सोमवार, 22 दिसंबर 2014

एक सर्द रात और पूरी ज़िन्दगी


गायत्री ने रजाई को चारों ओर से दबाकर थोडी गर्माहट महसूस करने की एक नाकाम सी कोशिश की ,पर रेतीली मिट्टी को तोडकर फूटती पानी की तेज धारा की तरह सर्दी उसकी पसलियों तक धँस गई । दो दो स्वेटर ,स्कार्फ ,इनर ,ऊनी मोजे तो वह सोते समय भी पहने हुए थी । यही नही रजाई के साथ एक शाल भी मिलाली थी । फिर भी सर्दी थी कि रोम रोम में समा गई थी । उसे रह रहकर कँपकपी सी लग रही थी । 
कुछ तो कमरा ही ऐसा है । बडी-बडी खिडकियाँ ,जिनमें किवाडों के नाम कागज के गत्ते लगे हैं ।वे भी पूरे फिट कहाँ हैं ? कहीं न कहीं सन्धि रह ही गई है । हवा को आने के लिये कितनी जगह चाहिये ? कमरा एकदम बर्फ हो रहा था । उसपर बिजली भी नही थी । मेला के समय तो पूरी पूरी रात बिजली की कटौती होजाती है । वैसे बिजली होती भी तो क्या करती गायत्री ? हीटर जैसी कोई चीज अभी तक नही है उसके पास । लकडियाँ पिछले हफ्ते की बारिश में गीली होगईं ,नही तो चूल्हा या अलाव जलाने पर कुछ राहत तो मिलती । 
उसे याद आया कि गाँव में तो आग के सहारे ही लोग आधी से ज्यादा रात काट लेते थे । आखिरी चिनगारी बुझने तक लोग राख कुरेदते रहते थे । बुझता हुआ अलाव या चूल्हा ही उन्हें गर्मी का अहसास कराता रहता था ।
बचपन में वह जब छोटे भाई के साथ कस्बा में पढने जाती थी तब दिसम्बर-जनवरी की ठिठुरती सुबह में वे रास्ते में आग जलाकर हाथों को गरम कर लेते तभी साइकिल चला पाते थे । यहाँ शहर में कहाँ लकडी ,कहाँ अलाव ! गैस से कहीं गर्मी मिलती है ?
"पिछले पैंतालीस साल में भी ऐसी सर्दी नही पडी ।"--अखबार में लिखा था । गायत्री को सर्दियों का आना बहुत अखरता है । सच तो यह है कि वह ठीक से तैयारी भी नही कर पाती कि मौसम आ धमकता है । सर्दियों के कपडे ,जो मार्च- अप्रेल में बाँधकर दीवान में रख दिये जाते हैं निकालकर धो सुखा भी नही पाती कि सर्दियाँ बहुत ही अनचाहे मेहमान सी आ जमती है । हर साल सोचती रह जाती कि दो अच्छी रुई वाली रजाइयाँ बनवाले .पिल्ले निकल आए हैं .बिछाने के लिए भी गद्दे होने चाहिए । जैसे उग्र भीड को रोकने में डण्डा-पुलिस असमर्थ होजाती है ,कथरी भी नीचे से सर्दी को रोकने में नाकाम रहती है । 
हर साल जाती सर्दियों में वह ऊनी कपडे खरीदने का विचार करती है . जाते मौसम में कपड़े सस्ते मिलते हैं ,लेकिन तभी यह विचार उसे दुकान से लौटा देता है कि अभी पैसा डालना बेकार रहेगा .गर्मियाँ आने को ही हैं । सर्दियां अब पूरे एक साल बाद आएंगी .जब आएंगी तब देखेंगे. 
सर्दी आ भी जाती हैं साथ ही हर साल की तरह पछतावा भी कि सेल से ही क्यों न खरीद लिये शाल और स्वेटर ?
गर्मियों में भी यही होता है .कूलर पंखे ठीक करवा भी नहीं पाती कि धरती तपने लगती है । जिन्दगी एकदम अस्त-व्यस्त बस गुजरती सी चल रही है । सब कुछ अस्थाई सा । मुसाफिरखाने में ठहरे मुसाफिर जैसा . एक आलपिन के बिना सारे कागज बिखर जाते हैं जरा से झौंके से। एक अभाव ने जैसे पूरे जीवन को ही खोखला कर दिया है । मोहित के पापा....
पति का ध्यान आते ही गायत्री को तलवे में धँसे काँटे को कुरेदने जैसी कसक महसूस हुई ।
अकेलापन जब हावी होजाता है तब अकेलेपन के कारण पर ही सबसे अधिक ध्यान जाता है । वैसे तो गायत्री अकेली नही है । दो बेटे हैं । आसपास ही देवर-देवरानी हैं । उनके बच्चे हैं और पास-पडौस के लोग हैं लेकिन कभी-कभी वह सबके बीच बहुत अकेली होजाती है और उसका एकमात्र कारण होता है मोहित के पिता की कमी । 
ऐसे में गायत्री अनायास ही केवल पति और पति से जुडी यादों में खो जाती है । पति नन्दकुमार जो उसे परिजनों के हवाले छोड दूसरी दुनिया बसाकर पूरी तरह बेखबर हो गया है । जब उसने दूसरा घर बसाया था तब गायत्री ने अपनी ऐसी जिन्दगी की कल्पना नहीं की थी या कि नंदकुमार ने करने नहीं दी थी ? 
ऐसे में विगत बीस वर्ष गायत्री को पर्स से गिर गए बहुत जरुरी कागजात से लगते हैं ,जिनके बिना उसे न्याय नहीं मिल सकेगा .  .सम्हालकर रखती तो....और फिर नींद कोसों दूर हो जाती है .

