शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

उसके लायक

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है यहाँ अधिकांश कहानियाँ वे हैं( कुछ कहानियों को छोड कर ) जो या तो अधूरी पडीं हैं अब तक या कहीं किसी फाइल में गुमनाम । यह कहानी सन् 1989 में लिखी थी । एक दो जगह भेजी पर बात नही बनी । कुछ सुधार के बाद यहाँ दे रही हूँ ।
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वह जिस दिन पहली बार कक्षा में आई थी ,उस दिन तो सबने ऐसा मुँह बना लिया था जैसे धोखे से कडवी ककडी चबा गए हों .....
दो माह पहले मैं शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्रांगण में कचनार के पेड के नीचे बैठा  अनायास ही पन्द्रह साल पहले के उन दिनों को याद करने लगा था जब मैं आठवीं कक्षा पास कर आगे की पढाई के लिये बुआ के पास सुजानगढ में रहा था ।
कस्बा कम देहात ज्यादा लगने वाला सुजानगढ मुख्य सडक से दूर एक पहाडी कस्बा है । गढ के नाम पर एक छोटा सा किला है जहाँ कभी राजा रहा करते थे । तब तो उनका ही राज चलता था पर अब वहां स्कूल ,बैंक और डिस्पेंसरी चलती है । पहाडी के नीचे एक छोटी सी नदी बहती है । इन पन्द्रह सालों में वहाँ इतना अन्तर आया है कि गोपू हलवाई की दुकान बीच बाजार से हट कर बस-स्टैंड पर आगई है और उसके पेडों में अब वह बात नही जो कभी सुजानगढ की पहचान थी । नदी में जहाँ पानी होना चाहिये वहाँ पानी की जगह बच्चे क्रिकेट खेलते हैं और लडकियाँ जो दुपट्टा को कन्धों पर फैला कर और गर्दन को कन्धों के समानान्तर रख कर बहुत जरूरी होने पर ही सडक पर निकलतीं थीं वे निस्संकोच खूब हँसती-बतियाती हुई स्कूल जातीं हैं और हर तरह के बिल भरने तक का काम करतीं हैं । जो बात आज भी वहाँ के लोगों में देखी जाती है वह है लोगों की बेफिक्री व मौजमस्ती । कहो तो ताश खेलते-हँसते पूरा दिन गुजार दें और कहो तो जरा सी बात पर विधानसभा में हंगामा खडा करदें । खैर यह सब मेरी कहानी का हिस्सा बिल्कुल नही है । मेरी कहानी सोलह-सत्रह साल पहले के केवल अपने स्कूल पर केन्द्रित है । स्कूल में भी  हमारी कक्षा और कक्षा में भी उस एकमात्र लडकी पर केन्द्रित है जो मेरे साथ स्कूल में पढी थी हालाँकि नियमित रूप से एक-डेढ साल ही कक्षा में आई थी । बाकी डेढ साल उसने कैसे पढाई की । और परीक्षा-परिणाम क्या रहा ,तब तक मुझे नही मालूम था ।
पहले यह बतादूँ कि जी.पी. कॅालेज के प्रांगण में मैं इस तरह अतीत की गलियों में गुजरने के लिये नही बैठा था । वहाँ मैं एक प्रतियोगी परीक्षा के लिये आया था और मेरे लिये एक-एक पल महत्त्वपूर्ण था । बस नौ बजे ही मुरैना पहुँच गई थी और परीक्षा प्रारंभ होने में अभी एक डेढ घंटा था । तब तक यही बेहतर था कि इधर-उधर भटककर समय गुजारने की बजाय याद किये हुए को दोहरा लूँ ।
सच पूछा जाए तो परीक्षा से ठीक पहले कुछ पढना या याद करना तेज चलती ट्रेन के डिब्बे गिनने जैसी कोशिश करना है । कुछ पल्ले ही नहीं पडता । लेकिन जब तक कोई हाथ से किताब छीन कर न रखदे छोडने का मन भी तो नही होता । लगता है कि कुछ और समय मिल जाए तो पूरी तैयारी हो ही जाएगी । जैसे कि उन पलों की तैयारी पर ही सारी सफलता टिकी होती है । जो भी हो वह परीक्षा मेरे कैरियर की दिशा में बडी महत्त्वपूर्ण ही नही बल्कि अन्तिम परीक्षा भी थी । कुछ ही महीनों बाद मैं ओवरएज जो होने वाला था । और आपको आज यह बात बडी खुशी के साथ बता रहा हूँ कि अब मैं उस परीक्षा में सफल भी हो चुका हूँ । आज ही परिणाम की सूचना मिली है और इस सफलता के बाद तो और भी जरूरी है कि मैं आपको वह सब बताऊँ जो कहीं न कहीं इस परीक्षा से जुडा है । क्योंकि परीक्षा के दौरान जो कुछ हुआ उसके तार मेरे स्कूली जीवन से भी जुडे है ।
जीवन की कई घटनाएं अप्रत्यक्ष रूप से आपस में जुडी होतीं हैं । समय आने पर उनके जुडे होने का अहसास हमें रोमांचित करता है ।
हाँ तो मैं बता रहा था कि मैं कालेज के प्रांगण में एक पेड के नीचे अकेला ही बैठा था और गाइड खोल कर कुछ और भी पढने--समझने की कोशिश कर रहा था कि एक महिला  वहाँ से गुजरी । मैं उसका  चेहरा तो ठीक से नही देख सका पर पर जाने कैसे अचानक मुझे अपनी क्लासमेट सरिता का ध्यान आया । मैं अनायास ही स्मृतियों की उन गलियों में पहुँच गया जहाँ उम्र के वसन्त में हर टहनी पर कलियाँ फूट निकलने को आतुर होतीं हैं । सूरज क्षितिज की बाँहों से छूट कर पूरे आसमान में फैल जाने को उत्साहित रहता है ।
मिडिल स्कूल के छोटे से दायरे से निकल कर बडे स्कूल में पहुँचना मेरे लिये काफी रोमांचक था । नए दोस्त ,नया माहौल ,नए शिक्षक और उम्र के नए अहसास...। अभी पढाई विधिवत् शुरु नही हुई थी । केवल प्रेजेन्ट लेने हिन्दी वाले सर आते थे और नागरिकशास्त्र वाले सर संविधान की कुछ चलताऊ कहानियाँ सुना कर चले जाते थे । बाकी समय में हम लोग या तो चुटकुले सुनाते रहते या स्कूल से भागने की योजना पर अमल करने की सोचते रहते थे तभी एक दिन एक सहपाठी घनश्याम ने एक सूचना दी ----"अरे भाइयो सुनो-सुनो ,ध्यान लगा कर सुनो । अभी-अभी पता चला है कि हमारे क्लास में एक लडकी भी आने वाली है । उसके पिताजी आज ही उसका फार्म व फीस जमा करने आए हैं ।"
