मंगलवार, 16 सितंबर 2014

सजा

थकी--हारी नमिता जब घर में आई तो उसकी थकान और बढ़ गई । जहाँ देखो चीजें बेतरतीब बिखरी पड़ीं थीं । सौमित्र मैगी बनाने में तीन बर्तन खराब करके वहीं प्लेटफार्म पर सरका गया था । मसालादानी खुली रखी थी और आलू-प्याज के बिखरे छिलके जैसे उसकी खिल्ली उड़ा रहे थे कि, अरे नमिता जी आप तो बड़ी सफाई पसन्द हैं लेकिन आपके किचन की हालत तो कुछ और ही बयां कर रही है । 
निखिल को अपने जाँघिया बनियान बाथरूम में ऐसे ही छोड देने की आदत है चाहे उन्हें माँ धोए या कपडे धोने वाली । अरे ! हाँ 'या' के लिये तो कोई विकल्प ही कहाँ है पन्द्रह दिनों से । किशोरीबाई छुट्टी पर है । अच्छा है कि कामवालियों को छुट्टी तो मिल जाती है । घर की बात छोड़ें ,नमिता को तो एक सी. एल. के लिये प्राचार्य कक्ष के कितने चक्कर लगाने पडते हैं । कोई ठोस कारण बताना होता है । तब भी छुट्टी मिल जाए तो गनीमत है । 
और पतिदेव की तो बात ही निराली है । उनका वश चले तो कुल्ला भी पलंग पर ही करें । अखबार पूरे कमरे में बिखरा था । जैसे कोई मशीन को सारे पुर्जे खोले बिना ठीक नही कर सकता उसी तरह वे अखबार को भी अलग-अलग पेज करके पढते हैं । और सारे पेज यहाँ वहाँ छोड देते हैं । नमिता को इस आदत से बडी चिढ होती है । उसे अखबार पढना होता है तो तारीख देख-देख कर पहले सारे पेज जोडने होते हैं । नही तो तीसरा पेज चार दिन पहले का पढो और छठा पेज पिछले महीने का । इसी झंझट के कारण वह अक्सर अखबार पढ ही नही पाती । 
उसके स्कूल जाने के बाद जरूरत होने पर साहब जी चाय बना कर तो पी लेते हैं पर चाय पिये कप किस अलमारी में मिलेंगे पता नही । कम से कम चीजों को अपनी जगह पर तो छोडा जा सकता है न ,कि उसमें भी भारी मेहनत लगती है । नमिता एक साफ-सुथरे व्यवस्थित घर की कल्पना में ही अधेड हो गई है । वह कभी-कभी अपनी यह खीज प्रगट करने से रह नही पाती और तब उसे तडाक् से पति की ओर से जबाब मिलता है----
"अरे ! तो ठीक है न ! तुम भी मत करो । पडा रहने दो यूँ ही सब । और नही तो फिर बडबडाओ मत ।"
"मम्मी पता नही क्यों टेंशन लेती रहतीं हैं ?" 
