बुधवार, 17 जून 2015

मौत के बाद

मौत के बाद 
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...और...आखिर मैंने अपने आप को खत्म कर ही लिया ।
इसे तो हर कोई जानता है कि खुद को खत्म कर लेना कोई खेल नही है ।जरूर कोई न कोई ऐसी समस्या होती है जिसका उपाय केवल अपने आपको मिटा देना ही होता है । मैंने भी मिटा दिया । और क्यों न मिटाती ? मेरा जीवन भी कोई जीवन था ! स्नेह-विहीन...निराश..संत्रस्त..
जिस जीवन में कोई आशा न हो ,उल्लास न होचाहत न हो सम्बल न हो ,उस उपेक्षा भरे जीवन को जबरन अनचाहे ही खींचते जाने का अर्थ ही क्या था !
कितनी बार सोचा ..सोच-सोच कर खुद को सम्हाला भी कि जीवन में अब कुछ बदलाव आएगा ...अब आएगा, पर नही ..कुछ नही बदला । सब कुछ वैसा ही रहा । दो बच्चों की माँ बनने के बाद भी सब कुछ वैसा ही ..अब मैं विवाह से अब तक की सारी बातों को आराम से याद करके यकीन कर सकती हूँ कि मैंने जो भी किया है सही किया है . 
मैं आपको बताती हूँ कि मेरा विवाह ही किस तरह बेमतलब था ।
पिताजी ने तो मुझे ससुराल भेज कर जैसे अपने सिर से बोझ उतार दिया था । इसे बोझ उतारना नही कहेंगे तो क्या कहेंगे कि उन्होंने वर का केवल रंग-रूप और नौकरी देखी और आनन--फानन में मुझे पराई कर दिया । यह नही कि जिस व्यक्ति को आप अपनी बेटी सौंपने जारहे हैं उससे पहले समझ तो लें । उसके विचार व दृष्टिकोण तो जानलें । बडे लोग बच्चों की समझ पर भरोसा नही करते । पर बड़ों की समझ भी कहाँ हर बार सफल होती है ? 
इस बात का मुझे तभी अहसास होगया जब मैं पहली बार ससुराल आई थी । सासजी ने देखते ही कह दिया कि बहू मेरे बेटे के पाँव का धोवन भी नही है । शादी में मिले बर्तनों और कपड़ों को लेकर भी मुझे अक्सर ताने सुनने पडते थे । सिर्फ यही बात होती तो भी सब चलता रहता लेकिन मुझे नीचा दिखाने के लिये सासजी जब तब शशिबाला नाम की युवती की प्रशंसा करती रहतीं थीं जो रवि के दफ्तर में काम करती थी । कहतीं थीं कि ,शशि तो शशि ही है जिस घर में जाएगी उजाला कर देगी .हमारे तो....
उनकी बात में जो व्यंजना छुपी रहती थी बखूबी मेरी समझ में आती थी .कभी-कभी वह रवि के साथ घर भी आजाया करती थी । उस सुदर्शना के आगे  मेरी स्थिति दयनीय सी होजाती थी । मैं सोचती थी कि हे भगवान मुझे सुन्दरता क्यों नही दी ? एक गुण को वापस ले लेते । गुणों को कोई पूछता भी नही है ।
घर में मेरी हैसियत काम करने वाली नौकरानी से ज्यादा नही थी । सुबह पाँच बजे से रात के दस बजे तक काम..सिर्फ काम । खाना बनाना, कपडे धोना प्रैस करना घर की सफाई करना ..रवि को तो जूते भी पलंग पर चाहिये थे ऊपर से बीसों निर्देश---
“.मेरा अमुक काम शाम तक पूरा होना चाहिये । बच्चे को दवा दिला लाना । अम्मा की दवा समय पर देती रहना... मुझे शिकायत सुनने नही मिले समझी...!”
समझ गई । लो पडा है मेरा बेजान शरीर । करालो उससे काम जितना चाहो..। सच याद करने को कितनी बातें हैं । हाँ अब मैं अपनी पीडाओं को आजादी के साथ याद कर सकती हूँ । और निस्संकोच आपको भी बता सकती हूँ । मरे हुए व्यक्ति का कोई क्या कर लेगा ?