उन दिनों किसी लडकी का पढने जाना और वह भी लडकों के स्कूल में किसी ब्रेकिंग न्यूज जैसा था
उस सूचना पर हम सब ऐसे केन्द्रित होगए थे जैसे बरसाती रात में जलते बल्ब के आसपास कीडे-मकोडे जमा होजाते हैं ।
घनश्याम हमारे क्लास का मसखरा था । मस्त व बेफिक्र । बात बात पर चुटकुले सुनाना ,गीत गा गाकर कमर-कूल्हे मटकाना और मिमिक्री करना--ये सारी खूबियाँ उसे खूब लोकप्रिय बनातीं थी । दूसरे स्थानों पर हो न हो लेकिन सुजानगढ के स्कूल में लडकी के पढने आने की बात सचमुच एक खास घटना थी । सुदूर अंचलों में किसी बिसाती के पहुँचने जैसी । पूरे इलाके में एक ही हायर सेकेन्डरी स्कूल था । लडकियों की पढाई के लिये भी वही एक स्कूल था । इसके बावजूद लडकियाँ वहाँ कम ही पढने आतीं थीं । तब देहात में तो लडकियों को कोई पढाता भी नही था । पर सुजानगढ के पढे-लिखे अच्छे घरों की लडकियाँ भी नाम लिखाने के बाद सीधी परीक्षाओं में ही दिखतीं थी । बात यह थी कि सुजानगढ का स्कूल हुल्लडबाजी के लिये जिलेभर में जाना जाता था । वहाँ आकर बाहर गाँवों के सीधे लडकों के भी मानो सींग निकल आते थे ।
'क्या बात कर रहा है तू ।'-- जगदीश एकदम उछल पडा । उस सूचना ने लगभग सभी को जिज्ञासा से भर दिया था ।
"अरे घनश्याम जी बडी मीठी सी खबर लाए हो । जरा हमें तो बताओ कि लडकी कौन है कैसी है ?"-मुंशी ने शरारती अन्दाज में पूछा ।
" जल्दी काहे की बेटा !"--- सुरेश मुस्कराया फिर धीरे से बोला---अरे यार लडकी है तो अच्छी ही होगी"  ।
मुंशी ,जगदीश ,ओम, सुरेश वगैरा दो-दो साल के फेलुअर थे । उनका काम नए लडकों पर रौब चलाना ,शरारतें करना और लडकि'यों पर फब्तियाँ कसना था । रात-रात में जंगल से लकडियाँ काट बेच कर सुबह तक सुजानगढ लौट आते थे । मैं कक्षा में सबसे छोटा था । अपेक्षाकृत होशियार और स्मार्ट भी माना जाता था । इस कारण वे सब मुझे प्रिंस कहते थे । और इसी बहाने अपने छूटे हुए काम मुझसे करवा लेते थे । घनश्याम की बात सुनने के बाद से सब यही सोच रहे थे कि कक्षा में लडकी रहेगी तो रौनक तो रहेगी ही । यही नही बैठने की जगह ,उसकी मदद और उसके साथ जोडी भी बनाने की योजनाएं विधिवत् बना ली गई थीं । जोडी बनाने की बात पर खूब खींचतान हुई । मुंशी उस पर अपना दावा करता और जगदीश अपना । सुरेश ने मेरा भी नाम उसके साथ जोड दिया । मुझे ऐसा सोचना काफी अच्छा भी लगा था । अच्छा और नया ।
लेकिन पहली बार जब वह कक्षा में आई ,उसे देख कर पहले तो यही हुआ कि सबकी हालत फूँक मार कर बुझाई हुई बत्ती जैसी होगई । जो कुछ आँखों के सामने था वह कल्पना से एकदम उल्टा था । एकदम अनगढ पत्थर सी वह लडकी तो लडकी नाम को भी लजा रही थी । न रंग की न रूप की । किसी भी कोण से आकर्षक नही । ऊपर से खींच कर बाँधी गईं चोटियों के कारण आँखें खिंची--खिंची सी होगईं थीं । चेहरे पर चमकता तेल ,पुरानी फ्राक ,प्लास्टिक की सफेद जूतियाँ और कन्धे में टँगा हुआ हाथ का सिला थैला...कुल मिला कर वह एक फूहड और गँवारू लग रही थी । उसे देख कर हमारी आशा व जिज्ञासा दोनों ही मन से निकल गईँ । टायर से जैसे हवा निकल जाती है ।
हमें जल्दी ही पता लग गया कि वह चार-पाँच कि.मी. दूर देहात से पैदल चल कर आती थी । कभी--कभी साइकिल से भी आती थी । उसकी साइकिल काफी पुरानी व जंग खाई थी । उसके हिसाब से काफी ऊँची भी थी । शायद उसके पिता की होगी । उसके पाँव पैडलों तक ठीक से नही पहुँचते थे । पूरा पैडल घुमाने के लिये उसे लगभग आठ-आठ इंच आजू-बाजू झुकना पडता था ।
उसके पिता प्राइमरी स्कूल के मास्टर हैं । सो इतना जरूर समझते होंगे कि भगवान ने अगर रंगरूप देने में कमी करदी है तो उसे पढा-लिखा कर पूरी किया जा सकता है । तभी तो अकेली लडकी को इस तरह पढने भेज दिया है ।----सुरेश ने बताया । उसकी पूरी पत्रिका उन लोगों के पास आ चुकी थी
और सीधा हमारे सिर पर ठीकरा फोड दिया है ।
"यार घनश्याम यह क्या जलेबियों की जगह रूखी रोटियाँ ले आया वह भी बाजरे की ।-"-जैसे ही वह पहली बार कक्षा में आई थी मुंशी रोने की मुद्रा बनाकर बोला । सबको हास-परिहास के लिये बढिया विषय मिल गया । टाइमपास ।
सुरेश ने पुचकारा--"-वत्स चिन्तित न हो । इसके लिये हमारा सुरेन्द्र है न । एकदम फिट । राम मिलाई जोडी एक अंधा एक कोढी ।"
सब लडके हँसने लगे । लडकी चकित सी सबकी ओर देखने लगी ।
सुरेन्द्र हमारी कक्षा का सबसे कुरूप लडका था । गहरा स्याह रंग ,पीले कंचे जैसी आँखें और नाक आँखों के बीच पूरी तरह गायब रह कर सीधी होठों के ऊपर निकली थी । डेल्टा के आकार में । उसके घर में आटा माँगने का काम होता था इसलिये मुंशी उसे चुकट्या कहता था जिसका वह उतना बुरा नही मानता था जितना उसे उस लडकी के साथ जुडने की बात सुन कर लगा । तिलमिला कर बोला---