जीवन के प्रारम्भिक दिन जिस विश्वास के साथ शुरू हुए थे ,सीधी-सादी गायत्री सोच भी नही सकती थी कि आदर्श और नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नन्द कुमार का पाँव कहीं और भी फँसा है । जब सच सामने आया । वह जड़वत रह गई । 
नन्दकुमार जाने कबसे एक अन्य स्त्री के साथ अलग दुनिया बसाए हुए था और उसे भनक तक नहीं थी. जब लगी तब मोहित दो साल का था और रोहित गर्भ में था । समझ में ही नहीं आया कि क्या करे ! वह पूरी तरह से मंझधार में थी .पारिवारिक और सामाजिक ही नहीं मानसिक रूप से भी .
और करती भी क्या कैसे ? तन-मन से नंदकुमार ही उसका सर्वस्व था .कोई कठोर कदम वह उठाती भी तो कैसे ? और उठाने की सोचती भी तो तब जब नन्दकुमार उसे सोचने देता . 
वाक्पटु नन्द ने कृतज्ञता का ऐसा प्रदर्शन किया कि गायत्री की बोलती बन्द होगई ।
“ गायत्री मुझसे गलती तो हुई है और तुम्हें पूरा हक है कि विरोध करो ,मुझे सजा दिलवाओ . मैंने तुम्हारे साथ छल किया है इसलिये तुम्हें रोकूँगा नही । लेकिन तुम अगर मेरी मजबूरी समझ जाओगी तो मैं निश्चित ही उसका मान जिन्दगी भर रखूँगा । तुम्हारा ऋण रहेगा मुझपर । अब तुम्हारे सामने दो रास्ते हैं---एक मुझ पर केस करदो और सजा करवाकर मेरे माथे एक अपराधी पति और पिता का लेबल लगा दो दूसरा मेरे निवेदन को मानकर एक भरापूरा जीवन बिताओ जिसमें हमारे दोनों बच्चे तुम्हारे और मेरे स्नेह में पल बढकर बडे होंगे । क्या करना है ,यह तुम्हारे ऊपर छोड़ता हूँ ।इतना समझलो कि निकिता तो अनपेक्षित व अप्रत्याशित रूप से जीवन में आगई है .पर तुम मेरी परिणीता हो और वह तो ऐसे ही है बस....
फिर साथ ही परिजनों की सान्त्वना और गर्भस्थ शिशु का मोह . 
समाज और कानून के बारे में सोचने की जरूरत ही कहाँ थी ! सच तो यह है असली सजा व्यक्ति अपनेआपको खुद ही दे सकता है .लोग जेल में जाकर भी नहीं सुधरते . नन्द खुद को अपराधी मान रहा है यह सजा क्या कम है ? 
पर इससे भी आगे जो बात थी वह थी गायत्री का नन्द से लगाव उसकी बातों का भरोसा जो इस असहनीय स्थिति में भी कम नहीं हुआ था .फिर सजा-शिकायत किसकी करे ? उसकी जो खुद ही अपना अपराध स्वीकार कर सिर झुकाए खडा है ? उसका पति ? ..पति , जिसके बिना जीना स्त्री के लिए कच्चे कगार पर चलना होता है .
बस उसने अपने आप को समझा लिया । पति से प्रेम और सम्बल मिलता रहे बस और क्या चाहिए .जब पति ने उसे भरोसा दिया है तो चिन्ता किस बात की । दूसरी औरत क्या कर लेगी ? सबसे बडी बात थी बच्चों के भविष्य की । बच्चों को पिता का स्नेहमय संरक्षण मिलना ही चाहिये जबकि वह दुनिया में है । स्त्री परिणय ,प्रणय और मातृत्त्व के नाम पर स्वाभिमान और सम्मान को भी एक तरफ रख देती है । यह उसकी उदारता है ,मूर्खता है या महानता , पता नही ।
गायत्री ने इसे स्त्री की उदारता माना और पति को अपराध बोध से मुक्त कर दिया । 
लेकिन उदारता ही काफी नहीं होती ,इसे समझने में गायत्री को खासा समय लग गया . तब तक निकिता अपने चातुर्य से अपना दायरा इस तरह फैला चुकी कि गायत्री को धीरे-धीरे खुद को समेटना पड गया. यहाँ तक कि उसे पाँव पसारना भी भारी पड़ने लगा .विरोध किस मुंह से करती ! दोष उसी को मिलता कि पहले तो विरोध किया नहीं ,अब हाय हाय करने से क्या होता है . शुरू में ही रोकना था न ? 
निकिता ने तो वही किया जो अक्सर ऐसी स्त्रियाँ करती हैं.उसे क्या दोष . दोष है तो वह खुद गायत्री का जिसने अपने पाँव पर कुल्हाड़ी खुद ही मारली है .
"ऐसा नहीं है "--परिवार व समाज में मान्य पत्नी गायत्री का असंतोष विद्रोह में न बदल जाए इसलिए नन्द बड़ी चतुराई से काम लेता .खूब स्नेह जताकर कहता ---
"यह तो तुम्हारी उदारता और शालीनता है .अच्छे परिवार के संस्कार हैं .यही तो ब्याहता पत्नी और दूसरी में फर्क होता है ."
तब गायत्री कुलीनता व शालीनता के भार से झुकी चुप रह जाती हालाँकि कभी-कभी उसकी बातें शिकायत का रूप ले लेतीं थी .आखिर वह भी एक स्त्री ही थी .
लेकिन तब नन्द का स्वर और लहजा दोनों ही बदल जाते --
गलती होगई जो इधर चला आया।"
तो न आया करें अगर इतनी ही परेशानी होती है।"--गायत्री एक पत्नी के स्वाभिमान और अपनेपन की धोंस में कहती थी तब नन्द
गायत्री को दूसरी तरह से परास्त कर देता -- 
"मैं तो यह सोचता था कि कम से कम गायत्री तो मुझे समझेगी लेकिन अब यहाँ भी मुझे शिकवे-शिकायत सुनने मिल रहे हैं तो मैं क्या करूँ ? जीना मुहाल होगया है .कहीं चैन नहीं है..."
"ऐसे परेशान न हो . मैं अब कोई शिकायत न करूंगी ." 
गायत्री पति की बातों से ऐसे पिघल उठती जैसे कि पति की परेशानी का कारण वही है .
यों नन्द का रास्ता आसान होता गया और गायत्री समझ ही नहीं पाई .नन्द हफ्तों तक नहीं आता और गायत्री बेचैन हो जाती . उसका अंतर चिल्ला-चिल्लाकर कह उठता कि उससे ही कोई भूल हुई है वरना वो इस तरह रुकने वाले नहीं हैं .भावनाओं पर गायत्री का वश नहीं . पति के सामने भूल स्वीकार करने में उसे जरा भी वक्त नहीं लगता .      
पिछली बार भी किसी बात पर नन्दलाल नाराज होकर चला गया लौटकर न आने का संकल्प लेकर. 
दो माह होने को आए . एक बार भी नन्द ने गायत्री या बच्चों को पलट कर नही देखा । 
शुरू में तो इस बार गायत्री ने भी सोच लिया था कि अब उन्हें जाने ही दो . बहुत हो चुका नाटक .ईमानदारी भी कुछ होती है . अपनी कही हर बात को हर बार भूल जाते हो. जाओ,रहो वहीँ 
लेकिन समय के साथ-साथ पति से उसका आत्मिक जुडाव एक बार फिर नफरत को धूमिल करने लगा । भावनाओं का उफान किनारों से टकराकर चीखने लगा कि ,"आखिर ये दूरियाँ क्यों ? उन्हें क्यों बढने दे रही है गायत्री, जबकि हृदय का बंधन आज भी उतना ही मजबूत है । फिर काँटों की राह उसने भी तो आसानी से स्वीकार करली थी . सिर्फ इसलिए कि वह पति को खोना नहीं चाहती थी .जिसे भुलाया नहीं जा सकता उसके लिए कोरी अकड में क्या रखा है ? पति के जीवित होते हुए वह क्यों हर तरह से वंचिता रहे ! .."     
गायत्री की नसों में जैसे बर्फ जमी जारही थी ।  
जब नेचुरल हीटर पास हो तो फिर कहाँ की सर्दी कैसी सर्दी ?---नन्द ने एक बार उसे बाँहों में भरते हुए कहा था । 
यादों ने उसकी दबी लालसाओं को अनायास ही जगा दिया । उसके सामने जाने कितनी जरूरतें मुँह फाड कर खडी होगईं और सारी कटुताओं को निगल गईं । एक बर्फीला झौंका उसकी पसलियों को भेद गया ।  
स्वाभिमान की ऊष्मा के साथ-साथ पति को याद न करने का संकल्प भी ठण्डा होगया , दो पल के लिये रख छोडी चाय की तरह । ऐसा क्यों है कि पति के स्नेह और सम्मान के बिना उसे कोई सुख-सुविधा या सम्मान सन्तुष्ट नही कर पाता । बच्चे माँ की एक हँसी के लिये क्या कुछ नही करते । वह हँसती भी है पर हँसी खुद ही उसे खोखली लगती है । उसे दो महीने ही दो साल क्यों लगते हैं कि कितना समय बीत गया पति को घर आए हुए । और यह जिन्दगी ठहर गई सी क्यों लगती है?
जरूरतों की पूर्ति भी कभी--कभी कितनी आवश्यक लगने लगती है ? उसके अन्तर से एक हूक सी उठी---उनसे क्षमा माँगलूँ । बुलालूँ उन्हें । आखिर उनसे मेरा सम्बन्ध कोई ऐसा वैसा नही, सात फेरों का है । कहीं भी रहें । हैं तो वो मेरे पति ,जीवन के प्रथम पुरुष । कोई भी स्त्री अपने प्रथम पुरुष को नही भूल पाती । फिर मैं तो पत्नी हूँ उनकी । पति से क्षमा माँगने में क्या मान और क्या अपमान । और इससे भी बडी बात है कि न पति के बिना स्त्री की राहें आसान होतीं हैं न पिता के बिना बच्चों की ।
जब गायत्री के अन्दर पति प्रेम का सागर उमडता है तो किनारे दूर तक भीग जाते हैं । उसे खुद में पच्चीस दोष नजर आने लगते हैं ।
मैं क्यों तभी अपनी बात कहती हूँ जब वो नाराज होते हैं । जीवन का अब जो भी रूप है ,खुद गायत्री ने भी तो स्वीकार कर लिया था फिर किस बात का मलाल ?
वो रास्ता बनाते गए वह पीछे हटती गई अब शिकायत किस बात की । कि शान्त रहकर उनकी बात क्यों नहीं सुनती । नही ज्यादातर गलती उसकी खुद की है । उसे लगता है कि पति का दिल जीतने की कोशिशों में कुछ कमी तो रही है । क्या वह कोशिश फिर नही होसकती । जरूर हो सकती है । होनी भी चाहिये । दूरियाँ बढाने से बढती हैं . फिर पति बिना जीवन भी कोई जीवन है ?
और उस सर्द खामोश रात में गायत्री एक बार फिर सिर्फ एक विह्वल प्रेमिका की तरह अपने पति को याद कर रही थी । हमेशा की तरह ही ये वो पल थे जब उसके सामने सिर्फ अपना प्रेम था । ऐसा प्रेम जिसमें प्रिय की खुशी के लिये कुछ भी करना कठिन या असंगत नही लगता । इस भाव के सामने वह अक्सर सब कुछ हार जाती है । अब भी हार कर मन ही मन कहे जा रही थी---"कितने दिन होगए तुम्हें देखे बिना ! कितने कठोर हो ! मेरी बातों का इस तरह बुरा मान गए । पर सच मानो तुम्हारे बिना जिन्दगी जिन्दगी नही है । जहाँ तुम हो वही मेरी खुशी है । मेरा जीवन है और मेरी मुक्ति है । काश एक बार सिर्फ एक बार मेरे हदय में झाँकते और देखते कि कितना वीराना है वहाँ । पुकार है तो सिर्फ तुम्हारी । तुम कैसे भूल गए कि तुम्हारी खुशी के लिये मैंने जहर भी पी लिया ,ऐसा जहर जिसके विषय में कोई स्त्री विचारों में भी नही सोचना चाहेगी । सिर्फ इसीलिये तो कि तुम्हें मेरे प्रेम पर विश्वास हो । इसके बाद भी मुझे जीवन का यह उजडा सा रूप मिल रहा है । मुझे यूँ न उजाडो प्रिय । तुम्हारे बिना मैं जी तो सकती हूँ पर खुश नही रह सकती किसी भी तरह । तुम मुझे गुनाहगार मानो पर दूर न जाओ । सजा दो । तुमसे दूर रहकर जीने का अब साहस नही है मुझमें ...। मुझे क्षमा करदो ,आ भी जाओ प्रिय ?"
गायत्री के अन्दर उमडा सैलाब आँखों से उमड कर बहने लगा । चेहरा आँसुओं से भीग गया । और  धार गर्दन से होती हुई बालों में समाने लगी । शायद एकाध सिसकी भी निकल पडी होगी ।
मम्मी ?--रोहित कुनमुनाया । गायत्री का ध्यान बेटे की तरफ गया । 
"मम्मी क्या कोई बुरा सपना देखा ?"--आँखें मलता हुआ रोहित  माँ को देख रहा था  
"रोहित ,मेरा प्यारा मासूम बेटा ."--गायत्री जैसे सपने से जाग गई उसका यथार्थ , उसका वर्त्तमान और उसका भविष्य उसके दो बेटे , ...विसंगतियों से अभी पूरी तरह परिचित नहीं हैं फिर भी कही दब गए से लगते हैं . दूसरे बच्चों जैसी उनकी कोई मांग नहीं होती . बच्चों जैसी जिद नहीं करते . ,बच्चे जिन्हें स्नेह और सम्बल की जरूरत है.
अपनी उम्र से कई साल आगे जाकर खड़ा होगया मोहित बड़ों की तरह सोचने लगा है .घर के कामों को एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह करता है लेकिन मैं उसे क्या दे रही हूँ ?एक रुखी उदासीन और वीरान माँ भला बच्चों को क्या दे सकती है ?" 
गायत्री की सोच की दिशा ने एकदम मोड ले लिया । 
नन्द ने जो भी किया उसका परिणाम मुझसे कही ज्यादा ये बच्चे भोगेंगे .अगर बच्चों को पिता का सही संरक्षण मिलता तो गायत्री एक बार अपना दुःख भूल जाती .बच्चों को पिता की कितनी जरूरत होती है ? पिता का जरा सा सम्बल ही उनके लिये बडा आधार होजाता है । 
पर पिता को तो यह भी ध्यान नही है कि दो मासूम उसका इंतज़ार करते रहते हैं ,जो उसके अपने हैं क्या यह भी उसे मैं ही याद कराऊं? 
गायत्री के जख्म हरे होगए । 
अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने की बजाय जो दूसरी दुनिया बसाकर बैठा है जिसने अपने वचनों का रत्तीभर पालन नही किया उससे स्नेह की भीख माँगेगी गायत्री ? क्या उसकी जरूरतें इतनी प्रबल होगईं हैं कि वह उसके सामने गिर जाए जो उसके अधिकार और सम्मान को भूलकर , उसके प्रेम और समर्पण को ठोकर मारकर ,तन-मन-धन से कहीं और समर्पित है ?
बहुत मनुहार करने पर वह आ भी जाए तो भी क्या होगा ?
नन्द उसकी मनुहार का अर्थ केवल उसके एक औरत होने से लगाता है । ऐसी औरत जिसे केवल पुरुष का 'प्रेम' चाहिये । उसके प्रेम जताने का वही एक ही तरीका ।....गायत्री को उबकाई सी आई । अपनाप से वितृष्णा हुई . स्नेह-विहीन संसर्ग, सतही और अनैतिक सा लगने वाला देहव्यापार ..पति कहलाने वाले व्यक्ति से क्या यही चाहती है गायत्री ? नहीं अब वह अपने बच्चों के लिए जिएगी .
वह इतनी भी कमजोर नही कि कुछ पलों का सुकून पाने के लिये वह अपनी प्रतिबद्धता को छोड एक गैरजिम्मेदार बेवफा और निर्मम पति को बुला कर उसके पैरों तले बिछने तैयार होजाए । क्योँ भला ? सही रास्ता तो नन्द ने छोडा है । राह पर उसे आना चाहिये । नही तो फिर नही । गायत्री भटके हुए आदमी के पीछे अब हरगिज नही भागेगी ...। हरगिज नहीं ...
"हाँ बेटा ,एक बुरा सपना देखा था . पर अब ठीक हूँ ."--गायत्री ने बेटे को गले लगाकर कहा .  

