सोमवार, 22 दिसंबर 2014

एक सर्द रात और पूरी ज़िन्दगी


गायत्री ने रजाई को चारों ओर से दबाकर थोडी गर्माहट महसूस करने की एक नाकाम सी कोशिश की ,पर रेतीली मिट्टी को तोडकर फूटती पानी की तेज धारा की तरह सर्दी उसकी पसलियों तक धँस गई । दो दो स्वेटर ,स्कार्फ ,इनर ,ऊनी मोजे तो वह सोते समय भी पहने हुए थी । यही नही रजाई के साथ एक शाल भी मिलाली थी । फिर भी सर्दी थी कि रोम रोम में समा गई थी । उसे रह रहकर कँपकपी सी लग रही थी । 
कुछ तो कमरा ही ऐसा है । बडी-बडी खिडकियाँ ,जिनमें किवाडों के नाम कागज के गत्ते लगे हैं ।वे भी पूरे फिट कहाँ हैं ? कहीं न कहीं सन्धि रह ही गई है । हवा को आने के लिये कितनी जगह चाहिये ? कमरा एकदम बर्फ हो रहा था । उसपर बिजली भी नही थी । मेला के समय तो पूरी पूरी रात बिजली की कटौती होजाती है । वैसे बिजली होती भी तो क्या करती गायत्री ? हीटर जैसी कोई चीज अभी तक नही है उसके पास । लकडियाँ पिछले हफ्ते की बारिश में गीली होगईं ,नही तो चूल्हा या अलाव जलाने पर कुछ राहत तो मिलती । 
उसे याद आया कि गाँव में तो आग के सहारे ही लोग आधी से ज्यादा रात काट लेते थे । आखिरी चिनगारी बुझने तक लोग राख कुरेदते रहते थे । बुझता हुआ अलाव या चूल्हा ही उन्हें गर्मी का अहसास कराता रहता था ।
बचपन में वह जब छोटे भाई के साथ कस्बा में पढने जाती थी तब दिसम्बर-जनवरी की ठिठुरती सुबह में वे रास्ते में आग जलाकर हाथों को गरम कर लेते तभी साइकिल चला पाते थे । यहाँ शहर में कहाँ लकडी ,कहाँ अलाव ! गैस से कहीं गर्मी मिलती है ?
"पिछले पैंतालीस साल में भी ऐसी सर्दी नही पडी ।"--अखबार में लिखा था । गायत्री को सर्दियों का आना बहुत अखरता है । सच तो यह है कि वह ठीक से तैयारी भी नही कर पाती कि मौसम आ धमकता है । सर्दियों के कपडे ,जो मार्च- अप्रेल में बाँधकर दीवान में रख दिये जाते हैं निकालकर धो सुखा भी नही पाती कि सर्दियाँ बहुत ही अनचाहे मेहमान सी आ जमती है । हर साल सोचती रह जाती कि दो अच्छी रुई वाली रजाइयाँ बनवाले .पिल्ले निकल आए हैं .बिछाने के लिए भी गद्दे होने चाहिए । जैसे उग्र भीड को रोकने में डण्डा-पुलिस असमर्थ होजाती है ,कथरी भी नीचे से सर्दी को रोकने में नाकाम रहती है । 
हर साल जाती सर्दियों में वह ऊनी कपडे खरीदने का विचार करती है . जाते मौसम में कपड़े सस्ते मिलते हैं ,लेकिन तभी यह विचार उसे दुकान से लौटा देता है कि अभी पैसा डालना बेकार रहेगा .गर्मियाँ आने को ही हैं । सर्दियां अब पूरे एक साल बाद आएंगी .जब आएंगी तब देखेंगे. 
सर्दी आ भी जाती हैं साथ ही हर साल की तरह पछतावा भी कि सेल से ही क्यों न खरीद लिये शाल और स्वेटर ?
गर्मियों में भी यही होता है .कूलर पंखे ठीक करवा भी नहीं पाती कि धरती तपने लगती है । जिन्दगी एकदम अस्त-व्यस्त बस गुजरती सी चल रही है । सब कुछ अस्थाई सा । मुसाफिरखाने में ठहरे मुसाफिर जैसा . एक आलपिन के बिना सारे कागज बिखर जाते हैं जरा से झौंके से। एक अभाव ने जैसे पूरे जीवन को ही खोखला कर दिया है । मोहित के पापा....
पति का ध्यान आते ही गायत्री को तलवे में धँसे काँटे को कुरेदने जैसी कसक महसूस हुई ।
अकेलापन जब हावी होजाता है तब अकेलेपन के कारण पर ही सबसे अधिक ध्यान जाता है । वैसे तो गायत्री अकेली नही है । दो बेटे हैं । आसपास ही देवर-देवरानी हैं । उनके बच्चे हैं और पास-पडौस के लोग हैं लेकिन कभी-कभी वह सबके बीच बहुत अकेली होजाती है और उसका एकमात्र कारण होता है मोहित के पिता की कमी । 
ऐसे में गायत्री अनायास ही केवल पति और पति से जुडी यादों में खो जाती है । पति नन्दकुमार जो उसे परिजनों के हवाले छोड दूसरी दुनिया बसाकर पूरी तरह बेखबर हो गया है । जब उसने दूसरा घर बसाया था तब गायत्री ने अपनी ऐसी जिन्दगी की कल्पना नहीं की थी या कि नंदकुमार ने करने नहीं दी थी ? 
ऐसे में विगत बीस वर्ष गायत्री को पर्स से गिर गए बहुत जरुरी कागजात से लगते हैं ,जिनके बिना उसे न्याय नहीं मिल सकेगा .  .सम्हालकर रखती तो....और फिर नींद कोसों दूर हो जाती है .

