बुधवार, 17 जून 2015

मौत के बाद

(1)
...और...आखिर मैंने अपने आप को खत्म कर ही लिया ।
इसे तो हर कोई जानता है कि खुद को खत्म कर लेना कोई खेल नही है । कोई न कोई ऐसी समस्या होती है जिसका उपाय केवल अपने आपको मिटा देना ही होता है । मैंने भी मिटा दिया । और क्यों न मिटाती । मेरा जीवन भी कोई जीवन था । स्नेह-विहीन...निराश..संत्रस्त..
जिस जीवन में कोई आशा न हो ,उल्लास न हो,चाहत व विश्वास न हो ,हो तो केवल उपेक्षा...अपमान..प्रताड़ना..,उस जीवन को जबरन अनचाहे ही खींचते जाने का अर्थ ही क्या था !
कितनी बार सोचा ..सोच-सोच कर खुद को सम्हाला कि जीवन में अब कुछ बदलाव आएगा ...अब आएगा पर नही ..कुछ नही बदला । सब कुछ वैसा ही रहा । दो बच्चों की माँ बनने के बाद भी सब कुछ वैसा ही ..
मैं आपको बताती हूँ कि मेरा विवाह ही किस तरह बेमतलब था ।
पिताजी ने तो मुझे ससुराल भेज कर जैसे अपने सिर से बोझ उतार दिया था । इसे बोझ उतारना नही कहेंगे तो क्या कहेंगे कि उन्होंने वर का केवल रंग-रूप और नौकरी देखी और आनन--फानन में मुझे पराई कर दिया । यह नही कि जिस व्यक्ति को आप अपनी बेटी सौंपने जारहे हैं उससे पहले समझ तो लें । उसके विचार व दृष्टिकोण तो जानलें । बडे लोग जाने क्यों बच्चों की समझ पर भरोसा नही करते । पर बड़ों की समझ भी कहाँ हर बार सफल होती है ? 
इस बात का मुझे तभी अहसास होगया जब मैं पहली बार ससुराल आई थी । सासजी ने देखते ही कह दिया कि बहू मेरे बेटे के पाँव का धोवन भी नही है । लेन देन को लेकर भी मुझे अक्सर ताने सुनने पडते थे । सिर्फ यही बात होती तो भी सब चलता रहता लेकिन मुझे नीचा दिखाने के लिये वे जबतब शशिबाला नाम की युवती की प्रशंसा करती रहतीं थीं जो रवि के दफ्तर में काम करती थी । कहतीं थीं कि , शशि तो शशि ही है जिस घर में जाएगी उजाला कर देगी .हमारे तो....
उनकी बात में जो व्यंजना छुपी रहती थी बखूबी मेरी समझ में आती थी .कभी-कभी वह रवि के साथ घर भी आजाया करती थी । उस सुदर्शना के आगे  मेरी स्थिति दयनीय सी होजाती थी । मैं सोचती थी कि हे भगवान मुझे सुन्दरता क्यों नही दी ? एक गुण को वापस ले लेते । गुणों को कोई पूछता भी नही है ।
धीरे--धीरे मेरी समझ में आगया कि घर में मेरी हैसियत काम करने वाली नौकरानी से ज्यादा नही है ।सुबह पाँच बजे से रात के दस बजे तक काम ..सिर्फ काम । खाना बनाना, कपडे धोना प्रैस करना घर की सफाई करना ..रवि को तो जूते भी पलंग पर चाहिये थे ऊपर से बीसों निर्देश---
“.मेरा अमुक काम शाम तक पूरा होना चाहिये । बच्चे को दवा दिला लाना । अम्मा के ब्लाउज कब सिले जाएंगे हाँ ?... मुझे शिकायत सुनने नही मिले समझी...!”
समझ गई । लो पडा है मेरा बेजान शरीर । करालो उससे काम जितना चाहो..। सच याद करने को कितनी बातें हैं । हाँ अब मैं अपनी पीडाओं को आजादी के साथ याद कर सकती हूँ । और निस्संकोच आपको भी बता सकती हूँ । मरे हुए व्यक्ति का कोई क्या कर लेगा ?
कितने दंश थे जो मुझे जब-तब लगते रहते थे ।
पति के लिये मैं सिर्फ एक शरीर थी । भाव-हीन शरीर । अपने उद्देश्य की पूर्ति के बाद वे बड़ी हिकारत के साथ मुझे दूर धकेल देते थे मरे हुए कीड़े की तरह । सोचिये कि मेरी यह पीडा तब कितनी बढ जाती होगी जब वे मुझे अपनी कमजोरी का कारण बता कर मेरे अन्दर अपराध-बोध भी जगा देते थे । हमारे रिश्ते में पति-पत्नी जैसा कुछ था ही नही । केवल देह-सम्बन्धों को तो पति-पत्नी का दर्जा नही दिया जासकता न । उसमें परस्पर रिश्ते का सम्मान ,विश्वास व प्रेम भी तो होना चाहिये ।
"प्रेम ?"-.रवि उपहास के साथ कहते थे--"प्रेम नही करता तो दो बच्चे कहाँ से आजाते ?"
"लो ! सुनो इनकी बात । हद होगई । इनके लिये देह सम्बन्ध और उसके परिणाम-स्वरूप बच्चे पैदा होना ही प्रेम है । बच्चा तो बलात्कार से भी पैदा होता है तब क्या उसे भी प्रेम का प्रतीक मानोगे श्रीमान ?