तभी चिडियाँ चहचहाने लगी । गायत्री ने एक सन्तोष के साथ दोनों बच्चों को देखा और बिस्तर छोड दिया ।

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

सजा

थकी--हारी नमिता जब घर में आई तो उसकी थकान और बढ़ गई । जहाँ देखो चीजें बेतरतीब बिखरी पड़ीं थीं । सौमित्र मैगी बनाने में तीन बर्तन खराब करके वहीं प्लेटफार्म पर सरका गया था । मसालादानी खुली रखी थी और आलू-प्याज के बिखरे छिलके जैसे उसकी खिल्ली उड़ा रहे थे कि, अरे नमिता जी आप तो बड़ी सफाई पसन्द हैं लेकिन आपके किचन की हालत तो कुछ और ही बयां कर रही है । 
निखिल को अपने जाँघिया बनियान बाथरूम में ऐसे ही छोड देने की आदत है चाहे उन्हें माँ धोए या कपडे धोने वाली । अरे ! हाँ 'या' के लिये तो कोई विकल्प ही कहाँ है पन्द्रह दिनों से । किशोरीबाई छुट्टी पर है । अच्छा है कि कामवालियों को छुट्टी तो मिल जाती है । घर की बात छोड़ें ,नमिता को तो एक सी. एल. के लिये प्राचार्य कक्ष के कितने चक्कर लगाने पडते हैं । कोई ठोस कारण बताना होता है । तब भी छुट्टी मिल जाए तो गनीमत है । 
और पतिदेव की तो बात ही निराली है । उनका वश चले तो कुल्ला भी पलंग पर ही करें । अखबार पूरे कमरे में बिखरा था । जैसे कोई मशीन को सारे पुर्जे खोले बिना ठीक नही कर सकता उसी तरह वे अखबार को भी अलग-अलग पेज करके पढते हैं । और सारे पेज यहाँ वहाँ छोड देते हैं । नमिता को इस आदत से बडी चिढ होती है । उसे अखबार पढना होता है तो तारीख देख-देख कर पहले सारे पेज जोडने होते हैं । नही तो तीसरा पेज चार दिन पहले का पढो और छठा पेज पिछले महीने का । इसी झंझट के कारण वह अक्सर अखबार पढ ही नही पाती । 
उसके स्कूल जाने के बाद जरूरत होने पर साहब जी चाय बना कर तो पी लेते हैं पर चाय पिये कप किस अलमारी में मिलेंगे पता नही । कम से कम चीजों को अपनी जगह पर तो छोडा जा सकता है न ,कि उसमें भी भारी मेहनत लगती है । नमिता एक साफ-सुथरे व्यवस्थित घर की कल्पना में ही अधेड हो गई है । वह कभी-कभी अपनी यह खीज प्रगट करने से रह नही पाती और तब उसे तडाक् से पति की ओर से जबाब मिलता है----
"अरे ! तो ठीक है न ! तुम भी मत करो । पडा रहने दो यूँ ही सब । और नही तो फिर बडबडाओ मत ।"
"मम्मी पता नही क्यों टेंशन लेती रहतीं हैं ?" 
"भैया ! चिन्ता न करो । मम्मियों की तो आदत ही होती है कुछ न कुछ मीन-मेख निकालने की । पर कोई दिल से नाराज थोडी होतीं हैं ।"
पति और बेटों की मिली जुली प्रतिक्रियाएं ..। सारी बातें सहज और आम हैं लेकिन नमिता को अब ये ही बातें पीडा देने लगीं हैं। पहले इन बातों को वह स्नेहमय परिहास मानकर मुस्करा भर देती थी , असहज व चुभने वालीं होने लगीं हैं ।क्योंकि इनमें संवेदना नही है, नमिता के लिये अपनापन नही है जिसकी जरूरत उसे अब ज्यादा महसूस होने लगी है । वह अक्सर थकान महसूस करती है जो काम से उतनी नही होती जितनी सबकी बेपरवाही से। उसके अकेलेपन और परेशानियों के प्रति उदासीनता से । थके हारे तन-मन के कोने से एक आवाज गूँजती है । काश उसकी भी एक बेटी होती...। बेटी ,कुछ नही भी करती तो भी ,माँ के साथ सहानुभूति तो रखती ही ।
स्टाफ की महिलाओं की बातें उसकी इस अनुभूति को और भी प्रखर बना देतीं हैं जो वे अपनी बेटियों के बारे में करतीं रहतीं हैं ।
" भई मैं तो जब घर पहुँचती हूँ मुझे चाय का कप तैयार मिलता है ।"--माधुरी कहती है---"मेरी बेटी ऋचा मेरी हर बात का बड़ा ध्यान रखती है । मम्मी को क्या अच्छा लगता है क्या नही । अगर जरूरी लगता है तो टोकना भी नही भूलती कि, मम्मी रात में कितने बजे तक काम करती रहती हो तबियत खराब होजाएगी । ठण्डी रोटी क्यों खा रही हो ? रात को थोडा दूध भी लिया करो पापा भी लेते हैं कि नही और..... ।"
"अरे मुझे तो कभी सोचना ही नही पडता कि मुझे कब क्या पहनना है "---नीलम बीच में ही बोल उठती है--- "हमारी पूनम जितनी पढाई में आगे है उतनी ही कला-पारखी भी है । और उतनी ही जिम्मेदार भी है । काम तो इतनी जल्दी करती है कि कालेज जाने से पहले मेरे भी आधे काम निपटा जाती है । यही नही बिल वगैरा वही भर आती है । अपने पिता को भी परेशान नही होने देती जरा भी ।"
नीरा कहती है--"मेरे घर में बेटा नही हैं। सच कहूँ , पहले तो मुझे बहुत बुरा लगता था लेकिन मेरी बेटी और दामाद के व्यवहार ने मेरा वह दुख जाने कबका मिटा दिया है ।"
"देखा जाए तो लडकों का सुख तो बचपन तक ही है और ज्यादा समझो तो विवाह होने तक । विवाह के बाद अब लडकियाँ नही लडके पराए हो जाते हैं । लडकियाँ तो विवाह के बाद भी अपने माता-पिता का कितना ध्यान रखतीं हैं ।" 
मिसेज शुक्ला ने आज ही जैसे नमिता को सुनाने के लिये ही बड़े गर्व से कह रही थीं । उनके पास एक से बढ कर एक डिजाइन के पर्स और ज्वेलरी सैट हैं । सब उनकी बेटी अमेरिका से भेजती रहती है । 
और ...दूर क्यों जाएं..नमिता की अपनी बहू शालिनी भी तो अपनी माँ का कितना ध्यान रखती है । जब तक फोन पर माँ से बात नही कर लेती सोती नही है । माँ को कितनी आत्मीयता से हिदायतें देती रहती है । 
जरा भी तबियत खराब होने पर नाराज होती है पर उस नाराजी में भी कितना स्नेह रहता है कि "आलू और चिकनाई कम से कम खाया करो माँ । कि बी.पी. कैसे बढ गया । चिन्ता कर रही होगी .जरूर  पापा ने कुछ कह दिया होगा . तुम मत सुना करो किसी की बात । मैं भाई और भाभी को भी समझाऊँगी । उनके लिये क्या माँ का ध्यान रखना जरूरी नही है क्या ?.... और नही तो कुछ दिन के लिये यहाँ आ जाओ । मन लग जाएगा ।" 
जब भी उसकी माँ यहाँ उससे मिलने आती है उसका उल्लास देखते ही बनता है । सौमित्र की भी हर कोशिश यही रहती है कि वे खुश रहें । सचमुच बेटी माँ के लिये ससुराल में रह कर भी कितना सोचती है और करती भी है ! कितनी आत्मीयता होती है दोनों के बीच ..
नमिता का दिल-दिमाग एक गहरे खालीपन से भर जाता है । अन्दर से एक हूक सी उठती है----"काश आज उसकी भी अपनी बेटी होती ।"
"होती...क्या ....हुई तो थी ।---नमिता अनायास ही जैसे अतीत की गहरी गुफा में चली जाती है । गुफा के अँधेरे में भी स्मृतियों की चिनगारियाँ चेतना में उजाला भर देतीं हैं । गरम ,झुलसाता हुआ सा उजाला...प्रकृति ने उसकी गोद को भी तो बेटी के अमूल्य धन से भरा था " । 
लेकिन उस भारी धरोहर को नमिता की दुर्बल बाँहें कहाँ सम्हाल पाईं । बेटी की दस्तक से वह कायर माँ कैसे घबरा उठी थी । सोच ही नहीं सकी कि एक दिन वह बेटी के लिए भी तरसेगी . तब तो 
 बेटी के लिये ममता का स्रोत जैसे बन्द ही होगया था या  एक दबाब चट्टान की तरह उसके दिल पर रख दिया गया था ? 
ओ....ह...!" नमिता ने कराह के साथ गहरी साँस छोडी ।
बीस-बाईस वर्ष का सूखा घाव जैसे फिर हरा होने लगा था । स्मृतियाँ मानसपटल पर रोज ही साकार होने लगीं । 
नमिता का विवाह बहुत जल्दी होगया था । पहली बार जब वह ससुराल आई थी तो उसे देख सबने नाक सिकोड़ी -भई कुछ मिले न मिले पर बहु सुन्दर होनी चाहिए .स ने कहा था--- ,बहू तो लजा रही है हमें । मेरे बेटे के तो पाँव की धूल भी नही है ।