कितने दंश थे जो मुझे जब-तब लगते रहते थे ।
पति के लिये मैं सिर्फ एक शरीर थी । भाव-हीन शरीर । अपने उद्देश्य की पूर्ति के बाद वे बड़ी हिकारत के साथ मुझे दूर धकेल देते थे मरे हुए कीड़े की तरह । सोचिये कि मेरी यह पीडा तब कितनी बढ जाती होगी जब वे मुझे अपनी कमजोरी का कारण बता कर मेरे अन्दर अपराध-बोध भी जगा देते थे । हमारे रिश्ते में पति-पत्नी जैसा कुछ था ही नही । केवल देह-सम्बन्धों को तो पति-पत्नी का दर्जा नही दिया जासकता न । उसमें परस्पर रिश्ते का सम्मान ,विश्वास व प्रेम भी तो होना चाहिये ।
"प्रेम ?"-.रवि उपहास के साथ कहते थे--"प्रेम नही करता तो दो बच्चे कहाँ से आजाते ?"
"लो ! सुनो इनकी बात । हद होगई । इनके लिये देह सम्बन्ध और उसके परिणाम-स्वरूप बच्चे पैदा होना ही प्रेम है । बच्चा तो बलात्कार से भी पैदा होता है तब क्या उसे भी प्रेम का प्रतीक मानोगे श्रीमान ?
मन होता कि यह सब कहलूँ लेकिन इतना बोलने का अधिकार ही कहाँ था मुझे ? सात साल मैंने मशीन बन कर ही गुजारे थे। मशीन जिससे सिर्फ चुपचाप चलते रहने की अपेक्षा रहती है । बिना किसी माँग या शिकायत के । पहले मुझे ,जब मैं गर्भवती हुई थी ,लगा था कि बच्चा हमारे बीच एक मजबूत डोर बाँध देगा पर उन्हें बेटे के जन्म की आशा थी ।
लेकिन जन्म हुआ बेटी का ।
रीतू के होने से वे मेरे प्रति और भी उपेक्षा दिखाने लगे । हालाँकि मेरा विश्वास है कि बेटा होता तब भी उन्हें बेटा होने की ही खुशी होती मेरे लिये संवेदना व स्नेह नही जागता । क्यों, तीन साल बाद बुन्दू के पैदा होने पर वो कौनसे बदल गए ! बल्कि मुझ पर कितने ही नियन्त्रण और बढ गए । यह मत खाना ,वह मत पीना । यहाँ मत जाना वहाँ मत जाना ..। अगर बुन्दू रोता तो सासू माँ चिल्ला उठतीं कि कुछ खा-पीगई होगी सो बच्चे को दर्द हो रहा है शायद ।
बच्चों के होने का लाभ यही था कि उनके रूप में मुझे सिर्फ उनसे जुडी होने के दो सबूत भर मिल गए थे । जा़यज़ सबूत । बस ।
लेकिन क्या मेरा अपना कोई अस्तित्त्व नही था ? क्या उनके बच्चों की माँ बन जाना ही काफी था ? यह विचार मेरे मन में शशिबाला के कारण अधिक प्रबल होने लगा था । रवि और सासजी की आँखों में वह स्नेह व उल्लास मेरे लिये क्यों नही था जो शशिबाला या दूसरी बहू-बेटियों को देख कर होता था ? शशिबाला जिस तरह खुल कर सामने आने लगी थी ,जरूर उसका पति से पहले से ही गहरा सम्बन्ध होगा ।
केवल दो बच्चे ही थे मेरी खुशियों का आधार थे और जीवन का भी । लेकिन सच तो यह था कि बच्चों के बहाने मुझे प्रताडित करने का उन्हें और मौका मिल गया । मुझे अक्सर सुनना पडता कि--क्यों बच्ची को डाँटती है ? बहुत हाथ चलने लगे हैं । लडके को क्या खिला दिया जो दस्त होगए ? सुअरिया भी अपने बच्चों का ध्यान रखती है पर इसे तो बच्चे पालने का भी सऊर नही है ।
यही नही एक दो बार मेरे ऊपर रवि ने हाथ भी उठा दिया था। 
यह सब बर्दाश्त से बाहर होने लगा था । 
