शुक्रवार, 20 मार्च 2015

उमस भरी सुबह और एक फोनकॉल


त्रिनन्...त्रिनन्....

गुलमोहर काली के एक एम आई जी फ्लैट में तीसरी बार फोन की घंटी बजी तो कुछ पलों के लिए वहां जमी एकरसता भंग हो गई , जिस तरह के पत्थर की चट्टान पर कुछ समय के लिए पानी पर जमी काई फट जाती है , घर में मौजूद लोगों का ध्यान उस काले उपकरणों पर केंद्रित हो गया।

फोन का सामान और घुटनों को तोड़ना है। लेकिन कभी-कभी लोग आपको अपने में ही इतना ट्रस्ट और उलझे हुए होते हैं कि फोन पर आना किसी ढीठ पड़ौसी की अलौकिक घुसपैठिया सा भी महसूस होता है। 51 नंबर के उस एम आई जी फ्लैट में सुबह   कुछ ऐसा ही हुआ।

इस घर में कुल चार जीव हैं। पेंटालिस पार के गृहस्वामी सुधाकर राय , पत्नी अमला और दो बेटे। बड़ा बच्चा और छोटा विकास यानि बचपन। लेकिन फिर भी वे अभी भी गाड़ी की एक ही बोगी में सवार मुसाफिर की तरह हैं , अक्सर अपने आप में डलिया में पड़े पोथियों की तरह रहते हैं।

सुधाकर बाबू एक स्थानीय समाचार पत्र ' सांध्य-संदेश ' के सम्पादक हैं। व्यक्तित्व में एक फक्कपन है। बाल खिचड़ी हैं। रंग गहरा, शक्ल-सूरत बाहरी तौर पर किसी भी कोण से सुंदर नहीं हैं , लेकिन बड़ी आंखों की धारियां बनी नजर में एक खास आकर्षण है। उनकी आवाज़ और संगीत का तरीका लोगों को खास प्रभावित करता है उन महिला लेखकों की संख्या अच्छी है। सम्पादन के साथ-साथ अच्छा भी शेयर किया जाता है, इसीलिये अखबार तो फिर भी चल जाता है सम्पादक जी का नाम बहुत चलता है। यह उनके आने वाले पत्र और फोन पर बताया जा सकता है। हालाँकि घर में उनके वैज्ञानिक 'घर की 'चिकित्सक' जितनी भी नहीं है। बच्चों के लिए , विशेष रूप से छोटे बेटों के लिए वे सिर्फ स्कूल की फ़ेस फ़ाइनल या किसी पेपर पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति भर हैं और पत्नी के लिए अकीकन साकिआम को पूरा करने वाला उपकरण। इसमें सुधाकर बाबू बहुत सारे तत्व हैं, इसलिए सुधाकरबाबू का मन होता है कि ' कमरे ' की एकरसता से मुक्ति के लिए कोई बड़ी सी 'खिड़की' हो ताजी बयार मिले और वे गहरी सांस लेकर खुद को तरोताजा महसूस कर सकें। घर की मजबूत दीवारों को खिड़की बनाना इतना आसान नहीं है।

मंझोले कद और गेहुँआ रंग की सामान्य चेहरे वाली अमलादेवी एक बेबाक और कुछ रोयी सी महिला है। पढ़ाई का उपयोग तर्क और बहस के लिए बहुत कुछ होता है। संवेदना के स्तर पर आधारित है. दुनियादारी के मामलों में उनकी छठी इंद्रिय पति सुधाकर से बहुत आगे की किताब है। आपके ऊपर आये वैज्ञानिक और जिम्मेदारी को वह बड़े कौशल से एक तरफा सरका इंटरनेट है। इसी कौशल के कारण, शहर से दूर गाँव में बस्ती की कोठरी और भिक्षु ' सुधाकर भैया' के घर आए दिन ' अम्मा का घर ' समझकर और धमकाते थे , धीरे-धीरे-धीरे-धीरे आना भूल गए हैं। उनके पति कई तरह से नागावार हैं, जिनमें आज तक वह बदला नहीं है, हालांकि कोशिश अभी भी जारी है। 

दोनों की शादी तो एक बार फिर से अकेले ही हो गई लेकिन असल में उनका एक प्रेमविवाह था। यह बात अलग है कि अब जैसे कि शादी हो जाने पर उनके बीच प्रेम की बातें तर्क और बहस ने ले ली हैं। हर शोधकर्ता की पत्नी की तरह अमला को भी सन्देह रहता है कि पति महाशय सिर्फ तन से उसके साथ हैं, मन से वे इधर उधर भटकते रहते हैं, इसलिए उसका ध्यान ' जो मिला है' जो नहीं मिला या छूट गया ', उसी पर रहता है इस तरह घर में जब लकड़ी का कूड़ा-कचरा निकलता है।

नवजात शिशु हुई उम्र का सांवला-सलोना लड़का है। उसकी एक उपलब्धि तो यही है कि वह इंटर का एग्जाम बिना किसी स्कूल के सेकेंड डिविजन से पास कर सकती है। उन्होंने बोर्ड में दो विषयों की स्थापना की थी। इस बात को लेकर सुधाकर बाबू कहते हैं कि, "भविष्य में क्या करने वाला है पता नहीं   । पढ़ने में मन ही नहीं लगता.. ?"

अमलादेवी को पति की ऐसी बातें अनाधिकृत चेष्टा दिखती हैं। उसने एक अचूक अस्त्र का प्रयोग किया है-

"तो खुद किसने तीर मारा ? बाबूजी ने एड़ी से चोटी तक जोर लगाया तब कहीं रो धोकर बी.ई. की डिग्री ले पाए ?"

“समुद्र तट पर बोलना ज़रूरी है ?”

“मैंने तो बिल्कुल सच कहा है।”

“सच की खोज का दूसरा तरीका भी हो सकता है।”

"मुझे तो यही तरीका आता है। साफा कहता है और खुशियाँ छुपाता है। लपेटकर कहता है मैं नहीं सीखता।"

" साफा देखने वालों में साफा सुनने वालों की भी लोकमान्यताएं शामिल हैं। "

वह तो सबसे ज्यादा उजागर है।

“अच्छा ठीक है. अपना काम करो...”

