगता है । हर वक्त काम की शिकायत ।
दरअसल काम उतना है नही जितना दिखावा तुम करती हो । सुबह बिस्तर उठाने से लेकर रात को बिस्तर बिछाने ,मच्छरदानी लगाने तक कितने ही काम हैं जिन्हें मैं ही करता हूँ ।
हाँ बडे करते हो !....और करोगे नही क्या ? घर की जिम्मेदारी क्या मेरी अकेली की है ?
ट्रिनन्...ट्रिनन्......               
उस खींचतान के बीच सुधाकर बाबू ने उस काले से उपकरण को एक सुकून भरी नजर से देखा . जैसे अचानक खिड़की खुल गई हो .उमस के बीच एक ठंडी हवा का झोंका आकर रोम रोम को प्रफुल्लित कर गया .यह फोन उन्ही के लिए होना चाहिए . आज दफ्तर जो नहीं गए .बाहर के 'कुछ लोग' कम से कम उन्हें इतना चाहते तो हैं कि एक दिन भी संवाद न हो तो लगे जैसे कुछ छूट गया है .बेशक ऐसा सोचना उन्हें बड़ा अच्छा लगा  .घर से तो दफ्तर बढ़िया है कि लोगों के साथ कुछ अपनेपन की बातें कहने-सुनने मिल जातीं हैं .
पर आजकल होता यह है कि जब भी कोई फोन आता है उठाने के लिए भले ही दौड़कर सुधीर और विक्की आएं पर फोन को अमलादेवी ही उठाती हैं .सुधीर बड़ा हो रहा है और विक्की भी कम स्मार्ट नहीं . और पतिदेव के तो हाल ही निराले हैं .घर में होकर भी वे घर में नहीं होते . 
इसलिए जब सुधाकर राय घर पर होते हैं ,अमलादेवी उन्हें वशभर फोन नहीं उठाने देतीं .यह उनकी सजगता का एक नमूना है. पर अक्सर होता यह है कि या तो कोई पतली सी आवाज आती है 'सुधाकर जी हैं ?" या फिर आवाज की जगह साँसों का सन्नाटा सा सुनाई देता है .अमलादेवी का संशय बढ़ जाता है खीज भी . 
“ कौन हो सकता है जो फोन लगाता है पर बोलता नहीं ? कोई न कोई चक्कर तो है ."
"हाँ जरुर कोई भूत होगा ."--सुधाकर राय हँसकर कहते है .पर अमला चिढ़ कर बोली -" क्यों चुड़ैल नहीं हो सकती क्या ? मैं कितनी बार कह चुकी हूँ कि आईडी कॉलर लगवा लो लेकिन मेरी बात का तो कोई असर ही नहीं है न ?” 
सुधाकर राय खूब समझते हैं कि अमला जानकर ही खुद फोन उठाती है. गज़ब की शक्की औरत है .सीधा आरोप लगा देती है कोई ‘चक्कर’ होने का .
इसे कौन समझाए कि चुपचाप  मानसिक स्तर पर व्यक्ति कहाँ कहाँ नहीं जुड़ता ,टूटता है ! वह भी जुड़े हैं और टूटे हैं लेकिन यह क्या जाने ! अमला जाने कैसे इतना नहीं समझ पाती  कि सुधाकर राय जैसे अनगढ़ आदमी से कौन चक्कर चलाना चाहेगी ! वह खामखाँ शक में उलझी रहती है .हालांकि उन्हें पत्नी का यह संदेह अच्छा लगता है . कभी कभी ऐसे संदेह बढ़ाने में जैसे उन्हें रस मिलता है .  
"अरे भई सम्पादक के सम्पर्क में लेखक भी होते हैं ,लेखिकाएं भी होतीं हैं .संपर्क बढ़ते भी हैं और इसमें आश्चर्य भी नहीं कि कोई रचनाकारा रचनाओं से भी कुछ आगे लगने लगे .अक्सर होता है ऐसा .." 
"होता है नहीं ,है मेरी आँखों के सामने . तभी तो कहती हूँ कि.... 
ट्रिनन ..ट्रिनन ..
ना इस बार फोन सम्पादक जी ही लें . अमला ने तय किया कि आज वह केवल सुनेगी .देखेगी कि सम्पादक जी का चेहरा क्या बोलता है .
“ अब अपना फोन तो उठा लिया करो.कि वह भी नहीं होता?--अमला चादर ठीक करते हुए व्यंग्यभरे लहजे में बोली ।
अपना !..क्या मतलब है तुम्हारा ?—सुधाकर ने अमला के व्यंग्य को समझकर कहा .
मैं कोई जापानी या फ्रेंच थोडी बोल रही हूँ जो मतलब समझाना पडेगा ?
नहीं ..बोल तो हिन्दी ही रही हो पर तुम्हारे शब्दों के मतलब अलग होते हैं न ?
वही तो ! चोर की दाढी में तिनका । खूब समझते हो पर अनजान बनते हो .
अरे भाई बात करो ,पता चल जाएगा कि किसका है.
पता तो तब चले जब कोई बात करे .तभी तो कह रही हूँ कि...बात करलो . फोन करने वाली को मेरी आवाज उसे पसंद नहीं है .सुनते ही फोन काट दिया .मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि फोन तुम्हारे लिए ही था ."
 वाह मम्मी आप तो बड़ी इंटेलिजेंट हो . विक्की हंसने लगा बिना आवाज सुने ही पता लगा लिया कि वह कोई महिला थी .
अब मेरी आवाज सुनकर फोन रख दिया तो जरुर वह कोई महिला या लडकी ही होगी .
बेटा तुम्हारी माँ शरलाक होम्स के खानदान से जो है ."
बाप–बेटा ,खूब मजाक उडालो पर मै घास नहीं खाती . दफ्तर की छुट्टी होने पर घर में जितने फोन आते है उनमें से आधे ब्लेंक होते हैं .क्यों ?
सुधाकर ने कहा --मुझे क्या मालूम ? और यह क्यों नहीं सोचती कि फोन सुधीर या विक्की के लिए भी तो हो सकते हैं .
उनके सब दोस्त मुझसे बात करते हैं .
आजकल लडकियाँ भी दोस्त होतीं हैं .और वे सबसे बात नहीं करतीं .”   