"भैया ! चिन्ता न करो । मम्मियों की तो आदत ही होती है कुछ न कुछ मीन-मेख निकालने की । पर कोई दिल से नाराज थोडी होतीं हैं ।"
पति और बेटों की मिली जुली प्रतिक्रियाएं ..। सारी बातें सहज और आम हैं लेकिन नमिता को अब ये ही बातें पीडा देने लगीं हैं। पहले इन बातों को वह स्नेहमय परिहास मानकर मुस्करा भर देती थी , असहज व चुभने वालीं होने लगीं हैं ।क्योंकि इनमें संवेदना नही है, नमिता के लिये अपनापन नही है जिसकी जरूरत उसे अब ज्यादा महसूस होने लगी है । वह अक्सर थकान महसूस करती है जो काम से उतनी नही होती जितनी सबकी बेपरवाही से। उसके अकेलेपन और परेशानियों के प्रति उदासीनता से । थके हारे तन-मन के कोने से एक आवाज गूँजती है । काश उसकी भी एक बेटी होती...। बेटी ,कुछ नही भी करती तो भी ,माँ के साथ सहानुभूति तो रखती ही ।
स्टाफ की महिलाओं की बातें उसकी इस अनुभूति को और भी प्रखर बना देतीं हैं जो वे अपनी बेटियों के बारे में करतीं रहतीं हैं ।
" भई मैं तो जब घर पहुँचती हूँ मुझे चाय का कप तैयार मिलता है ।"--माधुरी कहती है---"मेरी बेटी ऋचा मेरी हर बात का बड़ा ध्यान रखती है । मम्मी को क्या अच्छा लगता है क्या नही । अगर जरूरी लगता है तो टोकना भी नही भूलती कि, मम्मी रात में कितने बजे तक काम करती रहती हो तबियत खराब होजाएगी । ठण्डी रोटी क्यों खा रही हो ? रात को थोडा दूध भी लिया करो पापा भी लेते हैं कि नही और..... ।"
"अरे मुझे तो कभी सोचना ही नही पडता कि मुझे कब क्या पहनना है "---नीलम बीच में ही बोल उठती है--- "हमारी पूनम जितनी पढाई में आगे है उतनी ही कला-पारखी भी है । और उतनी ही जिम्मेदार भी है । काम तो इतनी जल्दी करती है कि कालेज जाने से पहले मेरे भी आधे काम निपटा जाती है । यही नही बिल वगैरा वही भर आती है । अपने पिता को भी परेशान नही होने देती जरा भी ।"
नीरा कहती है--"मेरे घर में बेटा नही हैं। सच कहूँ , पहले तो मुझे बहुत बुरा लगता था लेकिन मेरी बेटी और दामाद के व्यवहार ने मेरा वह दुख जाने कबका मिटा दिया है ।"
"देखा जाए तो लडकों का सुख तो बचपन तक ही है और ज्यादा समझो तो विवाह होने तक । विवाह के बाद अब लडकियाँ नही लडके पराए हो जाते हैं । लडकियाँ तो विवाह के बाद भी अपने माता-पिता का कितना ध्यान रखतीं हैं ।" 
मिसेज शुक्ला ने आज ही जैसे नमिता को सुनाने के लिये ही बड़े गर्व से कह रही थीं । उनके पास एक से बढ कर एक डिजाइन के पर्स और ज्वेलरी सैट हैं । सब उनकी बेटी अमेरिका से भेजती रहती है । 
और ...दूर क्यों जाएं..नमिता की अपनी बहू शालिनी भी तो अपनी माँ का कितना ध्यान रखती है । जब तक फोन पर माँ से बात नही कर लेती सोती नही है । माँ को कितनी आत्मीयता से हिदायतें देती रहती है । 
जरा भी तबियत खराब होने पर नाराज होती है पर उस नाराजी में भी कितना स्नेह रहता है कि "आलू और चिकनाई कम से कम खाया करो माँ । कि बी.पी. कैसे बढ गया । चिन्ता कर रही होगी .जरूर  पापा ने कुछ कह दिया होगा . तुम मत सुना करो किसी की बात । मैं भाई और भाभी को भी समझाऊँगी । उनके लिये क्या माँ का ध्यान रखना जरूरी नही है क्या ?.... और नही तो कुछ दिन के लिये यहाँ आ जाओ । मन लग जाएगा ।" 
जब भी उसकी माँ यहाँ उससे मिलने आती है उसका उल्लास देखते ही बनता है । सौमित्र की भी हर कोशिश यही रहती है कि वे खुश रहें । सचमुच बेटी माँ के लिये ससुराल में रह कर भी कितना सोचती है और करती भी है ! कितनी आत्मीयता होती है दोनों के बीच ..