"काम ही कर रही थी। पार्टनर की तरह नहीं कि फालतू पेपर-पत्तर फैलाए सबेरे से बैठा रहता हो।"

“तुम अपना देखो क्या क्या करने को है ।”

"क्यों , सारी जिम्मेदारियां मेरी ही हैं ? घरवाली भी संभालूं और बच्चों को भी मैं ही पढ़ूं और तुम फोन पर बतियाते रहो अपने दोस्त--मित्रानियों से..।"

“तुम लोग आराम से आओ, बहस करो। तब तक मैं वापस आ गया हूँ।

माता-पिता की इस तरह की फालतू बहसों का लाभ अक्सर बाहर निकल जाता है। अब उसे जाने के लिए प्लांट की भी जरूरत महसूस नहीं होती। जब भी वह दोस्तों के साथ फिल्म देखने या क्रिकेट खेलने जाती है। पिता के कई बार ये फिल्में भी इस गेम-वेल को छोड़कर किसी कॉम्पटीशन की तैयारी कर लेती थीं , वह रोज सुबह-सवेरे लड़ाई करके घर से निकल जाते थे।

दस साल का विकास बहुत ही चुस्त और तुनकमिजाज लड़का है। आपकी उम्र से कहीं ज्यादा आगे निकल गए ये महाशय चौधरी परिवार में अकेले हैं जो कान्वेंट में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे हैं इसलिए अपने भाई से ही खुद को अपनी मां और पिता से भी ज्यादा समझ रहे हैं। और उनकी हर बात में मीनमेख अवशेष रहते हैं।

"पापा क्या बोला आपने 'डीफ' ? या फिर बहरा ?.. इसे डीफ नहीं 'डेफ' कहते हैं...हद है.. पापा शैतान नहीं 'शैट' बोलते हैं। यहां 'आर' साइलेंट है।"

इस बात से भी बार-बार नाराजगी होती है कि पापा अपने पुराने स्कूल में नहीं जाना चाहते। कही भी जायेंगे , आदिवासियों में पुराने जूते , कंधे में लम्बा झोला लटकाये जायेंगे। दो-दो हफ्ता शेविंग नहीं करते तो दाढी कटेरी के कांटों सी उग आती है .विक्की ने कई बार टोक चुकाया है कि लेखक-संपादकों की ये यूनिफॉर्म है क्या जो ?... पर पापा हमेशा अपनी राह पर रहते हैं. अन्य माताएँ हैं...नाश्ता बनाने की बजाय या तो टी.वी. पर मैच देखने बैठ जाते हैं या पापा से बेमतलब ही उलझी रहती हैं कि ' क्यों जी दाढी कुक टाइम एक तरफ मुँह क्यों फुला लेते हो ? भद्दा लगता है। या शार्क शाहरुख क्यों पसन्द नहीं है सारी दुनिया क्या पागल है जो उसे पसन्द करती है ?

उसे टीवी देखने के अलावा घर में और कुछ ' दिलचस्प ' नहीं दिखता इसलिए वह जब तब टीवी से क्लिप्स डॉक्यूमेंट्री देखता रहता है।

"बिक्की , बहुत होचुका अब टीवी बंद करो और ना लो।"

सुधाकरबाबू कुछ गहराई और कुछ समझने की कोशिश भरी निगाहों से इधर-उधर देख रहे हैं।

“विकास , सुना नहीं माँ ने क्या कहा ?”

“किसकी माँ ने ? तुम्हारी या मेरी ?” पिता के इस तरह के संवादों पर निकोल फिक्शन से हंसी-मजाक होता है।

“देखा , कितना कुछ हो रहा है ?”

"और क्या होगा!   जब बच्चों को कोई देखने वाला न हो।"

“क्यों , तुम हो ना बहुत बड़ी फिल्में वाली। मैं तो जब भी उन्हें कुछ समझाना चाहता हूं तो तुम हमेशा के लिए टॉक डॉट हो गए हो कि , ' रहना दो उसने थका लिया है '

"क्या मैं आज मेरे साथ रहना चाहता हूँ ? मेरा तो सिर वैसा ही भाना आ रहा है।"

"कमाल है। सिर्फ इल्ज़ाम देना है...चोरी और सीनाजोरी कहते हैं।" सुधाकरबु निःशब्द मन मसोस कर रह जाते हैं। आगे कुछ समीक्षा का प्रश्न ही नहीं है। पत्नी से एक कहो , बीस सुनो--कि...'मेरा तो सिर चकरा रहा है। ..किस तरह के लक्षणों का दर्द होता है नहीं , कि मैं ही पूछ रहा हूं कि कैसे काम चल रही है। मेरी तो जिंदगी चूल्हे-चौके में ही चली गई...।" वगारा..वगरा।

हाँ तो बात है सूर्योदय हुई थी फूलों की एक भारी गिजगिजी, चिपचिपी सी सुबह से। बादल कभी तो मनमाने तरीके से अपनी भरी गागर उंडेल जाते थे तो कभी धूप चिलचिला उठती थी। हवा का कोई नाम नहीं था. अब भी जब सूरज बाहर गुडहल कलियों से कानाफूसी डे लोन में गिर गया था पानी की तरह , गुलमोहर कलियों के उस एम.आई.जी. फ्लैट में अजीब सी खुन्नस था उसके लिए किसी खास कारण की बर्बादी नहीं होती हवा के साथ फ्लो एटेल सूट की तरह स्वभाव होता है। 

सुधाकर राय सुपरमार्केट में नहाए हुए थे अपने आस-पास कई पत्र-पत्रिकाएं बिखराए बैठे थे। यह दृश्य अमला के वैयक्तिकृत शत्रु के जन्म के लिए काफी है। कम से कम छुट्टी के दिन तो घर में रहो...संपादक का मतलब यह है कि घर-बार और बीबी-को काम करना ही मत ... काम के नाम घर में तो महाशय को छुट्टी के दिन भी फुरसत नहीं। काम में हाथ बँटाता है। तो यह भी नहीं होता कि पंत नगर से मिल गया। शिल्पी के बारे में बात करने के लिए कहा  

पत्नी की बातों से सुधाकर का ध्यान अपने काम से उचट जाता है। गर्मी और उसम और बढ़ी हुई   दिखती है।

"काम मत करना दो, रोज सुबह एक ठेले वाला बिल्कुल ताजी   सब्जी लेकर नारियल वाला है। वह नहीं जाता। अच्छा फिर मुझे लोके का मौका कहां मिलेगा ?"