मन होता कि यह सब कहलूँ लेकिन इतना बोलने का अधिकार ही कहाँ था मुझे ? सात साल मैंने मशीन बन कर ही गुजारे थे। मशीन जिससे सिर्फ चुपचाप चलते रहने की अपेक्षा रहती है । बिना किसी माँग या शिकायत के । पहले मुझे ,जब मैं गर्भवती हुई थी ,लगा था कि बच्चा हमारे बीच एक मजबूत डोर बाँध देगा पर उन्हें बेटे के जन्म की आशा थी ।
लेकिन जन्म हुआ बेटी का ।
रीतू के होने से वे मेरे प्रति और भी उपेक्षा दिखाने लगे । हालाँकि मेरा विश्वास है कि बेटा होता तब भी उन्हें बेटा होने की ही खुशी होती मेरे लिये संवेदना व स्नेह नही जागता । क्यों, तीन साल बाद बुन्दू के पैदा होने पर वो कौनसे बदल गए ! बल्कि मुझ पर कितने ही नियन्त्रण और बढ गए । यह मत खाना ,वह मत पीना । यहाँ मत जाना वहाँ मत जाना ..। अगर बुन्दू रोता तो सासू माँ चिल्ला उठतीं कि कुछ खा-पीगई होगी सो बच्चे को दर्द हो रहा है शायद ।
बच्चों के होने का लाभ यही था कि उनके रूप में मुझे सिर्फ उनसे जुडी होने के दो सबूत भर मिल गए थे । जा़यज़ सबूत । बस ।
लेकिन क्या मेरा अपना कोई अस्तित्त्व नही था ? क्या उनके बच्चों की माँ बन जाना ही काफी था ? यह विचार मेरे मन में शशिबाला के कारण अधिक प्रबल होने लगा था । रवि और सासजी की आँखों में वह स्नेह व उल्लास मेरे लिये क्यों नही था जो शशिबाला या दूसरी बहू-बेटियों को देख कर होता था ? शशिबाला जिस तरह खुल कर सामने आने लगी थी ,जरूर उसका पति से पहले से ही गहरा सम्बन्ध होगा ।
केवल दो बच्चे ही थे मेरी खुशियों का आधार थे और जीवन का भी । लेकिन सच तो यह था कि बच्चों के बहाने मुझे प्रताडित करने का उन्हें और मौका मिल गया । मुझे अक्सर सुनना पडता कि--क्यों बच्ची को डाँटती है ? बहुत हाथ चलने लगे हैं । लडके को क्या खिला दिया जो दस्त होगए ? सुअरिया भी अपने बच्चों का ध्यान रखती है पर इसे तो बच्चे पालने का भी सऊर नही है ।
यही नही एक दो बार मेरे ऊपर रवि ने हाथ भी उठा दिया था। 
यह सब बर्दाश्त से बाहर होने लगा था । 
मैं अकेली पड गई थी मुझे लगता था कि पति से अलग होकर पत्नी की कोई गति नही है । पर मैं जीती भी तो किसके लिये जीती । बेजान धड की तरह जीकर करती भी क्या । नए लेखक लेखिकाओं की कितनी ही कहानियों में स्त्री के विद्रोह को बड़ा ऊँचा स्वर दिया गया है .बन्धनों को तोड़ फेंकने की अनुशंसा की गई है. ठीक है मैं परिवार व समाज के बन्धननही तोड़ सकती पर अपने आपको मिटा तो सकती थी न .सो मिटा दिया। बच्चों को वे मुझसे बेहतर पाल लेंगे मैं जानती ही थी । न पालें मेरी बला से . मौतके बाद कौन किसका बेटा और कौन किसकी माँ . लेकिन मेरी मौत उन्हें सबक भी देगी यकीनन ,कठोर सबक ।
लो अब मैं मुक्त हूँ । मेरा निर्जीव शरीर पडा है उसका उन्हें जो करना है करें । रवि को दर-दर भटकना होगा अब । मेरी मौत का केस तो बनेगा ही । और अब तो कोई उससे शादी भी न करेगा । समाज उसका बहिष्कार कर ही देगा । जियो रवि जी अब बिना पत्नी के ही ।
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वो देखलो ,मेरा शरीर पडा है । अच्छा सास जी कैसी रो रहीं हैं । अजी झूठे आँसू हैं । रवि भी तो कैसे मुँह लटकाए खडे हैं । उसकी सूरत देख कर कोई नही कह रहा कि वही बीना की मौत का जिम्मेदार है । लेकिन कमाल है ,सब मुझे ही दोष दे रहे हैं ।
"रवि की माँ सच्ची बहुत बुरा हुआ । देखो न मरने वाली तो गई पीछे कितने दुख छोड गई है । धीरज रखो । मरने वाले के साथ तो नहीं न जाया जाता ।"
"और क्या कब तक मातम मनाओगी बहन ? उसने तो यह भी नही सोचा कि बच्चों का माँ के बिना क्या हाल होगा ? औरतें समझतीं हैं कि ...बुरा मत मानना रवि का ब्याह तो हुआ न हुआ बराबर होगया । अभी उसकी उमर है ही कितनी !
"तो क्या हुआ बामनियों ने बेटियाँ जननी बन्द करदी हैं क्या ? तू कह तो सही लाइन लगा दूँ लडकियों की । बच्चों को कुछ दिन नानी के पास भेज देना और नही भी भेजेगी तो क्या , रवि को तो दो बच्चों के साथ भी कोई भी अपनी लडकी दे देगा ।"
'अच्छा ये पंडितानी अम्मा कैसी बातें बना रहीं हैं । मुझसे कैसी सहानुभूति दिखातीं थी ? मेरे मुँह फेरते ही बोली बदल गई । ..हाय मेरे बच्चे कैसे मम्मी--मम्मी कह कर रो रहे हैं । हे भगवान ..। मैंने क्या किया ? ..लेकिन नही मैं कमजोर नही पडूँगी लेकिन रवि को तो सजा मिलेगी ही ..मिलनी भी चाहिये । हर व्यक्ति की समझ में आना चाहिये कि पत्नी को इस तरह प्रताडित करना कोई हँसी-खेल नही है ।
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"अरे इतनी जल्दी सब सामान्य भी होगया ? रवि की शादी भी हो गई है ? गजब ! किसी ने विरोध नही किया । क्यों ? क्या इन्सान के जाने का कोई भी मलाल नही ? रवि बहुत खुश है । कमरे में से हँसी की आवाज आ रही है.  
रवि के साथ किसी स्त्री की खनकती हुई हँसी गूँज रही है । जरूर शशि की होगी ।
रवि बाहर आगया है । बडे प्यार से कह रहा है ---"शशि, मेरा टिफिन तैयार है ?"
सच कहा गया है स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी दुश्मन है । जिस व्यक्ति के दुर्व्यवहार से एक अच्छी-भली पत्नी ने मौत को गले लगाया है उसी को अपनाकर क्या शशि ने अन्याय नही किया ? ऐसे आदमी को तो उपेक्षा मिलनी थी पर शशिरानी कैसे हँस हँसकर बात कर रही है ? और रवि को क्या , उन्हें स्त्री की भावनाओं की कद्र कहाँ । वे तो मेरी मौत का जैसे इन्तजार ही कर रहे थे ।
मुझे उनकी राह को यूँ ही आसान नही करना था । मेरे होते हुए क्या सरेआम ऐसा कर सकते थे ? पत्नी के रहते पुरुष दूसरी स्त्री के साथ रह भले ही ले पर उसे सम्मान हरगिज नही मिल सकता पर अब तो लोगों की सहानुभूति भी है रवि के साथ । पत्नी के साथ वह काफी खुश हैं । उसका नाम लेते हुए लहजे में कितनी कोमलता है । रवि ने मुझे तो ऐसे कभी नही पुकारा ।
.... हाय रीति झाडू लगा रही है ! मेरी छोटी सी बच्ची । झाडू को उठा तक नही पारही । और कपडे भी कैसे मैले-कुचैले हो रहे हैं । मेरा बेटा बुन्दू बाहर खडा भूखा रो रहा है ।
शशि उसे झिडक रही है ---“अभी तो ब्रेड दी थी । इतनी जल्दी भूख आ भी गई ? कितना खाते हो बेटा ।.........हाय मेरे बच्चे ।
"क्या बात है ?"--रवि पूछ रहा है ।
"बुन्दू बहुत परेशान करता है । दिन में जितनी बार खाता है उतनी ही बार पखाना जाता है । मैं कहती हूँ लिमिट में खाओ वह भी टाइम से .."