जीवन के प्रारम्भिक दिन जिस विश्वास के साथ शुरू हुए थे ,सीधी-सादी गायत्री सोच भी नही सकती थी कि आदर्श और नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नन्द कुमार का पाँव कहीं और भी फँसा है । जब सच सामने आया । वह जड़वत रह गई । 
नन्दकुमार जाने कबसे एक अन्य स्त्री के साथ अलग दुनिया बसाए हुए था और उसे भनक तक नहीं थी. जब लगी तब मोहित दो साल का था और रोहित गर्भ में था । समझ में ही नहीं आया कि क्या करे ! वह पूरी तरह से मंझधार में थी .पारिवारिक और सामाजिक ही नहीं मानसिक रूप से भी .
और करती भी क्या कैसे ? तन-मन से नंदकुमार ही उसका सर्वस्व था .कोई कठोर कदम वह उठाती भी तो कैसे ? और उठाने की सोचती भी तो तब जब नन्दकुमार उसे सोचने देता . 
वाक्पटु नन्द ने कृतज्ञता का ऐसा प्रदर्शन किया कि गायत्री की बोलती बन्द होगई ।
“ गायत्री मुझसे गलती तो हुई है और तुम्हें पूरा हक है कि विरोध करो ,मुझे सजा दिलवाओ . मैंने तुम्हारे साथ छल किया है इसलिये तुम्हें रोकूँगा नही । लेकिन तुम अगर मेरी मजबूरी समझ जाओगी तो मैं निश्चित ही उसका मान जिन्दगी भर रखूँगा । तुम्हारा ऋण रहेगा मुझपर । अब तुम्हारे सामने दो रास्ते हैं---एक मुझ पर केस करदो और सजा करवाकर मेरे माथे एक अपराधी पति और पिता का लेबल लगा दो दूसरा मेरे निवेदन को मानकर एक भरापूरा जीवन बिताओ जिसमें हमारे दोनों बच्चे तुम्हारे और मेरे स्नेह में पल बढकर बडे होंगे । क्या करना है ,यह तुम्हारे ऊपर छोड़ता हूँ ।इतना समझलो कि निकिता तो अनपेक्षित व अप्रत्याशित रूप से जीवन में आगई है .पर तुम मेरी परिणीता हो और वह तो ऐसे ही है बस....
फिर साथ ही परिजनों की सान्त्वना और गर्भस्थ शिशु का मोह . 
समाज और कानून के बारे में सोचने की जरूरत ही कहाँ थी ! सच तो यह है असली सजा व्यक्ति अपनेआपको खुद ही दे सकता है .लोग जेल में जाकर भी नहीं सुधरते . नन्द खुद को अपराधी मान रहा है यह सजा क्या कम है ? 
पर इससे भी आगे जो बात थी वह थी गायत्री का नन्द से लगाव उसकी बातों का भरोसा जो इस असहनीय स्थिति में भी कम नहीं हुआ था .फिर सजा-शिकायत किसकी करे ? उसकी जो खुद ही अपना अपराध स्वीकार कर सिर झुकाए खडा है ? उसका पति ? ..पति , जिसके बिना जीना स्त्री के लिए कच्चे कगार पर चलना होता है .
बस उसने अपने आप को समझा लिया । पति से प्रेम और सम्बल मिलता रहे बस और क्या चाहिए .जब पति ने उसे भरोसा दिया है तो चिन्ता किस बात की । दूसरी औरत क्या कर लेगी ? सबसे बडी बात थी बच्चों के भविष्य की । बच्चों को पिता का स्नेहमय संरक्षण मिलना ही चाहिये जबकि वह दुनिया में है । स्त्री परिणय ,प्रणय और मातृत्त्व के नाम पर स्वाभिमान और सम्मान को भी एक तरफ रख देती है । यह उसकी उदारता है ,मूर्खता है या महानता , पता नही ।
गायत्री ने इसे स्त्री की उदारता माना और पति को अपराध बोध से मुक्त कर दिया । 
लेकिन उदारता ही काफी नहीं होती ,इसे समझने में गायत्री को खासा समय लग गया . तब तक निकिता अपने चातुर्य से अपना दायरा इस तरह फैला चुकी कि गायत्री को धीरे-धीरे खुद को समेटना पड गया. यहाँ तक कि उसे पाँव पसारना भी भारी पड़ने लगा .विरोध किस मुंह से करती ! दोष उसी को मिलता कि पहले तो विरोध किया नहीं ,अब हाय हाय करने से क्या होता है . शुरू में ही रोकना था न ? 