"यहाँ बहुत ताज़ी पेश है! बीस रुपए किल टमाटर चालीस में बिकता है। ये तो नहीं कि आदमी बचत की सोचे। "

सही बात है।--- सुधाकरबाबू ने बेध्यानी में कहा। फिर अनायास ही सारा ध्यान छत से लटके हुए जापान पर जाम हो गया था जो लंबी बीमारी से उठ खड़ा हुआ आदमी की तरह धीमा चल रहा था। ठीक उसी तरह जैसे ही ममी कम है क्या, सो भयानक पंखा तेज किया ही था अमला तन्टनकर आई और रेशम धीमा कर दिया।

“यह क्या मजाक है ?”

"मजाक नहीं एलेगोन और सीरियस बात है। बिल डिलिट फिलिंग अपोजिट है ?"

“नहीं ..बिल तो तुम पर टिप्पणी हो गई न ?”

"मैं क्यों जाऊँगा होता हूँ ? मेरे तो घर में ही इतने काम हैं कि...।"

"हां देख रहा हूं। कितने सारे काम हैं, इतने तो दस बज रहे हैं। एक कप चाय तक नहीं मिली।"

 "क्यों ? कभी खुद भी बना कर पी लिया करो। पता तो चले कि चाय बैठे-बैठे नहीं बन जाती..मेरे भैया को देखो..।"

"अरे यार! एक और तुम एक लड़की भाई है बस..! मुझे काम करने दो। तुम्हें अपने काम से काम दिखाया।"

"हां..हां एक मैं ही हूं जो सुरक्षा खेल रही हूं। कौनसा सुख मिला है साथ.. ?"

पति को परास्त करने का ये अचूक बान है जब-जब अमला देवी सामने आईं। पर कभी-कभी सुधाकरबाबू भी बाण के प्रत्युत्तर में बाण चला देते हैं --

"तो सूरज जहां सुख दिख रहा है, वहां सामान दिख रहा है न, मैंने कब मना किया। हद है यार, रोज-रोज एक ही बात है...मेरा कितना काम अधूरा रह गया है। अभी भी एक कलात्मक रिकॉर्डिंग आना है ' हिन्दुस्तान ' को ...आपकी दुकान और कोई भी ढूंढ हो ?"

“मैं नहीं रुका तो फुल और कौन सी जगह है जो जिमा जाए रोज गरम-गरम के ?”

“बंद करो यह नाटकबाजी।”

अनैतिक चीख उठाना। इस समय वह मैसाचुसेट्स का पूरा डिब्बा सामने रखा था और किसान भर-भर के खा रहा था।

“यह विशेषता क्यों है ? नक्सन नहीं चाहिए ?” सुधाकर ने तल्ख अंदाज़ में कहा।

“इसकी कीमत किसे है ?”-- यूनाइटेड की आवाज भी दोहराई गई है , लज्जा भी वैसी ही है।

"घर में बारह-ग्यारह बजे तक नाश्ता नहीं बनता। कुछ तो खाना चाहिए ना ?"

सुधाकर ने एक समुद्री दृश्य पत्नी पर कास्ट किया जो अभी तक लंबे समय तक फूल झाडू सेडे-खड़े ही आंगन में झाड़ू लगा रही थी। कमर पतली हो गई है और पेट इतना निकल आया है कि झकझोरते नहीं। आलू-चावल छूटते नहीं हैं। काम के नाम स्त्री चर्चा पर दस ख्यात सुनो। 

 "गृहमंत्री जी! बच्चा क्या कह रहा है ?"

"तुमने सुन लिया करो कभी-कभी। शादी भी जिम्मेदारी है..मैं सोचता हूं कहां-कहां मरूं ? आटे गण धोकर सुखा रहे हैं। पलंगों के अंधेरे में खटमल हो गए हैं। दवा डालनी है। तीन दिन से कपडे बर्तन रहे हैं उन्हें कपड़े हैं। ऊपर वाली माल अलग हो रही है..."

“सुन लिया भाई, सुन लिया....”--सुधाकर ने कहा। सोचा कि "काम का रंग नहीं है अमला , अभी भी गाती है .

लेकिन यह सब कहते हैं बारूद में चिंगारी चलाएंगे। इसलिए शान्त लौंडे में कहा --

ठीक है घरवाले दम से ही चल रही है अमलारानी..पर मैं भी तो बुरा नहीं हूँ।

“हां..देख रही हूं, बड़े काम करती हो!..और करती हो तो क्या..करोगे नहीं क्या ?”

" फिर भी जब देखो मेरे काम से शिकायत रहती है संकट .... "

" तो फिर कौन सा फर्क पड़ता है। कौन सी मेरी बातें सुनती हो। बस बेकार और... ?"

"अरे यार , अब बंद भी करो अपना ये याचिका पुराना। जो काम हो सके, करलो नहीं हो , मत करो। बात ख़त्म...

' बात ख़त्म ' सुधाकरबाबू के प्रतिद्वंद्वी के आगे हथियार डालने का संकेत-वाक्य है। लेकिन अच्छी बात ऐसे आसानी से ख़त्म हो जाती है ? कोई दूसरा प्रसंग बात को हवा देता है।

“ट्रिन्न्...ट्रिन्न्....”

सुधाकर राय ने कुछ रहस्यमयी नजरों से देखते हुए रिसिव करना चाहा, तभी अमलादेवी ने लपककर गोद उठाया।

हैलो ..कौन ?”

“…….”

" हैलो...हैलो..हेलो.मुंह में जबान नहीं है क्या.. ? अरे बात नहीं करनी तो...लो फोन कट गया ।"

क्यों परेशान हो ? कौन सी भी बात करनी होगी फिर से।

"ये कॉल मैंने जरूर उठाई थी इसलिए अब नहीं आएगी... "

अरी भाग्यवान ! मेरे लिए फ़ोन तो मेरे मोबाइल फ़ोन पर आता है न ?”