अच्छा , तो तुम लोगों ने मुझे बस उसके लायक ही समझा है और खुद को सलमान खान समझते हो । कि तुम्हारे लिये कोई माधुरी दीक्षित आएगी ..।
वह वह सहमी सी चुपचाप एक तरफ बैठ गई । उसके बगल वाले लडके इधर-उधर भागने लगे तो हँसी का एक फव्वारा फूट कर बह चला । और कक्षा में इस तरह स्वागत हुआ उस लडकी गँवई सरिता का ।
 सरिता...हाँ यही नाम था उसका । पर लडके उसे सरीता कहते थे । बाद में वह सरीता से सरौंता भी होगई । हाँ मैंने जरूर आज से पहले उसे उसके नाम से कभी नही पुकारा । मुझे लगता है कि नाम लेने का आधार अच्छी जान-पहचान व अपनापन होता है । नही भी होता है तो बनने लगता है । मेरे साथ न तो पहली स्थिति थी न ही दूसरी बनने वाली थी । मेरे लिये तो वह मात्र एक 'परसन' थी । एक लडकी । बस और कुछ नही । उसके लिये अगर कोई भाव था तो वह था उसके समग्र व्यक्तित्त्व से वितृष्णा का । कुछ--कुछ हेयता का भी । यह भाव दो कारणों से था । एक तो यही कि वह लडकी होकर भी लडकों के स्कूल में पढने आगई थी । लडकी का लडकों के साथ बैठ कर पढना यानी लडकों को बदतमीजी करने तथा उसके बदनाम होने के पूरे सौ परसेंट चान्स । दूसरे उसकी बोलचाल व बर्ताव बडा ही उजड्ड व गँवारू सा था । लडकियों वाली कोई बात ही नही थी ।
स्कूल में एक-दो लडकियाँ और भी थीं पर वे थीं काफी सम्पन्न घराने की और सलीके वालीं लडकियाँ  । उनके घरों में न केवल एक-दो लोग अच्छी नौकरियों पर थे और अंग्रेजी बोल सकते थे बल्कि थाने से लेकर मंत्रालय तक उनकी पहुँच थी । उनके विषय में किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने का साहस भी नही था किसी में । उनमें एक लडकी बहुत खूबसूरत भी थी । मुंशी वगैरा उसे दबी जुबान से आपस में ही मृगनयनी कहा करते थे । वे लडकियाँ जब भी स्कूल आतीं ,सरिता को ऐसे देखतीं थीं जैसे किसी शानदार मॅाल में कोई ठेठ अनपढ देहाती घुस आया हो । वह एकदम फूहड किस्म की देहातिन लगती भी थी । उसके बालों व फ्राक की जेबों में घास के तिनके या कुट्टी के टुकडे मिलते थे । शायद घर में भैंस-गाय होंगी । उसके होंठ खुले रहते थे । और कभी-कभी नाक भी भरी हुई रहती थी । कपडे भी एक ही जोड थे क्योंकि कई बार उसका पाजामा मुचडा या अधसूखा होता था ।
वह या तो बिल्कुल ही नासमझ थी या फिर नासमझी का दिखावा करती थी हालाँकि दिखावा करने लायक अक्ल उसमें लगती नही थी । क्योंकि वह हमारी उपेक्षा से अनजान लडकों से ही कई तरह के सवाल करने में नही हिचकिचाती थी जैसे कि , "चार बजे यहाँ से कौनसी बस जाती है । कि अँग्रेजी में सर ने कितना पढा दिया है । या कि एक दिन के लिये अपनी कापी दे दो भैया ..।"
"भैया...अरे यार क्या मजाक है ? यह तो बहन-भाई का रिश्ता जोडने लगी "--मुंशी रुआँसी मुद्रा में कहता । सुरेश हँसता--"अच्छा है न । दूसरे रिश्ते लायक वह है भी नही । "
फिर भी वह लडकी थी । हमसे बिल्कुल अलग । उसकी मौजूदगी को  नजरअन्दाज भी तो नही कर सकते थे । यही नही जगदीश ,मुंशी और दूसरे लडके अक्सर उसे सुनाने के लिये बहुत ही फालतू से कमेंन्ट्स करते रहते थे । जैसे कि---
" यार सुरेश पेड में ढंग से पानी नही दिया होगा वरना इसमें भी अब तक फूल--फल तो आ ही जाते ।"
" एक तो गिलोय ऊपर से नीम चढी यार कैसे पीसें और पियें । "
यही नही वह आकर जहाँ भी बैठती कोई न कोई अपनी किताबें रख देता वह खडी रहती । शिक्षक जब क्लास में आते तो चुपके से जगह खाली कर देते । यह सब वह चुपचाप देखती रहती पर किसी से कोई शिकायत करना ही नही जानती थी । उसे अपने होने का कोई भान ही नही था जैसे । तभी तो लडकों की गोलमोल सी टिप्पणियों को सुन कर प्रतिक्रियाहीन बनी रहती थी ।
एकदिन तो गजब ही होगया---
मुंशी लडकी की ओर इशारा कर जगदीश से कह रहा था---"ए टेक माइ पेन्....।"
जगदीश को पूरा यकीन था कि मुंशी ने इसके आगे भी कुछ अक्षर जोडे थे जिन्हें वह साँसों में ही बोल गया था सो ढिठाई से हँसता हुआ बोला---"मुझे नही चाहिये । मेरे पास तो अपना है । उसे दे दे जिसको जरूरत हो । जगदीश का इशारा भी लडकी की तरफ था ।"
"चल हट मेरी चीज ऐसे-वैसे लोगों के लिये नही है ..।"
सुन कर सब हँस पडे । वह लडकी भी हँस पडी । एक अबोध सी हँसी । जगदीश बोला---"यह तो सचमुच निरी बेवकूफ है ।
अभी बच्ची है ।"--सुरेश ने भी दया दिखाई ।
इस तरह अनगढ पत्थर सी वह नासमझ लडकी हमारे किसी काम की नही थी । कक्षा में उसके होने न होने का कोई अर्थ नही था । पूरे साल वह इस तरह कक्षा में बनी रही जिस तरह किसी के बाजू वाले फ्लैट में कोई सालों साल रह जाता है पर न कोई विवाद और नही कोई संवाद ।  
 दादी के शब्दों में उसे---बिल्ली का गू ,कहा जासकता था । न लीपने का न थापने का ।
जोडी बनाने की बात पर सबने एक दूसरे को जलती आखों से देखा ।