निकिता ने तो वही किया जो अक्सर ऐसी स्त्रियाँ करती हैं.उसे क्या दोष . दोष है तो वह खुद गायत्री का जिसने अपने पाँव पर कुल्हाड़ी खुद ही मारली है .
"ऐसा नहीं है "--परिवार व समाज में मान्य पत्नी गायत्री का असंतोष विद्रोह में न बदल जाए इसलिए नन्द बड़ी चतुराई से काम लेता .खूब स्नेह जताकर कहता ---
"यह तो तुम्हारी उदारता और शालीनता है .अच्छे परिवार के संस्कार हैं .यही तो ब्याहता पत्नी और दूसरी में फर्क होता है ."
तब गायत्री कुलीनता व शालीनता के भार से झुकी चुप रह जाती हालाँकि कभी-कभी उसकी बातें शिकायत का रूप ले लेतीं थी .आखिर वह भी एक स्त्री ही थी .
लेकिन तब नन्द का स्वर और लहजा दोनों ही बदल जाते --
गलती होगई जो इधर चला आया।"
तो न आया करें अगर इतनी ही परेशानी होती है।"--गायत्री एक पत्नी के स्वाभिमान और अपनेपन की धोंस में कहती थी तब नन्द
गायत्री को दूसरी तरह से परास्त कर देता -- 
"मैं तो यह सोचता था कि कम से कम गायत्री तो मुझे समझेगी लेकिन अब यहाँ भी मुझे शिकवे-शिकायत सुनने मिल रहे हैं तो मैं क्या करूँ ? जीना मुहाल होगया है .कहीं चैन नहीं है..."
"ऐसे परेशान न हो . मैं अब कोई शिकायत न करूंगी ." 
गायत्री पति की बातों से ऐसे पिघल उठती जैसे कि पति की परेशानी का कारण वही है .
यों नन्द का रास्ता आसान होता गया और गायत्री समझ ही नहीं पाई .नन्द हफ्तों तक नहीं आता और गायत्री बेचैन हो जाती . उसका अंतर चिल्ला-चिल्लाकर कह उठता कि उससे ही कोई भूल हुई है वरना वो इस तरह रुकने वाले नहीं हैं .भावनाओं पर गायत्री का वश नहीं . पति के सामने भूल स्वीकार करने में उसे जरा भी वक्त नहीं लगता .      
पिछली बार भी किसी बात पर नन्दलाल नाराज होकर चला गया लौटकर न आने का संकल्प लेकर. 
दो माह होने को आए . एक बार भी नन्द ने गायत्री या बच्चों को पलट कर नही देखा । 
शुरू में तो इस बार गायत्री ने भी सोच लिया था कि अब उन्हें जाने ही दो . बहुत हो चुका नाटक .ईमानदारी भी कुछ होती है . अपनी कही हर बात को हर बार भूल जाते हो. जाओ,रहो वहीँ 
लेकिन समय के साथ-साथ पति से उसका आत्मिक जुडाव एक बार फिर नफरत को धूमिल करने लगा । भावनाओं का उफान किनारों से टकराकर चीखने लगा कि ,"आखिर ये दूरियाँ क्यों ? उन्हें क्यों बढने दे रही है गायत्री, जबकि हृदय का बंधन आज भी उतना ही मजबूत है । फिर काँटों की राह उसने भी तो आसानी से स्वीकार करली थी . सिर्फ इसलिए कि वह पति को खोना नहीं चाहती थी .जिसे भुलाया नहीं जा सकता उसके लिए कोरी अकड में क्या रखा है ? पति के जीवित होते हुए वह क्यों हर तरह से वंचिता रहे ! .."     
गायत्री की नसों में जैसे बर्फ जमी जारही थी ।  
जब नेचुरल हीटर पास हो तो फिर कहाँ की सर्दी कैसी सर्दी ?---नन्द ने एक बार उसे बाँहों में भरते हुए कहा था । 