कॉल रिसीव करते हाईफ़िफ़ फेस पर जो चमकती और मुस्कुराती है, वह बहुत कुछ बताती है।

मतलब क्या है लड़की ?”

“मैं कोई जापानी या फ़्रेंच थोड़ी बोल रही हूँ जिसका मतलब समझाना चाहता हूँ ?”

“नहीं ..बोल तो हिंदी ही रही हो पर नकली शब्दों का मतलब अलग-अलग होता है ना ?”

"वही तो! चोर की नई में तिनका। बहुत सारे पात्र हो पर अनाम नाम के हो। कितनी बार कहा है कि आई डी स्टॉक ने लो पर नहीं...भेद जो खुल जाएगा...।"

कैसा भेद.. ?”

" अच्छा, इतने सारे नियम नहीं मैं। तुम्हारी डायरी में मैंने एक दो चिट्ठियाँ भी देखीं जिनमें गोलमोल सा कुछ लिखा था। कोई अच्छा इंसान तो सीधा ही कुछ लिखा होगा ना ? ..और कई बार तुम बिना किसी मान्यता के महिला से बाहर भी मिले हो, सुरेश भाई ने बताया ..सब साथी हूँ कैसे हो...। "

पत्नी के ऐसे दोस्त कभी-कभी सुधाकर राय को गुदगुदाते हैं। काश ऐसा होता है..कोई खिड़की खुली इस कमरे में तो ताजी हवाएं रहती हैं..

"अरे भाई आवाज से अनुमान तो हो जाता है कि..."

"वह तो तब हो जब कोई बात करे। फोन करने वाली बात तो मेरी आवाज सुने ही फोन काटता है।"

 “वाह माँ आप तो बड़ी वैज्ञानिक हो।” यूक्रेन हंसने लगा।

 “बिना बात के ही पता चला कि वह कोई महिला थी।”

“बेटा वर्जिन माँ शर्लक होम्स के खानदान से जो है।”

“बाप–बेटा , बहुत बढ़िया मजाक उडने पर मै घास नहीं।

“मान लिया। लेकिन फोन अयॉन या अलोन के लिए भी हो सकता है।”

“उनके सब दोस्त मुझसे बातें करते हैं।”

"आजकल लड़कियाँ भी दोस्त होती हैं। और वे सबसे ज्यादा बातें नहीं करतीं।"  

"यह मजाक कुछ जमा नहीं है। लेकिन मेरी गर्लफ्रेंड जैसी नहीं है। वे हर अपनी बात मां को सिखाते हैं।"

"भरोसा भी कुछ होता है ना ?"

"भरोसा ? और तुम पर ?

बहुत ज्यादा ही नहीं लिखा हो मेरे बारे में.. !”

"तो क्या गलत कहा गया है ? मर्दों को दूसरी औरतें ही सबसे ज्यादा अच्छी लगती हैं। तुम क्या अलग हो ?"

“कितने मर्दों को पसंद हो जो... ?”

“सबको अज्ञातवास क्या है , नक्षत्र जान लेना ही काफी है।”

"नहीं अमला तुम मुझे नहीं देखते-समझती, काश जान रचनाएँ। -सुधाकर के अंतमन से नीरव भाव-धारा फूटी। तुम तो सिर्फ बहस करना और बात करना, किसी भी तरह की टिप्पणी करना। घर को संसद भवन बनाया है ..पढ़ी लिखी होने का अर्थफे के लिए बस इतना है कि पति का विरोध जारी रहता है, चाहे वह हो या न हो...लेकिन यह सब दिखाने का कोई मतलब नहीं है।"

अब सच कहा तो बोलती बंद होगी।

एक मिनट, फ़ोन तो सबसे ज़्यादा फ़ायदे आते हैं। नहीं ?”

" हां , तो.. ? मेरा हुआ तो क्या मेरी बात नहीं हुई क्यों बिना बात किए फोन काटा ? फिर जो अपने हो गए तो याद आएंगे। मेरे परिवारवाले मेरा ध्यान रखते हैं ..तुम्हारा तो इतना बड़ा कुरमा है। अपने से कोई काम नहीं करता है कभी फोन ? जाएंगे भी तो 'मिस्कॉल'। कंजूस नंबर एक। यहां से हम बात करें तो कार्लें। उस दिन गर्लफ्रेंड ने..।"

"अरे! यह क्या विवाह--तुम्हारी रहना लगा है ? क्या मेरी बहन का विवाह कुछ नहीं हुआ ?"

“वो समझती है मुझे अपना ?

“तुमने भी कौन सी कोशिश की है दोस्तों ?”

मेरे पास इतना न अक्ल है न इसकी जरूरत...

" तो ये कहो ना. फालतू दोष क्यों रहता है ..?"

"हां,...तुम तो अपनी बहन का ही पक्ष लोगे। मैं तो...।"

"बहन को छोड़ो , अम्मा ने तो हमेशा बेटी को किस तरह से सजाया है। अपने हाथों से बनाया है कुछ भी नहीं कहा है। फिर भी तुम भी तुम्हारे साथ मिलती-जुलती रहती हो। कभी यहां चली जाती हो तो ठीक से बात नहीं करती। यही नहीं अगर मैं हलचाल भी मांगता हूं तो तुम उन्हें ' खटपाटी ' चबाती हो। देखा है ?

ये क्या किया सुधाकर बाबू ने। ज़रा सा सच कहे तो राकेश सलग रही आग को भड़का दिया।

“तुम मेरे साथ अकेले रहना चाहते हो ?”