मैं अकेली पड गई थी मुझे लगता था कि पति से अलग होकर पत्नी की कोई गति नही है । पर मैं जीती भी तो किसके लिये जीती । बेजान धड की तरह जीकर करती भी क्या । नए लेखक लेखिकाओं की कितनी ही कहानियों में स्त्री के विद्रोह को बड़ा ऊँचा स्वर दिया गया है .बन्धनों को तोड़ फेंकने की अनुशंसा की गई है. ठीक है मैं परिवार व समाज के बन्धन नही तोड़ सकती पर अपने आपको मिटा तो सकती थी न .सो मिटा दिया। बच्चों को वे मुझसे बेहतर पाल लेंगे मैं जानती ही थी । न पालें मेरी बला से . मौत के बाद कौन किसका बेटा और कौन किसकी माँ . लेकिन मेरी मौत उन्हें सबक भी देगी यकीनन ,कठोर सबक ।
लो अब मैं मुक्त हूँ । मेरा निर्जीव शरीर पडा है उसका उन्हें जो करना है करें । रवि को दर-दर भटकना होगा अब । मेरी मौत का केस तो बनेगा ही । और अब तो कोई उससे शादी भी न करेगा । समाज उसका बहिष्कार कर ही देगा । जियो रवि जी अब बिना पत्नी के ही ।
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वो देखलो ,मेरा शरीर पडा है । अच्छा सास जी कैसी रो रहीं हैं । अजी झूठे आँसू हैं । रवि भी तो कैसे मुँह लटकाए खडे हैं । उसकी सूरत देख कर कोई नही कह रहा कि वही बीना की मौत का जिम्मेदार है । लेकिन कमाल है ,सब मुझे ही दोष दे रहे हैं ।
"रवि की माँ सच्ची बहुत बुरा हुआ । देखो न मरने वाली तो गई पीछे कितने दुख छोड गई है । धीरज रखो । मरने वाले के साथ तो नहीं न जाया जाता ।"
"और क्या कब तक मातम मनाओगी बहन ? उसने तो यह भी नही सोचा कि बच्चों का माँ के बिना क्या हाल होगा ? औरतें समझतीं हैं कि ...बुरा मत मानना रवि का ब्याह तो हुआ न हुआ बराबर होगया । अभी उसकी उमर है ही कितनी !
"तो क्या हुआ बामनियों ने बेटियाँ जननी बन्द करदी हैं क्या ? तू कह तो सही लाइन लगा दूँ लडकियों की । बच्चों को कुछ दिन नानी के पास भेज देना और नही भी भेजेगी तो क्या , रवि को तो दो बच्चों के साथ भी कोई भी अपनी लडकी दे देगा ।"
'अच्छा ये पंडितानी अम्मा कैसी बातें बना रहीं हैं । मुझसे कैसी सहानुभूति दिखातीं थी ? मेरे मुँह फेरते ही बोली बदल गई । ..हाय मेरे बच्चे कैसे मम्मी--मम्मी कह कर रो रहे हैं । हे भगवान ..। मैंने क्या किया ? ..लेकिन नही मैं कमजोर नही पडूँगी लेकिन रवि को तो सजा मिलेगी ही ..मिलनी भी चाहिये । हर व्यक्ति की समझ में आना चाहिये कि पत्नी को इस तरह प्रताडित करना कोई हँसी-खेल नही है ।
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"अरे इतनी जल्दी सब सामान्य भी होगया ? रवि की शादी भी हो गई है ? गजब ! किसी ने विरोध नही किया । क्यों ? क्या इन्सान के जाने का कोई भी मलाल नही ? रवि बहुत खुश है । कमरे में से हँसी की आवाज आ रही है.  
रवि के साथ किसी स्त्री की खनकती हुई हँसी गूँज रही है । जरूर शशि की होगी ।
रवि बाहर आगया है । बडे प्यार से कह रहा है ---"शशि, मेरा टिफिन तैयार है ?"