लेकिन दसवीं पास करते-करते कहानी में मोड और दिलचस्पी आई ।
उम्र के साथ चेहरे में कुछ लोच और आकर्षण भी आगया और फिर  साथ रहने वाले तो जानवर के प्रति भी एक जुडाव सा होजाता है फिर वह तो एक लडकी थी । असुन्दर ही सही पर चढती नई उम्र में लडकी वसन्त की टहनी सी आकर्षक लगती है । उस पर अकेली । उसके प्रति लडकों का नजरिया भी धीरे-धीरे बदल गया । मुंशी उससे कोई परेशानी होने पर बेझिझक मदद माँगने का आग्रह करता तो जगदीश उससे किसी न किसी अधूरे रहे होमवर्क के बारे में पूछता । तो सुरेश ,जब भी वह कुछ पढती सबको ऊँची आवाज में निर्देश देता--"अरे यार डिस्टर्ब मत करो । पढने वालों को पढने दो ।"
लेकिन वह गजब की मट्ठर थी । इन गतिविधियों से बेअसर जैसे भारी वर्षा में कोलतार की सडक । व्यवहार में नाम का भी लोच नही आया । मदद माँगना तो दूर ,अब वह एक दूरी सायास बनाए रखती थी तथा सबसे अलग अनजान बनी सी अपनी किताबें पढती रहती थी । हालाँकि मेरी नजर में एक लडकी के लिये यह उचित भी था । मेरा तो यह भी मानना था कि वह इन लोगों की बातों से बचने के लिये ही व्यस्त रहने का दिखावा करती थी । पढाई क्या खाक करती होगी । पर उसका यों कट कर रहने के लिये पढने का बहाना खोजना मुंशी और उसी जैसे दूसरे लडकों को अपना अपमान लगने लगा । ऐसा कैसे हो सकता था कि एक लडकी उनके होते हुए न केवल पढती रहे , बल्कि उन्हें नजरअन्दाज भी करती रहे । उनके कमेंट्स पर भी ध्यान न दे । अकड और गरूर तो सिर्फ खूबसूरत लडकियों को शोभा देता है ।यह किस बात पर अकड दिखाती है । उस पर यह भी गजब कि कक्षा में वही सबसे पहले अपना काम पूरा करके शाबासी पाती । सर लोग हम सब लडकों को सम्बोधित कर कहते--
"सरिता को देखो और सीखो कि जब काम करना ही होता है तो कोई बहाना नही चलता । यह लडकी होकर भी गाँव से पढने आती है घर के काम करती है और तुम सबसे अच्छा काम करके दिखाती है।"
"अच्छा तो अब इसके कारण हमें बेइज्जती भी सहनी होगी ..।"--हमें अहसास हुआ ।
एक दिन बात बहुत बढ गई । हुआ यह कि पीरियड खाली था । मुंशी रजिस्टर से तबला बजा कर  भद्दा सा गीत गाने लगा ---हाय करिहा के दरद ने ....। लडके ताली पीटने लगे ।
वह लडकी क्लास से बाहर जाकर आफिस के पास पडे स्टूल पर बैठ कर पढने लगी । गुप्ता सर ने उसे यही निर्देश दे रखा था । लेकिन हमारी बदकिस्मती से सिंह साहब (प्रिंसिपल) ने यह सब देख लिया । यानी लडकी को कक्षा से बाहर बैठे और हमें गाते बजाते । सिंह साहब अपने अनुशासन के लिये जिले भर में जाने जाते थे । बस हम चार-पाँच लडकों को बुलवाया । जरूर पहले से भी उन तक कोई जानकारी पहुँच रही थी  हमारे बारे में वरना नाम लेकर हमें ही क्यों बुलवाते । बुलाकर उन्होंने हमें पहले खूब लताडा फिर एक लम्बी नसीहत व चेतावनी दीं कि अगर ऐसी वैसी हरकतें कीं ,  लडकी को परेशान किया तो ठीक नही होगा । सारा लफंगापन निकाल देंगे ।  स्कूल से रेस्टीकेट कर देंगे आदि..।
इस घटना के बाद मैं और सुरेन्द्र जैसे भलमनसाहत का लेबल चिपकाए बैठे लडके तो मामले से चुपचाप दूर खिसक लिये पर ओम के मन में तो जैसे आग ही सुलग उठी । ओमपाल शर्मा तेजपाल शर्मा का बेटा था जो सुजानगढ के जाने माने लोगों में से था और जनपद अध्यक्ष भी । यह जाना-माना-पन केवल धन का ही नही तमाम हथकण्डों का भी था जिनके बल पर अपनी सत्ता जमाए था । सत्ता को बनाए रखना सत्ता हासिल करने से कम कठिन नही होता ।
"अब तो यह अपना  प्रस्टेज पाइंट बन गया समझो । दो कौडी की लडकी के कारण हम अपमानित हो रहे हैं ।'--मुंशी ने दाँत चबाते हुए कहा--- "परेशान अब तक तो नही किया था पर अब करके दिखाएंगे । नदी में रह कर मगर से बैर । अब यह सुजानगढ में नही पढ पाएगी । हमने सोचा था कि चलो गाँव की सीधी-सादी लडकी है ..। पर यह तो हमें ही रास्ता बताने लगी ।"
इसके बाद ऊपर से सब शान्त पर भीतर भारी उथल-पुथल । संकल्प । पुरुष को जो सबसे ज्यादा अखरता है वह है स्त्री की अपराजेयता । उसे तोडना ही उसके लिये जैसे सबसे जरूरी काम होजाता है । फिर सचमुच उसके लिये बहुत सारी मुश्किलें पैदा की गईं । कभी उसकी किताबें गायब की जाने लगीं । कभी उसके नाम चिट्ठियाँ डाली जाने लगीं । यही नही उसके नाम के साथ दीवारों ,फर्श ,छत और रास्ते में कहीं भी अश्लील बातें लिखी जाने लगीं । पहले तो स्कूल में खूब हलचल मची । सर लोगों को लाख कोशिशों के बाद कोई सबूत हाथ नही लगा । क्योंकि राइटिंग किसी से मेल ही नही खाती थी । बिना सबूत के तो चोर राजा बराबर ही होता है । धीरे-धीरे पूरे सुजानगढ में इसकी चर्चा होने लगी । लडकी जिधर से भी निकलती ,उसे देखते ही हर कोई कहता ---"अरे देखो वो लडकी है जिसका नाम कोई बडे गन्दे तरीके से लिख जाता है । बाप जी उसे बनाने चले थे' पिराम मिनस्टर '। हमारी भी तो लडकियाँ हैं ।"
