सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

अपने-अपने कारावास

अपने-अपने कारावास
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वह आज फिर मिली ।
वैसे एक ही शहर में रह कर ऐसी मुलाकातें न तो विस्मयकारी होतीं हैं न ही विशेष । रोज तमाम परिचित मिलते हैं । उसी तरह वह भी जब-तब मिल जाती है और जबकि उसके साथ प्रायः एक सी ही बातें होतीं हैं ,उसका मिलना कुछ उबाऊ होना चाहिये लेकिन मुझे देख कर उसकी आँखों में ,चेहरे पर जो बात दिखती है वह मुझे निरपेक्ष नही रहने देती और मैं उल्लास व अवसाद दोनों से एक साथ भर जाता हूँ । जिस तरह दबाकर रखा गया तिलचट्टा जरा साँस मिलने पर रेंगने लगता है ,कई स्मृतियाँ दिमाग में रेंग उठतीं हैं । मन के एक कोने में में अनायास ही एक खालीपन समा जाता है ,भर उठने को व्यग्र । बीते बीस साल एक साथ मेरे सामने आ खडे होते हैं ।
वह यों तो मेरे दोस्त की बहन होने के नाते मुझे भैया कहती है पर मुझे हमेशा ही लगता रहा है कि यह शब्द बहुत ही छोटा और अनावश्यक है । किसी युवती के साथ उसकी सुरक्षार्थ चलते हुए आठ-दस साल के 'मर्द' जैसा । पर वह खुद को सहज व सुरक्षित अनुभव करने के लिये ही शायद इसे आवश्यक मानती है ।
मंजू..हाँ यही नाम है उसका । मंजू से मेरा पहला परिचय उसी के घर आयोजित एक 'शाम--गज़ल' के दौरान हुआ था । यह लगभग बीस साल पहले की बात है । मैं और राघव बहुत अच्छे दोस्त थे । हमारी दोस्ती का कारण मेरा गाना और बजाना था । राघव को गाना तो नही आता था ,पर गायन की जो समझ थी कि किस राग में कहाँ कौनसा कोमल और कहाँ शुद्ध स्वर लगना है ...वह साधारण बात नही थी । उसे अनेक रागों की खासी जानकारी थी । और सुनने का तो उसे शौक था ही । उसने परवीन सुल्तान ,प्रभा अत्रे, पं. जसराज ,पं. भीमसेन जोशी जैसे बडे कलाकारों के कैसेट्स जमा कर रखे थे जिन्हें वह हर खास मेहमान के सामने जरूर बजाता था । एक दिन मुझे भी सुनाए । मैं उसकी रुचि का कायल होगया । वह मेरा गाना तो पहले ही सुन चुका था । इस तरह हम दोस्त बन गए । हमारी पाँच-छः लडकों की टीम थी जिनमें हारमोनियम ,तबला, ढोलक ,मंजीरे ,चिमटा आदि बजाने वाले और गाने वाले थे । सभी हमउम्र ही थे । बीस-बाईस के आसपास के ।
राघव अपने घर जब चाहे गीत-गज़ल का कार्यक्रम रख देता था । ऐसे आयोजन उसके लिये मनोरंजन ही नही शान-शौकत की बात भी होते थे । रात भर तबले की थाप के साथ ताली या चुटकी बजाना ,झूमना और गाढी मलाईदार चाय के प्यालों के साथ संगीत का आनन्द लेना उसका हास-विलास था । हमें क्या ऐतराज होता ! उन दिनों हम सभी तो बेरोजगार थे । परिवार की जिम्मेदारियों ने अभी तक जकडा नही था सो गाने-बजाने के दौरान चाय सिगरेट के साथ जो कुछ इनाम के साथ प्रशंसा व सम्मान भी मिलता वही सन्तोषप्रद था । सच पूछा जाए तो वह सबसे बडा आनन्द था । जब भी ,जहाँ भी मौका मिलता हम लोग गाने-बजाने बैठ जाते थे । रात भर गाते और सुबह चाय पीकर अपने-अपने घर चले जाते ।
वह ऐसी ही एक शाम थी । मैं राघव की फरमाइश पर गुलामअली साहब की गाई मशहूर गज़ल, "रोया करेंगे आप भी पहरों मेरी तरह.." गा रहा था । गाते-गाते मेरी नजर अनायास ही खिडकी की ओर चली जाती थी जहाँ दो आँखें तन्मयता से मुझे गाते हुए देख रहीं थीं । वह एक साँवली और दुबली-पतली सी लडकी थी । उसकी तन्मयता में अजीब सा आकर्षण था । सुबह मौका पाते ही वह मेरे पास आई ।रातभर हारमोनियम और ढोलक बजाते-बजाते मैं काफी थक गया था और राघव की बैठक में जो एक खिडकी द्वारा घर के आँगन से जुडी थी, आराम करने के लिये रह गया था । एक अनजान लडकी को इस तरह अपने पास आया देख मैं हडबडा कर उठ बैठा । वह बिना किसी उलझन के मेरे सामने बैठ गई और कुछ झिझकते हुए बोली---"कितना अच्छा गाते हैं आप । भैया से आपकी तारीफ तो बहुत सुनी थी पर अब लग रहा है कि वह बहुत कम थी ।"
"अच्छा !!"---मेरा रोम-रोम पुलक से भर गया । अपने गायन की प्रशंसा तो मैं अक्सर सुनता रहता था । कहा भी गया है कि जहाँ वृक्ष नही होते वहाँ अरण्ड ही वृक्ष की तरह सम्माननीय होता है । लेकिन प्रशंसा का जो भाव मैंने मंजू की आँखों में देखा वह अपूर्व था । एक कलाकार के लिये उसकी कला ही उसकी आत्मा होती है पर मेरे लिये कला प्रशंसा सम्मान और स्नेह पाने का साधन भी है । दूसरी कलाएं दूसरे भावों के साथ चल सकती हैं पर संगीत प्रेम संवेदना व भक्ति के बिना नही चलता ऐसा मैं मानता हूँ । मुझे यह देख कर बडा विस्मय व आनन्द हुआ कि उसकी क्षितिज के पार देखतीं सी आँखें जिज्ञासा व लालसा से भरीं थीं । बहुत कुछ करने व पाने की जिज्ञासा । वह पास ही बैठ गई और जैसा कि मुझे अनुमान था वह बोली---
"नरेश भैया ,मुझे आप हारमोनियम सिखा देंगे ? जैसा आप बजाते हैं ।"
"अरे मैं क्या , बहन जी ! आप कोशिश करेंगी तो इससे भी अच्छा सीख जाएंगी ।"मैंने विनम्रता से कहा । राघव भले ही मेरा दोस्त था पर मैं अपनी सीमाओं को जानता था । पर वह उत्साहित होकर बोली---
"तो फिर पक्का..? और यह आप मुझे आप और बहन जी क्यों कह रहे हैं । मैं तो राघव भैया की छोटी बहन हूँ वैसी ही आपकी भी हूँ । आप मुझे नाम से ही पुकारें ।"
"हाँ ठीक है । लेकिन मुझे यह तो पता चले कि तुम्हारा नाम है क्या ।"
"अरे मंजू, तू यहाँ है ? फिर चाय कौन बना रहा है ?"--राघव अचानक आकर उससे बोला तब मुझे पता चला कि उसका नाम मंजू है ।
"और नरेश यार !---राघव फिर मेरी ओर घूमा----" तू इसे यह सब छोड ,सुनील का समाधान कर । वह क्या पूछना चाह रहा है ।"---मुझे जाने क्यों महसूस हुआ कि राघव शीशे के पार से बोल रहा है ।
भाई को देख वह हडबडा कर चली गई पर थोडी ही देर में वापस आई मेरे लिये अलग से गिलास में चाय लाई ।
"हाँ अब बताओ नरेश भैया , मुझे कबसे और कैसे सिखाओगे हारमोनियम बजाना और गाना भी ।"
"सचमुच सीखना है??"