पति की नजरों में भी नमिता की जगह तब तक धूल जैसी ही रही जब तक सौमित्र का जन्म नहीं हुआ . लेकिन बेटा के रूप में आई पहली सन्तान ने उसे सम्मान ,अपनापन सब कुछ दिला दिया . सुजीत जो सिर्फ पत्नी को दैहिक उपभोग की निरर्थक सी वस्तु मानता था ,अब उसके खानपान का तथा सुविधाओं का भी ध्यान रखने लगा । 
यही नही बेटे की माँ बनकर वह सास , देवर और दूसरे परिजनों की नजर में भी अचानक महत्त्वपूर्ण हो उठी थी . सास अपने पोते के फरुआ तक खुद धोती थी । कहतीं कि माँ पानी में हाथ देगी तो बच्चे को सर्दी लग जाएगी । हर समय जच्चा के दरवाजे पर अंगारे सुलगते रहते थे । बुरी हवा से बचने के लिये उसमें गन्धक डाला जाता था । हर किसी को जच्चा के कमरे में आने की इजाजत नही थी । सौमित्र की कोमल कलाई में अम्माजी ने नजर से बचने के लिये हींग-राई बँधा काला कपडा बाँध दिया था । । नमिता को महीना भर खूब घी.और मेवों का हरीरा पिलाया गया । पन्द्रह दिन चरुआ का पानी और दसमूल काढा दिया गया । सवा महीना तेल-मालिश करवाई गई । और धूमधाम से दष्टौन किया गया । जच्चा गीत और बधाई गाई गईं । लड्डू बाँटे गए । 
बेटे की माँ बनना कितना सुखद और सम्मान भरा होता है। नमिता अब कुल का चिराग देने वाली बहू थी । सबसे बड़ी उपलब्धि थी पति की स्वीकारोक्ति और सान्निध्य जिसे  पाकर वह प्रसन्नता व गर्व से भर उठी थी। पति की स्वीकृति और सहमति स्त्री को किस तरह निर्भय कर देती है ।  जब नमिता दूसरी बार गर्भवती हुई तो किसी को कोई सन्देह नही था बेटा होने में । सास ने कहा औरत या तो माँ की कोख पर जाती है या सास की कोख पर । यहाँ तो नमिता की माँ को भी लगातार तीन बेटे हुए और उसे खुद को भी दो बेटे हुए ।
नमिता का पति सुजीत भी आश्वस्त था कि यह दूसरा बच्चा भी बेटा ही होगा । पूरे लक्षण वे ही थे जो सौमित्र के लिये थे । घर में प्याज लाना बन्द होगया । बैगन ने कुछ महीनों के लिये रसोई से विदा ले ली । गुड और मिठाई जमा होने लगी । खटाई से दुश्मनी होगई । 
सास ने महीनों पहले ही बच्चे के लिये कथरी , लँगोटी और फरुआ बना लिये । नमिता को भी विश्वास था कि होने वाला बच्चा लडका ही होगा । बेटे की माँ बनने के आनन्द का अनुभव तो हो ही चुका था । 
कोई गुंजाइश ही नही थी कि अलग कुछ सोचा जाता । एक बार नमिता ने मजाक में ही कहा कि सौमित्र की बहन आ गई तो? 
"तो दोनों माँ बेटी को देश निकाला ."---सुजीत ने भी हँसकर कहा फिर अचानक गंभीर होगया . कहा--"ऐसा मज़ाक  मुझे पसन्द नही है ."
नमिता उसी समय कुछ शंकित हुई   
 वैसे तो लडकी का होजाना भी कोई विशेष चिन्ता की बात नही होगी । पहले बेटे के बाद बेटी का जन्म बुरा तो नही लगना चाहिये । बल्कि भाई के साथ एक बहन होना अच्छा ही है । लेकिन उसकी यह सोच वहीँ रुक जाती थी ,जैसे पुल टूट जाने पर यातायात रुक जाता है .  
से मालूम था कि घर में बेटी का आना किसी को पसन्द नही है। घर में ही क्यों बाहर समाज में भी बेटी का जन्म भले ही उतना बुरा न माना जाए पर बेटे जितना अच्छा भी नहीं माना जाता . कम से कम खुशी तो नही लाता । 
'बिटिया साठ ,तौऊ बाप की नाठ ' जैसी कहावत उसने सुन रखी थीं पर साक्षात्कार ससुराल में ही हुआ था . 
" बेटी जनम के साथ दस जंजाल लाती है . उसकी रखवाली करो ,घर-वर तलाशो , दस जगह की खाक छानो , लडके वालों के तमाम नखरे सहो 
भारी-भरकम दहेज दो उस पर भी लडकी ससुराल में सुखी नहीं तो जीवनभर का क्लेश .... सुजीत के इन विचारों से वह खूब वाकिफ़ हो चुकी थी . तय था कि बेटी को जन्म देकर वह पति की नजरों से गिर जाने वाली है . पर यह भी कोई अपने हाथ में होता है ? 
अस्पताल में दर्द की कई लहरों के गुजरने के बाद नन्ही सी रुलाई फूटी तो नर्स की ने कहा-- बधाई हो लक्ष्मी आई है । 
'अजी काहे की बधाई '--सास और देवर सुनते ही कर घर चले गए । लेकिन नमिता को तब घबराहट सी महसूस तब हुई जब पति सुजीत भी उसे हिकारतभरी नजरों से देखते हुए उसे अकेली छोड़ गया ,वैसे ही जैसे हारा हुआ चुनाव-परिणाम मिलने पर समर्थक चले जाते हैं । जैसे कि नमिता से कोई गंभीर अपराध होगया हो । 
अस्पताल में रह गई जेठानी और नमिता की माँ । तीसरे दिन छुट्टी करवा कर घर भी उसे अकेली जेठानी लेकर आई । घर पर ऐसे सन्नाटा पसरा था जैसे व्यापार में कोई बडा घाटा होगया हो या किसी ने सारी सम्पदा चोरी होजाने का समाचार दे दिया हो ।
इस बार जच्चा के आगमन और स्वागत की कोई तैयारी नही थी । बस नीम का पानी उबाल दिया नहान के लिये । जच्चा-बच्चा के नहान के बाद सब कुछ शान्त होगया । जैसे अर्थी जलाकर लौटे हुए घर में होती है । न सास ने उपले जलाकर गन्धक डाला न ही चरुआ-हरीरा पकाया ।
"लडकी को कौनसी हवा लगेगी ! मौत भी आए तो बच कर निकल जाए ।" 
नमिता बाथरूम भी जाती तो ,बच्ची अकेली उपेक्षिता सी एक तरफ पडी रोती रहती । उसके पापा देख कर निकल जाते । क्या सौमित्र को इस तरह कोई रोने देता ? जो जहाँ होता काम छोड कर बच्चे को उठा लेता और उसके लिये एक मीठी झिडकी--"नमिता क्या कर रही है री ? सब छोड पहले बच्चे को देख ।"
अब बेटी रोती तो सास चीख पुकार मचाने लगती---"कहाँ मर गई ? कौनसा पहाड तोड रही है ...? सन्तान सम्हाली नही जाती !" नमिता का मन डगमगाने लगा । सास तो सास पति भी नाराज हैं ।
"नाराज न होऊँ तो पीठ ठोकूँ तेरी ? बडा किला फतह करके दिया है न तूने ? कन्धे झुका दिये तूने । जाने किस किसके हथ जोड़ने पड़ेंगे । किस किसके दरवाजे पर माथा टेकना होगा ."---सुजीत हिकारत के साथ बोला---" अब इतनी मेहरबानी तो किया कर कि इसे मेरे सामने न लाया कर । भला हो कि जब मैं आऊँ तो इसका मुँह ढँक दिया कर । रोटी भी गले से नही उतरेती ।"
पति के आक्रोश व घृणा को देख नमिता अपराध-बोध से ग्रस्त हो उठी । बेटी को जन्म देकर पति पर बोझ डाल कर वह जैसे अपने स्थान से गिर गई । अपने पति की इतनी नाराजी सहन करना उसके लिये सबसे दुष्कर कार्य था । उसका एक ही दायरा था पति की अनुकूलता उसकी सोच के अनुसार ही ढलना । पति प्रसन्न तो जग प्रसन्न । पति के दायरे में एक बेटी के लिये जरा सी भी जगह नही थी । 
पति की बेरुखी में वह बच्ची को भी कैसे प्यार करती । पति को प्रसन्न करने के लिये उसे बच्ची अकेली छोडना पडता , कलेजे के टुकडे को रोते देखकर भी वह अविचलित रहती थी । छोटे भाई के विवाह में जब फोटोग्राफी हो रही थी ,वह बच्ची को गोद में लिये सुजीत के साथ खडी थी ,सुजीत ने झिडक कर कहा----" पहले अपनी सन्तान को कही रख कर आ तब मेरे साथ खडी हो ।" नमिता ग्लानि से पानी-पानी होगई । जीवन में आकर बेटी ने उसके लिये फिर से अपमान और यांत्रणाओं की राह खोल दी थी । वह खुल कर उसे प्यार भी नही कर सकती थी । जब भी उसे बच्ची को दुलारते हुए देखा जाता । सुजीत तानों और झिडकियों के अंगारे बरसाता रहता । आते--जाते जब भी मौका मिलता सुजीत उसे बेटी जनने के अपराध से भरता रहता । और वह अपराध-बोध से भरती रही । धीरे-धीरे उसका दूध जल गया । उसकी छाती के वात्सल्य स्रोत सूख गए। बच्ची भूखी सूखे स्तनों को खींचती रहती। ऊपर के दूध को नकार देती । विद्रोह करती कि माँ मेरे लिये क्यों नही है तुम्हारा दूध । पत्थर बनी माँ अनुत्तरित ..।   