नमिता का दिल-दिमाग एक गहरे खालीपन से भर जाता है । अन्दर से एक हूक सी उठती है----"काश आज उसकी भी अपनी बेटी होती ।"
"होती...क्या ....हुई तो थी ।---नमिता अनायास ही जैसे अतीत की गहरी गुफा में चली जाती है । गुफा के अँधेरे में भी स्मृतियों की चिनगारियाँ चेतना में उजाला भर देतीं हैं । गरम ,झुलसाता हुआ सा उजाला...प्रकृति ने उसकी गोद को भी तो बेटी के अमूल्य धन से भरा था " । 
लेकिन उस भारी धरोहर को नमिता की दुर्बल बाँहें कहाँ सम्हाल पाईं । बेटी की दस्तक से वह कायर माँ कैसे घबरा उठी थी । सोच ही नहीं सकी कि एक दिन वह बेटी के लिए भी तरसेगी . तब तो 
 बेटी के लिये ममता का स्रोत जैसे बन्द ही होगया था या  एक दबाब चट्टान की तरह उसके दिल पर रख दिया गया था ? 
ओ....ह...!" नमिता ने कराह के साथ गहरी साँस छोडी ।
बीस-बाईस वर्ष का सूखा घाव जैसे फिर हरा होने लगा था । स्मृतियाँ मानसपटल पर रोज ही साकार होने लगीं । 
नमिता का विवाह बहुत जल्दी होगया था । पहली बार जब वह ससुराल आई थी तो उसे देख सबने नाक सिकोड़ी -भई कुछ मिले न मिले पर बहु सुन्दर होनी चाहिए .स ने कहा था--- ,बहू तो लजा रही है हमें । मेरे बेटे के तो पाँव की धूल भी नही है ।
पति की नजरों में भी नमिता की जगह तब तक धूल जैसी ही रही जब तक सौमित्र का जन्म नहीं हुआ . लेकिन बेटा के रूप में आई पहली सन्तान ने उसे सम्मान ,अपनापन सब कुछ दिला दिया . सुजीत जो सिर्फ पत्नी को दैहिक उपभोग की निरर्थक सी वस्तु मानता था ,अब उसके खानपान का तथा सुविधाओं का भी ध्यान रखने लगा । 
यही नही बेटे की माँ बनकर वह सास , देवर और दूसरे परिजनों की नजर में भी अचानक महत्त्वपूर्ण हो उठी थी . सास अपने पोते के फरुआ तक खुद धोती थी । कहतीं कि माँ पानी में हाथ देगी तो बच्चे को सर्दी लग जाएगी । हर समय जच्चा के दरवाजे पर अंगारे सुलगते रहते थे । बुरी हवा से बचने के लिये उसमें गन्धक डाला जाता था । हर किसी को जच्चा के कमरे में आने की इजाजत नही थी । सौमित्र की कोमल कलाई में अम्माजी ने नजर से बचने के लिये हींग-राई बँधा काला कपडा बाँध दिया था । । नमिता को महीना भर खूब घी.और मेवों का हरीरा पिलाया गया । पन्द्रह दिन चरुआ का पानी और दसमूल काढा दिया गया । सवा महीना तेल-मालिश करवाई गई । और धूमधाम से दष्टौन किया गया । जच्चा गीत और बधाई गाई गईं । लड्डू बाँटे गए । 
बेटे की माँ बनना कितना सुखद और सम्मान भरा होता है। नमिता अब कुल का चिराग देने वाली बहू थी । सबसे बड़ी उपलब्धि थी पति की स्वीकारोक्ति और सान्निध्य जिसे  पाकर वह प्रसन्नता व गर्व से भर उठी थी। पति की स्वीकृति और सहमति स्त्री को किस तरह निर्भय कर देती है ।  जब नमिता दूसरी बार गर्भवती हुई तो किसी को कोई सन्देह नही था बेटा होने में । सास ने कहा औरत या तो माँ की कोख पर जाती है या सास की कोख पर । यहाँ तो नमिता की माँ को भी लगातार तीन बेटे हुए और उसे खुद को भी दो बेटे हुए ।
नमिता का पति सुजीत भी आश्वस्त था कि यह दूसरा बच्चा भी बेटा ही होगा । पूरे लक्षण वे ही थे जो सौमित्र के लिये थे । घर में प्याज लाना बन्द होगया । बैगन ने कुछ महीनों के लिये रसोई से विदा ले ली । गुड और मिठाई जमा होने लगी । खटाई से दुश्मनी होगई । 
सास ने महीनों पहले ही बच्चे के लिये कथरी , लँगोटी और फरुआ बना लिये । नमिता को भी विश्वास था कि होने वाला बच्चा लडका ही होगा । बेटे की माँ बनने के आनन्द का अनुभव तो हो ही चुका था । 
कोई गुंजाइश ही नही थी कि अलग कुछ सोचा जाता । एक बार नमिता ने मजाक में ही कहा कि सौमित्र की बहन आ गई तो? 