"नहीं, मैं चाहता हूं कि मुझे शांति से काम करने दो और तुम भी इस समय जो सीख रहे हो, वह कार्लो। विकी कबसे इंस्टेंट मांग रही है...दिमाग में गहरी भारी-भरकम बातें दो को हटा दी गईं।"

"कैसे हटा दूं , जबकि वे सब लोग घर के हों या बाहर के..आज भी बहुत हैं। इतनी दूर रह रहे हैं फिर भी मुक्ति नहीं है...कभी घरवाले खून सुखाते हैं तो कभी...ये बाहरवाले..बालियां चैन नहीं छोड़ते..."-अमलादेवी का आवेश चरम पर पहुंच गया तो सुधाकर का गुस्सा फूट पड़ा।

"बिना सोचे समझे मुंह मत खोलो समझी। गाली बंद करो और मुझे काम दो। दोस्त के अलावा भी कुछ मिलता है स्टार ? जीना मुहाल हो गया है। सिर्फ एक दिन की छुट्टी घर में रहना कितना मुश्किल होता है! अच्छा है कि बाहर कहीं चला जाऊं।"

"हां हां..मैं ही बुरा हूं। मेरी बातों में तो कंगाल हैं ना ? ऐसे आदमी के पल्ले बंधकर मेरी तो जिंदगी बर्बाद हो जाएगी" -अमला ने चिल्लाते हुए कहा। फिर रुआंसी आईडिया एक तरफ पटक दिया और अंदर वाले कमरे में फ्लैट पलंग पर जा लेटी और सिसकने लगी। पत्नी के इस विचार को देखकर सुधाकरराय का सारा तनाव या जोश ठंडा पड़ गया। साड़ी कागजात एकत्रित करके रखें। लेख लिखा है। ऐसी स्थिति में कोई कैसे काम करे।

इलिनोइस इस घटना से लेकर टीवी दृश्य तक। उसे पता है कि माँ का इस तरह का 'कोपभवन' में जाना जाता है हर तरह के डर का क्लाईक मैक्स होता है। पिता उस पर विश्वास करते हैं। ऐसा हुआ ये मौसम हमेशा की तरह कुछ देर बाद आपके आप ही ठीक हो जाएगा जैसे कुछ हुआ ही न हो।

और सुधाकर राय किसी दिग्भ्रमित रुचि व्यक्ति की तरह बैठे किसी विंडो से आर्हे हवा के झोंके की कल्पना करके ही मित्र और गर्मी से उपकरण पाने की कोशिश कर रहे थे।

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सोमवार, 22 दिसंबर 2014

एक सर्द रात और पूरी ज़िन्दगी


गायत्री ने रजाई को चारों ओर से दबाकर थोडी गर्माहट महसूस करने की एक नाकाम सी कोशिश की ,पर रेतीली मिट्टी को तोडकर फूटती पानी की तेज धारा की तरह सर्दी उसकी पसलियों तक धँस गई । दो दो स्वेटर ,स्कार्फ ,इनर ,ऊनी मोजे तो वह सोते समय भी पहने हुए थी । यही नही रजाई के साथ एक शाल भी मिलाली थी । फिर भी सर्दी थी कि रोम रोम में समा गई थी । उसे रह रहकर कँपकपी सी लग रही थी । 
कुछ तो कमरा ही ऐसा है । बडी-बडी खिडकियाँ ,जिनमें किवाडों के नाम कागज के गत्ते लगे हैं ।वे भी पूरे फिट कहाँ हैं ? कहीं न कहीं सन्धि रह ही गई है । हवा को आने के लिये कितनी जगह चाहिये ? कमरा एकदम बर्फ हो रहा था । उसपर बिजली भी नही थी । मेला के समय तो पूरी पूरी रात बिजली की कटौती होजाती है । वैसे बिजली होती भी तो क्या करती गायत्री ? हीटर जैसी कोई चीज अभी तक नही है उसके पास । लकडियाँ पिछले हफ्ते की बारिश में गीली होगईं ,नही तो चूल्हा या अलाव जलाने पर कुछ राहत तो मिलती । 
उसे याद आया कि गाँव में तो आग के सहारे ही लोग आधी से ज्यादा रात काट लेते थे । आखिरी चिनगारी बुझने तक लोग राख कुरेदते रहते थे । बुझता हुआ अलाव या चूल्हा ही उन्हें गर्मी का अहसास कराता रहता था ।
बचपन में वह जब छोटे भाई के साथ कस्बा में पढने जाती थी तब दिसम्बर-जनवरी की ठिठुरती सुबह में वे रास्ते में आग जलाकर हाथों को गरम कर लेते तभी साइकिल चला पाते थे । यहाँ शहर में कहाँ लकडी ,कहाँ अलाव ! गैस से कहीं गर्मी मिलती है ?
"पिछले पैंतालीस साल में भी ऐसी सर्दी नही पडी ।"--अखबार में लिखा था । गायत्री को सर्दियों का आना बहुत अखरता है । सच तो यह है कि वह ठीक से तैयारी भी नही कर पाती कि मौसम आ धमकता है । सर्दियों के कपडे ,जो मार्च- अप्रेल में बाँधकर दीवान में रख दिये जाते हैं निकालकर धो सुखा भी नही पाती कि सर्दियाँ बहुत ही अनचाहे मेहमान सी आ जमती है । हर साल सोचती रह जाती कि दो अच्छी रुई वाली रजाइयाँ बनवाले .पिल्ले निकल आए हैं .बिछाने के लिए भी गद्दे होने चाहिए । जैसे उग्र भीड को रोकने में डण्डा-पुलिस असमर्थ होजाती है ,कथरी भी नीचे से सर्दी को रोकने में नाकाम रहती है । 
हर साल जाती सर्दियों में वह ऊनी कपडे खरीदने का विचार करती है . जाते मौसम में कपड़े सस्ते मिलते हैं ,लेकिन तभी यह विचार उसे दुकान से लौटा देता है कि अभी पैसा डालना बेकार रहेगा .गर्मियाँ आने को ही हैं । सर्दियां अब पूरे एक साल बाद आएंगी .जब आएंगी तब देखेंगे. 
सर्दी आ भी जाती हैं साथ ही हर साल की तरह पछतावा भी कि सेल से ही क्यों न खरीद लिये शाल और स्वेटर ?
गर्मियों में भी यही होता है .कूलर पंखे ठीक करवा भी नहीं पाती कि धरती तपने लगती है । जिन्दगी एकदम अस्त-व्यस्त बस गुजरती सी चल रही है । सब कुछ अस्थाई सा । मुसाफिरखाने में ठहरे मुसाफिर जैसा . एक आलपिन के बिना सारे कागज बिखर जाते हैं जरा से झौंके से। एक अभाव ने जैसे पूरे जीवन को ही खोखला कर दिया है । मोहित के पापा....
पति का ध्यान आते ही गायत्री को तलवे में धँसे काँटे को कुरेदने जैसी कसक महसूस हुई ।
अकेलापन जब हावी होजाता है तब अकेलेपन के कारण पर ही सबसे अधिक ध्यान जाता है । वैसे तो गायत्री अकेली नही है । दो बेटे हैं । आसपास ही देवर-देवरानी हैं । उनके बच्चे हैं और पास-पडौस के लोग हैं लेकिन कभी-कभी वह सबके बीच बहुत अकेली होजाती है और उसका एकमात्र कारण होता है मोहित के पिता की कमी । 
ऐसे में गायत्री अनायास ही केवल पति और पति से जुडी यादों में खो जाती है । पति नन्दकुमार जो उसे परिजनों के हवाले छोड दूसरी दुनिया बसाकर पूरी तरह बेखबर हो गया है । जब उसने दूसरा घर बसाया था तब गायत्री ने अपनी ऐसी जिन्दगी की कल्पना नहीं की थी या कि नंदकुमार ने करने नहीं दी थी ? 
ऐसे में विगत बीस वर्ष गायत्री को पर्स से गिर गए बहुत जरुरी कागजात से लगते हैं ,जिनके बिना उसे न्याय नहीं मिल सकेगा .  .सम्हालकर रखती तो....और फिर नींद कोसों दूर हो जाती है .