लेकिन उत्तर देता कौन । नमिता ने दिल-दिमाग तो जैसे गिरवी रख दिया  था । पति के दायरे से बाहर जाकर सोचने के बारे में भी नही सोचा उसने । बच्ची कुपोषण से सूखती गई । बिल्कुल क्षीणकाय होने पर उसे अस्पताल में दिखाया गया पर बात हाथ से निकल गई थी और एक दिन वह माँ को ग्लानि और सारे तानों-उलाहनों से मुक्त कर गई । जरूर वह आत्मा माता-पिता की उपेक्षा से आहत होकर ही इतनी जल्दी चली गई । 
नमिता को कुछ दिनों के लिये लगा कि वह अन्दर से खोखली होगई है । उसे अब माँ बनने का कोई अधिकार नही है । लेकिन अनचाहे ही जब गोद में बहुत जल्दी निखिल आगया तो वह बेटी के दुःख को धीरे-धीरे भूल गई । 
लेकिन अब उसे महसूस हो रहा है कि असल में वह अपराधियों का जीवन जी रही है । अपराधी जिसे कभी न कभी दण्ड मिलता ही है । नमिता ईश्वर की भेजी उस पवित्र आत्मा का सम्मान न कर सकी तभी तो उसे यह अकेलेपन की सजा मिली है ।      
हाय वह कैसी हृदयहीन थी । जाने कैसे उसने एक बार भी उलट कर नही सोचा कि मासूम बच्ची उसकी अपनी सन्तान है जिसे माँ की स्नेहमयी गोद की जरूरत है और अधिकार भी । बेटी के लिये कोई भी कठोर हो पर माँ कैसे कठोर हो गई। क्यों , क्यों उसने खुद बेटे और बेटी में इतना भेद भाव माना । जबकि सृष्टि में जितनी भूमिका पुरुष की है उतनी ही स्त्री की भी है फिर क्यों बेटी के जन्म पर इतना विषाद । और क्यों इसके लिये सिर्फ माँ ही जिम्मेदार माना जाता रहा है । 
वह , नमिता सचमुच एक हृदयहीन, कमजोर व कठोर माँ .. माँ जो बेटी के आने पर शर्म और संकोच से भर उठी थी कि बेटी उसके पति और परिजनों को स्वीकार न थी , कि बेटी उसके लिये उपेक्षा व अपमान का कारण बन गई थी । कितनी घटिया ,गलत और कमजोर सोच थी  नमिता की। सिर्फ कुछ लोगों की सोच के कारण वह माँ एक के दायित्त्व को ही दरकिनार कर बैठी ।     
उस प्रसंग को याद कर नमिता की आँखें छलछला आईं । खुद को ही हजार बार धिक्कारा । पति और परिवार से कहीं अधिक दोषी वह स्वयं है । कैसी स्त्री है वह । कैसी माँ । माँ के नाम पर एक कलंक ।
"मेरी बेटी , मैं तुझसे क्षमा नही माँगूगी क्योंकि मेरा अपराध क्षम्य है ही नही । " --नमिता ग्लानिबोध से पिघल कर बोल उठी ---" मैं तुझे सम्हाल न सकी । काश तुझे बचा सकती । तुझे छाती से लगा कर पाल-पोस कर बडी करने का हौसला जुटा सकती । तेरी माँ होने पर गर्व कर सकती । जो मुझे करना चाहिये था । मैं माँ के नाम पर सचमुच एक कलंक हूँ । तेरे पिता को क्या दोष दूँ जबकि माँ होकर मैं ही मातृत्व न निभा सकी । 
मेरी यही सजा है कि मैं दूसरों की बेटियों को देख देख कर कर पछताती रहूँ। उनकी अपने माता-पिता के प्रति आत्मीयता देख-देख जीती रहूँ । स्नेहहीन उजाड में अकेली ही जीवन को ढोते हुए , बिना किसी हमदर्द के ही उपेक्षाओं का जहर पीती रहूँ । जीती रहूँ एक स्नेह और सम्बल रहित अकेली जिन्दगी । और तुझे खो देने का मूल्य चुकाती रहूँ अपना सुकून देकर । याद करती रहूँ अपने अपराध को । इससे बडी सजा एक स्त्री के लिये क्या होसकती है । मेरी बेटी ,मैं सदा शर्मिन्दा रहूँगी एक कमजोर माँ के रूप में । "  
नमिता ने गहरी साँस लेकर आँसू पौंछे और थकी-हारी बिखरे कागज समेटने लगी । 