"तो दोनों माँ बेटी को देश निकाला ."---सुजीत ने भी हँसकर कहा फिर अचानक गंभीर होगया . कहा--"ऐसा मज़ाक  मुझे पसन्द नही है ."
नमिता उसी समय कुछ शंकित हुई   
 वैसे तो लडकी का होजाना भी कोई विशेष चिन्ता की बात नही होगी । पहले बेटे के बाद बेटी का जन्म बुरा तो नही लगना चाहिये । बल्कि भाई के साथ एक बहन होना अच्छा ही है । लेकिन उसकी यह सोच वहीँ रुक जाती थी ,जैसे पुल टूट जाने पर यातायात रुक जाता है .  
से मालूम था कि घर में बेटी का आना किसी को पसन्द नही है। घर में ही क्यों बाहर समाज में भी बेटी का जन्म भले ही उतना बुरा न माना जाए पर बेटे जितना अच्छा भी नहीं माना जाता . कम से कम खुशी तो नही लाता । 
'बिटिया साठ ,तौऊ बाप की नाठ ' जैसी कहावत उसने सुन रखी थीं पर साक्षात्कार ससुराल में ही हुआ था . 
" बेटी जनम के साथ दस जंजाल लाती है . उसकी रखवाली करो ,घर-वर तलाशो , दस जगह की खाक छानो , लडके वालों के तमाम नखरे सहो 
भारी-भरकम दहेज दो उस पर भी लडकी ससुराल में सुखी नहीं तो जीवनभर का क्लेश .... सुजीत के इन विचारों से वह खूब वाकिफ़ हो चुकी थी . तय था कि बेटी को जन्म देकर वह पति की नजरों से गिर जाने वाली है . पर यह भी कोई अपने हाथ में होता है ? 
अस्पताल में दर्द की कई लहरों के गुजरने के बाद नन्ही सी रुलाई फूटी तो नर्स की ने कहा-- बधाई हो लक्ष्मी आई है । 
'अजी काहे की बधाई '--सास और देवर सुनते ही कर घर चले गए । लेकिन नमिता को तब घबराहट सी महसूस तब हुई जब पति सुजीत भी उसे हिकारतभरी नजरों से देखते हुए उसे अकेली छोड़ गया ,वैसे ही जैसे हारा हुआ चुनाव-परिणाम मिलने पर समर्थक चले जाते हैं । जैसे कि नमिता से कोई गंभीर अपराध होगया हो । 
अस्पताल में रह गई जेठानी और नमिता की माँ । तीसरे दिन छुट्टी करवा कर घर भी उसे अकेली जेठानी लेकर आई । घर पर ऐसे सन्नाटा पसरा था जैसे व्यापार में कोई बडा घाटा होगया हो या किसी ने सारी सम्पदा चोरी होजाने का समाचार दे दिया हो ।
इस बार जच्चा के आगमन और स्वागत की कोई तैयारी नही थी । बस नीम का पानी उबाल दिया नहान के लिये । जच्चा-बच्चा के नहान के बाद सब कुछ शान्त होगया । जैसे अर्थी जलाकर लौटे हुए घर में होती है । न सास ने उपले जलाकर गन्धक डाला न ही चरुआ-हरीरा पकाया ।
"लडकी को कौनसी हवा लगेगी ! मौत भी आए तो बच कर निकल जाए ।" 
नमिता बाथरूम भी जाती तो ,बच्ची अकेली उपेक्षिता सी एक तरफ पडी रोती रहती । उसके पापा देख कर निकल जाते । क्या सौमित्र को इस तरह कोई रोने देता ? जो जहाँ होता काम छोड कर बच्चे को उठा लेता और उसके लिये एक मीठी झिडकी--"नमिता क्या कर रही है री ? सब छोड पहले बच्चे को देख ।"
अब बेटी रोती तो सास चीख पुकार मचाने लगती---"कहाँ मर गई ? कौनसा पहाड तोड रही है ...? सन्तान सम्हाली नही जाती !" नमिता का मन डगमगाने लगा । सास तो सास पति भी नाराज हैं ।
