“वसुधा ! सुनले ,अब राखी बाँधने आशू के घर मैं तो नहीं जाऊँगी । उसे जरूरी लगेगा तो खुद ही आजाएगा ।”
मैं
मेंहदी लगाकर बैठी थी और विचार कर रही थी कि कल रक्षाबन्धन है । भैया के घर कितने
बजे पहुँचना है ,राखी पर क्या क्या लेजाना है , भाभी को कौनसे रंग की चूड़ियाँ ले
जाऊँ , भैया को कौनसी मिठाई पसन्द है । गिन्नी
तो पहले ही पूछेगी कि बुआ छेने की मिठाई लाईं या नहीं । और ऐसे में करुणा जीजी के
मुंह से ऐसा कुछ सुनने की कल्पना भी नहीं थी । उनकी अप्रत्याशित बात उतनी ही रूखी
और असामयिक थी जितनी सावन के महीने में चल रही रूखी और गर्म हवा । सावन के महीने
में ऐसी लू और गर्मी की कल्पना कौन कर सकता है ? और करुणा जीजी से इतनी कठोर बात की अपेक्षा कौन कर सकता है ?..जो रिश्तों व रस्मों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील
मानी जातीं हैं । कम से कम मैं तो नहीं । मुझे बड़ी हैरानी हुई । वे कहे जा रही
थीं---"जब रिश्तों में प्रेम ही न
रहे तो रिश्ते बोझ बन जाते हैं । ऐसा बोझ ढोने से क्या फायदा ! कोरी औपचारिकता निभाने का क्या मतलब !”
जीजी कई बार
छोटी छोटी बातों को भी दिल पर ले लेतीं हैं और दुखी हो जातीं हैं पर छोटी छोटी
बातों से ही उतनी ही जल्दी खुश भी हो जातीं हैं चाहे वह आँगन के पौधे में फूल के
खिलने से हो या किसी नई चिड़िया के दिखने पर हो । यों तो जीजी
में कई खूबियाँ भी हैं । वे हाथी-पूजा पर हाथी ,गणेश चतुर्थी पर गणेश जी ,गणगौर पर
गौरा-महादेव मकर संक्रांति पर बैल-गुड़िया आदि बढ़िया मूर्तियाँ माटी से बना लेतीं
हैं । वे थोड़ी बहुत चित्रकारी भी कर लेतीं हैं । जब वे दीपावली पर हर साल रंगों
से दीवार पर लक्ष्मी जी का चित्र बनातीं थीं , कमल पर बैठीं दोनों हाथों से सोने
के सिक्के बरसातीं देवी लक्ष्मी, तो जीजी को खूब तारीफें मिलतीं थीं । ऐसी तारीफों
के लिये मैं तो हमेशा तरसती ही रही ,लेकिन जीजी को तारीफों की कोई कीमत ही नहीं है
। कहतीं-–
“तारीफों से क्या होता है ! तारीफ़ तो पिताजी करनू जमादार
को लड़के के गाने की भी करते हैं पर उसे प्यार तो नहीं करते ना ? देख पिताजी भले
ही तेरी तारीफ़ नहीं करते पर उनका प्यार तो सबसे ज्यादा तुझे ही मिलता है .माँ भी
अपने साथ हर जगह तुझे ले जातीं है या फिर आशु को ।”
“जीजी बेकार
ही सबसे पहले पैदा होगईं । तुम्हारा नम्बर हम सबके बाद ही आना चाहिये था ।”—मैं हँसती हूँ ।
“वसु तू बिल्कुल सही कह रही है । सच्ची बड़े होने के बहुत सारे नुक्सान हैं
।“—जीजी भी हल्के फुल्के
अन्दाज में कहती है।
लेकिन
यह राखी वाली बात जीजी ने पूरी गंभीरता के साथ कही थी । मैं बहुत हैरान व परेशान
होगई ।
संयोग
से हम तीनों ही भाई-बहिनें मुरैना में हैं । मेरी ससुराल गणेशपुरा में है । जीजी
पास ही गाँव के प्राइमरी स्कूल में हैं और भैया दो साल पहले ही लोकनिर्माण विभाग
के कार्यालय में स्थानान्तरित होकर आए हैं । भैया और जीजी दोनों ही माधव नगर में
रहते हैं । तीज- त्यौहारों पर और कभी ऐसे ही मौके बेमौके हम दोनों बहनें तो मिलती
रहती हैं लेकिन रक्षाबन्धन के दिन हम दोनों भैया के घर चली जातीं हैं ।
जब
माँ बाबूजी थे हम दोनों रक्षाबन्धन गाँव में ही मनाती थीं । भाभी को उनके मायके
छोड़कर भैया भी वहीं आजाते थे । माँ हम तीनों को एक साथ देखकर फूली नहीं समाती थीं
। यह उनके लिये सबसे बड़ी खुशी होती थी । तब सादा सूजी का हलवा और आलू प्याज के
पकौड़ों में जो स्वाद मिलता था ,आज किसी भी व्यंजन में नही मिलता । यह उस आँगन का