गुरुवार, 22 मई 2014

प्रलोभन

बिरमा ने टोकरी में बाँस की एक और तीली फँसाकर सामने नीम के पेड़ की ओर देखा । चबूतरा पर रूपल अभी भी पँचगुट्टे खेलने में मगन थी । बिरमा तीन बार पुकार चुका था पर वह टस से मस नही हुई थी ।
लड़की दिनोंदिन कामचोर होती जा रही है ।“--बिरमा मन ही मन भुनभुनाया—“गाँव वालों की शिकायत पर शिकायतें आ रही हैं---‘ओ बिरमा तीन दिन होगए । कोई सफाई के लिये नही गया ।गली-दरवाजों पर कचरे और गन्दगी के अम्बार लगे हैं । मुफत की खाने की आदत होगई है ना । अगर ऐसा ही रवैया रहा तो हम लालाराम को काम पर लगा लेंगे । हमें तो सफाई चइये । तू करे कि कोई और । फिर तू बैठ कर फिराता रहना भौंरा...
लालाराम !”---बिरमा का मन उस अकिंचन किराएदार जैसा होगया जिसे किराया न दे पाने के कारण मकान खाली करने की सख्त चेतावनी दे दी गई हो ।
चचेरा भाई लालाराम तो बैठा ही इस ताक में है कि वह विरमा के इन पन्द्रह-बीस घरों को भी हथिया ले । इन्ही घरों से तो बिरमा की रोजी--रोटी चल रही है । और कोई काम-धन्धा है भी नही । शहर में तो तमाम काम मिल जाते हैं । कोई इतनी छुआछूत भी नही मानता । उसके कई रिश्तेदार शहर में हैं । उसकी लड़की की नन्द का देवर स्कूल में लगा है । लैटरिंग बगैरा भी साफ करता है और फाइलें भी इधर से उधर पहुँचाता रहता है । मजाल है कि कोई मना करदे उसके हाथों से फाइलें लेने से । बस टेम्पो में सबके साथ बैठ कर जाते हैं वे लोग । बंसी ने तो कई बार कहा कि गाँव में क्यों पड़े हो फूफा । बहुत होगया गुलामों की तरह कीड़े-मकोड़ों की जिन्दगी ..
पर बिरमा का मन कभी तैयार नही हुआ यह गाँव छोडने के लिये । जनम से वह इसी घर में है । आँगन मुँड़ेली छप्पर,पाटौर,गली चबूतरा नीम का पेड सब अभिन्न रूप से उसके साथी हैं। फिर अँधेरे की आदी होगई आँखों को रोशनी का कोई खास मतलब नही होता। रोशनी रास भी नही आती । वैसे भी इन बीस घरों की बदौलत उसकी जिन्दगी आराम से कट रही है फिर वह क्यों कहीं जाए । लेकिन उसके सामने अब अक्सर यह सवाल आ खडा होता है कि काम पर जाए कौन? तीन दिन से वह इसी असमंजस में पड़ा था । 
घरवाली बसन्ती चार दिन से बुखार में भुँज रही है । नीम-गिलोय का काढ़ा दोनों टैम पिलाने पर भी कोई फायदा नही है । चक्कर और आने लगे हैं ।
वसन्ती के होते विरमा को कोई चिन्ता नही होती । मुट्ठी भर की काया है लेकिन नंगे पाँव ही दुनियाभर का काम निपटा आती है । गाँव में उसी की पूछ है । जिसे देखो वही टोकता है---
"बसन्ती भौजी क्यों नही आई । ए रूपा ,तेरी महतारी क्या कहीं गई है ? उसके बिना सफाई सफाई लगती ही नही है ।"
अम्मा बेचारी बूढ़ी होकर भी बैठी नही है । आसपास के जापे-जनेले वही निपटाती है । लोग कहते हैं कि बिरमा की अम्मा का हाथ जैसा सधा हुआ है आजकल के डाक्टर भी फैल हैं उसके आगे । दाईगिरी डिगरी नही 'तजरबा' माँगती है । चालीस साल से सम्हाल रही है अम्मा इस काम को । आज भी वह घर नही लौटी है ।
"कोई केस लम्बा खिच गया शायद"---बिरमा सोच रहा था । लौट भी आती तो उसे गलियों की झाड़ा-बुहारी के लिये तो नही भेज सकता बिरमा । एक तो बूढ़ी, ऊपर से गरीबी से टूटा शरीर । एक बार झुकजाए तो सीधी न होपाए । गाँव वाले तो साइकिल पर बिठा लेजाते हैं और छोड़ भी जाते हैं । खिदमत भी करते हैं । उसे काम के लिये भेजना तो बूढ़े बीमार बैल को हल में जोतना होगा । बिरमा इतना धरमार तो नही है ।
अब कोई सोचे कि बिरमा चला जाए काम पर तो पहली बात तो यह कि बसन्ती के होते उसे काम करने की आदत ही नही है । चबूतरा पर नीम की छाँह में वह ठौर पर ठाकुर बना बैठा बाँस के सूप डलिया बनाता रहता है । शादी-ब्याह के मौके पर बिक्री भी खूब होजाती है । फिर जहाँ खेती-किसानी है अनाज भरी कोठियाँ हैं वहाँ सूप--डलिया तो उतने ही जरूरी हैं जितना साइकिल वाले को हवा भरने का पम्प । पर दूसरी बात ज्यादा सही है कि बिरमा दमा का मरीज है । धूल तो उसके लिये कोबरा का डंक समझो । गली-दरवाजों पर झाड़ू लगाने की बिरमा तो सोच भी नही सकता ।
बचा 'पिरकास' । बिरमा ने उसे घरवालों में गिनना छोड़ दिया है ।
पन्द्रह-सोलह साल का उठती उमर का छोकरा है चाहे तो 'मिन्टों' में सारा काम करके आजाए पर राम भजो । काम के नाम तो उसकी अम्मा मरती है । पेंट-बूट चढाए खुद को 'सनीमा' का हीरो समझता है । शीशे में दस बार चेहरा देख जुलफें सँवारता रहता है । एक कंघा तो हरदम जेब में रहता है । 'काम का न काज का ,दुसमन अनाज का ।' खूब मार-पीट लिया पर अब तो पिटपिट कर गेंडे की खाल होगया है हरामी । जब देखो सीटी बजाना और 'सनीमा' के गीत गाना ...। अपने कपडे धोना तक तो शान के खिलाफ समझता है । गाँव में काम क्या करेगा । उस पर तो जुबान डालना भी कुँए में कंकड़ फेंकना है । ऐसी औलाद किस काम की ?
तो बची है केवल रूपा । बिरमा की नजरें अब इकलौती बेटी रूपल पर ही टिकीं हैं ।
"अरी रुपिया बेटी ,सुन तो जरा बापू की बात..."
ग्यारह साल की रूपा बिरमा की दूसरी बेटी और सबसे छोटी सन्तान है । भोली और चंचल । बड़ी कमली तो पाँच-छह साल पहले ही ब्याहकर ससुराल में रच बस गई । वह तो कभी-कभार तीज-त्यौहारों पर ही आ पाती है । हाथ-पाँव मेंहदी-महावर से रचे होते हैं । और वैसे भी वह अब तो मेहमान है मेहमान से भला कोई काम कराता है । हाँ कभी-गाँव की हमउम्र लड़कियों से बोलने बतियाने या अपनी नई साड़ी और बुन्दे दिखाने के लोभ में कमली रोटी लेने जरूर चली जाती है ।
साँवली-सलौनी रूपल अपने प्रति अभी से काफी जागरूक लगती है । सुबह-सुबह भी उसके बाल सँवरे देखे जासकते हैं और हाथ पाँव साफ ,तेल से चमचमाते हुए । उसे अपने खूबसूरत होने का पूरा यकीन है जो उसकी आम की फाँकों जैसी आँखों में साफ झलकता दिखाई देता है । वह बहुत ही जरूरी होने पर कंजूसी से मुस्कराती है जरा सा । 
दूसरे बच्चों की तरह उसे भी खेलना पसन्द है । गाँव में सफाई के लिये जाना उसे जरा भी पसन्द नही । खासतौर पर इसलिये कि लोग उससे अच्छा बर्ताब नही करते । जब कभी उसे जाना ही पड़ जाता है तो कोई न कोई उसे हिकारत से देखता हुआ टोक ही देता है---"अरे रुपिया , तू आई है । तू क्या सफाई करेगी ! झाड़ू तो ऐसे फेरती है कि कहीं धरती को लग न जाय । कहीं कूड़ा छोड देती है तो कहीं गन्दगी । तेरी अम्मा क्यों नही आती आजकल ? और 'रिसीराज' पंडिज्जी तो एक झिडकी जरूर देते हैं---"काय मौड़ी ,मेरे पूजा पाठ के टैम ही आती है ? आधा घंटा पहले या बाद में नही आसकती ..?"
रुपिया क्या घड़ी बाँधे फिरती है जो टैम की जानकारी रखे ।
उसे गाँव वालों के सामने माँ और दादी का गिड़गिड़ाना जरा भी पसन्द नही । किसी ने अगर थाली भर खाना या पुरानी साड़ी थमादी तो रूपा को अच्छा नही लगता कि वे आशीषों की झड़ी लगा देतीं हैं--"ऐहवाती रहो ,सुखी रहो भगवान तुमाए नाती बेटों को खुश रखे । लम्बी उमर दे..."
अजीब बात है । लोग हमें अगर कपडा खाना या पैसा खैरात में तो नही देते । हम काम भी तो करते हैं । फिर कहो कि काम जितना पैसा भी वे कहाँ देते हैं ! दो दिन काम न हो तो कैसी हाय दैया मचा देते हैं लोग । रूपल का वश चले तो हर घर से महीना के सौ रुपए ले कम से कम ..
रूपल बहुत कुछ जानने समझने लगी है ।
"रुपिया ...ओ रूपल बेटी ..जरा इधर आ । मेरी बात तो सुन लाड़ो ।"—बिरमा ने आवाज को भरसक मीठी बनाकर कहा ।
"वही से कहदो ,क्या कहना है ।" रूपल लापरवाही में गुट्टे उछालती रही ।
"अरी मेरी सयानी बेटी । एक चक्कर गाँव में लगा के तो आजा ।"
"हाँ ..इसीलिये मुझपर इतना लाड़ आ रहा है "--रूपल ने हाथ रोक कर कहा---"अपने लाड़ले से क्यों नही कहते । मैं कहीं नहीं जाने वाली..हाँ... " यह कह कर रूपा फिर गुट्टे उछाल कर लपकने लगी ।
बिरमा एकबारगी सुलग सा उठा । मन हुआ कि झोंटा पकड़कर खींच लाए । लड़की इस हाथ से निकली जारही है । काम के नाम झट से मुकर जाती है । लड़की की जात । यह हेकड़ी कहीं शोभा देती है । पराए घर जाएगी तो नाम डुबाएगी और क्या..
लेकिन बिरमा को जल्दी ही याद आया कि जोर-जबरदस्ती करने पर तो वह और बिफर जाती है फिर करवा तो ले कोई काम । ना यह सख्ती का नही नरमाई और चतुराई का समै है । थोडी 'पौल्सी' से काम लेना पडेगा । वह खूब जान चुका है कि किसन की अम्मा के गुण क्यों गाती रहती है रूपल ।
"तू तो खामखां बिगड़ रही है री रुपिया..। मैं तो तेरे मतलब की बात कह रहा था ..। किसन की अम्मा की बात ."
"किसन की अम्मा.."---रूपल की आँखें चमकीं जैसे किसी ने बुझते दिये में तेल भर दिया हो । और हाथ वहीं रुक गए । गाँवभर में एक किसन की अम्मा ही तो है जो उसे नाम लेकर बुलाती हैं । नही तो लोग "उसे..ए मौड़ी..काए बिरमा की सन्तान.. ओ जमादार की लड़की कहकर ही पुकारते हैं । लेकिन किसन की अम्मा उसका नाम लेकर अक्सर उसे छेड़ती रहती है---"अरी रूपल ,आज तो तू बड़ी सुन्दर लग रही है । ये बालों की खजूरी चोटियाँ किसने बनाईँ ? तूने खुद ने अरे भई वाह । रूपल तो बड़ी चतुर है । .अरे रूपा तेरे लिये मिठाई रखी है ।"
"मिठाई ..कौन लाया ?"--आत्मीयता पाकर रूपा के मन में बरसात के अंकुरों जैसी जिज्ञासाएं फूटने लगतीं हैं ।...क्या बड़े भैया आए हैं ? अम्मा भैया कहीं नौकरी करते हैं ? सुनीता बुआ भी नौकरी करतीं हैं ? कौनसे 'किलास' तक पढ़ीं हैं ? और किसन चाचा भी पढ़ रहे हैं ? फिर वे भी नौकरी करेंगे ।
तू पढ़ेगी । पढ़ाई के प्रति रूपा के मन में वही आकर्षण है जो दूसरे बच्चों में चाकलेट या आइसक्रीम का होता है । पर उसे कौन पढ़ाएगा । घर में किसी को इस बात का ध्यान नही है ।
"अरे तू चिन्ता न कर रूपा । तेरे पढ़ने की व्यवस्था तो मैं कर दूँगी । उसमें क्या है । किताबें पेन पेन्सिल स्लेट और बत्ती बस ...। किसी दिन चलकर स्कूल में नाम भी लिखवा दूँगी ।"
किसन की अम्मा की बातें सुनकर उसकी कल्पनाओं को पंख लग जाते हैं । आकाश में उडती चिड़िया की तरह वह बहुत दूर की चीजें देख लेती है । उसकी नजर काफी साफ और तेज होगई है । उसे यह सोच कर बड़ा अच्छा लगता है कि वह दीवारों पर लिखी सारी बातों को पढ़ सकेगी । खूब सारी कहानियाँ पढ़ेगी फिर जीजी की बेटी को सुनाएगी । दुकान वाले बाबा उससे मोलभाव में हेराफेरी नही कर सकेंगे । और हाँ तब तो वह प्रकाश भैया की पर्चियों को पढ़ सकेगी जिन्हें वह लिख कर और गोल करके फेंकता रहता है । पता नही वह क्यों लिखता है और फिर क्यों फेंक देता है ? जरा पूछने पर कैसे झिड़क देता है --"चल हट ,ये तेरे मतलब की नही हैं ।"
पढ़ लिख कर काबिल बन जाएगी तब उन शैतान बच्चों को भी सबक सिखाएगी जो उसे चिढ़ाते रहते हैं । किसन की अम्मा का तो कोई भी काम रूपा बिना घिनाए या हिचकिचाए कर सकती है । 
"बापू ,किसन चाचा की अम्मा कुछ कह रही थी ? क्या कह रही थीं ?" सारे पँचगुट्टों को एक तरफ सरका कर रूपल पिता के पास आगई ।
"तेरे लिये कुछ लाने की बात कर रहीं थीं ।"
"जरूर मेरे लिये स्लेट और किताबें होंगी .."