"नाराज न होऊँ तो पीठ ठोकूँ तेरी ? बडा किला फतह करके दिया है न तूने ? कन्धे झुका दिये तूने । जाने किस किसके हथ जोड़ने पड़ेंगे । किस किसके दरवाजे पर माथा टेकना होगा ."---सुजीत हिकारत के साथ बोला---" अब इतनी मेहरबानी तो किया कर कि इसे मेरे सामने न लाया कर । भला हो कि जब मैं आऊँ तो इसका मुँह ढँक दिया कर । रोटी भी गले से नही उतरेती ।"
पति के आक्रोश व घृणा को देख नमिता अपराध-बोध से ग्रस्त हो उठी । बेटी को जन्म देकर पति पर बोझ डाल कर वह जैसे अपने स्थान से गिर गई । अपने पति की इतनी नाराजी सहन करना उसके लिये सबसे दुष्कर कार्य था । उसका एक ही दायरा था पति की अनुकूलता उसकी सोच के अनुसार ही ढलना । पति प्रसन्न तो जग प्रसन्न । पति के दायरे में एक बेटी के लिये जरा सी भी जगह नही थी । 
पति की बेरुखी में वह बच्ची को भी कैसे प्यार करती । पति को प्रसन्न करने के लिये उसे बच्ची अकेली छोडना पडता , कलेजे के टुकडे को रोते देखकर भी वह अविचलित रहती थी । छोटे भाई के विवाह में जब फोटोग्राफी हो रही थी ,वह बच्ची को गोद में लिये सुजीत के साथ खडी थी ,सुजीत ने झिडक कर कहा----" पहले अपनी सन्तान को कही रख कर आ तब मेरे साथ खडी हो ।" नमिता ग्लानि से पानी-पानी होगई । जीवन में आकर बेटी ने उसके लिये फिर से अपमान और यांत्रणाओं की राह खोल दी थी । वह खुल कर उसे प्यार भी नही कर सकती थी । जब भी उसे बच्ची को दुलारते हुए देखा जाता । सुजीत तानों और झिडकियों के अंगारे बरसाता रहता । आते--जाते जब भी मौका मिलता सुजीत उसे बेटी जनने के अपराध से भरता रहता । और वह अपराध-बोध से भरती रही । धीरे-धीरे उसका दूध जल गया । उसकी छाती के वात्सल्य स्रोत सूख गए। बच्ची भूखी सूखे स्तनों को खींचती रहती। ऊपर के दूध को नकार देती । विद्रोह करती कि माँ मेरे लिये क्यों नही है तुम्हारा दूध । पत्थर बनी माँ अनुत्तरित ..।   

लेकिन उत्तर देता कौन । नमिता ने दिल-दिमाग तो जैसे गिरवी रख दिया  था । पति के दायरे से बाहर जाकर सोचने के बारे में भी नही सोचा उसने । बच्ची कुपोषण से सूखती गई । बिल्कुल क्षीणकाय होने पर उसे अस्पताल में दिखाया गया पर बात हाथ से निकल गई थी और एक दिन वह माँ को ग्लानि और सारे तानों-उलाहनों से मुक्त कर गई । जरूर वह आत्मा माता-पिता की उपेक्षा से आहत होकर ही इतनी जल्दी चली गई । 
नमिता को कुछ दिनों के लिये लगा कि वह अन्दर से खोखली होगई है । उसे अब माँ बनने का कोई अधिकार नही है । लेकिन अनचाहे ही जब गोद में बहुत जल्दी निखिल आगया तो वह बेटी के दुःख को धीरे-धीरे भूल गई । 
लेकिन अब उसे महसूस हो रहा है कि असल में वह अपराधियों का जीवन जी रही है । अपराधी जिसे कभी न कभी दण्ड मिलता ही है । नमिता ईश्वर की भेजी उस पवित्र आत्मा का सम्मान न कर सकी तभी तो उसे यह अकेलेपन की सजा मिली है ।      