जीवन के प्रारम्भिक दिन जिस विश्वास के साथ शुरू हुए थे ,सीधी-सादी गायत्री सोच भी नही सकती थी कि आदर्श और नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नन्द कुमार का पाँव कहीं और भी फँसा है । जब सच सामने आया । वह जड़वत रह गई । 
नन्दकुमार जाने कबसे एक अन्य स्त्री के साथ अलग दुनिया बसाए हुए था और उसे भनक तक नहीं थी. जब लगी तब मोहित दो साल का था और रोहित गर्भ में था । समझ में ही नहीं आया कि क्या करे ! वह पूरी तरह से मंझधार में थी .पारिवारिक और सामाजिक ही नहीं मानसिक रूप से भी .
और करती भी क्या कैसे ? तन-मन से नंदकुमार ही उसका सर्वस्व था .कोई कठोर कदम वह उठाती भी तो कैसे ? और उठाने की सोचती भी तो तब जब नन्दकुमार उसे सोचने देता . 
वाक्पटु नन्द ने कृतज्ञता का ऐसा प्रदर्शन किया कि गायत्री की बोलती बन्द होगई ।
“ गायत्री मुझसे गलती तो हुई है और तुम्हें पूरा हक है कि विरोध करो ,मुझे सजा दिलवाओ . मैंने तुम्हारे साथ छल किया है इसलिये तुम्हें रोकूँगा नही । लेकिन तुम अगर मेरी मजबूरी समझ जाओगी तो मैं निश्चित ही उसका मान जिन्दगी भर रखूँगा । तुम्हारा ऋण रहेगा मुझपर । अब तुम्हारे सामने दो रास्ते हैं---एक मुझ पर केस करदो और सजा करवाकर मेरे माथे एक अपराधी पति और पिता का लेबल लगा दो दूसरा मेरे निवेदन को मानकर एक भरापूरा जीवन बिताओ जिसमें हमारे दोनों बच्चे तुम्हारे और मेरे स्नेह में पल बढकर बडे होंगे । क्या करना है ,यह तुम्हारे ऊपर छोड़ता हूँ ।इतना समझलो कि निकिता तो अनपेक्षित व अप्रत्याशित रूप से जीवन में आगई है .पर तुम मेरी परिणीता हो और वह तो ऐसे ही है बस....
फिर साथ ही परिजनों की सान्त्वना और गर्भस्थ शिशु का मोह . 
समाज और कानून के बारे में सोचने की जरूरत ही कहाँ थी ! सच तो यह है असली सजा व्यक्ति अपनेआपको खुद ही दे सकता है .लोग जेल में जाकर भी नहीं सुधरते . नन्द खुद को अपराधी मान रहा है यह सजा क्या कम है ? 
पर इससे भी आगे जो बात थी वह थी गायत्री का नन्द से लगाव उसकी बातों का भरोसा जो इस असहनीय स्थिति में भी कम नहीं हुआ था .फिर सजा-शिकायत किसकी करे ? उसकी जो खुद ही अपना अपराध स्वीकार कर सिर झुकाए खडा है ? उसका पति ? ..पति , जिसके बिना जीना स्त्री के लिए कच्चे कगार पर चलना होता है .
बस उसने अपने आप को समझा लिया । पति से प्रेम और सम्बल मिलता रहे बस और क्या चाहिए .जब पति ने उसे भरोसा दिया है तो चिन्ता किस बात की । दूसरी औरत क्या कर लेगी ? सबसे बडी बात थी बच्चों के भविष्य की । बच्चों को पिता का स्नेहमय संरक्षण मिलना ही चाहिये जबकि वह दुनिया में है । स्त्री परिणय ,प्रणय और मातृत्त्व के नाम पर स्वाभिमान और सम्मान को भी एक तरफ रख देती है । यह उसकी उदारता है ,मूर्खता है या महानता , पता नही ।
गायत्री ने इसे स्त्री की उदारता माना और पति को अपराध बोध से मुक्त कर दिया । 
लेकिन उदारता ही काफी नहीं होती ,इसे समझने में गायत्री को खासा समय लग गया . तब तक निकिता अपने चातुर्य से अपना दायरा इस तरह फैला चुकी कि गायत्री को धीरे-धीरे खुद को समेटना पड गया. यहाँ तक कि उसे पाँव पसारना भी भारी पड़ने लगा .विरोध किस मुंह से करती ! दोष उसी को मिलता कि पहले तो विरोध किया नहीं ,अब हाय हाय करने से क्या होता है . शुरू में ही रोकना था न ? 
निकिता ने तो वही किया जो अक्सर ऐसी स्त्रियाँ करती हैं.उसे क्या दोष . दोष है तो वह खुद गायत्री का जिसने अपने पाँव पर कुल्हाड़ी खुद ही मारली है .
"ऐसा नहीं है "--परिवार व समाज में मान्य पत्नी गायत्री का असंतोष विद्रोह में न बदल जाए इसलिए नन्द बड़ी चतुराई से काम लेता .खूब स्नेह जताकर कहता ---
"यह तो तुम्हारी उदारता और शालीनता है .अच्छे परिवार के संस्कार हैं .यही तो ब्याहता पत्नी और दूसरी में फर्क होता है ."
तब गायत्री कुलीनता व शालीनता के भार से झुकी चुप रह जाती हालाँकि कभी-कभी उसकी बातें शिकायत का रूप ले लेतीं थी .आखिर वह भी एक स्त्री ही थी .
लेकिन तब नन्द का स्वर और लहजा दोनों ही बदल जाते --
गलती होगई जो इधर चला आया।"
तो न आया करें अगर इतनी ही परेशानी होती है।"--गायत्री एक पत्नी के स्वाभिमान और अपनेपन की धोंस में कहती थी तब नन्द