"और नही तो क्या ऐसे ही कह रही हूँ ।"
"ठीक है फिर सबसे पहले तो यह देखना होगा कि तुम्हें सुर की पकड है कि नही । जरा कुछ गाकर सुनाओ । फिर सोचेंगे ।" मैंने गुरुता के भाव से कहा ।
कुछ ना नुकर करने व शरमाने के बाद उसने -मेघा रे मेघा...गाया । मुझे खुशी हुई कि उसे न केवल सुर समझ है बल्कि आवाज भी अच्छी है ।
"मंजू , यह तो तय है कि तुम गाना व बजाना ,दोनों ही जल्दी सीख जाओगी बस थोडी मेहनत व लगन की जरूरत है ।"
मेरी बात पर वह बच्चों की तरह उत्साहित हो उठी । बोली ----
"देखो भैया ,कहे देती हूँ , आपको तब तक छुटकारा नही मिलेगा जब तक आप मुझे हारमोनियम नही सिखा देते ।" मेरा रोम-रोम जैसे झंकृत हो उठा । एक जिज्ञासु लडकी के आत्मीय आग्रह ने मुझे मेरी नजर में बडा बना दिया । बडा और ऊँचा । कला के प्रति रुझान होना किसी वरदान से कम नही होता । क्योंकि कला ही है जो जीवन की ऊबड-खाबड ,पथरीली और कंटीली राहों को सुगम और आनन्दमय बनाती है । आनन्द का अनुभव जितना एक कलाकार या रचनाकार कर सकता है कोई कुबेर नही कर सकता । अगर मैं किसी की कला-साधना में सहयोग कर सकूँ बडी बात होगी मेरे लिये । मैंने राघव को मंजू की इच्छा के बारे में बताया तो वह हँस पडा । मैंने उस हँसी का कोई मतलब नही निकाला और एक दिन जब मुझे अनायास ही एक सेकण्ड-हैंड लेकिन बहुत अच्छा हारमोनियम मिल गया तो मुझे मंजू का ध्यान आया और खरीद भी लिया । मैंने राघव से कहा कि वह इसे मंजू के लिये ले जाए । पर राघव ने हँसते हुए मेरी पीठ पर एक धौल जमाया और उपहास के स्वर में बोला----"तू भी नरेश....खूब है यार, मंजू ने कहा और तूने मान भी लिया ?"
"तो क्या हुआ । इसमें गलत भी क्या है ?"
"सवाल अच्छे--बुरे का नही जरूरत का है नरेश "---मेरी बात पर राघव गंभीर होकर बोला---- "सम्हालनी तो उसे गृहस्थी ही है । क्या करेगी गिटार--बाजा सीख कर । दूसरे घर जाएगी और वहाँ अगर किसी को यह सब पसन्द नही हुआ तो बेकार ही रहेगा न । अभी तो जरूरत है कि घर के काम सीखले ।"
"उसे भी अपने शौक पूरा करने का हक है यार । क्या दोनों काम साथ--साथ नही किये जा सकते ?"---मुझे राघव के तर्क बेबुनियाद लगे इसलिये मैंने प्रतिवाद किया । लेकिन राघव के तेवर अचानक बदल गए । बोला--"देख नरेश हक--नाहक तू मुझे मत सिखा । मुझे पता है कि क्या सही है और क्या गलत है । तू बेकार अपनी नाक क्यों घुसेडता है भाई । हारमोनियम खरीदने से पहले मुझसे पूछना भी जरूरी नही समझा ।"
लेकिन उसे जल्दी ही अपनी कटुता का अहसास होगया सो थोडी देर बाद कुछ नरम पडते हुए कहने लगा---"बुरा मत मानना यार, दरअसल मैं मानता हूँ कि उसे बिल्कुल अनजान लोगों से एडजस्ट करना पडेगा । अगर अभी से वह अपनी रुचि--अरुचि को महत्त्व देने लगी तो मुश्किल होगी ।"
राघव की इस समझ पर मुझे बडी कोफ्त हुई । मंजू ल़डकी है तो उसे अपने शौक व रुचियों का ख्याल रखने का अधिकार नही । क्या बेहूदा बात है ! लेकिन मुझे जाने क्यों ऐसा लगा कि वह जानबूझ कर मुझे मंजू से दूर रखना चाहता था । क्या यह एक भाई की अपनी बहन के प्रति सजगता थी ? या कुछ और...। खैर , जो भी हो ,मैंने चुपचाप अपने आपको वहाँ से हटा लिया । यही उचित भी था और आवश्यक भी । मैं उस उच्चकुल के ब्राह्मण परिवार के घर में रात-रात भर गा तो सकता था पर उसकी बराबरी की सोच भी नही सकता था । वर्ग भेद में काफी निचले पायदान पर था (हूँ)। मेरे ऊपर परिवार का भार था और मेरा ध्यान सिर्फ जीविका के साधन तलाशने में था । राघव या राघव की बहन मुझे भाव देते हैं या नही,क्या फर्क पडता है । इधर मेरा सम्पर्क एक-दो संगीत प्रेमियों से हुआ जो मुझे तानसेन समारोह के दौरान ग्वालियर में मिले थे । तानसेन नगरी ग्वालियर साहित्य व संगीत का गढ रहा है । उनकी सलाह पर मैं ग्वालियर आगया । और दूसरे साथियों की तरह भाग्य को जगाने हाथ-पाँव मारने लगा ।