हाय वह कैसी हृदयहीन थी । जाने कैसे उसने एक बार भी उलट कर नही सोचा कि मासूम बच्ची उसकी अपनी सन्तान है जिसे माँ की स्नेहमयी गोद की जरूरत है और अधिकार भी । बेटी के लिये कोई भी कठोर हो पर माँ कैसे कठोर हो गई। क्यों , क्यों उसने खुद बेटे और बेटी में इतना भेद भाव माना । जबकि सृष्टि में जितनी भूमिका पुरुष की है उतनी ही स्त्री की भी है फिर क्यों बेटी के जन्म पर इतना विषाद । और क्यों इसके लिये सिर्फ माँ ही जिम्मेदार माना जाता रहा है । 
वह , नमिता सचमुच एक हृदयहीन, कमजोर व कठोर माँ .. माँ जो बेटी के आने पर शर्म और संकोच से भर उठी थी कि बेटी उसके पति और परिजनों को स्वीकार न थी , कि बेटी उसके लिये उपेक्षा व अपमान का कारण बन गई थी । कितनी घटिया ,गलत और कमजोर सोच थी  नमिता की। सिर्फ कुछ लोगों की सोच के कारण वह माँ एक के दायित्त्व को ही दरकिनार कर बैठी ।     
उस प्रसंग को याद कर नमिता की आँखें छलछला आईं । खुद को ही हजार बार धिक्कारा । पति और परिवार से कहीं अधिक दोषी वह स्वयं है । कैसी स्त्री है वह । कैसी माँ । माँ के नाम पर एक कलंक ।
"मेरी बेटी , मैं तुझसे क्षमा नही माँगूगी क्योंकि मेरा अपराध क्षम्य है ही नही । " --नमिता ग्लानिबोध से पिघल कर बोल उठी ---" मैं तुझे सम्हाल न सकी । काश तुझे बचा सकती । तुझे छाती से लगा कर पाल-पोस कर बडी करने का हौसला जुटा सकती । तेरी माँ होने पर गर्व कर सकती । जो मुझे करना चाहिये था । मैं माँ के नाम पर सचमुच एक कलंक हूँ । तेरे पिता को क्या दोष दूँ जबकि माँ होकर मैं ही मातृत्व न निभा सकी । 
मेरी यही सजा है कि मैं दूसरों की बेटियों को देख देख कर कर पछताती रहूँ। उनकी अपने माता-पिता के प्रति आत्मीयता देख-देख जीती रहूँ । स्नेहहीन उजाड में अकेली ही जीवन को ढोते हुए , बिना किसी हमदर्द के ही उपेक्षाओं का जहर पीती रहूँ । जीती रहूँ एक स्नेह और सम्बल रहित अकेली जिन्दगी । और तुझे खो देने का मूल्य चुकाती रहूँ अपना सुकून देकर । याद करती रहूँ अपने अपराध को । इससे बडी सजा एक स्त्री के लिये क्या होसकती है । मेरी बेटी ,मैं सदा शर्मिन्दा रहूँगी एक कमजोर माँ के रूप में । "  
नमिता ने गहरी साँस लेकर आँसू पौंछे और थकी-हारी बिखरे कागज समेटने लगी । 

8 टिप्‍पणियां:

  1. मार्मिक कहानी..बेटी की याद में तड़पती उस माँ की जिसने स्वयं ही अपनी ममता का गला घोंट दिया..आज भी न जाने कितनी बेटियां उपेक्षा का शिकार हो रही हैं

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  2. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 6/10/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  3. दिल को छूती बहुत मार्मिक कहानी...लेकिन अब सोच बदल रही है और बेटियां भी प्रेम और सम्मान पा रही हैं, लेकिन यह कुछ वर्ग तक ही सीमित है..सम्पूर्ण समाज को अपनी सोच बदलनी होगी...