यादों ने उसकी दबी लालसाओं को अनायास ही जगा दिया । उसके सामने जाने कितनी जरूरतें मुँह फाड कर खडी होगईं और सारी कटुताओं को निगल गईं । एक बर्फीला झौंका उसकी पसलियों को भेद गया ।  
स्वाभिमान की ऊष्मा के साथ-साथ पति को याद न करने का संकल्प भी ठण्डा होगया , दो पल के लिये रख छोडी चाय की तरह । ऐसा क्यों है कि पति के स्नेह और सम्मान के बिना उसे कोई सुख-सुविधा या सम्मान सन्तुष्ट नही कर पाता । बच्चे माँ की एक हँसी के लिये क्या कुछ नही करते । वह हँसती भी है पर हँसी खुद ही उसे खोखली लगती है । उसे दो महीने ही दो साल क्यों लगते हैं कि कितना समय बीत गया पति को घर आए हुए । और यह जिन्दगी ठहर गई सी क्यों लगती है?
जरूरतों की पूर्ति भी कभी--कभी कितनी आवश्यक लगने लगती है ? उसके अन्तर से एक हूक सी उठी---उनसे क्षमा माँगलूँ । बुलालूँ उन्हें । आखिर उनसे मेरा सम्बन्ध कोई ऐसा वैसा नही, सात फेरों का है । कहीं भी रहें । हैं तो वो मेरे पति ,जीवन के प्रथम पुरुष । कोई भी स्त्री अपने प्रथम पुरुष को नही भूल पाती । फिर मैं तो पत्नी हूँ उनकी । पति से क्षमा माँगने में क्या मान और क्या अपमान । और इससे भी बडी बात है कि न पति के बिना स्त्री की राहें आसान होतीं हैं न पिता के बिना बच्चों की ।
जब गायत्री के अन्दर पति प्रेम का सागर उमडता है तो किनारे दूर तक भीग जाते हैं । उसे खुद में पच्चीस दोष नजर आने लगते हैं ।
मैं क्यों तभी अपनी बात कहती हूँ जब वो नाराज होते हैं । जीवन का अब जो भी रूप है ,खुद गायत्री ने भी तो स्वीकार कर लिया था फिर किस बात का मलाल ?
वो रास्ता बनाते गए वह पीछे हटती गई अब शिकायत किस बात की । कि शान्त रहकर उनकी बात क्यों नहीं सुनती । नही ज्यादातर गलती उसकी खुद की है । उसे लगता है कि पति का दिल जीतने की कोशिशों में कुछ कमी तो रही है । क्या वह कोशिश फिर नही होसकती । जरूर हो सकती है । होनी भी चाहिये । दूरियाँ बढाने से बढती हैं . फिर पति बिना जीवन भी कोई जीवन है ?
और उस सर्द खामोश रात में गायत्री एक बार फिर सिर्फ एक विह्वल प्रेमिका की तरह अपने पति को याद कर रही थी । हमेशा की तरह ही ये वो पल थे जब उसके सामने सिर्फ अपना प्रेम था । ऐसा प्रेम जिसमें प्रिय की खुशी के लिये कुछ भी करना कठिन या असंगत नही लगता । इस भाव के सामने वह अक्सर सब कुछ हार जाती है । अब भी हार कर मन ही मन कहे जा रही थी---"कितने दिन होगए तुम्हें देखे बिना ! कितने कठोर हो ! मेरी बातों का इस तरह बुरा मान गए । पर सच मानो तुम्हारे बिना जिन्दगी जिन्दगी नही है । जहाँ तुम हो वही मेरी खुशी है । मेरा जीवन है और मेरी मुक्ति है । काश एक बार सिर्फ एक बार मेरे हदय में झाँकते और देखते कि कितना वीराना है वहाँ । पुकार है तो सिर्फ तुम्हारी । तुम कैसे भूल गए कि तुम्हारी खुशी के लिये मैंने जहर भी पी लिया ,ऐसा जहर जिसके विषय में कोई स्त्री विचारों में भी नही सोचना चाहेगी । सिर्फ इसीलिये तो कि तुम्हें मेरे प्रेम पर विश्वास हो । इसके बाद भी मुझे जीवन का यह उजडा सा रूप मिल रहा है । मुझे यूँ न उजाडो प्रिय । तुम्हारे बिना मैं जी तो सकती हूँ पर खुश नही रह सकती किसी भी तरह । तुम मुझे गुनाहगार मानो पर दूर न जाओ । सजा दो । तुमसे दूर रहकर जीने का अब साहस नही है मुझमें ...। मुझे क्षमा करदो ,आ भी जाओ प्रिय ?"