सच कहा गया है स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी दुश्मन है । जिस व्यक्ति के दुर्व्यवहार से एक अच्छी-भली पत्नी ने मौत को गले लगाया है उसी को अपनाकर क्या शशि ने अन्याय नही किया ? ऐसे आदमी को तो उपेक्षा मिलनी थी पर शशिरानी कैसे हँस हँसकर बात कर रही है ? और रवि को क्या , उन्हें स्त्री की भावनाओं की कद्र कहाँ । वे तो मेरी मौत का जैसे इन्तजार ही कर रहे थे ।
मुझे उनकी राह को यूँ ही आसान नही करना था । मेरे होते हुए क्या सरेआम ऐसा कर सकते थे ? पत्नी के रहते पुरुष दूसरी स्त्री के साथ रह भले ही ले पर उसे सम्मान हरगिज नही मिल सकता पर अब तो लोगों की सहानुभूति भी है रवि के साथ । दूसरी पत्नी के साथ वह काफी खुश हैं । उसका नाम लेते हुए लहजे में कितनी कोमलता है । रवि ने मुझे तो ऐसे कभी नही पुकारा ।
.... हाय रीति झाडू लगा रही है ! मेरी छोटी सी बच्ची । झाडू को उठा तक नही पारही । और कपडे भी कैसे मैले-कुचैले हो रहे हैं । मेरा बेटा बुन्दू बाहर खडा भूखा रो रहा है ।
शशि उसे झिडक रही है ---“अभी तो ब्रेड दी थी । इतनी जल्दी भूख आ भी गई ? कितना खाते हो बेटा ।
"क्या बात है ?"--रवि पूछ रहा है ।
"बुन्दू बहुत परेशान करता है । दिन में जितनी बार खाता है उतनी ही बार लैट्रिन जाता है । मैं कहती हूँ लिमिट में खाओ वह भी टाइम से .."
"बुन्दू सुन मम्मी क्या कह रही हैं ।"
"ये मेरी मम्मी नही है "--बुन्दू कह रहा है ।
तडाक्...बुन्दू के गाल पर रवि ने थप्पड मार दिया । बुन्दू रो पडा है । ओह क्रूर पिता । पर मैं भी तो अपने बच्चों को छोड कर चली गई हूँ । मैं भी तो क्रूर माँ हूँ । मर कर मैं किसको सजा देना चाहती थी पर सजा भुगत कौन रहा है ।
रीति चीख--चीख कर रो रही है ---"मम्मी तुम कहाँ चली गईं हमें छोड कर ! क्यों चली गईं मम्मी..!" मैं तडफ उठी हूँ । पछता रही हूँ कि क्यों मुझे अपने बच्चों का खयाल नही आया । बच्चों के लिये तो जीना चाहिये था । मैं अपने आपको रोक नही पाती । बेतरह सुबकते हुए बच्चों को दिलासा दे रही हूँ---
"बेटा मैं कहीं नही गई । मैं हमेशा तुम्हारे पास हूँ । तुम्हें छोड कर कहाँ जाऊँगी मेरे बच्चो !".....
मम्मी sssमम्मी ss...। क्या होगया है तुम्हें ? तुम रो क्यों रही हो ?" ---कोई मुझे झिंझोड क्यों रहा है ?
"मम्मी उठो । देखो कितना उजाला हो गया है बाहर । मम्मी sss !"
"अरे !" ...मैं आँखें मलते हुए उठी और पुलकित होकर रीति और बुन्दू को देखा । उन्हें छुआ । 
"अरे मैं तो जिन्दा हूँ । तो यह सपना था !"
ओह मम्मी सपना देख रही थी ..
पर सपना क्या था मम्मी 
कुछ नही बेटा , बस एक भटकाव था ..मैंने दोनों बच्चों को लिपटाते हुए कहा ... 
" आजकल कुछ ज्यादा ही दिमाग चल रह है तुम्हारी माँ का .
यह बुन्दू के पिता रवि थे। आवाज में भले ही वैसा ही उपहास था लेकिन अब मुझे उसका दुख नहीं है .क्योंकि मुझे अपने होने का अर्थ समझ में आगया है . यही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है . और यह भी कि हर व्यक्ति अपनी तरह सोचता है जरूरी नही कि वह आपसे खुश रहे ही .फिर खुशी व सन्तुष्टि ही जीवन का आधार कैसे हो सकती है .राह में व्यवधान हों भी पर इसका हल आत्महत्या तो नही है .मौत को अपनाने का मतलब ,आप अपनी जगह किसी और के लिये छोड़ रहे हैं .