उस लडकी के गाँव के दूसरे लडके भी पढने आते थे । उन्होंने हमें बताया कि थू-थू हो रही है सब जगह । गाँव में जहाँ देखो यही कहा जा रहा है कि मास्टर से  कितनी मना करी थी कि लडकी को मत पढाओ । जमाना खराब है पर कान्तीलाल को तो धुन सवार हुई कि लडकी को पढा लिखा कर काबिल बनाना ही है । अब देखो कालिख पुत रही है कि नही । कोई भला आदमी तो ब्याहने भी राजी नही होगा । कुशल चाहो तो अपनी लडकियों को दूर ही रखना उससे । मजे की बात यह कि लगभग सभी ने दोषी अपशब्द लिखने वाले को नही बल्कि उस लडकी को माना जिसके लिये वह सब लिखा गया । आखिर बदनामी लडकी की ही होती है न ।तो चिन्ता भी उसी को करनी चाहिये कि नही ।
इस सबका असर यह हुआ कि वह अकेली पड गई । स्कूल में तो वह अकेली थी ही पर अब गाँव से भी उसके साथ कोई नही आता था । सुनसान रास्तों से अकेली कब तक स्कूल जाती । आखिर लडकी ही तो थी ।
और अन्ततः उस लडकी का स्कूल आना बन्द हो ही गया । मुंशी ने सिकन्दर की तरह सबको देखा । छाती ठोकी । मुझे लगा कि लडकी ने यह ठीक ही किया । पढ लिख कर भी वह कौनसी इन्दिरा गान्धी बन जाती । इतनी बदनामी झेल कर पढना क्या जरूरी है । कम से कम लडकी के लिये तो बिल्कुल नही ।
हैरानी की बात यह हुई कि उसके घर से कोई शिकायत करने भी नही आया । अगर उसके पिता ने कोई सख्त कदम उठा या होता तो शायद  हम लडके कमजोर पड जाते ।यह हमारी जीत थी ।
"कौन आता ! पिता तो वैसे ही शर्म के मारे गर्दन झुकाए बैठा होगा ।"--जगदीश बोला --मेरी दादी कहती थी कि रूप और गुणहीन कन्या का पिता सबसे ज्यादा बेचारा होता है फिर यह तो बदनाम भी होगई थी । हाँ परीक्षा देने के लिये वह जरूर आई थी लेकिन वैसे ही जैसे कोई सुरक्षा के बीच कोई अपराधी लाया जाता है । इसके बाद क्या हुआ । वह पास हुई या फेल ( वैसे फेल होने के चांस ही ज्यादा लग रहे थे ।) शादी हुई या नही कुछ पता नही चला । इसकी कोई जरूरत भी नही थी । हमारे लिये वह गए साल के कैलेण्डर की तारीख भर थी । पर उस साल के गुजर जाने का कही हल्का सा भी मलाल नही था ,यह कहना भी मुश्किल था । दूब की जड की तरह वह घटना मन की जमीन में कहीं दबी थी तभी तो एक महिला को देख कर एकदम हरियाने लगी थी । हालाँकि यहाँ इतने बडे कालेज में उसके मिलने की कल्पना मुझे एक बारगी निरर्थक ही लगी ।
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परीक्षा प्रारंभ हुई । पेपर देख कर मुझे पहले तो पसीना ही आगया । उसमें हिन्दी वाला भाग मुझे सबसे ज्यादा मुश्किल लगा । वैसे जितनी भी कठिनाइयाँ हैं वह हिन्दी में ही आतीं हैं । वह भी साहित्य के इतिहास और काव्य सिद्धान्त में । मैं खीज उठा । अब इससे क्या फर्क पडता है कि दुष्यन्त कुमार गीतकार हैं या गजलकार कि निराला जी छायावाद के कवि हैं । पर उनकी कविताओं में प्रगतिवाद के स्वर सबसे ज्यादा हैं कि ध्वनि सिद्धान्त क्या है, और साधारणीकरण किसका होता है । किस काम के हैं ये सवाल ?
अब समझ आ रहा है कि लडके-लडकियाँ ऐसे सवालों को छोड क्यों तकनीकी शिक्षा में जा रहे हैं ।उन्हें हिन्दी आए न आए पर अशिक्षित मजदूर वर्ग में बच्चों की पैदावार की तरह ही उग रहीं कम्पनियाँ उन्हें धडाधड नियुक्तियाँ दे रही है । मैं सोच रहा था कि क्यों नही मैंने भी उस तरफ ध्यान क्यों नही दिया । खैर....।
पिछली बार की अपेक्षा इस बार पेपर कुछ ठीक रहा और मैं उम्मीद के साथ लिखने में व्यस्त था कि एक गुलशन ग्रोवर टाइप एक व्यक्ति ने अचानक आकर मेरी कापी उठाली और कडक कर कहा --"आउट । अब भी ऐसी बचकानी हरकतें कर रहे हो ।" उसे मेरे पास ही पडी दो चिटें मिलीं थी और संयोग से मैं वही सब लिख भी रहा था ।
"सर वो मेरी नही हैं । आप यकीन करें मैंने कुछ नही किया ।"--मैंने गिडगिडाते हुए कहा ।
ऐसे में कैसी दयनीय हालत हो जाती है । पर वह मुझसे फार्म भरवाने अडा ही रहा ।
"फार्म भर कर तो मेरा कैरीयर चौपट हो जाएगा सर ।"--मैं फिर गिडगिडाया ।