कुछ महीनों बाद पता चला कि मंजू की शादी होगई है । राघव का पत्र मिला तो था पर मैं गया नही । मुझे कुछ काम भी था और खास आग्रह करके मुझे बुलाया भी नही गया था ।
मेरे दोस्त ने बताया कि अच्छा खाता-पीता घर है ,खानदानी लोग हैं और लडके का तो क्या कहना । सुन्दर कमाऊ. व्यवहार--कुशल.। मंजू की किस्मत अच्छी है।
"हाँ अच्छी ही तो है ।"--मैंने इतना ही कहा साथ ही विचार आया कि एक लडकी के भाग्य का ,उसकी खुशियों का निर्धारण सिर्फ इस बात से होजाता है कि उसका विवाह सम्पन्न व खानदानी परिवार में होजाय । कितनी साधारण सी लगने वाली असाधारण बात है । मुझे उसके विवाह की बात ठीक नही लगी । उसकी उम्र अभी पढने सीखने व परिपक्व होने की है । उसमें जो सीखने की लालसा ,संगीत के लिये एक आकर्षण दिखा था वह अलग है विशिष्ट है । विवाह के बाद मंजू को न गाना याद रहेगा न बजाना । विवाह के बाद पति का स्नेह, परिवार बच्चे ,गृहस्थी ..। ऐसी महिलाएं बहुत ज्यादा नही (गाँव-कस्बों में तो बिल्कुल नही) है जो विवाह के बाद परिवार से परे अपने लिये भी कुछ सोचतीं ,करतीं हों । मंजू कोई अलग तो नही । फिर मैं भला कौन होता था जो उसके लिये इतना सोचता ।
मैं धीरे-धीरे मंजू की उस हारमोनियम वाली बात को लगभग भूल ही गया ।
पर एक दिन जब मैं एक स्टोर से अपना छोटा-मोटा सामान खरीद रहा था उसने एकदम पीछे आकर सुरमय तरीके से "नरेश भैयाsss" कह कर मुझे चौंका दिया ।
सचमुच चौंकने वाली बात थी । इसीलिये नही कि उसने अब सलवार-कुरता की बजाए जामुनी रंग की साडी पहन रखी थी , हाथों में चूडियाँ और माँग में सिन्दूर दिपदिपा रहा था , चेहरे पर उल्लास की चमक थी ,बल्कि वह भरे बाजार में मुझसे ऐसे बात कर रही थी मानो मैं उसका कोई बहुत खास अपना हूँ ।
"अरे मंजू , शादी के बाद कितनी बदल गई हो ।"
"तुम तो आए नही ।" वह रूठने के स्वर में बोली --"मुझे लगा था कि जरूर आओगे ।"
"क्या करता आकर !" मेरे लहजे में पहले कुछ धुन्ध सी थी पर वह अचानक मेरे चारों ओर धूप सी बिखर गई---"क्या करता आकर !! यह क्या बात हुई भला ! और मुझे गाना -बजाना सिखाने का वादा किसने किया था भूल गए ?"
"मंजू अब बात दूसरी है । अब तुम्हारी..."
"शादी होचुकी है । यही न ! चाहे जो हो पर मैं अपना शौक तो पूरा करूँगी ही । और उसे तुम पूरा कराओगे ,समझे !"
आसपास गुजरने वाले लोग हमें देख रहे थे पर मंजू का ध्यान केवल मुझ पर था । उसके उन अधिकारपूर्ण शब्दों ने मुझे भी अभिभूत कर दिया । बोला ---"चलो अब किसी दिन आ जाऊँगा तुम पता बताओ कहाँ रहती हो ।"
"वह पटेल पैट्रोल-पम्प है न ,उसके बाजू में शास्त्री गली है उसी में ....."
"अरे ,यहाँ कहाँ खडी है तू ?" मंजू की बात पूरी होती इससे पहले अकडता हुआ एक संजय दत्त टाइप युवक आया । मंजू के संकेत से मैं समझ गया कि यह उसका पति है प्रसून ..प्रसून तिवारी । चिट्ठी में यही नाम तो था । मैंने अभिवादन किया तो मंजू ने बताया कि ये नरेश भैया हैं । राघव भैया के अच्छे दोस्त ।
"अच्छा , चलें ।" प्रसून ने मशीनी ढंग से मुझसे हाथ मिलाया और उसी लहजे में घर आने की कह कर औपचारिकता पूरी की और मंजू को लेकर आगे निकल गया । मैं ऐसे ही कुछ देर उधर देखने लगा तब मुझे हल्का सा अहसास हुआ कि मंजू ने जरा सा मुड कर भी देखा था । उसकी बातें दिमाग में घूमने लगीं । मन, जाने किन कार्य-व्यापारों में अपनी अलग राह खोज लेता है । और किसी को खबर तक नही होती । ऐसी ही किसी राह से होता हुआ एक दिन मैंने मंजू का घर तलाश लिया । दरवाजा खोला उसके पति ने । आँखों में हल्का सा परिचय-भाव लाकर बोला---अरे भई आप ,इधर कहाँ ?"
"बस ऐसे ही....जरा ."