"बुन्दू सुन मम्मी क्या कह रही हैं ।"
"ये मेरी मम्मी नही है "--बुन्दू कह रहा है ।
तडाक्...बुन्दू के गाल पर रवि ने थप्पड मार दिया । बुन्दू रो पडा है । ओह क्रूर पिता । पर मैं भी तो अपने बच्चों को छोड कर चली गई हूँ । मैं भी तो क्रूर माँ हूँ । मर कर मैं किसको सजा देना चाहती थी पर सजा भुगत कौन रहा है ।
रीति चीख--चीख कर रो रही है ---"मम्मी तुम कहाँ चली गईं हमें छोड कर ! क्यों चली गईं मम्मी..!" मैं तडफ उठी हूँ । पछता रही हूँ कि क्यों मुझे अपने बच्चों का खयाल नही आया । बच्चों के लिये तो जीना चाहिये था । मैं अपने आपको रोक नही पाती । बेतरह सुबकते हुए बच्चों को दिलासा दे रही हूँ---
"बेटा मैं कहीं नही गई । मैं हमेशा तुम्हारे पास हूँ । तुम्हें छोड कर कहाँ जाऊँगी मेरे बच्चो !".....
मम्मी sssमम्मी ss...। क्या होगया है तुम्हें ? तुम रो क्यों रही हो ?" ---कोई मुझे झिंझोड क्यों रहा है ?
"मम्मी उठो । देखो कितना उजाला हो गया है बाहर । मम्मी sss !"
"अरे !" ...मैं आँखें मलते हुए उठी और पुलकित होकर रीति और बुन्दू को देखा । उन्हें छुआ । 
"अरे मैं तो जिन्दा हूँ । तो यह सपना था !"
"बुन्दू जरा पूछो तो कि तुम्हारी मम्मी आजकल क्या-क्या सोचती रहती है ?"---ये मेरे पति रवि हैं । आवाज में भले ही वैसा ही उपहास है लेकिन अब मुझे कुछ भी बुरा नही लग रहा । समझ में आगया है कि हर इन्सान अलग अपनी तरह का होता है । उसे समझना और पूरी समझ कर ही किसी निष्कर्ष पर पुहुँचा जासकता है । लेकिन वह निष्कर्ष मृत्यु नही है । यह भी आश्चर्य है कि मृत्यु के साक्षात्कार का अहसास भर ही किस तरह जीवन की हर कडवाहट को , हर अभाव को मामूली और हर दुख को निर्मूल बना देता है । महसूस हो जाता है कि जीवन कितना अनमोल होता है । उस अनमोल जीवन के छूटने की कल्पना व अहसास कितना भयावह होता है । फिर जीवन से क्यों निराश हुआ जाय । क्यों विश्वास हिम्मत और धीरज का हाथ छोडा जाय ! क्यों घबराकर परिस्थितियों से भागा जाय ! क्यों उनके लिये रास्ता छोडा जाय ,जो तुम्हें हटा कर अपना रास्ता बनाने में कोई संकोच नही करेंगे । जो आपके जाने की उम्मीद व अरमान पाले बैठे हैं । 
बेशक यह सपना ही था । पर अवश्यम्भावी । एकदम यथार्थ लगने वाला । यथार्थ न भी हो पर यह स्वप्न कई सम्भावनाओं का अनुमान देगया । मुझे जैसे एक नींद से जगा गया । साथ ही मेरी समझ में आगया कि अपने आपको मार लेना किसी समस्या का समाधान नही है ।



मंगलवार, 5 मई 2015

मजबूरी

सन १९८० में लिखी गई यह कहानी एक रजिस्टर में दबी अचानक ही मिल गई .रचना का वर्ष भी उसी में लिखा था .अन्यथा मेरी स्मृति में थी ही नहीं . पैतीस वर्ष पहले लिखी इस कहानी को यहाँ देने का उद्देश्य न केवल इसे जीवन देना है बल्कि खुद को याद दिलाना भी है कि इतने वर्षों में मैंने कुछ खास नहीं लिखा ( लिखने को बहुत कुछ होने के बावजूद ) और आप सब तो सुधि समीक्षक हैं ही ..
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किसी आहट से हडबडाकर हंसुली ने आँखें खोली .देखा कि धूप पियराने लगी है .आसमान की ढलान से उतरते सूरज का चेहरा निस्तेज सा हो रहा था .पंछियों को अपने घोंसलों में लौटने सुधि आरही थी . खेतों में किसान भी हल-फावड़े समेटने लगे थे . खूंटे पर बंधे बछड़े-बछिया माँ की अगवानी में रंभाने लगे थे .सिर पर घास का बोझ लादे लौटती किसानिनें हँसुली की ओर देखती कहे जा रहीं थीं – बेचारी अभी तक यहीं बैठी है .किसी ने नहीं खरीदीं इसकी ‘मौहरी’( लकड़ियों का गट्ठर ) .
अवसाद की मोटी सी धुंध हँसुली के मन पर जम गई . जाने किसका मुंह देखकर चली थी आज .सबेरे की साँझा होने को आई ,अभीतक तक किसी ने उसकी लकड़ियों के सही दाम नहीं लगाए . गाँव के उस छोर पर बनी हीरा की झोपडी से लेकर इस छोर पर बने पण्डित सर्जूलाल के तिमंजिला मकान तक उसने चार चक्कर लगाए पर सबके मुंह पर एक ही बात चिपकी रही – अगर ‘उसने’ ने नौ लगा दिए हैं तो हम सवा नौ देंगे .जादा से जादा साढे नौ ..डाले तो डाल दे ..
चल तू अकेली रह गई है सो दस रुपैया तक दे सकते हैं .नहीं ? तो फिर जा ..कही और ..इससे ज्यादा तो कोई देगा भी नहीं .
देगा भी नहीं .. हँसुली मन ही मन भुनभुनाई – अभी पास के गाँव में उसकी साथिनों ने ऐसी ही मोहरी ,फिर कहो तो इससे भी छोटी पंद्रह ..भली अट्ठारह में बेचीं हैं .
बेचीं होंगी .-कोई लापरवाही से बोला – आज तुम्हारी गरज है ..नहीं तो सीधे मुंह बात भी नहीं करती हो .”
तो...? –हंसुली को ताव आगया .
का मुफ्त में दे जाएं ? भैया यह तो सोचो कि हम कैसे-कैसे यहाँ तक आते हैं . लकडियाँ बीनने में हाथ-पाँव लोहूलुहान हो जाते हैं ..
वो तू जाने . सरजू पण्डित आकर बीच में ही बोल पड़े – दस रुपए में देनी हो तो अभी मेरे घर डालडे  .