असर था या माँ की उमंग उल्लास और वात्सल्य से रची बसी का जादू था । अब न माँ-बाबूजी
हैं और न वह खुशियों से चहकता महकता आँगन है । हमारे पास शेष हैं तो बस गाँव की
आँसुओं भरी यादें हैं ।
इस
बार जीजी ने भैया के घर जाने से मना कर दिया तो मैं असमंजस में पड़ गई । भाई बहिन
का यही तो एक बड़ा त्यौहार है । वैसे तो आजकल लोगों के पास समय ही नहीं है कि
अपनों के साथ कुछ फुरसत के खुशनुमा पल गुज़ार लें । त्यौहारों और पारिवारिक
आयोजनों का एक बड़ा लाभ यह भी है कि सब इकट्ठे होजाते हैं भले ही यह प्रयास प्रायः
हम बहिनों की तरफ से ही होता है । तो क्या हुआ , हम माँ जाए भाई बहिन हैं । ज़रूरी
है प्रेम व्यवहार बना रहे , पहल कोई भी करे ।
जीजी
कितनी ही अच्छी हों पर कई बार बेमौके ही अजीब सी बातें कर देतीं हैं .अब भरे सावन
में जीजी को क्या सूझी कि नया बहीखाता खोलकर बैठ गई हैं ।
जीजी
को भैया भाभी से जितना स्नेह है उतनी ही उनसे अपेक्षाएं हैं । अपेक्षाएं दुख देती
हैं क्योंकि वे अक्सर पूरी नहीं होतीं । मैं जानती हूँ इसलिये खुद को समझा लिया है
पर जीजी बातों को दिल पर लगा लेती हैं । जानती हूँ कि बातें उनकी भी गलत नहीं हैं
। पर बातों को समय के साथ खत्म होजानी चाहिये फिर हर बात के कहने का एक सही समय
होता है । पर जीजी नहीं मानतीं ।
“अरे अपने होते हैं तो अपेक्षाएं तो रहती हैं । क्या उनको हमसे नहीं रहतीं ? क्या वह नहीं चाहती कि हम समय पर हर रस्म को निभाएं, तीज
त्यौहारों पर ,सगाई ब्याह के अवसरों पर तरीके से हर रस्म को पूरी करें ? और क्या रस्मों को हमने पूरी नहीं किया ? कभी कोई कमी रह भी गई होगी तो सुजाता ने कितने ताने मारे
है कि बिट्टू के लिये कंगन लाई वे हल्के थे , कि इस बार गिन्नी का जन्मदिन भूल गईं
। या कि मेरे पैर में चोट लग गी पर देखने भी नहीं आई ..। कि दौज पर इस बार खाना
बनाने में देर करदी ,हमने तो खाना बना लिया ..। अन्तिम समय में सुजाता ने पिताजी
के साथ कैसा सलूक किया था , माँ को कैसे दयनीय बनाकर रखा था । रुपया पैसा जमीन
जायदाद सब कुछ होते हुए हमारे माता पिता ने दीन-हीनों जैसा जीवन जिया ,क्या यह बात
सहन करने लायक थी पर मैंने आपसी सम्बन्ध के बीच उन बातों को कभी आने नहीं दिया ।
सोचा कि जाने वाले चले गए ,अब सामने जो है वही अपने हैं .माँ बाबूजी भी यही चाहते
थे कि हम मिलकर रहें । पर सुजाता ने कभी अपनेपन का मान नहीं रखा । खुद तो वह कभी
पूछती नहीं । मन होता है तो मैं ही कभी चली जाती हूँ .पर दरवाजा खोलते समय वह
मुस्कराना तो दूर ,ऐसी निरपेक्षता दिखाती है जैसी रोज आने वाले हॉकर के लिये होती
है . मेरे लिये उसके पास केवल चाय पियोगी ..खाना खा लो ..जैसे वाक्य हैं . अगर बात
करना जरूरी समझती है तो ऐसी बातें कि आज पानी नही आया ,कि सब्जी बडी मँहगी होगईं हैं..अपनी कि गर्मी दिनों दिन बढ़ती जा रही है
..। ”
“पिछली बार जब मैं गई थी तो पता है पूरे एक घंटे वह अपने डॉगी के गुण गाती
रही ...उस पर कितना खर्च करते हैं..उसके लिये क्या क्या व्यवस्थाएं कर रखी है
..उसका खाना कितना स्पेशल होता है ...मैं कहना चाहती थी कि मेरे माता पिता से
ज्यादा भाग्यशाली तो वह डॉगी है...पर मालूम है कि सुनकर सुजाता तूफान खड़ा कर देगी
और परेशान होगा आशू । फिर वह दोष देगा जीजी को ही । इसलिये पी जाती हूँ सारा भाव ,सारा
सच । फिर भी पता नहीं सुजाता जाने किस बात पर जब चाहे बोलना ही बन्द कर देती है ।
आशु कहता है -- जीजी नब्बे परसेंट अगर सुजाता की गलती है तो दस परसेंट तुम्हारी भी
है । अन्धेर है कि नही ? दस
और नब्बे में कोई अन्तर नही है?”