गायत्री को दूसरी तरह से परास्त कर देता -- 
"मैं तो यह सोचता था कि कम से कम गायत्री तो मुझे समझेगी लेकिन अब यहाँ भी मुझे शिकवे-शिकायत सुनने मिल रहे हैं तो मैं क्या करूँ ? जीना मुहाल होगया है .कहीं चैन नहीं है..."
"ऐसे परेशान न हो . मैं अब कोई शिकायत न करूंगी ." 
गायत्री पति की बातों से ऐसे पिघल उठती जैसे कि पति की परेशानी का कारण वही है .
यों नन्द का रास्ता आसान होता गया और गायत्री समझ ही नहीं पाई .नन्द हफ्तों तक नहीं आता और गायत्री बेचैन हो जाती . उसका अंतर चिल्ला-चिल्लाकर कह उठता कि उससे ही कोई भूल हुई है वरना वो इस तरह रुकने वाले नहीं हैं .भावनाओं पर गायत्री का वश नहीं . पति के सामने भूल स्वीकार करने में उसे जरा भी वक्त नहीं लगता .      
पिछली बार भी किसी बात पर नन्दलाल नाराज होकर चला गया लौटकर न आने का संकल्प लेकर. 
दो माह होने को आए . एक बार भी नन्द ने गायत्री या बच्चों को पलट कर नही देखा । 
शुरू में तो इस बार गायत्री ने भी सोच लिया था कि अब उन्हें जाने ही दो . बहुत हो चुका नाटक .ईमानदारी भी कुछ होती है . अपनी कही हर बात को हर बार भूल जाते हो. जाओ,रहो वहीँ 
लेकिन समय के साथ-साथ पति से उसका आत्मिक जुडाव एक बार फिर नफरत को धूमिल करने लगा । भावनाओं का उफान किनारों से टकराकर चीखने लगा कि ,"आखिर ये दूरियाँ क्यों ? उन्हें क्यों बढने दे रही है गायत्री, जबकि हृदय का बंधन आज भी उतना ही मजबूत है । फिर काँटों की राह उसने भी तो आसानी से स्वीकार करली थी . सिर्फ इसलिए कि वह पति को खोना नहीं चाहती थी .जिसे भुलाया नहीं जा सकता उसके लिए कोरी अकड में क्या रखा है ? पति के जीवित होते हुए वह क्यों हर तरह से वंचिता रहे ! .."     
गायत्री की नसों में जैसे बर्फ जमी जारही थी ।  
जब नेचुरल हीटर पास हो तो फिर कहाँ की सर्दी कैसी सर्दी ?---नन्द ने एक बार उसे बाँहों में भरते हुए कहा था । 
यादों ने उसकी दबी लालसाओं को अनायास ही जगा दिया । उसके सामने जाने कितनी जरूरतें मुँह फाड कर खडी होगईं और सारी कटुताओं को निगल गईं । एक बर्फीला झौंका उसकी पसलियों को भेद गया ।  
स्वाभिमान की ऊष्मा के साथ-साथ पति को याद न करने का संकल्प भी ठण्डा होगया , दो पल के लिये रख छोडी चाय की तरह । ऐसा क्यों है कि पति के स्नेह और सम्मान के बिना उसे कोई सुख-सुविधा या सम्मान सन्तुष्ट नही कर पाता । बच्चे माँ की एक हँसी के लिये क्या कुछ नही करते । वह हँसती भी है पर हँसी खुद ही उसे खोखली लगती है । उसे दो महीने ही दो साल क्यों लगते हैं कि कितना समय बीत गया पति को घर आए हुए । और यह जिन्दगी ठहर गई सी क्यों लगती है?
जरूरतों की पूर्ति भी कभी--कभी कितनी आवश्यक लगने लगती है ? उसके अन्तर से एक हूक सी उठी---उनसे क्षमा माँगलूँ । बुलालूँ उन्हें । आखिर उनसे मेरा सम्बन्ध कोई ऐसा वैसा नही, सात फेरों का है । कहीं भी रहें । हैं तो वो मेरे पति ,जीवन के प्रथम पुरुष । कोई भी स्त्री अपने प्रथम पुरुष को नही भूल पाती । फिर मैं तो पत्नी हूँ उनकी । पति से क्षमा माँगने में क्या मान और क्या अपमान । और इससे भी बडी बात है कि न पति के बिना स्त्री की राहें आसान होतीं हैं न पिता के बिना बच्चों की ।
जब गायत्री के अन्दर पति प्रेम का सागर उमडता है तो किनारे दूर तक भीग जाते हैं । उसे खुद में पच्चीस दोष नजर आने लगते हैं ।
मैं क्यों तभी अपनी बात कहती हूँ जब वो नाराज होते हैं । जीवन का अब जो भी रूप है ,खुद गायत्री ने भी तो स्वीकार कर लिया था फिर किस बात का मलाल ?
वो रास्ता बनाते गए वह पीछे हटती गई अब शिकायत किस बात की । कि शान्त रहकर उनकी बात क्यों नहीं सुनती । नही ज्यादातर गलती उसकी खुद की है । उसे लगता है कि पति का दिल जीतने की कोशिशों में कुछ कमी तो रही है । क्या वह कोशिश फिर नही होसकती । जरूर हो सकती है । होनी भी चाहिये । दूरियाँ बढाने से बढती हैं . फिर पति बिना जीवन भी कोई जीवन है ?