"बस ऐसे ही तो हो नही सकता । अन्दर आओ न !" उसने कहा और मुझे बैठक में बिठा कर अन्दर चला गया । मैं काफी देर तक इन्तजार करता रहा । न प्रसून आया न मंजू । हाँ एक अधेड महिला चाय और नमकीन बिस्किट रख गई । मैं सिर्फ चाय के घूँट भरता हुआ मंजू के आने का इन्तजार करता रहा । काफी देर बाद वह प्रसून के साथ आई । उसका सपाट चेहरा था । मुस्कराई भी तो बडी कंजूसी से ।
"नरेश भैया , आने की खबर भेज देते तो ठीक रहता । अभी तो मुझे इनके साथ दीदी के यहाँ जाना है।" उसका लहजा एकदम बदला हुआ था ।
"चलो कोई बात नही । मैं तो ऐसे ही इधर से निकल रहा था .." मैंने भी एकदम सहज भाव से कह दिया पर सच कहूँ उस दिन मैं स्वयं को बहुत असहज अनुभव करता रहा । अपनी जडों से दूर नही जा पाना कितना दुष्कर होता है । देखा जाए तो राघव के साथ भी मैं केवल एक गवैया ही रहा । दस-दस रुपयों के लिये रात भर ढोलक पीटने या हारमोनियम पर गीत-गज़ल गाने वाला गवैया । घरेलू तौर पर उन लोगों के बीच मेरी कोई हैसियत नही रही । यहाँ भी तो ऐसा ही कुछ भाव रहा होगा था वरना मेरी जगह राघव होता तो क्या उसे ऐसे ही लौटा देती मंजू ! मैंने तय कर लिया कि अब मैं उन लोगों से सम्पर्क नही रखूँगा जिनके सामने किसी भी स्तर पर छोटा हो जाने का अहसास हो ।
फिर मैं अनारक्षित यात्रा करती सी जिन्दगी के लिये कहीं पाँव रखने की जगह बनाने में व्यस्त होगया । वैसे भी मंजू के साथ ऐसा कोई ऐसा जुडाव तो था नही कि संघर्ष के दिनों में उसे याद करके कुछ राहत पाता । कस्बा की सँकरी सडकों से चल कर महानगर के चौराहों तक पहुँचने में मुझे कडी प्रतिस्पर्धाओं व अवरोधों का सामना करना पडा । मेरी इच्छा विधिवत् शास्त्रीय संगीत सीखने की थी । यों सुन-सुन कर में कई रागों की बन्दिशें गा लेता था पर यह कोई शिक्षा हुई ! मुझे ऐसा कोई गुरु नही मिला जो छुपी कला के बन्द दरवाजों को खोलता । या यों कहूँ कि मैं तलाशने में असफल रहा ।यह भी कह सकता हूँ कि मुझे सिखाने कोई तैयार ही नही हुआ । संगीतकला जिनके अधिकार में थी वे मुझ जैसे पिछडे गरीब को देखते तक नही थे शिष्य बनाना तो दूर की बात थी ।
लेकिन कला चाहे जैसी व जितनी हो कहीं न कहीं काम तो आती ही है । मेरी आवाज के प्रशंसक तो पहले से ही बनते जा रहे थे ,पर सितार, वायलिन व तबला-वादन की कला ने भी लोगों को खींचना शुरु किया ,जो पूरी तरह मेरे अभ्यास का परिणाम थी । कुछ वंशानुगत प्रभाव भी था । मेरे पिताजी को राग ,स्वर लय व ताल का काफी गहरा ज्ञान था । जमींदारों-जागीरदारों के ठिकानों से उन्हें गाने के लिये बुलावा आता रहता था । खैर वह सब अलग से बताने का विषय है । तो हुआ यह कि पहले जिन एक दो बच्चों को मैंने सितार व गिटार बजाना तथा गाना सिखाया उन्होंने मुझे आसपास एकदम प्रसिद्ध कर दिया । जैसे कोलावेरी ने धनुष का नाम बच्चे-बच्चे तक पहुँचा दिया । वास्तव में विद्वान व कलादक्ष होना अलग बात है और किसी को सिखाने में सिद्धहस्त होना दूसरी बात । इसे कोरी आत्म प्रशंसा न समझें पर मुझे सिखाने का बेहतर तरीका मालूम है । सीखने वाले को तो सबसे पहले यही चाहिये न । सो मेरा विस्तार होना शुरु हुआ । दो साल में मेरी तीन संगीत-शालाएं होगईँ । मेरे पाँव संगीत प्रेमियों के बीच जमने लगे थे । शहर में मेरा सम्मान बढने लगा । मेरा विवाह तो छुटपन में ही होगया था । अब दो बच्चे भी थे । कुल मिला कर चार--पाँच साल में मैं लगभग स्थापित होगया था । मेरे कार्यक्रम भी होने लगे । और होने ही नही काफी लेकप्रिय भी होगए । मकान अभी भी किराए का ही था लेकिन बडा और सुविधायुक्त था । एरिया भी अच्छा था । अब मैं तीन-चार दोस्तों के साथ आराम से संगीत की महफिल जमा सकता था लेकिन मेरे वे लोग ,तो जो मुझे कभी अपना अभिन्न साथी बना कर रखते थे ,अब लगभग छूट गए थे । कभी मिलते भी तो उनके लहजे में अपनापन कम औपचारिकता अधिक होती थी । उनकी प्रशंसा में भी एक टीस होती थी । शायद इसलिये कि अब उनके कार्यक्रमों में चाय-चिलम के सहारे लिये रात-रात भर गा-बजा कर जागने वाला नरेश नही था । किसी गज़ल की तारीफ में मिले चन्द रुपयों को माथे से लगाकर लेने वाला नरेश नही था । बल्कि तीन-तीन संगीत शालाओं का संचालन करने वाला ,अनेक शिष्यों में सम्मानित नरेश नायक था ।
जब हम निम्नता की स्थिति व अभावों को परास्त कर सही सलामत खडे होते हैं तब सच्चे मित्रों तथा स्नेह के नाम पर अक्सर अकेले हो जाते हैं । तंगी के दिनों में हम पर तरस खाने वाले हमारे कथित अपने शायद हमारी सफलता से हैरान होते हें । दाँतों तले उँगली दबा लेते हैं ,कभी-कभी इतने जोर से कि पीडा के मारे उन्हें बेचैनी होने लगती है । अपनत्व की सही कसौटी दुख से कही अधिक सुख में होती है । लोग दुख में दुखी तो हो ही जाते हैं लेकिन जो हमारी खुशियों से सचमुच खुश होता है वही सच्चा अपना होता है । खैर ..मैं लगभग सब कुछ भूल चुका था लेकिन मेरी यादों में एक नाम अब भी जुगनू की तरह चमकता था जो घुप अँधेरे में अचानक भोलेपन के साथ पूछ उठता ---नरेश भैया मुझे हारमोनियम सिखाओगे । लेकिन वह था जुगनू ही, चाँद या सूरज नही ..। कुछ चमक कर वह विलुप्त हो ही जाता था । इसलिये मैं उस जुगनू की ओर से ध्यान हटा ही रहा था कि  मंजू ने फिर मुझे चौंका दिया था । 
यह दो साल पहले की बात है । मैं गान्धी मार्केट में अपने लिये एक सूट खरीदने आया था कि वही चिर-परिचित सी पुकार सुनी ---"अरे नरेश भैया !"