आँखें
पौंछने की नाकाम सी कोशिश करते हुए जीजी बोलती रहीं---
"अब खून के रिश्तों का अब कोई मतलब ही नही रह गया है एक शहर में , एक ही
कालोनी में रहकर भी मेरा सगा भाई जैसे विदेश में रहता है । मैं उसे देखने तरसती
रहती हूँ ।”
“पर यह सब तो पहले से चल रहा है जीजी , राखी बाँधने तो तुम जाती ही हो । अब
नया क्या हुआ ?”
“हाँ कड़वी बातों पर धूल डालकर हम जाते रहे हैं । माँजाया भाई है पर अब इस
बात पर ध्यान चला ही जाता है कि आशु और सुजाता इन रस्मों बहुत सतही ढंग से जैसे
जबरन निभाते हैं । न खुलकर हँसना बोलना । न बैठकर घंटे दो घंटे बचपन को याद करना
,गाना बजाना । पिताजी के साथ बैठकर हम सब भजन और सावन के गीत गाते थे तब कितना
अच्छा लगता था । यह सब तो गुज़रे ज़माने की बातें रह गई हैं । इधर राखी बँधी उधर जेब से रुपए निकले।..तुझे
याद है पिछली बार तो आशु की बजाय रुपए सुजाता ने दिये थे ..बोली—“ये लो जीजी अपने रुपए ,वे दे गए कि मैं तुम्हें दे दूँ ..भाई की नज़र में बस
इतना ही रिश्ता रह गया है हमारा?
पैसे किसे चाहिये ?
दो पल बैठकर बात तो कर लेता । सुजाता को भई सी समय सारे काम याद आते
हैं । सुनो ज़रा वह डिब्बा उतार देना ,कि धूप निकल रही है कपड़े फैला दोगे तो सूख
जाएंगे वरना कब बारिश होजाए ..ना ,मैं तो थक गई हूँ ..भाई के घर भाई से मिलने जाते
हैं और वहीं नहीं मिलता ..।
“वसु हम क्या चन्द रुपयों के लिये राखी बाँधते हैं ? वह
तो एक बहाना है कुछ पल उन्मुक्त होकर बचपन को याद करने का ,भाई बहिनों का साथ
बैठने ,बहुत सारी बातें करने .पर होता है यह कि ...वसु वह मेरा सगा भाई है इसलिये
ऐसी रस्मों को महज औपचारिकता से निभाने का अब मन नही करता जिनमें आत्मीयता नहीं
सिर्फ सतही रूप से राखी नारियल के मूल्य स्वरूप रुपए पकड़ा देना है ..अब जी दुखता
है .”---कहते
कहते जीजी की आँखें छलछला आईँ थीं । मैं अवाक् ।
“जीजी तुम कुछ ज्यादा ही ध्यान देती हो इन बातों पर ..।”
“अरे ,क्यों न दूँ भई ?..शिकायत
उनसे न करें जो हमारे दर्द के जिम्मेदार है ? तो फिर किससे करें ?--जीजी
की आँखें डबाडब भरती गईँ और बहती गईँ
भैया
के लिये उनका जो स्नेहभाव है उसे मैं अच्छी तरह जानती हूँ । दोनों में डेढ--पौने दो साल का ही अन्तर है । बचपन से ही दोनों साथ रहे हैं
, खेले हैं । साथ ही स्कूल गए हैं ।जीजी ने भैया के खूब नखरे भी झेले है जिन्हें वे
अक्सर सुनाया करतीं थीं और सुनाते हुए उनकी आँखों में स्नेह झिलमिला उठता था जैसे
लहरों पर धूप चमकती है .“यह
आशू हैं न ,छुटपन में बड़ा जिद्दी और लडाकू था । जानबूझकर ऐसे काम करता था कि झगड़ा
हो । मैं जहाँ भी पढने बैठती थी वहीँ आकर जोर जोर से पहाड़े या मायने याद करता था ।
मेरी जरुरी कापियों को छुपा देता था .और मुक्का चलाने में तो ..बाप रे ..क्या दम
था इसकी सूखी पतली बांहों में । लेकिन जब मैं एक बार गिरकर बेहोश हो गई थी तो
कितना रोया था । जब तक होश नही आया ,यह मेरी खाट के पास ही बैठा रहा था ।”
मैं