मैं चकित थी मृत्यु के साक्षात्कार का अहसास भर ही किस तरह जीवन की हर कडवाहट को , हर अभाव को मामूली और हर दुख को निर्मूल बना देता है और जीवन कितना अनमोल। जीवन के छूटने की कल्पना व अहसास कितना भयावह होता है... फिर जीवन से क्यों निराश हुआ जाय ।
क्यों उनके लिये रास्ता छोडा जाय ,जो तुम्हें हटा कर अपना रास्ता बनाने में कोई संकोच नही करेंगे । जो आपके जाने की उम्मीद व अरमान पाले बैठे हैं । 
बेशक यह सपना ही था । पर अवश्यम्भावी । एकदम यथार्थ लगने वाला । पूरा यथार्थ न भी हो पर यह स्वप्न कई सम्भावनाओं का अनुमान देगया । मुझे जैसे एक नींद से जगा गया । साथ ही मेरी समझ में आगया कि अपने आपको मार लेना किसी समस्या का समाधान नही है ।



मंगलवार, 5 मई 2015

मजबूरी

सन १९८० में लिखी गई यह कहानी एक रजिस्टर में दबी अचानक ही मिल गई .रचना का वर्ष भी उसी में लिखा था .अन्यथा मेरी स्मृति में थी ही नहीं .   लकड़ी बेचकर गुजारा करने वाले सहारियों के संघर्ष को कुछ अंश में मैंने भी देखा है . यह छोटी सी कहानी उसकी एक छोटी सी झलक है   .
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किसी आहट से हडबडाकर हंसुली ने आँखें खोली .देखा कि धूप पियराने लगी है .आसमान की ढलान से उतरते सूरज का चेहरा निस्तेज सा हो रहा था .पंछियों को अपने घोंसलों में लौटने सुधि आरही थी . खेतों में किसान भी हल-फावड़े समेटने लगे थे . खूंटे पर बंधे बछड़े-बछिया माँ की अगवानी में रंभाने लगे थे .सिर पर घास का बोझ लादे लौटती किसानिनें हँसुली की ओर देखती कहे जा रहीं थीं – बेचारी अभी तक यहीं बैठी है .किसी ने नहीं खरीदीं इसकी ‘मौहरी’( लकड़ियों का गट्ठर ) .
अवसाद की मोटी सी धुंध हँसुली के मन पर जम गई . जाने किसका मुंह देखकर चली थी आज .सबेरे की साँझा होने को आई ,अभीतक तक किसी ने उसकी लकड़ियों के सही दाम नहीं लगाए . गाँव के उस छोर पर बनी हीरा की झोपडी से लेकर इस छोर पर बने पण्डित सर्जूलाल के तिमंजिला मकान तक उसने चार चक्कर लगाए पर सबके मुंह पर एक ही बात चिपकी रही – अगर ‘उसने’ ने नौ लगा दिए हैं तो हम सवा नौ देंगे .जादा से जादा साढे नौ ..डाले तो डाल दे ..
चल तू अकेली रह गई है सो दस रुपैया तक दे सकते हैं .नहीं ? तो फिर जा ..कही और ..इससे ज्यादा तो कोई देगा भी नहीं .
देगा भी नहीं .. हँसुली मन ही मन भुनभुनाई – अभी पास के गाँव में उसकी साथिनों ने ऐसी ही मोहरी ,फिर कहो तो इससे भी छोटी पंद्रह ..भली अट्ठारह में बेचीं हैं .
बेचीं होंगी .-कोई लापरवाही से बोला – आज तुम्हारी गरज है ..नहीं तो सीधे मुंह बात भी नहीं करती हो .”
तो...? –हंसुली को ताव आगया .
का मुफ्त में दे जाएं ? भैया यह तो सोचो कि हम कैसे-कैसे यहाँ तक आते हैं . लकडियाँ बीनने में हाथ-पाँव लोहूलुहान हो जाते हैं ..
वो तू जाने . सरजू पण्डित आकर बीच में ही बोल पड़े – दस रुपए में देनी हो तो अभी मेरे घर डालडे  .
हँसुली ने देखा कि पण्डित जी का चेहरा चमक रहा है . रोली का तिलक लगा है संपन्न दीखते है . दाम तो सही दे ही देंगे .
म्हाराज दस तो बहुत कम हैं . दिन भर की मजूरी में दिन भर का पेट तो भरे .आप अठारह नहीं तो पन्दरह तो दे दें ... हँसुली ने दीनता से कहा पर पण्डित जी बिना सुने ही भीतर चले गए .वह मोहरी दीवार से टिकाए खड़ी रही .   