मैंने चौंक कर देखा । कुछ समझ पाता तब तक तो वह पास आगई । उसमें काफी बदलाव आगया था । कमजोर होने के साथ चेहरा कुछ बेनूर सा लग रहा था । कपडे भी कुछ विपन्नता सी दर्शा रहे थे और सबसे बडी बात यह कि न उसकी माँग में सिन्दूर था न माथे पर बिन्दी । और सुदूर विजयपुर की बजाए मंजू ग्वालियर में थी । सब कुछ अप्रत्याशित था इसलिये एकाएक तो पहचान पाने का प्रश्न ही नही था ।
"भूल गए ?"--उसका स्वर अपेक्षाकृत कुछ धीमा था ।
"अरे मंजू ,तुम यहाँ कैसे ? मैंने पास जाकर धीरे से कहा । साथ ही मैंने लक्ष्य किया कि गुमसुम खडे पेडों के पत्ते अब हिलने लगे थे । पर उसकी वेश-भूषा देख मैंने गंभीरता बनाए रखी ।
"मुझे तुम्हारा कोई समाचार नही मिला । बताओ ,यह सब कैसे क्या हुआ ।"
दो साल पहले की बात है एक दुर्घटना में...।
बुरा हुआ ..खैर यहाँ कबसे हो ।
मैं तो यहाँ साल भर से हूँ । बच्चों की पढाई के लिये रह रही हूँ । विजयपुर तो गाँव जैसा ही है । वहाँ अच्छी पढाई की भी व्यवस्था नहीं है ।
"तो कैसे कहाँ रह रही हो ?" कोई परेशानी हो, जरूरत हो तो बताना.."
"यहाँ जीवाजीगंज में मेरी बुआ रहतीं हैं न । उन्होंने ही मुझे एक कमरा दे दिया है ।"
"चलो ,यह तो अच्छा ही हुआ । मंजू अब बन्धनों से मुक्त है ।" मैंने सोचा । दरअसल मुझे इतना तो पता चल गया था कि मंजू को उसका पति बहुत ही कठोर बर्ताव करता था । दबाब इतना कि खुल कर साँस भी न ले सके कोई ।
पर अगले ही पल मुझे अपनी सोच पर शर्म आई । कुछ पल निःशब्द सा खडा रहा ।
"अच्छा ,यह तो बताओ ,भाभी कैसीं हैं और तुम्हारे बच्चे क्या कर रहे हैं ?
"कभी घर आकर देखो न !"
"वह तो आऊँगी ही । मैं भूली नही हूँ कि मुझे कुछ सीखना है ।"
"अभी तक सीखने की तमन्ना बनी हुई है ।"
"क्यों सीखने की कोई उम्र होती है क्या ! बस अभी थोडे दिन की ही कुछ समस्याएं हैं । अभ्यास में रुकावटें आएंगी इसलिये...लेकिन सीखूँगी जरूर ।"
वह चलने लगी तो मैंने उसके घर का पता पूछा पर वह टाल गई । बोली--"अरे तुम क्यों परेशान होते हो । समय मिलते ही मैं खुद ही आजाऊँगी । मुझे अपना फोन नं. दे दो ।"
उस दिन मेरा रोम- रोम पतंग बन कर जैसे आसमान में उडता रहा । रात भर नींद नही आई । कोई हम पर इतना विश्वास करता है इतना मान देता है, वह कोई साधारण बात नही है । मुझे देख कर मंजू के चेहरे पर जो उल्लास दिखा ,आँखों में जो खुशी की चमक आई उसने मुझे अपने अन्दर बहुत कुछ होने का अहसास कराया । मंजू में कुछ सीखने की कितनी लालसा है । जीने का कैसा उत्साह है । तीस को छूने करने जारही उस लडकी ( मेरे लिये वह लडकी ही है ) में बच्चों जैसी पुलक है । मैं तमाम लडके- लडकियों को सिखा रहा था पर उनमें कोई भी 'मंजू' नही था । मेरी कक्षा जैसे मंजू के बिना अधूरी है । सीखने वाले में जिज्ञासा व उत्साह हो तो सिखाने का आनन्द अलग ही होता है ।
मैं यह मानता हूँ कि जीवन की विसंगतियों ,दुखों और पीडाओं को भुलाने में वैसे तो हर कला सहायक होती है लेकिन संगीत कला से बडी कोई कला नही । मैंने एक बार फिर निश्चय किया कि मैं मंजू की संगीत लालसा को पूरी करने में यथासंभव सहायता करूँगा ।
इसी अहसास के चलते मैं एक दिन बाजार से गुजरते हुए जीवाजीगंज पहुँच गया । अच्छा हुआ कि मुझे मंजू दरवाजे पर ही खडी दिख गई । हालाँकि प्रसून और उसके साथ-साथ मंजू ने भी अपने घर पर जो उपेक्षा दिखाई थी वह मेरे पाँव बाँधने के लिये काफी थी लेकिन अब तो मंजू स्वतन्त्र है । होनी भी चाहिये । इसलिये में मैं निर्विकार भाव से उल्लसित हुआ उसके पास गया । लेकिन मेरी आशा के विपरीत मंजू के चेहरे पर अब भी असमंजस के भाव थे । पता नही वह क्या है जो अचानक उसके और मेरे बीच आजाता है किसी शक्की और खूसट आदमी की तरह । तब तो हो सकता है कि उसे पति की नाराजी का डर हो लेकिन यहाँ अब क्या था । मैं हैरान हुआ खडा था ।
"अन्दर आने को नही कहोगी ।"
"आजाओ.." वह सपाट लहजे में बोलती हुई चली गई । मैं पीछे चला गया । घर में शायद कोई नहीं था
"कहो इधर कैसे आना हुआ ? घर भी खूब मिल गया ।-"-वह कुर्सी पर रखे कपडों को अलमारी में रखते हुए बोली ।
"मिलता कैसे नही ! जहाँ चाह होती है वहीं राह होती है ।" --मेरी बात पर उसने कोई प्रतिक्रिया नही दी मैंने हँसकर कहा --"अरे बाबा ,यूँ ही किसी काम से आया था । यहाँ से गुजर रहा था कि तुम दिख गईँ ।"
"रोहित मोहित स्कूल गए हैं । तुम बैठो मैं चाय बनाती हूँ ।" उसने ऐसे कहा मानो मैं उससे नही रोहित मोहित से मिलने आया हूँ ।