"यह पहले नही सोचा था ?"-- वह बोला । वह सचमुच बडा ही कठोर अधिकारी था । जरा नही पिघला  ।  एक-दो लोग और भी आगए । मन का ज्वाला मुखी ठंडा पड चुका था । वरना इतना सुनने के बाद कौन चुप रहता । मैं इस तरह अपनी बेइज्जती सहने का आदी कहाँ था । पर गरज जो थी । पिताजी व माँ की उम्मीदभरी आँखें मन में ज्वार उठा रही थी । मैंने असहाय होकर चारों ओर देखा । बचने का कोई उपाय नजर नही आ रहा था । काश यहाँ अपना कोई परिचित होता ...। तभी एक पतली मगर मजबूत आवाज आई----"राजीव जी, वहाँ मैं देखती हूँ आप इधर आइये...। आपको हिन्दी के विभागाध्यक्ष श्री तोमर साहब याद कर रहे हैं ।"
मैं चौंका । यह तो वही महिला थी जो प्रांगण में मेरे सामने से गुजरी थी । जिसे देख कर मुझे सरिता वर्मा का ध्यान आया । अब वह ध्यान और भी निरन्तर होगया । इसकी तो आवाज भी सरिता जैसी है । कहीं यह वही तो नही ...। हाँ वही तो है । एकदम सरिता वर्मा । बाकी कमी उसकी टिप्पणी ने करदी जो बात में अतीत को चिपकाती हुई मुखर हुई----"यह क्या है ? आप अपने कैरियर के प्रति आज भी सचेत नही हैं ?
मैं मुश्किल से ही उसे देख पाया । वह काफी सुलझी सँवरीथी । सुरुचिपूर्ण वेश में शालीन भी लग रही थी । यहाँ उसकी ऐसी स्थिति है कि उसकी आवाज पर ही निरीक्षक मेरे नकल प्रकरण को छोड कर उसके पीछे चला गया । मेरे लिये यह सब अप्रत्याशित था । और दिल--दिमाग पर पूरी तरह छा जाने वाला भी पर वह समय केवल परीक्षा देने का था । मैं कुछ समय सब कुछ भूलकर उत्तर लिखने लगा । लेकिन उसकी बात अन्त तक दिमाग में गूँजती रही ।
परीक्षा देकर जैसे ही मैं बाहर जाने लगा ,एक आदमी ने मुझे पुकारा---"ओ भाई ,आपको वो मैडम बुला रहीं हैं । छह न.वाले रूम में ।"
उसी आदमी से मुझे पता चला कि सरिता यहाँ असिस्टेंट प्रोफेसर है । उसके पति भी इसी कालेज में ही हैं । वाह सरिता वर्मा कैसी हार उपहार में दी है तुमने । मुझे याद आया कि लडके उसे व्यंग्यवश मैडम क्यूरी , लैक्चरारनी , प्रोफेसरनी ..और न जाने किन किन उपाधियों से नवाजते थे । जगदीश कहता---"इतना मत जलो ,मास्टरनी तो वह बन जाएगी ।"
"अरे भाई जगदीश की बातें हैं ...वरना यह मुँह और मसूर की दाल..।"
मैं कक्ष में जाने में झिझक रहा था । किस मुँह से सामने जाऊँ । पुरानी बातें पीछे छोड भी दे तो इस हाल की बात पर क्या शर्मिन्दा न करेगी यह सरिता वर्मा ।
"अन्दर आओ । "--उसने मुझे दरवाजे पर ही खडा झिझकता हुए देख लिया ।
उसकी आवाज पर मैं फिर चौंक उठा । वह कह रही थी ---"मैंने तुम्हें देखते ही पहचान लिया । अन्दर आओ ।" मैंने कृतज्ञता दिखाते हुए अभिवादन किया ।
आप यहाँ । मैडम ...वाह क्या बात है एकदम अप्रत्याशित । कहाँ तो  वे .... और कहाँ आप...। मैं तो एकदम ....।
"अरे वह सब छोडो ।--उसने मेरी बात को पीछे करके पूछा--- यह बताओ पेपर कैसा गया ? कौनसा अटेम्प्ट है यह ?
"मैडम आखिरी है बस । देखते हैं...।"
"इस बार तो निकल जाओगे मेरा विश्वास है । लेकिन वह क्या मामला था जो भदौरिया जी कापी छीन रहे थे । उन्हें मैंने ही वहाँ से हटाया था । वैसे सचमुच तो चीटिंग नही थी कहीं "---वह हल्का सा मुस्कराई । पर मैं अभी भी संकुचित था ।
" जी नही यकीनन उसमें मेरी गलती नही थी मैडम ..।"
"अरे, यह मैडम--मैडम क्या लगा रखी है ? मैं सरिता हूँ भाई । आपकी क्लासमेट । ..और उन लोगों के क्या हाल हैं ? मुंशी ,सुरेश ..जगदीश.. ओम..।"
"ये लोग बडे शरारती थे-"--हँसते हुए उसने अपने पति को बताया---"दिमाग में जाने क्या-क्या चलता रहता था । एकदम निरर्थक । लेकिन मुश्किल यह है कि असल में भविष्य के तय होने का समय भी वही होता है न ! "
मैं अवाक् था । उसकी बातों में सहजता थी । अतीत की कोई स्मृति , कटुता या मलाल नही था । आज भी अगर वह न होती तो....।
उस दिन मुझे लगा कि अचानक मेरा कद बहुत छोटा होगया है । बौना कहलाने लायक । मुझे एक बार फिर याद आया कि सुरेन्द्र जैसा लडका भी सरिता वर्मा को अपने लायक नही समझता था लेकिन आज यह सच साबित हो ही गया कि उसके लायक तो वहाँ कोई था ही नही । न सुजानगढ के सर्वसम्पन्न और प्रतिष्ठित घर का ओम और न ही स्कूल भर में प्रिंस कहाने वाला मैं ।
"रिजल्ट आए तो बताना जरूर---" ग्लानिबोध के साथ जब मैं पीछा छुडाता हुआ सा वहाँ से भाग रहा था ,उसकी आवाज मेरा पीछा कर रही थी ।