तभी उधर से चमन बौहरे निकले . पंसारी की दूकान चलाने के साथ ब्याज भी कमाते थे .सम्पन्न होने के साथ कंजूस भी थे . आँखों को धूप से बचाने उन्होंने हथेली को माथे पर छतरी की तरह तान रखा था
यों उन्हें लकड़ियों की जरुरत न थी .उनके कर्जदार साग-सब्जी , घास-भूसा ,कंडे-लकड़ी उनके घर ऐसे ही डाल देते थे .ताकि बौहरे जी प्रसन्न रहें और वसूली में ज्यादा कठोरता न दिखाएं साथ ही आगे जरुरत पड़ने पर रुपया देने में आनाकानी न करें .
लेकिन उन्हें पता चला कि एक ‘सहरनी ’( सहारिया आदिवासी) को अभी तक कोई ग्राहक नहीं मिला है और सौदा सस्ते में पट जाएगा तो उन्होंने आखों को और भी छोटी करते हुए लकड़ियों का वजन अनुमाना .फिर हँसुली को देखा –सांवले चेहरे पर उभरी हड्डियों के बीच गड्ढे में धंसी सी आँखों में उम्मीद की हल्की सी किरण , पीठ से मिलजाने को आतुर सा ,पल्लू से दिखता अनेक सिलवटों वाला पेट ,खुरदरे हाथ-पाँव ,रूखे-उलझे बालों से बहती पसीने की लकीरें ..सहानुभूति दिखाने का विचार हवा होगया . उपेक्षा से बोले --
माल तो नौ का भी नहीं है . पर तेरी हालत देख मैं दस रुपए या दो सेर बाजरा दे सकता हूँ . बाद में आठ भी नहीं मिलेंगे .सोचले ..
सारी मुफत में ही क्यों नहीं छुड़ा लेते बौहरे जी ?"--हँसुली आहत होकर बोली--"अपने लिए कैसे हुशियार हो .कोई नोंन की डरी तो उठाले ...
नहीं तो न सही . तुझे जहां परता पड़े वहां दे देना ..
चमन बौहरे ने बड़ी निस्संगता से कहा और बिना मुड़े सीधे चले गए .जाहिर है कि उन्हें सौदा हाथ से जाने की चिंता नहीं थी .
तब से दिन ढलने को आया . हँसुली की मोहरी अभी तक ग्राहक के इन्तजार में थी .
कैसे लोग हैं .---हँसुली निराश होकर सोच रही थी .
घर बैठे चीज माटी मोल चहिये इन्हें .पर कैसे दे दें ? एक-दो मौहरी के लिए भूखे प्यासे जंगल में रातदिन भटकना पड़ता है .कांटे लोहूलुहान कर देते हैं .उस पर नाकेदार सूखी टूटी लकडियाँ बीनने में दस झमेले करता है .डरा-धमकाकर मुंह से कौर डरा लेता है . लोग जेब में रुपया ठूँसकर हरे-भरे पेड़ काट ले जाते है .और चोरों पर तो कोई जोर ही नहीं होता .बस हम गरीबों का ही कोई आसरा नहीं है .अठारह बीस की मोहरी दस में ! इतना घाटा कैसे सहे हँसुली ? दो दिन पेट भरने लायक बाजरा आजाएगा दस रुपैया में .हल्कू ‘ताव’ (बुखार) से तप रहा होगा और उसका कहीं धुत्त पड़ा होगा .ठीक दाम मिलने की आस में पूरा दिन ऐसे ही चला गया .आज भाग ही खोटा है और क्या...
अभी तक नहीं बिची तेरी मोहरी ?
चमन बोहरे लोटा लेकर दिशा-मैदान जा रहे थे .हँसुली को देख रुक गए .
मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरे घर डालडे ..अब भी सोचले ..पर हाँ अब दूंगा नौ ही रुपए ..कोई जबरदस्ती नहीं है . तेरी इच्छा हो तो ...

हँसुली ने बौहरे को देखा .अपनी मोहरी को देखा .ढलते सूरज को देखा ,अपनी बस्ती की दो कोस की दूरी देखी और हारकर मौहरी उठाकर मंगलिया के घर की और चलदी .