"रहने दो-"---मैं कहना चाहता था पर वह चली गई । वास्तव में चाय पीने की मेरी कतई इच्छा नही थी । मैं सिर्फ मंजू से कुछ देर बात करके चला ही जाता । चाय उसने एक ही कप बनाई थी ।
"सिर्फ मेरे लिये तकलीफ करने की क्या जरूरत थी ।"
" इसमें तकलीफ की क्या बात है । मैंने कुछ ही पहले चाय पी है । ज्यादा चाय नही पीती ।"
मुझे चाय देकर वह फिर रसोई में चली गई जैसे कि वहाँ बहुत सारा काम करने पडा हो ।
"मंजू कुछ बात करनी थी इसलिये..."मैंने कहा तो वह बैठक में आगई ।
"बोलो"---उसने सपाट लहजे में कहा और अलमारी में जमी किताबों को फिर से जमाने लगी । अखबार एक से करने लगी । मेजपोश बदल दिया । फिर एक पत्रिका पलटने लगी । मुझे लगा कि मैं एक बिल्कुल अजनबी महिला के सामने फालतू ही बैठा हूँ । अब इस पर किसका नियन्त्रण है । किसकी चिन्ता है । कौनसे कारावास में है ।
"शायद मेरे आने से तुम्हें असुविधा हो रही है मंजू । "
"किसे ? मुझे ? नही तो----वह बनावटी आश्चर्य के साथ बोली ।
"अरे भई हाथ कंगन को आरसी क्या । मैं बेहतर महसूस कर सकता हूँ ।--मैं उठते हुए बोला मैं चलता हूँ ।"
"..नही....ऐसी तो कोई बात नही । बस यों ही सिर में दर्द है ।" वह जैसे मेरे जाने का इन्तजार कर रही थी । चलने से पहले मैंने अपना आने का उद्धेश्य बता ही दिया ।
"देखो मंजू आकाशवाणी में भजनों की रिकार्डिंग होनी है । इसमें नाम भी है और दाम भी । तुम्हारी पसन्द का काम भी है । तुम्हें कर लेना चाहिये । ऐसे मौके बार-बार नही आते । और एक बार शुरु कर दिया तो बार बार आते हैं ।"
"अरे भाई , क्यों मुर्दों को जिन्दा करने की कोशिश कर रहे हो । सच्ची कहती हूँ मुझसे नही होगा अब ।"
मंजू ने यह निराशावश कहा था या मुझे टालने भर का बहाना था ,उस समय मैं यह नही समझ पाया । लेकिन बाद में इतना जरूर समझ गया कि मंजू भी आखिर है तो राघव की ही बहिन न ।उच्चवर्ग के अहंकार से भरी । अहंकार व संवेदना का क्या साथ । और बिना संवेदना के कला कैसी । संगीत इनका हास-विलास होसकता है । तपस्या नही ।
मैंने मंजू का ख्याल छोड देना चाहा पूरी तरह । काश ऐसा हो पाता ।
कुछ दिन बाद ही जब मैं गालव सभागार से लौट रहा था कि मंजू ने अचानक सामने आकर मेरा रास्ता ही रोक लिया ।
"कबसे तलाश रही हूँ तुम्हें ।"--वह शिकायती लहजे में बोली मानो न मिलना मेरी गलती हो ।
"क्यों तलाश रही थीं ।"-मैंने निरपेक्षता से कहा ।
क्यों ,क्या । मन कह रहा था बस और हाँ वो हारमोनियम के बारे में भी तो पूछना था ?--वह अप्रत्याशित सी विकलता के साथ बोली तो मैं हतप्रभ रह गया । यह क्या किसी नाटक का सीन है जो बार-बार बदलना पडता है प्रसंगानुसार..। आज इतनी मुखरता और उस दिन इसके घर में ...वह क्या था । मैं तो खुद ही कहने गया था इस विषय में । मंजू ने मुझे समझ क्या रखा है ? क्या मैं यों ही चप्पल चटकाता फिरता हूँ ?" 
  ईश्वर की कृपा से अब मेरी भी एक इमेज है शहर में ।
"मंजू तुम बेकार ही अपने लिये गलतफहमी पाले हो । तुमसे नही होगा । सचमुच ।"
मेरी बात पर वह संजीदा होगई---"जानती हूँ तुम नाराज हो । नाराजी की बात भी है । पर कुछ हालात...खैर छोडो गुजरी बात को ..." अब देखना कुछ दिन बाद ही मैं फ्री हो जाऊँगी । हाँ अपना पता और फोन नं. लिखवा दो ।"
"पहले भी तो लिया था तुमने पता भी और फोन नं. भी ।"
"तो क्या फिर से देने का कोई नियम नही है क्या ? कहीं रख कर भूल गई तभी तो तुमसे सम्पर्क नही कर पाई । अब करूँगी न ।"
उस दिन मैं सचमुच एक भँवर में फँसा अनुभव कर रहा था । अब तक समझ में नही आया था कि मंजू आखिर चाहती क्या है शायद वह खुद भी नही जानती । उपलब्धियों का रास्ता टेढा-मेढा होता है । वह नही समझती कि जब तक आप किसी मोड तक नही जाते ,आगे का रास्ता नही दिखेगा । अरे सीखना ही है तो फिर सारी बातें भूल कर सीखने में पूरा ध्यान लगादो और नही तो फिर अपने साथ-साथ दूसरों को भी भ्रमित मत करो । अगर आप घेरों में नही रहना चाहते तो उन्हें तोड डालो वरना उनमें रहने के अभ्यस्त हो जाओ । लेकिन यह सोचनीय स्थिति है कि आप घेरे तोड भी नही सकते पर उन्हें कोसते रहते हैं । बीच का रास्ता अच्छा नही होता ।
इसके बाद काफी समय से मेरी मंजू से भेंट नही हुई । 
कई साल यूँ ही गुजर गए । हाँ उसका ख्याल आता रहता कि अब तो उसके दोनों बच्चे बडे होगए होंगे । अब उसका वह सीखने वाला बचपना भी चला गया होगा ।
मैं उसके खयालों से अलग अब मुक्ति का अनुभव करना चाहता हूँ लेकिन कहाँ !.कैसी मुक्ति !!