रूपा उल्लास से भर उठी और जल्दी से डलिया उठा कर बस्ती की ओर चलदी । 
बिरमा ओझल होने तक सजल आँखों से बेटी को देखता रहा ।
('पलाश' (राज्य शिक्षा केन्द्र भोपाल) में प्रकाशित)

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

वो ढाई घण्टे

यह कहानी सन् 1985 में लिखी गई थी । कहानी के पात्र व घटनाएं  भले ही काल्पनिक हैं पर यथार्थ को प्रस्तुत करती यह कहानी आपको कहानी कम रिपोर्ताज अधिक प्रतीत होगी । साथ ही यह कहानी हमारी शिक्षा-व्यवस्था के स्वरूप की जड़ों का भी संकेत करती है ।
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मार्च-अप्रैल का महीना फसल की कटाई ,मडाई का होता है । कटाई चाहे गेहूँ-चना की हो या फिर पाठ्यक्रम की । देखा जाए तो स्कूली शिक्षा का पाठ्यक्रम ही एकमात्र ऐसी फसल है जिसमें बुवाई ,निराई-गुडाई, सिंचाई और देखभाल की बजाय, ध्यान फसल की कटाई पर ही ज्यादा रहता है ।कटाई के लिये पूरा विभाग हँसिया पैने कर तैयार होजाता है । फसल के अच्छे उत्पादन का निर्धारण भी कटाई-कौशल पर ही निर्भर रहता है . 
उधर तो खेतों में गेहूँ-चना मसूर आदि खलिहानों में जमा होगया और इधर स्कूलों में जुलाई में बोई गई पाठ्यक्रम की फसल को काटने परीक्षा के हँसिया तैयार थे । हँसिया ऐसे-वैसे नही संभागीय बोर्ड के धारदार हँसिया थे । यानी आठवीं बोर्ड की परीक्षा थी।
पहला पेपर हिन्दी का था । 
परीक्षा-केन्द्र पर काफी चहल-पहल और गर्मजोशी का वातावरण था । केन्द्राध्यक्ष मि. गौतम की व्यवस्था एकदम दुरुस्त थी । स्कूल-प्रांगण में सामने ही एक बडा ब्लैकबोर्ड रखा था जिस पर परीक्षा सम्बन्धी निर्देश थे--
"परीक्षा-केन्द्र पर किसी बाहरी व्यक्ति का आना निषिद्ध है ।"
"परीक्षा कार्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं गोपनीय है । इसमें अनुशासन व सख्ती बनाए रखें ।"
"किसी भी छात्र-छात्रा पर अनुचित सामग्री मिली तो उसे परीक्षा से वंचित करते हुए कडी कार्यवाही की जावेगी ।"
"अनुचित सामग्री !!"---पर्यवेक्षक रामखिलाडी शर्मा मुस्कराए---"बोर्ड की परीक्षा है और हर कमरे में 'बोर्ड' है ही । सामग्री रखकर क्या कद्दू लेंगे ।"
रामखिलाडी शर्मा दूसरे शिक्षकों की तरह ही बडे 'परिश्रमी' पर्यवेक्षक हैं । हर परीक्षा केन्द्र पर इनकी बडी माँग रहती है । साथ में खूबचन्द गुप्ता है । संकुल के किसी स्कूल से है । झकाझक सफेद धोती-कुरता पहनते है । वे भी 'मेहनती' है लेकिन साथ ही बच्चों को पढाते भी हैं । दोनों एक ही कमरे में थे । उत्तरपुस्तिकाएं बाँटी जाचुकीं थीं । पर्यवेक्षक इधर से उधर लगातार टहल रहे थे ।
"पहले कापियाँ चैक करलो शर्मा जी ।"
"आप ही करलो । क्या फरक पडता है आपने करीं कि मैंने ।" शर्मा कुछ जाँचने व हस्ताक्षर करने से अक्सर कतराता है । 
गुप्ता जी काँपियों पर साइन करने लगे । साथ ही कक्षा की तरह डाँट-फटकार भी ---
"अरे बेटा ,यहाँ नाम नही रोलनम्बर लिखना है ।..अबे घोंचू तूने 5030 को 530 लिख दिया..ओफ्.ओ तूने सोमवार को सुबार लिख दिया है ... अबे उल्लू यहाँ तारीख नही वार लिखना है । पढ लिये बेटा ..बन गए कलेक्टर ..।"
"गुप्ता इतना शोर मत करो । परीक्षा है यह ।"
"क्या पढाते हो यार ।"--गुप्ता झल्लाया-- "ये तो लिखना भी नही जानते । पास हो भी गए तो आगे क्या करेंगे ।"
"करेंगे मेरा सिर---शर्मा भी कुछ खीज कर बोला---"अरे यार ! आम पूछ आम के लक्षण पूछ , यह कोई बात हुई ? आगे क्या करेंगे यह उनके मताई-बाप जानें । सरकार ने नियम बनाया है कि चौथी कक्षा तक कोई फेल नही करना है . ये लो पास करने में कौनसा पहाड़ तोड़ना पड़ता है . चार लिखो कि चालीस ..'मारगसीट' में नम्बर ही तो लिखने होते  हैं .यह तो कही लिखा नही है कि पास करने के लिये इतनी इतनी योग्यता होनी चइये . .प्राइमरी वाले सोचते हैं कि उनके यहाँ से निकल जाएं बस फिर हमें क्या भुगतें मिडिल वाले . 
"अरे यार मिडिल में भी तो बच्चों को जैसे तैसे निकालने की ही रस्साकसी होती है कि जाने हाईस्कूल वाले .. और वहाँ भी यही रिजल्ट बनाने की कबायद ..नही तो दस स्पष्टीकरण दो ,वेतनवृद्धि रुके .. शासन को भी तो वही आँकड़े ही चाहिये .योग्यता की चिन्ता किसे है . ऐसे में नुक्सान होता है बच्चों का ही .."
" शासन क्यों पालक भी तो सिरफ अच्छे नम्बर चाहते हैं . असल नकल से ..कैसे भी आएं .तब हम क्योंं सालों की चिन्ता करें .इसीलिये कह रहा हूँ, लिखादे..लिखादे यार । कोई पहली बार ड्यूटी दे रहे हो क्या । ऐसे गलतियाँ ढूँढोगे तो होगई परीक्षा ..।"
गुप्ता लिखाने लगा---"लिख बेटा स सरौता का । उसपर ओ की मात्रा लगा । म मछली का व वन का उस पर डण्डा तो लगा हाँ ऐसे और फिर रस्सी का र ..।" 
इतने में आठ की घंटी बजी । सुस्त पर्यवेक्षकों में जाग्रति आई। पेपर फडफडाए और जीभ से उँगली गीली कर करके बाँटे जाने लगे । गुप्ता थोडा सुस्त है । दो चिपके पेपरों को अलग करने में कुछ सेकण्ड लगे कि शर्मा ने पेपर छीन लिये---"क्या करते हो यार , बच्चों का एक एक पल कीमती है ।"
पेपर बँटने की देर थी कि तिवारी आ धमका । सहायक शिक्षक तिवारी को शत-प्रतिशत परीक्षा-परिणाम दिलवाने का ठेकेदार माना जाता है । हेडमास्टर जी के साथ-साथ पालकों से भी उसे काफी सम्मान और अधिकार मिला हुआ है । 
"एक ही घंटे में सब कराना है । पहला दिन है । कोई न कोई आएगा जरूर ।"
उधर मि गौतम गोपनीय रूप से हर कमरे में सन्देश पहुँचा रहे थे कि "अपने हाथ बचाते हुए काम करें । कहो तो सब कुछ होने पर भी कुछ न हो और कहो तो छींकने पर ही स्पष्टीकरण माँग लिया जाए । आ पडी तो कोई हाथ नही लगाएगा ..।" 
गुप्ता ने गुन गुनकर पेपर पढा । शर्मा ने आशाभरी नजरों से देखा--" कुछ समझ में आया ?"
"हाँ आ तो गया । ओटी करा देते हैं और क्या..।"
"ठहरो पहले तिवारी के ट्यूशन को देख लिया जाए ।"
"ट्यूशन ?--गुप्ता चौंका---ये तो इसी स्कूल के बच्चे हैं । ट्यूशन अपने ही बच्चों का ? क्लास में क्या करता है तिवारी ?"
"अरे गुपता जी , आप तो निरे भोलानाथ हैं । मास्टर कक्षा में पढाएगा तो टूसन पढने क्या परिन्दे आएंगे ?"
"फिर तो मैं मदद नही करूँगा । तिवारी को भी इसका अहसास होना चाहिये ।"
गाडी चलते-चलते रुक गई एक झटके के साथ । छोटे--छोटे यात्री इस अप्रत्याशित विराम से हैरान थे । दूसरे कमरों में तो गाडी धडल्ले से चल पडी थी ।
एक..दो..तीन..चार..पूरे पाँच मिनट होगए । सभी छात्रों की नजर इन दोनों माँझियों पर टिकी थी जो उन्हें अथाह 'भौसागर' से पार ले जाने वाले थे ।  
"करादो यार .." शर्मा ने बच्चों की कातर दृष्टि से पिघलकर कहा---"ये सब तुम्हारे ही भरोसे बैठे हैं । दूसरे कमरों में तो आधा करा भी दिया होगा ।" 
गुप्ता ने भी दयार्द्र होकर हिसाब लगाया एक गद्य ,एक पद्य एक जीवनी, एक पत्र और एक दो प्रश्न..बस बेडा पार ..। तो रामखिलाडी , यार कुछ तुम भी देखो न ।"
"हें हें ..गुप्ताजी..तुम तो जानते हो हिन्दी मेरा सब्जेक्ट नही है ।"
"हिन्दी किसी का सब्जेक्ट नही रहता "--गुप्ता ने झल्लाकर कहा--"कमजोरी जितनी भी है साली , हिन्दी में ही होती है ।" 
"क्या तुम्हें भी नही आ रहा ..।"
"कमबख्त लेखक का नाम भूल रहा हूँ ।---गुप्ता ने माथे का पसीना पौंछा-- ये बोर्ड वाले भी खूब हैं । भला इतना कठिन पेपर रखने की क्या जरूरत है ।" 
"किसी को बुलालो ..।"
गुप्ता ने खिडकी में झाँककर देखा ही था कि एक लडका लपककर आगया ।
"क्या चाहिये साब । सब बतादो..।"
"पहले तू इस गद्य का अर्थ ले आ । पता नही कौनसे 'दुबेदी' का है । और हाँ बाहर का इन्तजाम तो..।"
"आप चिन्ता मत करौ साब । एक लडका अटारी पर है दूसरा नदी की तरफ नीम के पेडपर और तीसरा दूसरे रास्ते में मन्दिर पर ..। कोई भी जीप गाडी इन्ही दो रास्तों से आएगी । जैसे ही कोई खतरा लगेगा , सीटी बजेगी । आप 'सतरक' होजाना ।"  
थोडी देर में ही गुप्ता के हाथ में कागजों का पुलिन्दा था और फिर इबारत शुरु होगई--"लिखो यह गद्यांश ...द के नीचे छोटा सा तिरछा डण्डा लगादो..और य पर डण्डा और बिन्दी..।....अरे सब एक ही पेज में मत लिखो सालो....मरवाओगे क्या ।"
"माडसाब ,इधर आके बोलो .।" एक लडका रौब से बोला ।
"यार शर्मा--गुप्ता की त्यौरियाँ चढ गईं--- "इस लडके की बडी परेशानी है । लिखना तक तो जानता नही । 
"कुछ मत पूछो । बाप जब देखो पीछे पडा रहता है । पीछे पडा है कि किसी तरह पास करवाओ । जब भी गली से निकलो बिना चाय--सिगरेट के उठने नही देता । 'बीओ' ,'डीओ' सबसे हेलमेल है उसका ।"
" फिर ?"
" फिर क्या , लिखाए बिना गति नही है । वैसे भी इतनी श्रद्धा रखने वाले का बच्चा पास न होगा तो कौन होगा । देखा नही रोज तर माल खाने मिलते हैं । कहाँ से ..?"
"इतनी सजगता पूरे साल पढाई के लिये रहे तो .?"
"सजगता !"--गुप्ता हँसा---"चोर बने हुए हैं हम । पकडे गए तो मुफ्त में मारे जाएंगे । न स्कूल हमारा न लडके हमारे ..।"
"कैसी दिलफटी बात करते हो गुप्ता ? अरे दिल भी तेरा ,हम भी तेरे । नमकीन भी तेरा ,पेडे भी तेरे ..।"--तिवारी ने तुक जोडकर ठहाका लगाया । 
कमरों में भारी सरगर्मी थी । खिडकियों पर फुसफुसाहटें, भागदौड , चिटों का आदान-प्रदान, कानाफूँसियाँ---'अरे साब सबको लिखादो' .निबन्ध होगया ? ..पत्र ले लो । ...क्या कुशवाह मना कर रहा है ? कल से उसकी ड्यूटी लगाना ही मत ..।
शिक्षकों के होंठ कमरे में हिल रहे थे आँखें मुख्य दरवाजे पर और कान सुदूर रास्ते पर चिपके थे । बीच-बीच में मि, गौतम जूतों की चरमराहट के साथ राउण्ड लगाते उस समय हर कमरे से सुनाई देता--"ए सीधे बैठो ,...आवाज मत करो ...शान्त रहो ।" 
उधर माथुर और तिवारी में तूतू मैं मैं होने लगी । माथुर का आरोप था कि तिवारी केवल अपने ट्यूशन वाले बच्चों को व्यक्तिगत तौर पर नकल करा रहा है । तिवारी माथुर पर बच्चों को बरगलाने  का आरोप लगा रहा था । शर्मा ने दोनों को किसी तरह शान्त कराया--"भाई लोगो यह समय व्यक्तिगत टसल को छोडकर बच्चों के हित पर ध्यान दो ।" 
तभी अचानक हडकम्प मचा । खबर हुई कि एक दो सवार वाली 'फटफट' (मोटरसाइकिल) आती देखी गई है । बस 'सफाई' का आन्दोलन सा छिड गया । खामोश रहने की चेतावनी युद्धस्तर पर दी जाने लगी । जिन छात्रों को बडी उदारता से लिखवा रहे थे , कुछ पूछने पर तमाचे रसीद करने लगे -
"कमबख्त ...स्सालो.. हमारी जान पर बनी है और इन्हें लिखने की पडी है । पास होकर बेटा पूछोगे भी नही कि माडसाब मरते हैं कि जीते हैं ..।"
शान्ति स्थापित कर सब दिल थामे उस गाडी का इन्तजार करने लगे । गाडी पास आई ..आई और फर्राटे से निकल गई ।
"अरे कोई ठेकेदार था "--तिवारी ने हँसते हुए बताया ।
"लेकिन पट्ठे ने सबकी हालत पतली करदी । क्यों गुप्ता !"
"मरवाओगे यार । रिजल्ट तुम्हारा बन रहा है ,खतरों से हम खेल रहे हैं ।"
"फिर वही कायरों वाली बात । गुप्ता जी भूलो मत कि आप बच्चों का भाग्य बना रहे हैं ।"