हँसुली ने देखा कि पण्डित जी का चेहरा चमक रहा है . रोली का तिलक लगा है संपन्न दीखते है . दाम तो सही दे ही देंगे .
म्हाराज दस तो बहुत कम हैं . दिन भर की मजूरी में दिन भर का पेट तो भरे .आप अठारह नहीं तो पन्दरह तो दे दें ... हँसुली ने दीनता से कहा पर पण्डित जी बिना सुने ही भीतर चले गए .वह मोहरी दीवार से टिकाए खड़ी रही .   
तभी उधर से मंगलिया बौहरे निकले . पंसारी की दूकान चलाने के साथ ब्याज भी कमाते थे .सम्पन्न होने के साथ कंजूस भी थे . आँखों को धूप से बचाने उन्होंने हथेली को माथे पर छतरी की तरह तान रखा था
यों उन्हें लकड़ियों की जरुरत न थी .उनके कर्जदार साग-सब्जी , घास-भूसा ,कंडे-लकड़ी उनके घर ऐसे ही डाल देते थे .ताकि बौहरे जी प्रसन्न रहें और वसूली में ज्यादा कठोरता न दिखाएं साथ ही आगे जरुरत पड़ने पर रुपया देने में आनाकानी न करें .
लेकिन उन्हें पता चला कि एक ‘सहरनी ’( सहारिया आदिवासी) को अभी तक कोई ग्राहक नहीं मिला है और सौदा सस्ते में पट जाएगा तो उन्होंने आखों को और भी छोटी करते हुए लकड़ियों का वजन अनुमाना .फिर हँसुली को देखा –सांवले चेहरे पर उभरी हड्डियों के बीच गड्ढे में धंसी सी आँखों में उम्मीद की हल्की सी किरण , पीठ से मिलजाने को आतुर सा ,पल्लू से दिखता अनेक सिलवटों वाला पेट ,खुरदरे हाथ-पाँव ,रूखे-उलझे बालों से बहती पसीने की लकीरें ..सहानुभूति दिखाने का विचार हवा होगया . उपेक्षा से बोले --
माल तो नौ का भी नहीं है . पर तेरी हालत देख मैं दस रुपए या दो सेर बाजरा दे सकता हूँ . बाद में आठ भी नहीं मिलेंगे .सोचले ..
सारी मुफत में ही क्यों नहीं छुड़ा लेते बौहरे जी ?"--हँसुली आहत होकर बोली--"अपने लिए कैसे हुशियार हो .कोई नोंन की डरी तो उठाले ...
नहीं तो न सही . तुझे जहां परता पड़े वहां दे देना ..
मंगलिया बौहरे ने बड़ी निस्संगता से कहा और बिना मुड़े सीधे चले गए .जाहिर है कि उन्हें सौदा हाथ से जाने की चिंता नहीं थी .
तब से दिन ढलने को आया . हँसुली की मोहरी अभी तक ग्राहक के इन्तजार में थी .
कैसे लोग हैं .---हँसुली निराश होकर सोच रही थी .
घर बैठे चीज माटी मोल चहिये इन्हें .पर कैसे दे दें ? एक-दो मोहरी के लिए भूखे प्यासे जंगल में रातदिन भटकना पड़ता है .कांटे लोहूलुहान कर देते हैं .उस पर नाकेदार सूखी टूटी लकडियाँ बीनने में दस झमेले करता है .डरा-धमकाकर मुंह से कौर डरा लेता है . लोग जेब में रुपया ठूँसकर हरे-भरे पेड़ काट ले जाते है .और चोरों पर तो कोई जोर ही नहीं होता .बस हम गरीबों का ही कोई आसरा नहीं है .अठारह बीस की मोहरी दस में ! इतना घाटा कैसे सहे हँसुली ? दो दिन पेट भरने लायक बाजरा आजाएगा दस रुपैया में .हल्कू ‘ताव’ (बुखार) से तप रहा होगा और उसका कहीं धुत्त पड़ा होगा .ठीक दाम मिलने की आस में पूरा दिन ऐसे ही चला गया .आज भाग ही खोटा है और क्या...
अभी तक नहीं बिची तेरी मोहरी ?
मंगलिया बोहरे लोटा लेकर दिशा-मैदान जा रहे थे .हँसुली को देख रुक गए .
मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरे घर डालडे ..अब भी सोचले ..पर हाँ अब दूंगा नौ ही रुपए ..कोई जबरदस्ती नहीं है . तेरी इच्छा हो तो ...

हँसुली ने बौहरे को देखा .अपनी मोहरी को देखा .ढलते सूरज को देखा ,अपनी बस्ती की दो कोस की दूरी देखी और हारकर मोहरी उठाकर मंगलिया के घर की और चलदी . 

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

उमस भरी सुबह और एक फोनकॉल


ट्रिनन्...ट्रिनन्....
गुलमोहर कालोनी के एक एम आई जी फ़्लैट में तीसरी बार फोन की घंटी बजी ।
वैसे तो किसी का फोन आना एकान्त की ऊब और घुटन को तोडता है । सारी एकरसता को भंग कर पलों को तरोताजा कर देता है । हमें याद दिलाता है कि कोई है जो हमें याद कर रहा है किसी बहाने सही । लेकिन कभी-कभी लोग आप अपने आप में ही इतने त्रस्त व उलझे होते हैं कि फोन आना किसी ढीठ पडौसी की अनावश्यक घुसपैठ सी भी महसूस होता है .
बरसात की वह एक पसीने भरी गिजगिजी सी सुबह थी । बादल कभी तो मनमाने तरीके से अपनी भरी गागर उँडेल जाते थे तो कभी धूप चिलचिला उठती थी । हवा का कही नाम नहीं था .
उस समय सुबह तो क्या कहें लगभग दोपहर होने वाली थी । लेकिन छुट्टी का दिन कम से कम कामकाजी लोगों के लिए देर से ही शुरू होता है .
इस घर के चार प्राणी--पैंतालीस पार के गृहस्वामी सुधाकर राय , पत्नी अमला और दो बेटे--बडा बेटा सुधीर और छोटा विकास यानी विक्की , इसके बावजूद कि वे एक ही मंजिल तक जाने वाले एक ही गाड़ी में सवार मुसाफिर हैं वे अक्सर अपने आप में टकराते रहते है डलिया में पड़े बर्तनों की तरह ।
बैठे-बैठे बेडौल से होगए गहरे साँवले रंग के सुधाकर बाबू एक स्थानीय अखबार 'सान्ध्य-सन्देश' के सम्पादक हैं । बाल खिचडी हैं । शक्ल-सूरत बाहरी तौरपर किसी कोण से खूबसूरत नहीं हैं, लेकिन आँखों में एक खास आकर्षण है . उनकी रचनाएँ ,आवाज और बोलने का तरीका भी इतना प्रभावशाली है कि लोग उनसे खासे प्रभावित होजाते हैं । इसीलिये अखबार भले ही कुछ खास नही चलता पर सम्पादक जी का नाम खूब चलने लगा है । यह उनके लिये आने वाले पत्र और फोन बखूबी बता सकते हैं ।  लेकिन घर में उनकी हैसियत ‘घर की मुर्गी ‘जितनी भी नहीं है .बच्चों के लिए  ,खास तौर पर छोटे बेटे के लिए वे सिर्फ स्कूल की फ़ीस भरने या किसी कागज पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति भर हैं और पत्नी के लिए बहुत जरुरी जरूरतों को पूरा करने वाला साधन वैचारिक स्तर पर उनमें कोई समानता नहीं है .     