“ यह मजाक कुछ जमा नहीं . मेरे लडके तुम्हारे जैसे नहीं हैं .वे हर बात अपनी माँ को बताते है .और जब तुम घर में होते हो तब फोन पर न सुधीर के बोलने पर कोई बोलता है न विक्की के .फिर मैं तो पक्की दुश्मन ही हूँ .
" भरोसा  भी कुछ होता है कि नहीं ? "
"भरोसा ? और तुम पर ? कौन करेगा ? देखने में सज्जन पर आचरण ? बिगड़ा हुआ है !"
'बिगड़ा हुआ ! क्या शब्द लिया है अमला जी ." सुधाकर राय को बात चुभ गई .
"हिंदी में स्नातक उपाधि का कोई मतलब नहीं है सोच और अभिव्यक्ति बिलकुल जाहिल औरतों जैसी .'
 तो क्या गलत कहती हूँ ? मर्दों को दूसरी औरतें ही ज्यादा अच्छी लगतीं हैं .तुम क्या कोई अलग हो ? 
.कितने मर्दों को जानती हो जो....?
सबको जानने की जरुरत क्या , तुम्हें जान लेना ही काफी है .
नहीं अमला तुम मुझे नहीं जानती-समझती .—सुधाकर के अन्तर्मन से नीरव भाव-धारा फूटी—‘ तुम सिर्फ बहस करना और बात काटना जानती हो राजनीति के किसी दुराग्रही विपक्षी दल की तरह . आवाज कितनी रूखी ,आक्रामक और कर्कश होती है .दूसरी तरफ वे भी महिलाएं ही हैं ,फोन पर कितनी कोमलता से बातें करतीं हैं . कितना सुकून मिलता है जब कोई इतने सम्मान के साथ बात करता है .यह अनुभूति भी कितनी मीठी होती है कि वे एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं .किसी के लिए बहुत खास . इस तरह खास होना कितना मोहक होता है .बंद कमरे में अनायास ही कोई खिड़की खुल जाना किसे पसंद नहीं . 
पर घर तो जैसे अक्सर ही संसद भवन बना होता है . कैसी विडम्बना है कि जहां तन होता है वहां मन नहीं होता .
अच्छा ! अच्छा !... और क्यों गृहमंत्री जी , ये फोन क्या तुम्हारे लिए नहीं हो सकते ? ..समझा ..तभी तुम किसी को उठाने नहीं देतीं .."
अमला ने घूर कर देखा तो सम्पादक जी सम्हल गए -- 
" मेरा मतलब है , ज्यादातर फोन तुम्हारे ही मायके से आते है और...
हाँ, तो ? जिसके होंगे वही तो याद करेंगे . तुम्हारा तो इतना बड़ा कुरमा है .अपनेआप से कोई करता है कभी फ़ोन ? करेंगे भी तो ‘मिसकॉल’ . कंजूस नम्बर एक . इधर से हम करें तो करलें. उस दिन तुम्हारी बहन ने ... .
अरे ! यह क्या तुम्हारी–तुम्हारी लगा रखी है . क्या मेरी बहिन तुम्हारी कुछ नहीं लगती ?
उन्होंने कभी समझा है मुझे अपनी ? हमेशा मेरी कमियां तलाशती रहतीं हैं. 
तुमने भी कौनसी कोशिश की है समझाने की ?"
"हाँ तुम तो उसी का पक्ष लोगे .मैं तो ..." 
"दीदी को छोडो ,माँ ने तो तुम्हें हमेशा बेटी की तरह रखा है .न मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की . न ही तुमसे कभी कुछ नहीं कहा . फिर भी तुम उन्हें दोष देती रहती हो .हमेशा रूखा बर्ताव करती हो . उनकी नजर से भी कभी सोचकर देखा है ?
तुम लड़ना चाहते हो मुझसे उन सबके पीछे ?
नहीं मैं बताना चाहता हूँ कि दिमाग में बेवजह भरी बेकार बातों को निकाल दो ."
कैसे निकाल दूँ ,जबकि तुम्हारे लिए वे आज भी मुझसे ज्यादा हैं .इतनी दूर रह रहे हैं फिर भी मुक्ति नहीं है ..कभी घरवाले खून सुखाते हैं तो कभी...बाहर वालियाँ ..”—अमलादेवी रुआंसी होकर बोली . सुधाकर का भी गुस्सा फूट पड़ा .
बिना सोचे समझे मुंह मत खोला करो समझी .अपनी बकवास बंद करो और मुझे काम करने दो .शिकायतों के अलावा भी कुछ आता है ? जीना मुहाल होगया है . सिर्फ एक दिन की छुट्टी में घर रहना कितना कठिन होता है ! अच्छा हो कि कहीं बाहर चला जाया करूँ .
हाँ हाँ ..मैं ही खराब हूँ . मेरी बातों में तो कांटे चुभते हैं न ? ऐसे आदमी के पल्ले बंधकर मेरी तो जिंदगी बर्बाद होगई —अमला ने चीखते हुए कहा . फिर रुआंसी होकर झाड़ू एक तरफ पटक दिया और अंदर वाले कमरे में जाकर पलंग पर जा लेटी और सिसकने लगी. सुधाकरराय अवाक् देखते रहे . 
ट्रिनन ट्रिनन ...
अब सुधाकरराय को गुस्सा आगया .चाहे फोन 'करने वाला' हो या 'वाली' हो . कोई भी हो . अपनी गृहस्वामिनी ही व्यथित हो तब कैसा रोमांस ? कौनसी खिड़की ?  .
हेल्लो , अरे भई कौन हो ? क्या परेशानी है ? ...नहीं , मैं इस समय बात नहीं कर सकता .आपको यहाँ फोन करने की जरुरत भी नहीं है . हाँ ठीक सुना .क्या ?...हाँ सीधे दफ्तर में भेज देना .. और फोन पटक दिया गया .
विक्की इस घटनाक्रम से बेअसर टीवी देखता रहा . उसे पता है कि मम्मी का इस तरह ‘कोपभवन’ में जाना हर तरह के झगड़े का क्लाइमैक्स होता है .बिगड़ा हुआ यह मौसम कुछ देर बाद अपने आप ही ठीक हो जाएगा जैसे कुछ हुआ ही न हो .
तब तक सुधाकर राय किसी बेरोजगार व्यक्ति की तरह बैठे गर्मी से निजात पाने के लिए बेहाल थे और हवा के साथ बारिश का इन्तजार कर रहे थे .