आज ही मैं दो-तीन मित्रों के साथ पान की दुकान पर बैठा एक कार्यक्रम की योजना पर विचार-विमर्श कर रहा था तभी वह दिखी । थकी-बुझी सी । सब्जी व सामान की थैलियों से लदी-फदी । चेहरा पसीने से तर था फिर भी उबाल कर निचोडी गई भाजी जैसा नीरस । रूखे कमजोर से बाल माथे पर बिखर कर चेहरे को और भी विद्रूप बना रहे थे । मुझे एकाएक तो यकीन ही नही हुआ कि यह मंजू है । कहाँ बगीचे की क्यारी में बढती हुई वह बेल और कहाँ सूखी पथरीली जमीन में जीवन के लिये संघर्ष करता यह पौधा । मुझे उस पर तरस आया । एक पहाड को काटते--काटते क्या वह थकेगी नही । लेकिन मेरी आशा के विपरीत मुझे देखते ही उसकी आँखों में चमक आगई । मानो बुझते हुए दिये में किसी ने तेल डाल दिया हो और लौ लहक उठी हो । हमेशा की तरह अनायास और निर्बाध सी हँसी । बिल्कुल बच्चों जैसी । चेहरे पर कोमल मुस्कराहट फैल गई ,मोइस्चराइजर की तरह । अवसाद की जगह उल्लास फूटा जारहा था । क्या है वह जो मनुष्य को विषाद की खाइयों से निकाल कर एक खुशनुमा संसार में लेजाता है । कौनसा जादू है जो जीवन की ऊबड-खाबड पथरीली जमीन पर भी पाँव तले फूल बिछा देता है ।
"बडी लम्बी उम्र है तुम्हारी । वह पास आकर खिलखिलाई ---मैं अभी तुम्हारे बारे में ही सोच रही थी
और देखो तुम मिल गए ।"
मैं फिर विस्मित हुआ ।
"क्या हाल हैं ।" मैंने पूछा तो एक को न्योता दिया दो चले आए के अन्दाज में बोल पडी---"हाल क्या हैं । एकदम बढिया । रोहित पूना चला गया और मोहित का अन्तिम साल है । और मेरी नौकरी भी स्थाई होगई है । वेतन भी ठीक-ठाक है ।"
"यह तो बहुत अच्छा रहा । चलो तुम तो गंगा नहालीं ।"
"सब ईश्वर की कृपा है । पर तुम तो बताओ रिंकू मेरा मतलब आकाश और बबली क्या कर रहे हैं ।"
"कभी खुद ही आकर सबकी खबर ले लो न । तुम कभी आती भी तो नही हो ।'
"इसके लिये भी भला कहने की जरूरत है !"
"अच्छा ,वो तुम्हारे 'संगीत-प्रेम' का क्या हुआ !"---मैं उसके रटे-रटाए से उत्तर से ऊब कर बोला पर वह संजीदा हो गई । बोली---"प्रेम कह रहे हो तो पूछते क्यों हो ? प्रेम कभी खत्म होता है भला !"
मैंने चौंक कर मंजू को देखा । कभी--कभी अनायास ही वह ऐसी बातें कह देती है कि मन अचानक   भोर की बयार होजाता है । एक खुशनुमा अहसास रोम-रोम को स्फूर्ति से भर देता है । उसी भले से अहसास वश मैंने आग्रहपूर्वक कहा---"तो फिर कब शुरु कर रही हो सीखना ?"
बस जल्दी ही । वह यंत्रवत् बोली --"जरा मोहित का और कहीं कुछ हो जाए ।"
"अब बहाने छोडो और घर चलो । कभी परिवार की कभी काम की तो कभी बच्चों की जिम्मेदारी में अपनी एक जरा सी इच्छा को सालों से यूँ ही टालती आ रही हो । बस यही दो कदम पर ही तो घर है और वहीं स्कूल । देख तो लो कि कैसा चल रहा है मेरा संगीत विद्यालय ।'
वह एक पल चलने को तैयार हुई पर अगले ही पल वह रुक गई जैसे नाली में कचरा अडने पर पानी रुक जाता है ।
"भाभी हैं घर पर ?" 
"हद होगई ।" अब संगीत--विद्यालय और संगीत के बीच यह भाभी कहाँ से आगई । मेरी पत्नी सचमुच अभी घर नही थी । दो दिन पहले ही अपने पिता से मिलने चली गई । लेकिन भाभी का तो 'सा रे गा मा' से दूर-दूर का नाता नही है । और मुझे किसी भी स्तर पर महसूस नही हुआ कि मंजू को मेरे साथ बैठने में किसी मध्यस्थ की जरूरत है । मैं हल्के-फुल्के अन्दाज में बोला--
'"भाभी नहीं होगी तो क्या घर नही आओगी । भई चाय बना कर तो मैं भी पिला सकता हूँ ।" वह खिलखिला कर हँस पडी । बिल्कुल बच्ची जैसी उन्मुक्त हँसी । उसकी यह हँसी एक पहाड को काटती हुई एक लम्बा--चौडा सुगम और सुन्दर रास्ता बना देती है जिस पर कितनी ही दूर आराम से चला जासकता है बिना रुके ,बिना थके । पर जल्दी ही उसकी हँसी मन्द होकर रुक गई । बिजली बन्द करने पर जैसे पंखा रुक जाता है ।
"वह बात नही है । लेकिन मैं उनसे कभी मिली भी नही हूँ । फिर आज मुझे जल्दी घर भी पहुँचना है मोहित के दोस्त आ रहे हैं । तभी तो इतना सारा सामान लादे हूँ । हाँ मुझे अपना नम्बर दे दो । जिस डायरी में लिखा था वह मिल नही रही ।"
"अरे नम्बर--अम्बर छोडो । घर चलो । देखो तो सही कि आकाश का हाथ सितार पर कितना साफ होगया है । अभी उसे भोपाल में पुरस्कृत भी किया गया ।" मैंने अधिकार पूर्ण ढंग से कहा ।  
"अच्छा लगता है यह सब जानकर ।--वह मेरे अधिकार भरे आग्रह को एक तरफ सरका कर बोली---- मैं अभी तो नही लेकिन फिर कभी आऊँगी जरूर । आना तो है ही । एक साध को मन में लिये ही मरना थोडी है ।"
फिर वह जैसे मुझसे पीछा छुडाती हुई सी चली गई । एक बार फिर झूठ बोलकर । 
मैं समझ चुका हूँ कि वह नही आ सकेगी । पर जब भी मुझे मिलेगी उसका चेहरा उल्लास से चमक उठेगा । बच्चों की तरह किलक उठेगी । मेरे लिये यही काफी है । हाँ....काफी क्यों है यह तो अभी तक मुझे भी नही पता । 

14 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी और रोचक कहानी लिखी आपने
    मेरी हार्दिक शुभकामनाएं.