सभी पर्यवेक्षक फिर अपने काम पर तैनात थे । जरा खतरे का अहसास होते ही चिटें गोल होकर जेबों में चली जातीं और खतरा टलते ही फिर खुलकर बाहर आजातीं । इस तरह गोल होने व खुलने से चिटों की हालत खस्ता हो रही थी । लेकिन चिटों को भी यह सन्तोष होगा कि वे छात्रों के भाग्य-निर्माण में शहीद हो रहीं हैं । 
और भाग्य निर्माण में जरा सी कसर रह गई थी कि जिला शिक्षाधिकारी की जीप के आने की सूचना हुई । केन्द्राध्यक्ष सहित सभी पर्यवेक्षकों की साँस अधर में लटक गई । आनन-फानन में अभ्यस्त कलाकारों की तरह एक बार फिर पलक झपकते ही सफाई होगई ।
एक चौराहे पर गाँव के दो चार लोग बतिया रहे थे-- 
"सिन्हा साब अब क्या रेबडी लेंगे यहाँ आकर..?"
"सिन्हा बडा सिद्धान्तवादी है ।"
'हमने बहुत देखे हैं सिद्धान्तवादी । सब इसके ( उँगलियों पर रुपयों का संकेत करते हुए )खेल हैं ।"
"देखते हैं । वैसे चिडिया दाना लेकर उड चुकी है । सिन्हा को कुछ मिलने वाला नही है ।" 
जीप में से आधा दर्जन निरीक्षक उतरे । और एक एक कमरे में किसी आतंकवादी की तरह घुस गए । और बारीकी से तलाश करने लगे । अगर कोई प्रकरण नही बना तो निरीक्षण कैसा । उन्हें विश्वास था कि अपराधी अपराध का कोई न कोई चिह्न जरूर छोडता है फिर नदगवाँ गाँव तो संभागभर में प्रसिद्ध है नकल के लिये । कहा गया है कि कोशिश करने वालों की हार नही होती । सिन्हासाब ने एक छात्र को पकड ही लिया ।
"बेटा क्या नाम है तुम्हारा ?"
"ग गो गोपा....नही असोक..।" सिन्हा साब की पैनी नजर ने सब समझ लिया । और पूछताछ की तो लडके ने सब उगल दिया ।
"साब मेरी गलती नही है मुझे तो..।"
सिन्हा को मसाला मिल गया । लडके को कापी सहित ऑफिस में लेगए ।
"आप क्या सबको बेवकूफ समझते हो मि. गौतम । बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड कर रहे हो । जानते हो यह मामला कितना गंभीर है ।"
"अब जो भी हो साहब...सब आपके हाथ में ...।" 
"कोई हाथ में नही है । वीरेन पूरी रिपोर्ट बनाओ । देश का निर्माण इनके हाथ में है बताओ तो ...ऐसे लोगों के कारण शिक्षा विभाग की बदनामी होरही है ।" 
गौतम की सीधे सिन्हासाब से बात करने की हिम्मत नही हुई । उनके एक सहायक को कोने में लेजाकर मामला निपटाने पर विचार करने लगा । 
"मामला बहुत बडा है गौतम साहब । सस्पेंसन छोडो सीधे 'टर्मीनेसन' का प्रकरण है ।"  
"सर ,अब जो भी है आपके हाथ है । जैसे भी कहो...।"
"पहले नही सोचा यह सब...?"
केन्द्राध्यक्ष अधिकारी के चमचे के हर वार को गजब का धैर्य दिखाते हुए सहते रहे ।
इसके बाद दोनों के बीच क्या बात हुई यह तो पता नही पर सिन्हा अपनी टीम के साथ खुशी-खुशी गौतम जी से विदा ले रहे थे ।
कुछ ही मिनटों बाद धूल का गुबार छोडती हुई जीप ओझल होगई । 
गुप्ता ने अपना रोष पूरे वेग से निकाला--
"कल से हमारी ड्यूटी मत लगाना । आप हमें पागल समझते हैं सर ? हमारे कमरे में इतना बडा घोटाला ? अशोक की जगह गोपाल..! वह भी जिले के अधिकारी ने पकडा ..!"
"अरे भाई ,जिले का हो या संभाग का ..ये अधिकारी बुरी हवा की तरह आते हैं ,चले जाते हैं । इन्हें क्या पता नही कि कहाँ क्या होरहा है । इन्ही के यहाँ सेन्टर और 'सी एस' की दुकान लगती है । मनचाहे केन्द्र की बोली लगती है बोली । समझे । सख्ती को 'सख्ती' के अर्थ में लेना नासमझी है मेरे भाई । चिन्ता क्यों करते हो गुप्ता जी ?"
"अब जल्दी करो । ढाई घंटे की मेहनत के बाद भूख लगी है जोरों की ।" 
तिवारी ने कहा । शर्मा कागज की प्लेटों पर हलवा और पकौडे सजाने लगा ।