और उस सर्द खामोश रात में गायत्री एक बार फिर सिर्फ एक विह्वल प्रेमिका की तरह अपने पति को याद कर रही थी । हमेशा की तरह ही ये वो पल थे जब उसके सामने सिर्फ अपना प्रेम था । ऐसा प्रेम जिसमें प्रिय की खुशी के लिये कुछ भी करना कठिन या असंगत नही लगता । इस भाव के सामने वह अक्सर सब कुछ हार जाती है । अब भी हार कर मन ही मन कहे जा रही थी---"कितने दिन होगए तुम्हें देखे बिना ! कितने कठोर हो ! मेरी बातों का इस तरह बुरा मान गए । पर सच मानो तुम्हारे बिना जिन्दगी जिन्दगी नही है । जहाँ तुम हो वही मेरी खुशी है । मेरा जीवन है और मेरी मुक्ति है । काश एक बार सिर्फ एक बार मेरे हदय में झाँकते और देखते कि कितना वीराना है वहाँ । पुकार है तो सिर्फ तुम्हारी । तुम कैसे भूल गए कि तुम्हारी खुशी के लिये मैंने जहर भी पी लिया ,ऐसा जहर जिसके विषय में कोई स्त्री विचारों में भी नही सोचना चाहेगी । सिर्फ इसीलिये तो कि तुम्हें मेरे प्रेम पर विश्वास हो । इसके बाद भी मुझे जीवन का यह उजडा सा रूप मिल रहा है । मुझे यूँ न उजाडो प्रिय । तुम्हारे बिना मैं जी तो सकती हूँ पर खुश नही रह सकती किसी भी तरह । तुम मुझे गुनाहगार मानो पर दूर न जाओ । सजा दो । तुमसे दूर रहकर जीने का अब साहस नही है मुझमें ...। मुझे क्षमा करदो ,आ भी जाओ प्रिय ?"
गायत्री के अन्दर उमडा सैलाब आँखों से उमड कर बहने लगा । चेहरा आँसुओं से भीग गया । और  धार गर्दन से होती हुई बालों में समाने लगी । शायद एकाध सिसकी भी निकल पडी होगी ।
मम्मी ?--रोहित कुनमुनाया । गायत्री का ध्यान बेटे की तरफ गया । 
"मम्मी क्या कोई बुरा सपना देखा ?"--आँखें मलता हुआ रोहित  माँ को देख रहा था  
"रोहित ,मेरा प्यारा मासूम बेटा ."--गायत्री जैसे सपने से जाग गई उसका यथार्थ , उसका वर्त्तमान और उसका भविष्य उसके दो बेटे , ...विसंगतियों से अभी पूरी तरह परिचित नहीं हैं फिर भी कही दब गए से लगते हैं . दूसरे बच्चों जैसी उनकी कोई मांग नहीं होती . बच्चों जैसी जिद नहीं करते . ,बच्चे जिन्हें स्नेह और सम्बल की जरूरत है.
अपनी उम्र से कई साल आगे जाकर खड़ा होगया मोहित बड़ों की तरह सोचने लगा है .घर के कामों को एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह करता है लेकिन मैं उसे क्या दे रही हूँ ?एक रुखी उदासीन और वीरान माँ भला बच्चों को क्या दे सकती है ?" 
गायत्री की सोच की दिशा ने एकदम मोड ले लिया । 
नन्द ने जो भी किया उसका परिणाम मुझसे कही ज्यादा ये बच्चे भोगेंगे .अगर बच्चों को पिता का सही संरक्षण मिलता तो गायत्री एक बार अपना दुःख भूल जाती .बच्चों को पिता की कितनी जरूरत होती है ? पिता का जरा सा सम्बल ही उनके लिये बडा आधार होजाता है । 
पर पिता को तो यह भी ध्यान नही है कि दो मासूम उसका इंतज़ार करते रहते हैं ,जो उसके अपने हैं क्या यह भी उसे मैं ही याद कराऊं? 
गायत्री के जख्म हरे होगए । 
अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने की बजाय जो दूसरी दुनिया बसाकर बैठा है जिसने अपने वचनों का रत्तीभर पालन नही किया उससे स्नेह की भीख माँगेगी गायत्री ? क्या उसकी जरूरतें इतनी प्रबल होगईं हैं कि वह उसके सामने गिर जाए जो उसके अधिकार और सम्मान को भूलकर , उसके प्रेम और समर्पण को ठोकर मारकर ,तन-मन-धन से कहीं और समर्पित है ?
बहुत मनुहार करने पर वह आ भी जाए तो भी क्या होगा ?
नन्द उसकी मनुहार का अर्थ केवल उसके एक औरत होने से लगाता है । ऐसी औरत जिसे केवल पुरुष का 'प्रेम' चाहिये । उसके प्रेम जताने का वही एक ही तरीका ।....गायत्री को उबकाई सी आई । अपनाप से वितृष्णा हुई . स्नेह-विहीन संसर्ग, सतही और अनैतिक सा लगने वाला देहव्यापार ..पति कहलाने वाले व्यक्ति से क्या यही चाहती है गायत्री ? नहीं अब वह अपने बच्चों के लिए जिएगी .
वह इतनी भी कमजोर नही कि कुछ पलों का सुकून पाने के लिये वह अपनी प्रतिबद्धता को छोड एक गैरजिम्मेदार बेवफा और निर्मम पति को बुला कर उसके पैरों तले बिछने तैयार होजाए । क्योँ भला ? सही रास्ता तो नन्द ने छोडा है । राह पर उसे आना चाहिये । नही तो फिर नही । गायत्री भटके हुए आदमी के पीछे अब हरगिज नही भागेगी ...। हरगिज नहीं ...
"हाँ बेटा ,एक बुरा सपना देखा था . पर अब ठीक हूँ ."--गायत्री ने बेटे को गले लगाकर कहा .  

तभी चिडियाँ चहचहाने लगी । गायत्री ने एक सन्तोष के साथ दोनों बच्चों को देखा और बिस्तर छोड दिया ।