16 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन की कई घटनाएं अप्रत्‍यक्ष रुप से आपस में जुड़ी होती हैं। समय आने पर उनके जुड़े होने का अहसास हमें रोमांचित करता है। बहुत ही शिक्षाप्रद कहानी, अनेक विसंगतियों के बीच रहकर अपनी राह ढूंढनेवाली सरिता जैसी लड़कियां अत्‍यंत प्रेरणाप्रद हैं, प्‍यारी और आकर्षक भी हैं। बहुत सुन्‍दर क‍थांक।

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  2. ये प्रेरणाप्रद कहानियाँ कठिन समय की सच्ची साथी साबित हुई हैं .....मन बढ़ गया इसे पढ़कर
    मैं अपने ब्लॉग का पता छोड़ रही हूँ ....समय निकाल कर अवश्य देखें .....मुझे join करेगीं तो बेहद ख़ुशी होगी
    मेरी यह रचना शायद आपको आये ...
    क्या होता है सच

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  3. कहानी बहुत पसंद आई । सरिता का चरित्र बहुत अच्छा लगा बत्तख के बच्चों के बीच रहते कुरूप हंस के बच्चे की कहानी याद आ गई । कोशिश करूंगी कि पिछली कहानियां भी पढूं । आप मेरे ब्लॉग पर कभी कभार आती हैं धन्यवाद, स्नेह बनाये रखें ।