गायत्री के अन्दर उमडा सैलाब आँखों से उमड कर बहने लगा । चेहरा आँसुओं से भीग गया । और  धार गर्दन से होती हुई बालों में समाने लगी । शायद एकाध सिसकी भी निकल पडी होगी ।
मम्मी ?--रोहित कुनमुनाया । गायत्री का ध्यान बेटे की तरफ गया । 
"मम्मी क्या कोई बुरा सपना देखा ?"--आँखें मलता हुआ रोहित  माँ को देख रहा था  
"रोहित ,मेरा प्यारा मासूम बेटा ."--गायत्री जैसे सपने से जाग गई उसका यथार्थ , उसका वर्त्तमान और उसका भविष्य उसके दो बेटे , ...विसंगतियों से अभी पूरी तरह परिचित नहीं हैं फिर भी कही दब गए से लगते हैं . दूसरे बच्चों जैसी उनकी कोई मांग नहीं होती . बच्चों जैसी जिद नहीं करते . ,बच्चे जिन्हें स्नेह और सम्बल की जरूरत है.
अपनी उम्र से कई साल आगे जाकर खड़ा होगया मोहित बड़ों की तरह सोचने लगा है .घर के कामों को एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह करता है लेकिन मैं उसे क्या दे रही हूँ ?एक रुखी उदासीन और वीरान माँ भला बच्चों को क्या दे सकती है ?" 
गायत्री की सोच की दिशा ने एकदम मोड ले लिया । 
नन्द ने जो भी किया उसका परिणाम मुझसे कही ज्यादा ये बच्चे भोगेंगे .अगर बच्चों को पिता का सही संरक्षण मिलता तो गायत्री एक बार अपना दुःख भूल जाती .बच्चों को पिता की कितनी जरूरत होती है ? पिता का जरा सा सम्बल ही उनके लिये बडा आधार होजाता है । 
पर पिता को तो यह भी ध्यान नही है कि दो मासूम उसका इंतज़ार करते रहते हैं ,जो उसके अपने हैं क्या यह भी उसे मैं ही याद कराऊं? 
गायत्री के जख्म हरे होगए । 
अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने की बजाय जो दूसरी दुनिया बसाकर बैठा है जिसने अपने वचनों का रत्तीभर पालन नही किया उससे स्नेह की भीख माँगेगी गायत्री ? क्या उसकी जरूरतें इतनी प्रबल होगईं हैं कि वह उसके सामने गिर जाए जो उसके अधिकार और सम्मान को भूलकर , उसके प्रेम और समर्पण को ठोकर मारकर ,तन-मन-धन से कहीं और समर्पित है ?
बहुत मनुहार करने पर वह आ भी जाए तो भी क्या होगा ?
नन्द उसकी मनुहार का अर्थ केवल उसके एक औरत होने से लगाता है । ऐसी औरत जिसे केवल पुरुष का 'प्रेम' चाहिये । उसके प्रेम जताने का वही एक ही तरीका ।....गायत्री को उबकाई सी आई । अपनाप से वितृष्णा हुई . स्नेह-विहीन संसर्ग, सतही और अनैतिक सा लगने वाला देहव्यापार ..पति कहलाने वाले व्यक्ति से क्या यही चाहती है गायत्री ? नहीं अब वह अपने बच्चों के लिए जिएगी .
वह इतनी भी कमजोर नही कि कुछ पलों का सुकून पाने के लिये वह अपनी प्रतिबद्धता को छोड एक गैरजिम्मेदार बेवफा और निर्मम पति को बुला कर उसके पैरों तले बिछने तैयार होजाए । क्योँ भला ? सही रास्ता तो नन्द ने छोडा है । राह पर उसे आना चाहिये । नही तो फिर नही । गायत्री भटके हुए आदमी के पीछे अब हरगिज नही भागेगी ...। हरगिज नहीं ...
"हाँ बेटा ,एक बुरा सपना देखा था . पर अब ठीक हूँ ."--गायत्री ने बेटे को गले लगाकर कहा .  