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  2. कहानी पढने व अपनी राय देने के लिये आभार ।

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  3. वाह...वाह...वाह...
    सुन्दर प्रस्तुति.....बहुत बहुत बधाई...

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  4. मैं जान चुका हूँ कि मंजू मुझसे ही नही अपने-आपसे भी झूठ बोलती है । अपने ही बन्धनों में कैद होकर मुक्ति की बातें सोचती है पर क्यों । यह आज तक नही समझ पाया । तबसे प्रायः ऐसा ही होता रहा है कि मैं जब भी उसे भुलाने लगता हूँ वह ,अचानक जैसे मेरी देहरी पर आ खडी होती..
    गिरिजा जी सुन्दर प्रस्तुति मन को छू गयी आप की ये प्यारी कहानी ... बधाई हो
    राम नवमी की हार्दिक शुभ कामनाएं इस जहां की सारी खुशियाँ आप को मिलें आप सौभाग्यशाली हों गुल और गुलशन खिला रहे मन मिला रहे प्यार बना रहे दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति होती रहे ...
    सब मंगलमय हो --भ्रमर५

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  5. विवशताओं से जूझती नारी के मन को थाहने में सफल है ये कहानी -बधाई!

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  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति । मरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  7. ये जीवन का जो नखलिस्तान है ,पल दो पल मन पसंद के हैं यही हासिल है ज़िन्दगी का बाकी सब' अपने अपने कारावस' भोग रहें हैं मंजु भी हम भी तुम भी .एक बेहतरीन मनो -वैज्ञानिक कहानी है जो व्यक्ति की सीमाओं का रेखांकन करती चलती है आकाश में उड़ने की इच्छा का भी -पंछी बनू उडती चलूँ ......कृपया यहाँ भी पधारें -
    बृहस्पतिवार, 17 मई 2012
    कैसे करता है हिफाज़त नवजात की माँ का दूध
    कैसे करता है हिफाज़त नवजात की माँ का दूध
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्‍तुति।

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  9. बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट अमीर खुसरो पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  10. बड़ी जानी पहचानी सी लगी कहानी.. कई जगहों पर ख़ुद को पाया... आपका झूठ भी पकड़ा गया आज. आप कहती हैं कि मुझे लिखना नहीं आता.. अगर इसे 'नहीं आना' कहते हैं तो भगवान अगले जन्म में मुझे अनपढ ही बना दे!!
    कहानी और पोस्ट के बारे में बहुत कुछ कहना है.. कभी बातें होंगीं तो बताउँगा!! आपसे बहुत कुछ सीखना है!!

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  11. बेशक ये कहानी बहोत अच्छी है और संवाद का स्तर बहोत ही ऊँचा लेकिन इसमें एक चूक हो गएी है वो ये कि जब नरेश मंजू के यहाँ गया तो आपने नरेश और उसके मित्रों के परिचय में लिखा कि सब बीस बाईस के लडके थे परिवार की कोई जिम्मेदारी भी नहीं थी लेकिन आगे बहोत बाद जब नरेश का मंजू से दोबारा मिलने का प्रकरण हुआ तब आपने लिखा कि नरेश की शादी बचपन में हो गएी थी दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं

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  12. ये आपने वहाँ पर लिखा है जब आपने नरेश की तीन संगीतशालाएँ की बात लिखी है और आगे लिखा है कि मेरी शादी तो छुटपन में ही हो गएी थी अब दो बच्चे भी हैं

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    1. प्रिय विकास ,
      आपने काफी सूक्ष्मता से इस बात को देखा है . यानी कि कहानी चलते चलते नही पढ़ी .
      यह सही है कि बीस-बाईस की जगह नरेश की उम्र सत्रह-अठारह की हो सकती है . लेकिन बचपन में विवाह की बात असंगत नही है ,हाँ विवाह के बाद पाँच या सात साल का अन्तराल होता था वैवाहिक जीवन के लिये . प्रसंगवश मैं बताना चाहती हूँ कि पाँच-छह दशक पहले के गाँव और कस्वाओं में ( जहाँ मैंने देखा है ,अधिकांश तो अब भी ) लड़के के विवाह का मतलब बस विवाह होना और घर में बहू का आना भर था , वह भी बचपन में ही .उम्र बढ़ने पर तो वह ‘छिकैला’ (यानी छोड़ दिया गया ) होजाता था और उसका विवाह होना मुश्किल ही होता था . लड़के की दायित्त्व निभाने की योग्यता से विवाह का सम्बन्ध न तो खासतौर पर कन्या पक्ष देखता था न ही लड़के के परिजन . संयुक्त परिवार थे ( अब भी हैं ) माता पिता ही बहू और पोते-पोतियों के भरण-पोषण का दायित्त्व निभाते थे . मैं आज भी अपने गाँव में ऐसे कई परिवार देखती हूँ .
      नरेश के ऊपर परिवार का दायित्त्व तब आया जब वह परिवार , दूर सपत्नीक शहर में आगया था वह भी तब जब वह दायित्त्व-वहन करने में आर्थिक रूप से सक्षम होगया . आपने सभी कहानियाँ एक साथ लेकिन बड़े ध्यान से पढ़ी हैं यह सचमुच विस्मय की बात है ..खुशी की भी .

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