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  4. आपकी कंकू पढणे के बाद ये कहाणी पढणे का भी मोह हो गया ! और कहानी मेरी उम्मीदपर पुरी तरह खरी उतरी ! अंतिम चरणने तो मुझे कुच्छ भावूक बना दिया !

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  5. गिरिजा दी,

    कल की आपकी कविता, आज की फोन पर हुई बातचीत और अब ये कहानी.. तीनों का निचोड़ यही है कि वास्तव में नारी को जिस रूप में आपने प्रस्तुत किया है अपनी रचनाओं में, वैसा विरले ही देखने को मिलता है..
    इस कहानी की विषयवस्तु से परे जिसने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया वह है लेखन शैली. कथा आत्मकथ्य शैली में एक पुरुष पात्र द्वारा वर्णित है. और पढते हुए कहीं से ऐसा नहीं लगता कि यह एक लेखिका की रचना है.. न संवादों से - न वर्णन से!! दूसरी बात की मुहावरे और लोकोक्तियों का जिस प्रकार आपने प्रयोग किया है वह माणिक की तरह प्रतीत होता है कथा-मालिका में.
    कथा का विस्तार कम किया जा सकता था और सस्पेंस के तत्व को बनाए रखा जा सकता था. फिर भी कुल मिलाकर एक प्रभावशाली कथा!!
    शायद पहली बार यहाँ आया, मगर बंधकर रह गया!
    प्रणाम दी!!

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  6. सलिल भैया आपने मेरे आग्रह पर यह ब्लाग देखकर और कहानी को अपनी नजर से व्याख्यायित करके कहानी और मेरा दोनों का मान बढाया है । हाँ कहानी कुछ बडी है और सपाट भी । कहानियाँ लगभग सभी बडी ही हैं फिर भी मेरी अपेक्षा है कि जब भी समय मिले आप मास्टरसाब,पार्टफाइनल, अपराजिता,पहली रचना,तथा अपने-अपने कारावास कहानियाँ को भी देखें ।

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  7. सही कहा गिरिजा जी......यही समय तो करियर बनाने का होता है......सुन्दर व सटीक कथा...शिक्षाप्रद ..

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  8. Salil bhaiya ne sab kah hi diya... :)
    ham to bas yahi kahenge aap behtareen rachnakaara ho !

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  9. गिरिजा जी,

    आप का लेखन प्रशन्सनीय है। मैं धीरे-धीरे समय मिलने पर आप की रचनायें पँढूगी। कृपया कभी मेरे ब्लोग http://www

    Unwarat.com में आईये। मेरी कहानियाँ और लेख पढिये। पढ़ने के बाद अपने विचार अवश्य व्यक्त करें मुझे अच्छा लगेगा।

    लेखन व चित्र-कला मेरा बाल्य काल से शौक रहा है पर मैगजीनों में इधर भेजना शुरू किया और ब्लोग तो बिलकुल अभी लिखना शुरू किया है। मेरी रचनायें आमतौर पर सभी स्थानीय पत्रिकाओं में पिछ्ले कुछ वर्षो से छपती हैं। मैं जीवन में दैनिक अनुभवों पर रचनायें लिखती हूँ। मुझे कविता पढ़ना मुझे भले ही अच्छा लगे ।पर लिख्ने में मेरी रूचि नही है।

    मैंने कुछ समय पहले self publishing माध्यम से बच्चों की एक पुस्तक लिखी है"ये हैं मेरी कहानियाँ"

    अब आप मेरे ब्लोग पर जायेगे तो इस पुस्तक के प्रथम पाँच पॄष्ट पढ़ सकेगें।

    आप से पुनः अनुरोध है कि मेरे ब्लोग पर अवश्य जाइयेगा।

    आभी के लिये इतना ही।

    विन्नी,

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  10. विन्नी जी ,आपका बहुत बहुत धन्यवाद । खेद है कि आपके ब्लाग पर टिप्पणी नही कर पा रही हूँ ।

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  11. कहानी की तकनीक में शब्दों के चयन में किस्सागोई की उस हर कसौटी पर ये कहानी खरी है ऊपर की टिप्पणी में कहा गया कि कहानी ज्यादा लम्बी है वो बात एक दम गलत है कम से कम मेरी नजर में हिन्दी कहाानियों के एकल प्रसंग में अन्त का अहसास हो जाता है लेकिन तारीफ इस बात की होनी चाहिए कि अन्त अन्त तक रहा और उसके आगे तक रहने की संभावनाएँ छोड गया श्रेष्ठ रचना

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