जानती हूँ कि एक साथ बड़े होना ,लड़ना ,मेल होना ,रूठना मनाना ,ये सब बचपन की चीजें
बडी मजबूती और मिठास के साथ ताउम्र रिश्तों के बीच जुडी रहतीं हैं फिर भी जीजी ने
इतनी बड़ी बात झट् से कह डाली । क्या यह शहर की हवा का असर है या बदलते समय का ? हम
गाँव में थे सब कुछ कितना सुहाना था ।
हमारे
लिये बादलों के आने का नाम ही सावन होता था इसलिये जैसे ही पहली वर्षा होती , खेतों में हल-बैलों का मेला लग जाता , बुवाई
के लिये ज्वार, बाजरा तिल , मूँग ,मूँगफली
और मक्का के बीज कोठियों से निकलने लगते ,हम लोग यानी मैं जीजी और आशू भैया भी जब देखो झूला डालने का राग आलापना
शुरु कर देते थे । पर अम्मा साफ कह देतीं थीं कि हरियाली अमावस्या से पहले अगर
झूला झूलोगे तो पीछे फोडे निकल आवेंगे । सो हम चारों ओर हरियाली के पसरते वैभव को
देख-देख कर , नदी की फैलती धारा को नाप-नाप कर हरियाली अमावस्या का इन्तजार करते थे । आए दिन उमडते गरजते बादल मोर
पपीहे की मीठी पुकार ,हरी लहलहाती मेंहदी , हमें महीना भर पहले से ही सावन के आने की सूचना दे देती थी । सावन यानी
झूला मल्हारें और रक्खा (राखी) । अमावस के दिन नीम की डाली पर जो झूला पडता वह पन्द्रह-सोलह दिन पड़ा ही रहता । रात--दिन में जब भी मौका मिलता दो--चार रमक ले लेना एक उपलब्धि जैसा लगता था ।जीजी तुम्हें याद है शकुन जीजी
के आँगन में जहाँ नीम पर तीन--चार
झूले रहते थे मौहल्ले भर की औरतें व लडकियाँ इकट्ठी होकर झूलतीं व मल्हारें गातीं
थी –करेला बागनि छाए जी राज ..। न कोई खींचतान न मान--मनौवल । बरसात की रात का सुरमई उजाला, गीतों की रसभरी तान से कैसे दिपदिपा उठता था । हरी
मेंहदी के घोंटते घोंटते ही हथेलियाँ रच जातीं मेंहदी की महक तमन महका देती थी । पूनों
से आठ दिन पहले ही राखियाँ खरीदने हाट में जाने का जो आनन्द था वह इन मार्केट में
कहाँ ।
“तू ठीक कहती है वसु .”—कभी
कभी बातों में जीजी भी शामिल होजातीं ।
"
खुशी किसी बाजार या बैंक में नही मिलती । तुझे याद है वसु
,तब हम बडी से बडी काँच के
मोती, सुनहरी, और रंगीन स्पंज से बनी राखी नही ...नही..रक्खा( उसके आकार को रक्खा शब्द ही समेट सकता है ) खरीदते थे क्यों कि रक्खा का आकार ही उसके अच्छे व मँहगे
होने का प्रमाण था । अगर कलाई नही ढँक पाई तो कैसी राखी । आशू को भी तो यही पसन्द
था ।
“हाँ जीजी भुजरिया सिराने की बात तो हम कभी भूल नही सकते । जिसकी भुजरियाँ
सबसे लम्बी और घनी होतीं थी उसका मान देखते बनता था ।“
“हाँ वह भी एक सगुन था ।“ जीजी
बतातीं--- “भुजरियाँ फसल के अच्छी होने
या सडने-गलने व सूखने का प्रतीक जो
होतीं थी । भुजरियों को नदी में सिराने के बाद हम लोग रेत में गेहूँ गाढ़ते हुए “आपस में कहती थीं --
“में मर जाऊँ तो मेरे भैया को यह खोह ( गड़ा धन ) बता
देना ।” –यह कहते जीजी की आँखें भर आतीं । यह उनका भैया के प्रति असीम स्नेह ही तो है । भाभी को भी
वे बहुत प्यार करती हैं पर भाभी नहीं समझती ।
पर