तभी चिडियाँ चहचहाने लगी । गायत्री ने एक सन्तोष के साथ दोनों बच्चों को देखा और बिस्तर छोड दिया ।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के - चर्चा मंच पर ।।

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  2. आम गरीब जीवन के उठापटक से होते हुए परित्‍यक्‍त पत्‍नी की मनोभावों को बहुत संवेदनशील तरीके से उजागर करती सुन्‍दर कहानी।

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  3. बहुत ही सुंदर और सार्थक कथा प्रस्‍तुत करने के लिए धन्‍यवाद।

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  4. बहुत ही सुंदर और सार्थक कथा प्रस्‍तुत करने के लिए धन्‍यवाद।

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  5. सहीं सवाल का सही जवाब कहानी लाजबाव
    http://savanxxx.blogspot.in

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  6. स्त्री के मन की थाह पाना कितना कठिन है..अपने पर हुए अन्याय के लिए भी खुद को दोषी मान लेना...कहानी का अंत सुकून से भर गया

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  7. रचनाकार को ये पूरी आजादी होती है कि वो कब किस मोड पर अपनी कहानी को विराम दे मगर पाठक अपनी मानसिकता के आधार पर तौलने लग पडता है कि हाँ एसे होना चाहिए या एसे नहीं होना चाहिए इस कहानी को पढने के बाद मैं आपकी कहानी (मौत के बाद) पर की गएी टिप्पणी वापिस लेता हूँ मुझे लग रहा है कि मैंने अपनी सोच के दायरे से उस कहानी को पढ बैठा था शुक्रिया आपका ये कहानी लिखने का और सौभाग्य मेरा कि दो लगभग समान परिस्थतियों की कहानियाँ और कितना विपरीत अन्त, मैं क्यूँ एक को स्वीकारूँ और एक को नकार दूँ मुझे बहोत बढी सीख मिली है खुश हूँ कि जल्दी मिल गएी
    एक बात फिर भी कहीं गहरे रह गएी बस साझा कर रहा हूँ कि
    (निकिता ने भी तो वही किया जो एसी स्त्रीयाँ करती हैं) कैसी स्त्री???
    (कोई भी स्त्री अपने प्रथम पुरूष को नहीं भूल पाती) कौन प्रथम पुरूष???
    इन दोनों सवालों पर मैं कुछ विस्तार से कहना चाहता हँ पर पहले वाली गलती न दोहरा दूँ इसलिए आग्रह है कि आपका आशय मिल जाए वरना कहीं एसा न हो कि लेखक और पाठक अपने अपने कालखण्ड को लेकर किसी टकराव पर आ जाएँ हाहा हल्के शब्दों में कह रहा हूँ वरना मेरी उम्र तो इतनी इजाजात भी नहीं देती कि हल्के शब्दों की जगह ये लिख दूँ कि मजाक में कह रहा हूँ
    सम्प्रेषण और नैतिकता दोनों कमजोर पड जाते फिर टकराव की तो बात ही क्या

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