5 टिप्‍पणियां:

  1. घर के लोगों की तीमारदारी करते करते अमला अपने स्वयम् को भूले बैठी थी। अपना सारा वज़ूद पति और बच्चों में खपाने के बावज़ूद आपको वो सम्मान नहीं मिलता क्यूँकि आप अपना निजी व्यक्तित्व विकसित नहीं करते और फिर दूसरों को अपने में रमने का विचार आप में एक कुंठा का जन्म ले लेता है।

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  2. बहुत ही ध्यान से पढ़ रही थी ,बहुत ही अच्छा लिखा है ,आप आयी इसके लिये धन्यवाद

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  3. बहुत ही ध्यान से पढ़ रही थी ,बहुत ही अच्छा लिखा है ,आप आयी इसके लिये धन्यवाद

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  4. अच्‍छी कहानी। बिलकुल स्‍वाभाविक पात्र रचना ।

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  5. एक शहरी उत्तर भारतीय घर का इतना सजीव चित्रण किया है कि क्या कहूँ और
    ( कौन हो सकता है जो फोन करता है पर बोलता नहीं जरूर कोई न कोई चक्कर जरूर होगा, हाँ जरूर कोई भूत होगा सुधाकर बाबू हँस कर कह देते हैं क्यूँ कोई चुढैल नहीं हो सकती)
    यहाँ तो मैं अपने बिस्तर पर दीवार के सहारे पढ रहा था हँसते २ लुढक गया
    कमाल रचा है आपने
    और मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित कर गया शेरलाक होल्मस का उदाहरण बेहद अच्छी रचना

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