अमलादेवी छोटे कद और गेहुँआ रंग की सामान्य चेहरे वाली एक बेबाक और रूखी महिला है । वह यों तो स्नातक है लेकिन बातों से ऐसा लगता नहीं हैं .हाँ दुनियादारी के मामलों में उनकी छठी इन्द्रिय पति सुधाकर से भी बहुत आगे चलती है .यही कारण है कि शहर से दूर गाँव में बसे परिचित और परिजन ,जो 'सुधाकर भैया’ के घर आए दिन आ धमकते थे ,धीरे-धीरे आना भूल गए हैं ।
सुधीर बढती हुई उम्र का साँवला और सलोना लडका है । उसकी एक उपलब्धि तो यही है कि इन्टर की परीक्षा उसने बिना किसी रुकावट के सेकण्ड डिविजन से पास करली है । दसवीं बोर्ड में दो विषयों में रह गया था । इस बात को लेकर सुधाकर बाबू जब तब कहते रहते हैं कि’--"इसका कोई भविष्य नही है । पता नही क्यों पढाई में मन ही नही लगता इसका..?"
अमलादेवी को पति की ऐसी बातें अनाधिकृत चेष्टा लगती हैं । वह तुरन्त पति की बोलती बन्द करने के लिये एक अचूक अस्त्र का प्रयोग करती है ---
तो तुमने खुद कौनसे तीर मार दिये ? रो धोकर बी एस सी तो किसी तरह होगई पर एम. . की डिग्री तो आर्ट की बदौलत ही मिल पाई थी न ?
बीच में बोलना जरूरी है ?
मैंने तो सिर्फ सच कहा है .
सच कहने का दूसरा तरीका भी हो सकता है.
मुझे तो यही तरीका का  आता है । साफ कहना और खुश रहना .लपेटकर कहना तो मैंने सीखा ही नही है .
अच्छा ठीक है । अपना काम करो ..
काम ही कर रही थी । तुम्हारी तरह नही कि फालतू कागज-पत्तर फैलाए सबेरे से बैठे हो । बच्चों को समझाने का भी एक तरीका होता है ...
अगर तुम वह तरीका जानती हो तो समझाती क्यों नही हो .
क्यों ,सारी जिम्मेदारियाँ मेरी ही हैं ? तुम तो बस पत्र-पत्रिकाएं पलटते रहो , फोन पर बतियाते रहो अपने मित्र--मित्राणियों से ..
मित्राणियों से तुम्हें जलन होती है न ?
“ऐसी ऐरी-गैरी औरतों से  जलती है मेरी जूती .
तुम लोग आराम से आपस में बहस करो । तब तक मैं लौटकर आता हूँ
सुधीर माता-पिता की इस तरह की फालतू बहस का फायदा उठाकर अक्सर बाहर निकल जाता है । अब उसे जाने के लिए पूछने की भी जरूरत महसूस नही होती । जब चाहे वह दोस्तों के साथ फिल्म देखने या क्रिकेट खेलने चला जाता है । पिता के कई बार यह समझाने पर भी कि ये खेल-वेल छोड किसी कम्प्टीशन की तैयारी करले ,वह रोज सुबह-सुबह बैट थामे घर से निकल जाता है ।
विक्की जब देखो टी.वी.से चिपका कार्टून देखता रहता है ।
अपनी उम्र से कही ज्यादा आगे निकल गए लगते ये महाशय चूँकि परिवार में अकेले हैं जो कान्वेन्ट में अँग्रेजी माध्यम से पढ रहे हैं इसलिये अपने भाई से ही नही खुद को अपनी माँ और पिता से भी अधिक समझदार मानते हैं । और उनकी हर बात में मीनमेख निकालते रहते हैं ।
पापा क्या बोला आपने’ डीफ’ ? यानी बहरा ?..इसे डीफ नही ‘डेफ’ कहते हैं ।...हद है .. पापा शॅार्ट नही ‘शॅाट’ बोला जाता है । ‘आर’ साइलेंट है यहाँ  .” 
विक्की इस बात से भी अक्सर नाराज रहता है कि पापा अपने पुराने तरीकों को छोड़ना ही नहीं चाहते .कही भी जाएंगे ,पैरों में वही पुरानी चप्पलें ,कंधे में लम्बा झोला लटकाए रहेंगे . विक्की कई बार टोक चुका है कि लेखक-संपादकों की यह कोई यूनिफार्म है क्या जो...पर पापा हमेशा अपनी राह चलते हैं . उधर मम्मी हैं... नाश्ता बनाने की बजाय या तो टी.वीपर मैच देखने बैठ जाती हैं या पापा से उलझने लगती हैं कि 'क्यों जी दाढी बनाते समय एक तरफ मुँह क्यों फुला लेते हो ? भद्दा लगता है । या तुम्हें शाहरुख क्यों पसन्द नही है सारी दुनिया क्या पागल है जो उसे पसन्द करती है ?
बिक्की ,बहुत होचुका अब टी वी बन्द करो और नहा लो ."--अमलादेवी इधर से उधर उसे टोकती निकलती हैं पर विक्की उतनी ही लापरवाही से चैनल बदलता रहता है ।
सुधाकरबाबू कुछ देर गहरी और कुछ समझने की कोशिश भरी नजरों से उधर देखते हैं .
विकास, सुना नही माँ ने क्या कहा ?
किसकी माँ ने ? आपकी या मेरी ? विक्की फिक् से हँस पडता है ।
देखा, कितना ढीठ होता जा रहा है ?
और क्या होगा !  जब बच्चों को कोई देखने समझाने वाला न हो .
क्यों ,तुम्ही तो हर बार टोक देती हो ,मैं जब भी उन्हें कुछ समझाना चाहता हूँ कि ,रहने दो अभी वह थका हुआ है ..कि अब तो वह पहले से समझदार हो गया है, कि मैं कह रही हूँ ना ?, कि बच्चों को कहीं ऐसे समझाया जाता है ? जैसे पुलिस अपराधी को .ऐसे में बच्चे क्या सीखेंगे ?
“क्या आज मुझसे लड़ने की ठान ली है? मेरा तो सिर वैसे ही भन्ना रहा है
कमाल है . चोरी और सीनाजोरी इसे कहते हैं .”