मैं क्या करूँ ,समझ नहीं आ रहा । इधर तो रक्षा-बन्धन का त्यौहार पास आरहा था । मैं योजनाएं बनाने में लगी थी कि इस बार
भैया के लिये कैसी राखियाँ खरीदें । कौनसी मिठाई लें जो जरा हट कर हो । राखी के
साथ इस बार रूमाल की बजाय शर्ट या टीशर्ट ली जाए और भाभी के लिये सुहाग--श्रंगार का सामान । जीजी सारी खरीददारी का दायित्व मुझे
ही दे देती हैं । कहतीं हैं कि वह तो दुकान पर जाकर तय ही नही कर पाती कि क्या
लेना चाहिये और क्या नही । कभी खरीद भी लातीं है तो एक बार उसे बदलवातीं जरूर हैं
चाहे साडी हो या और कोई सामान । मुझे हँसी आती है कि वे अपनी ही पसन्द वाली चीज को
घर आकर नापसन्द कर देतीं हैं । इसलिये उनका सामान भी मैं ही ला देती हूँ । हर साल
मैं और जीजी मिल कर भैया के घर जाते हैं। कई बार सावन में जीजी की इच्छा एक बार उस
देहरी पर जाने की होती जिस पर खड़ी माँ खिलखिलाकर हमारा स्वागत करती थीं । कहतीं
कि पुरानी यादों को जीना भी एक अनौखा ही अनुभव होता है । बचपन जैसे पूरी तरह लौट
आता है । पर जीवन कुछ ऐसे ढर्रे पर चला गया है कि गाँव जाना तो दूर यहाँ शहर में
भी त्यौहार के लिये मन में एक उन्मुक्तता नही होती । कहीं कुछ रुका और बँधा हुआ सा
लगता है ।
राखी
से दो दिन पहले ही जीजी ने न केवल मुझे दुविधा में डाल दिया बल्कि यह कहकर कि तू
जाना चाहे तो मैं तुझे नहीं रोकूँगी ..एक ही झटके में पराई भी कर दिया । जानती नहीं कि
उनके बिना मैं भी नहीं जा पाऊँगी । भाभी दस बातें करेंगी । जीजी कभी-कभी गहरी सुनसान खाई में अकेली जाकर घर बनाने की सोचने
लगतीं हैं . जीजी दुखी रहें और मैं मटककर भैया के घर चली जाऊँ और भाभी की तारीफ
बटोरूँ । भला ऐसा कभी हुआ है ?
राखी
के एक दिन पहले शाम को बादल घिरे हुए थे मैं उदास बैठी गाँव को याद कर रही थी और
सोच रही थी कि क्या सचमुच जीजी नहीं जाएंगी भैया के घर तभी फोन की घंटी बजी ।मैंने
लपककर फोन उठाया --
“हैलो!”
“जीजी !” पुलक और उदासी के बीच झूलते
हुए मैंने कहा ।
“तैयारी होगई वसु ?”
जीजी की आवाज मुझे सुबह की तरह सुरीली और खनकती हुई लगी फिर भी पूछा --“कहाँ की ?”
“य़े लो ..आशू के यहाँ नहीं जाएगी ?”
“तुम तो नहीं न जा रही । मैं अकेली जाती क्या अच्छी लगूँगी ?”
“अरे ,चल रही हूँ न ?
जीजी की आवाज सुनकर मैंने उनके चेहरे की कल्पना की । किसी बच्चे की तरह उल्लास से
भरी आँखें ।
“मैने रातभर सोचा कि मैं नहीं जाऊँगी तो तू भी नहीं जाएगी । तो तुझे दुख
होगा । मुझे भी होगा । उधर आशू को भी बहुत बुरा लगेगा कि राखी बाँधने एक भी बहिन
नहीं आई । सुजाता भी बुरा मानेगी । वह बुलाए या न बुलाए पर जानती है कि हम आशू को राखी
बाँधने ज़रूर पहुँचती हैं । हमारे कारण ही तो वह अपने मायके शाम को या दूसरे दिन
जाती है ।
ये
जीजी भी न ..कुछ खीज और आश्चर्य से मैं सोच रही थी कि शेष सारी बातें बादलों ने
गड़गड़हट और बौछारों के साथ कीं और मैं सिर से पाँव तक भीग गई ।
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