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  4. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया अनीता जी कुलदीप जी और श्री शर्मा जी । यह सच है कि सोच बदल रही है । जिसने यह सब देखा ,महसूस किया वही लेखिका अपनी पोती पर न्यौछावर है । वह बच्ची हमारी दुनिया की सबसे प्यारी और खूबसूरत सदस्य है । लेकिन यह भी सच है कि तब भी ऐसे लोग थे और आज भी सजा के किरदार जहाँ तहाँ देखे जासकते हैं । अभी माँ द्वारा छह माह की स्वस्थ सुन्दर बच्ची को नाले में फेंकने वाली भीषण गाथा को लोग भूले नही होंगे ।

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  5. अच्छी प्रस्तुति प्रेरणाप्रद कथा !

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  6. एक नए अंदाज एवं शैली में प्रस्तुत आपकी पोस्ट अच्छी लगी। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।धन्यवाद।

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  7. बहोत ही मार्मिक आज भी सोच कर सिहर उठता हूँ कि कैसे रहे होंगें वो लोग जिन्होनें बेटी को बोझ समझा शायद आजादी के बाद के २०००,तक के दशक में ये प्रवत्ति ज्यादा रही लेकिन मुधे खुशी है कि मैं जिस पीढी का हूँ वो बिल्कुल भी एस नहीं सोचती गाँव में भी हालात बदल रहे हैं तेजी से मेरे गाँव की अधिकाँश मेरी बचपन की साथ पढने वाली सहपाठियाँ आज दिल्ली बैगलोर लखनऊ में सही पदों पर हैं हर दीवाली गाँव जाता हूँ तो सबसे मुलाकात होती है अच्छा लगता है फेसबुक पर नहीं हूँ न इसीलिए वैसे एक बात और कि लडकियों के मुकाबले लडकों का औसत कम है हालांकि साथी दोस्त भी अच्छे पदों पर हैं पर संख्या लडकियों की ही ज्यादा है हम खुद तीन भाई बहन हैं मेरी दोनों बडी बहनें सरकारी अध्यापिका हैं ऊपर सारी जानकारी व्यक्तिगत है पर साझा इसलिए कर रहा हूँ कि कहीं न कहीं से आपको खुशी मिलेगी स्त्री की प्रगति पर आज नए सिरे से उसको बडते हुए देखकर शहरों में ही नहीं अपितु गाँवो में भी

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  8. प्रिय विकास ,
    शायद मेल पर भेजे उत्तर आपको नही मिले . इसलिये उसे यहाँ दे रही हूँ --
    प्रिय विकास,
    आप तो अनूठे ही पाठक निकले .
    अच्छा लगा आपके विचार जानकर और यह भी कि आप गाँव से हैं . गाँव की मिट्टी में जन्मा पला व्यक्ति अगर सही शिक्षित है तो वह अपेक्षाकृत अधिक उन्नत विचारों वाला होता है क्योंकि उसके साथ जमीन से जुडा यथार्थ भी होता है .
    बहुत अच्छी बात है कि नई पीढ़ी की सोच अग्रगामी और क्रान्तिकारी विचारों वाली है . गाँव भी इससे अछूते नही हैं . बस उसे व्यक्तिवाद के अतिरेक से बचना होगा . .
    आजकल आप कहाँ है , क्या कर रहे हैं . आपकी बहनें शिक्षा विभाग में हैं यह बड़ी अच्छी बात है .मैं भी शिक्षा-विभाग में ही हूँ . वास्तव में शिक्षक के रूप में व्यक्ति प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से ,अपने स्तर पर परिवर्तन ला सकता है .
    शुभकामनाओं सहित .

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