सुधाकरबाबू निःशब्द मन मसोस कर रह जाते हैं । आगे कुछ कहने का सवाल ही नही उठता । पत्नी से एक कहो ,बीस सुनो--कि ...‘मेरा तो सिर चकरा रहा है । ..कि घुटनों का दर्द जाता ही नही कि मैं ही जानती हूँ कि कैसे काम चला रही हूँ । महाशय को तो दफ्तर से फुरसत ही नही है । और कैसे मिले ? दफ्तर घर में जो आजाता है । खाना भी ऐसे खाते हैं जैसे खाकर एहसान कर रहे हों । मेरे भाई को देखो कैसे भाभी के हर काम में हाथ बँटाता है । मेरी तो जिन्दगी चूल्हे-चौके में ही गुजर चली...." वगैरा..वगैरा ।
ऐसे में विवाद और तनाव से बचने के लिए सुधाकर राय का मन कोई 'खिड़की' तलाशता है जो इस बंद कमरे में कुछ ताजगी का अहसास हो.आने वाले फोन कॉल भी उनके लिये एक तरह की खिड़की ही होते हैं . 
शायद अमला भी इस तथ्य से अनजान नहीं है. इसीलिए उसका ध्यान 'जो मिला है' उससे ज्यादा 'जो नहीं मिला या छूट गया' ,उस पर रहता है . इस तरह घर में अक्सर शीतयुद्ध का माहौल बना रहता है. 
अब भी जबकि सूरज को सिर पर आने में कम से कम ढाई-तीन घंटे थे, गुलमोहर कालोनी के उस एम.आई.जीफ्लैट के माहौल में जाने किस बात पर पहले से ही अजीब सी खुन्नस थी . मौसम की उमस से ज्यादा चुभने वाली थी विचारों की उमस. जैसा कि अक्सर होता है. ऐसे में छोटी छोटी बातें भी उस खुन्नस को बढ़ाने वाली होतीं हैं . बार बार फोन का बज उठना भी उन कई बातों में से एक है .
सुधाकर राय अपने आसपास ढेर सारी पत्रिकाएं बिखराए पसीने में नहाए हुए जैसे किसी 'खिड़की' के खुलने की उम्मीद में बैठे थे .पंखा ऐसे चल रहा था जैसे अभी लम्बी बीमारी से उठा हो . सुधाकर ने उठकर पंखा तेज किया लेकिन अमला ने तुरन्त आकर धीमा कर दिया ।
यह क्या मजाक है ?
मजाक नही जरुरी और सीरियस बात है । बिल कितना भरना पडता है मालूम है ?
नही ..बिल तो तुम भरने जाती हो न ?
मैं क्यों जाऊँ तुम्हारे होते ? मेरे तो घर में ही इतने काम हैं कि ....
हाँ देख रहा हूँ .बहुत सारे काम हैं तभी तो दस बज रहे हैं । एक कप चाय तक नही मिली .
क्यों ? कभी खुद भी बना कर पी लिया करो. पता तो चले कि चाय बैठे-बैठे नहीं बन जाती ...सुबह से फालतू बैठे हैं । कभी किसी प्रकाशक को फोन लगाते हैं कभी इस लेखक को और कभी उस लेखिका को . लेखिकाओं के लिए तो .. ..यह कोई काम है ?
अरे यार, बन्द करो अपनी ये बकवास । जो काम हो सके करलो नही हो ,मत करो । बात खतम..."
अमला को इस बात की चिढ है कि पढने-लिखने की आदत ने सुधाकर की आदतें ही नही बिगाड दी हैं बल्कि घर का माहौल भी उबाऊ बना दिया है । छुट्टी के दिन भी महाशय दफ्तर फैला कर बैठ जाते हैं । या किताबों में आँखें गडाए रहते हैं और कुछ नहीं तो फोन पर कान चिपकाए रहते हैं और घंटों तक फुनियाते रहते हैं । खासतौर पर महिलाओं से कुछ ज्यादा ही रूचि लेकर....कहो तो दो-दो हफ्ता शेव नही करें । दाढी को कटेरी के काँटों सी उगालें और कहो रोज ही साबुन-रेजर लेकर बैठ जाएं ।
अब भी वह किसी बात पर कुढ़ी हुई थी और पति को सुनाती हुई बडबडाती जा रही थी—
सम्पादक होने का मतलब यह थोडी है कि घर-बार और बीबी-बच्चों को देखो ही मत ? यह तो नही कि पन्तनगर जाकर भैया से मिल आएं .शिल्पा की पढाई के बारे में राय लेने कितनी बार बुला चुके हैं पर महाशय के भाव मिलें तब ना ?कुछ नहीं तो बडी मण्डी जाकर हफ्ते भर की सब्जी ले आएं। किफायती पड जाती है और सब्जी की चिन्ता नही करनी पडती । नही तो ठेले वालों से दुगने दाम देकर खरीदो वह भी पानी के छींटों से जबरन ताजी बनाई हुई .
" रोज सुबह एक ठेले वाला  तो एकदम ताज़ी  सब्जी लेकर निकलता है . वह नहीं खरीदी जाती . भला फिर मुझे टोकने का मौका कहाँ मिलेगा ?"
" हाँ खूब ताज़ी लाता है ! बीस रुपए किलो टमाटर चालीस में बेचता है .यह तो नहीं कि आदमी बचत की सोचे . मेरे भैया को देखो ..."
“ अरे यार ! तुम और तुम्हारा भाई ! अपने काम से काम रखो । मेरे काम में अपनी नाक मत घुसेडा करो समझी .----ऐसे में सुधाकर का धैर्य भी जबाब दे जाता है ।
हाँ..हाँ एक मैं ही हूँ जो तुम्हें निभा रही हूँ । तुम्हारे साथ कौनसा सुख मिला है ?
तो जहाँ मिले वहाँ चली जाओ न ? हद होगई यार... अपने अलावा किसी और को भी देखती हो ?
मैं नही देखती तो तुम्हारी और कौन बैठी है जो जिमा जाएगी गरम-गरम फुलके ?
बन्द करो यह नाटकबाजी .
विक्की चीख उठा । इस समय वह नमकीन का पूरा डिब्बा सामने रखे बैठा था और मुट्ठी भर--भर के खा रहा था ।
यह नमकीन क्यों खाया जारहा है ? नुक्सान नही करेगा ? सुधाकर ने तल्ख अन्दाज में कहा ।
इसकी परवाह किसे है ?-- विक्की की आवाज भी जितनी तीखी है ,लहजा भी उतनी ही रूखा है ।
घर में ग्यारह-ग्यारह बजे तक नाश्ता नही बनता । कुछ तो खाना पडेगा न ?
सुधाकर ने कुढते हुए घड़ी को देखा और एक असहाय सी दृष्टि पत्नी पर डाली जो लम्बे फूल झाडू से खडे-खडे ही आँगन में झाडू लगा रही थी । कमर स्थूल होगई है और पेट इतना निकल आया है कि झुकते नही बनता । आलू-चावल छूटते नही हैं ।
गृहमंत्री जी ! बालक क्या कह रहा है ?-- पत्नी के मूड को ठीक करने और माहौल को हल्का बनाने की गरज से कुछ परिहास के लहजे में सुधाकर ने कहा पर अमलादेवी हैं जो खीज के खजूर पर चढ गई तो उतरती नही है आसानी से । झाड़ू लगाना रोक दिया और चिढ कर बोली--
तुम्ही सुन लिया करो कभी-कभी । मैं अकेली कहाँ-कहाँ मरूँ ? गेहूं धोकर सुखाने हैं .पलंग की दरारों में खटमल होगए हैं । दवाई डालनी है । तीन दिन से कपडे इकट्ठे हो रहे हैं उन्हें...
“ बस ,बस सुन लिया ."--सुधाकर ने उकता कर कहा । अमला इतने कर्कश लहजे में बोलती है कि सिर दुखने लगता है । हर वक्त काम की शिकायत ।
दरअसल काम उतना है नही जितना दिखावा तुम करती हो । सुबह बिस्तर उठाने से लेकर रात को बिस्तर बिछाने ,मच्छरदानी लगाने तक कितने ही काम हैं जिन्हें मैं ही करता हूँ ।
हाँ बडे करते हो !....और करोगे नही क्या ? घर की जिम्मेदारी क्या मेरी अकेली की है ?
ट्रिनन्...ट्रिनन्......               
उस खींचतान के बीच सुधाकर बाबू ने उस काले से उपकरण को एक सुकून भरी नजर से देखा . जैसे अचानक खिड़की खुल गई हो .उमस के बीच एक ठंडी हवा का झोंका आकर रोम रोम को प्रफुल्लित कर गया .यह फोन उन्ही के लिए होना चाहिए . आज दफ्तर जो नहीं गए .बाहर के 'कुछ लोग' कम से कम उन्हें इतना चाहते तो हैं कि एक दिन भी संवाद न हो तो लगे जैसे कुछ छूट गया है .बेशक ऐसा सोचना उन्हें बड़ा अच्छा लगा  .घर से तो दफ्तर बढ़िया है कि लोगों के साथ कुछ अपनेपन की बातें कहने-सुनने मिल जातीं हैं .
पर आजकल होता यह है कि जब भी कोई फोन आता है उठाने के लिए भले ही दौड़कर सुधीर और विक्की आएं पर फोन को अमलादेवी ही उठाती हैं .सुधीर बड़ा हो रहा है और विक्की भी कम स्मार्ट नहीं . और पतिदेव के तो हाल ही निराले हैं .घर में होकर भी वे घर में नहीं होते . 
इसलिए जब सुधाकर राय घर पर होते हैं ,अमलादेवी उन्हें वशभर फोन नहीं उठाने देतीं .यह उनकी सजगता का एक नमूना है. पर अक्सर होता यह है कि या तो कोई पतली सी आवाज आती है 'सुधाकर जी हैं ?" या फिर आवाज की जगह साँसों का सन्नाटा सा सुनाई देता है .अमलादेवी का संशय बढ़ जाता है खीज भी . 
“ कौन हो सकता है जो फोन लगाता है पर बोलता नहीं ? कोई न कोई चक्कर तो है ."
"हाँ जरुर कोई भूत होगा ."--सुधाकर राय हँसकर कहते है .पर अमला चिढ़ कर बोली -" क्यों चुड़ैल नहीं हो सकती क्या ? मैं कितनी बार कह चुकी हूँ कि आईडी कॉलर लगवा लो लेकिन मेरी बात का तो कोई असर ही नहीं है न ?” 
सुधाकर राय खूब समझते हैं कि अमला जानकर ही खुद फोन उठाती है. गज़ब की शक्की औरत है .सीधा आरोप लगा देती है कोई ‘चक्कर’ होने का .
इसे कौन समझाए कि चुपचाप  मानसिक स्तर पर व्यक्ति कहाँ कहाँ नहीं जुड़ता ,टूटता है ! वह भी जुड़े हैं और टूटे हैं लेकिन यह क्या जाने ! अमला जाने कैसे इतना नहीं समझ पाती  कि सुधाकर राय जैसे अनगढ़ आदमी से कौन चक्कर चलाना चाहेगी ! वह खामखाँ शक में उलझी रहती है .हालांकि उन्हें पत्नी का यह संदेह अच्छा लगता है . कभी कभी ऐसे संदेह बढ़ाने में जैसे उन्हें रस मिलता है .  
"अरे भई सम्पादक के सम्पर्क में लेखक भी होते हैं ,लेखिकाएं भी होतीं हैं .संपर्क बढ़ते भी हैं और इसमें आश्चर्य भी नहीं कि कोई रचनाकारा रचनाओं से भी कुछ आगे लगने लगे .अक्सर होता है ऐसा .." 
"होता है नहीं ,है मेरी आँखों के सामने . तभी तो कहती हूँ कि.... 
ट्रिनन ..ट्रिनन ..
ना इस बार फोन सम्पादक जी ही लें . अमला ने तय किया कि आज वह केवल सुनेगी .देखेगी कि सम्पादक जी का चेहरा क्या बोलता है .
“ अब अपना फोन तो उठा लिया करो.कि वह भी नहीं होता?--अमला चादर ठीक करते हुए व्यंग्यभरे लहजे में बोली ।
अपना !..क्या मतलब है तुम्हारा ?—सुधाकर ने अमला के व्यंग्य को समझकर कहा .
मैं कोई जापानी या फ्रेंच थोडी बोल रही हूँ जो मतलब समझाना पडेगा ?
नहीं ..बोल तो हिन्दी ही रही हो पर तुम्हारे शब्दों के मतलब अलग होते हैं न ?
वही तो ! चोर की दाढी में तिनका । खूब समझते हो पर अनजान बनते हो .
अरे भाई बात करो ,पता चल जाएगा कि किसका है.
पता तो तब चले जब कोई बात करे .तभी तो कह रही हूँ कि...बात करलो . फोन करने वाली को मेरी आवाज उसे पसंद नहीं है .सुनते ही फोन काट दिया .मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि फोन तुम्हारे लिए ही था ."
 वाह मम्मी आप तो बड़ी इंटेलिजेंट हो . विक्की हंसने लगा बिना आवाज सुने ही पता लगा लिया कि वह कोई महिला थी .
अब मेरी आवाज सुनकर फोन रख दिया तो जरुर वह कोई महिला या लडकी ही होगी .
बेटा तुम्हारी माँ शरलाक होम्स के खानदान से जो है ."
बाप–बेटा ,खूब मजाक उडालो पर मै घास नहीं खाती . दफ्तर की छुट्टी होने पर घर में जितने फोन आते है उनमें से आधे ब्लेंक होते हैं .क्यों ?
सुधाकर ने कहा --मुझे क्या मालूम ? और यह क्यों नहीं सोचती कि फोन सुधीर या विक्की के लिए भी तो हो सकते हैं .
उनके सब दोस्त मुझसे बात करते हैं .
आजकल लडकियाँ भी दोस्त होतीं हैं .और वे सबसे बात नहीं करतीं .”   
“ यह मजाक कुछ जमा नहीं . मेरे लडके तुम्हारे जैसे नहीं हैं .वे हर बात अपनी माँ को बताते है .और जब तुम घर में होते हो तब फोन पर न सुधीर के बोलने पर कोई बोलता है न विक्की के .फिर मैं तो पक्की दुश्मन ही हूँ .
" भरोसा  भी कुछ होता है कि नहीं ? "
"भरोसा ? और तुम पर ? कौन करेगा ? देखने में सज्जन पर आचरण ? बिगड़ा हुआ है !"
'बिगड़ा हुआ ! क्या शब्द लिया है अमला जी ." सुधाकर राय को बात चुभ गई .
"हिंदी में स्नातक उपाधि का कोई मतलब नहीं है सोच और अभिव्यक्ति बिलकुल जाहिल औरतों जैसी .'
 तो क्या गलत कहती हूँ ? मर्दों को दूसरी औरतें ही ज्यादा अच्छी लगतीं हैं .तुम क्या कोई अलग हो ? 
.कितने मर्दों को जानती हो जो....?
सबको जानने की जरुरत क्या , तुम्हें जान लेना ही काफी है .
नहीं अमला तुम मुझे नहीं जानती-समझती .—सुधाकर के अन्तर्मन से नीरव भाव-धारा फूटी—‘ तुम सिर्फ बहस करना और बात काटना जानती हो राजनीति के किसी दुराग्रही विपक्षी दल की तरह . आवाज कितनी रूखी ,आक्रामक और कर्कश होती है .दूसरी तरफ वे भी महिलाएं ही हैं ,फोन पर कितनी कोमलता से बातें करतीं हैं . कितना सुकून मिलता है जब कोई इतने सम्मान के साथ बात करता है .यह अनुभूति भी कितनी मीठी होती है कि वे एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं .किसी के लिए बहुत खास . इस तरह खास होना कितना मोहक होता है .बंद कमरे में अनायास ही कोई खिड़की खुल जाना किसे पसंद नहीं . 
पर घर तो जैसे अक्सर ही संसद भवन बना होता है . कैसी विडम्बना है कि जहां तन होता है वहां मन नहीं होता .
अच्छा ! अच्छा !... और क्यों गृहमंत्री जी , ये फोन क्या तुम्हारे लिए नहीं हो सकते ? ..समझा ..तभी तुम किसी को उठाने नहीं देतीं .."
अमला ने घूर कर देखा तो सम्पादक जी सम्हल गए -- 
" मेरा मतलब है , ज्यादातर फोन तुम्हारे ही मायके से आते है और...
हाँ, तो ? जिसके होंगे वही तो याद करेंगे . तुम्हारा तो इतना बड़ा कुरमा है .अपनेआप से कोई करता है कभी फ़ोन ? करेंगे भी तो ‘मिसकॉल’ . कंजूस नम्बर एक . इधर से हम करें तो करलें. उस दिन तुम्हारी बहन ने ... .
अरे ! यह क्या तुम्हारी–तुम्हारी लगा रखी है . क्या मेरी बहिन तुम्हारी कुछ नहीं लगती ?
उन्होंने कभी समझा है मुझे अपनी ? हमेशा मेरी कमियां तलाशती रहतीं हैं. 
तुमने भी कौनसी कोशिश की है समझाने की ?"
"हाँ तुम तो उसी का पक्ष लोगे .मैं तो ..." 
"दीदी को छोडो ,माँ ने तो तुम्हें हमेशा बेटी की तरह रखा है .न मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की . न ही तुमसे कभी कुछ नहीं कहा . फिर भी तुम उन्हें दोष देती रहती हो .हमेशा रूखा बर्ताव करती हो . उनकी नजर से भी कभी सोचकर देखा है ?
तुम लड़ना चाहते हो मुझसे उन सबके पीछे ?
नहीं मैं बताना चाहता हूँ कि दिमाग में बेवजह भरी बेकार बातों को निकाल दो ."
कैसे निकाल दूँ ,जबकि तुम्हारे लिए वे आज भी मुझसे ज्यादा हैं .इतनी दूर रह रहे हैं फिर भी मुक्ति नहीं है ..कभी घरवाले खून सुखाते हैं तो कभी...बाहर वालियाँ ..”—अमलादेवी रुआंसी होकर बोली . सुधाकर का भी गुस्सा फूट पड़ा .
बिना सोचे समझे मुंह मत खोला करो समझी .अपनी बकवास बंद करो और मुझे काम करने दो .शिकायतों के अलावा भी कुछ आता है ? जीना मुहाल होगया है . सिर्फ एक दिन की छुट्टी में घर रहना कितना कठिन होता है ! अच्छा हो कि कहीं बाहर चला जाया करूँ .
हाँ हाँ ..मैं ही खराब हूँ . मेरी बातों में तो कांटे चुभते हैं न ? ऐसे आदमी के पल्ले बंधकर मेरी तो जिंदगी बर्बाद होगई —अमला ने चीखते हुए कहा . फिर रुआंसी होकर झाड़ू एक तरफ पटक दिया और अंदर वाले कमरे में जाकर पलंग पर जा लेटी और सिसकने लगी. सुधाकरराय अवाक् देखते रहे . 
ट्रिनन ट्रिनन ...
अब सुधाकरराय को गुस्सा आगया .चाहे फोन 'करने वाला' हो या 'वाली' हो . कोई भी हो . अपनी गृहस्वामिनी ही व्यथित हो तब कैसा रोमांस ? कौनसी खिड़की ?  .
हेल्लो , अरे भई कौन हो ? क्या परेशानी है ? ...नहीं , मैं इस समय बात नहीं कर सकता .आपको यहाँ फोन करने की जरुरत भी नहीं है . हाँ ठीक सुना .क्या ?...हाँ सीधे दफ्तर में भेज देना .. और फोन पटक दिया गया .
विक्की इस घटनाक्रम से बेअसर टीवी देखता रहा . उसे पता है कि मम्मी का इस तरह ‘कोपभवन’ में जाना हर तरह के झगड़े का क्लाइमैक्स होता है .बिगड़ा हुआ यह मौसम कुछ देर बाद अपने आप ही ठीक हो जाएगा जैसे कुछ हुआ ही न हो .
तब तक सुधाकर राय किसी बेरोजगार व्यक्ति की तरह बैठे गर्मी से निजात पाने के लिए बेहाल थे और हवा के साथ बारिश का इन्तजार कर रहे थे .