बहुत बुरा हुआ ।
भगवान दुश्मन को भी यह दिन न दिखाए गल्ला-मण्डी के बाबू रामरज शर्मा के घर कोहराम मचा हुआ था । दरवाजे पर लोग समा नही रहे थे । पिछली रात उनका मँझला बेटा सोमनाथ नही रहा ।अनहोनी हुई है । तीस-बत्तीस साल की उम्र ही तो थी । बहू को देख कलेजा फटता है । सुन्दर सुशील .किसी ने उसकी आवाज तक नही सुनी । उस पर कैसा वज्रपात हुआ है !
"अरे ! इससे बड़ा बज्रपात और क्या होगा कि बूढे़े बाप को जवान बेटे की अर्थी देखनी पड़े ।" --हर किसी की जुबान से बार बार यही निकल रहा था । ऐसे अवसरों पर कहे गए शब्द महज औपचारिक होते हैं उनका सम्बन्ध अक्सर हृदय से नही होता , लेकिन यह एक जवान बेटे की मौत थी । उस समय सब शोक सन्तप्त परिवार को सान्त्वना देते हुए खुद भी शोक में आकण्ठ डूबे हुए थे ।
सोम की माँ सुशीलादेवी जो हर माँ की तरह , बेटे के अच्छे हो जाने की उम्मीद पाले हुए थी और अन्त तक अनगिन देवी-देवताओं को मनाती रही---"हे मेरी शीतला मैया ! नंगे पाँव तेरी सात जातें करूँगी ! हे गिर्राज जी महाराज ! साल भर तेरी 'परकम्मा' लगाऊँगी ..हे मेरे कुल देवता !...अब वह यथार्थ की ठोकरसे माटी की पुरानी दीवार की तरह भरभरा कर जमीन पर गिरी पडी थी और भगवान को कोसते हुए कराह रही थी---"भगवान बैरी होगया । निरमोही । अब क्या करूँ ..कहाँ जाऊँ..!" और कहकर जार जार रो रही थी ।
"धीरज रखो सोम की अम्मा !..कितना ही रोओ, क्या कोई लौटा है , जो वह लौटेगा ?"---औरतें पल्लू से आँख-नाक पौंछती हुई बिलखती माँ को समझा रहीं थीं ।
"जरा रंजू को तो देखो । उसके सामने तो पूरी जिन्दगी पड़ी है बहन..।"
'रंजू ..रंजना ..सोम की औरत नही दुश्मन '--औरतों की बात सुन माँ के हृदय में अचानक बगूला सा उठा । वही तो सोम को खींचकर हमसे दूर अपने मायके ले गई ; नौकरी के लिये । बताओ तो इस घर में कौनसी कमी थी ? कौनसा खोट था हमारे पैसे में ? गोपाल वैद ने ठीक कर दिया था । न वहाँ जाता न दुबारा बीमारी उभरती । अच्छा-भला गया था । जाने कैसे कब बीमारी ने फिर पकड़ लिया । वहाँ कौन ध्यान देता ! माँ-बाप थोड़ी थे जो ..माँ का दुख माँ ही जाने ..।'
लेकिन इस समय रंजना के लिये यह सब कहना सहायता के लिये खड़े किसी दीन अपाहिज पर डण्डे बरसाना ही था । पति के बिना स्त्री का जीवन बिना छत वाले घर जैसा होता है । फिर वह नवयुवती हो ,बेरोजगार हो ,उस पर दो- दो बेटियों का भार हो तो उसकी असहायता व पीड़ा का कोई अन्त नही । इसे कौन जानता है कि सुन्दर सुदर्शन पति के साथ बिताए क्षणों की मधुर यादों की पीड़ा से कहीं ज्यादा अब उसके लिये दुखद थी पति की अभेद्य सी निस्संगता । खामोशी । कभी कुछ बताया ही नहीं बस 'सब ठीक है '-- का भाव चेहरे पर चिपकाए हमेशा मुस्कराता रहा जैसे उसे कभी कोई परेशानी या उलझन थी ही नही । हमेशा उसे खुश रखने के सपने दिखाने वाला उसका जीवन साथी उसे दुखों के दरिया में डुबाकर चला गया । हर सवाल को अनुत्तरित छोड़ कर कि आखिर उसे क्या परेशानी थी जिसे जीवनसंगिनी को भी नहीं बता सका? क्या पत्नी क्या केवल गहनों कपडों या दैहिक जरूरतों की ही भूखी होती है ? परेशानियों व उलझनों में क्या वह पति को छोड देती है ? सोम का मन उसके लिये सदा से ही ताला लगा एक अँधेरा कमरा रहा जिसे रंजना कभी खोल कर नही देख पाई । उसकी दुनिया उजड़ गई है , निया जो ठीक से बस भी नही पाई थी अभी ।
बाबू रामरज की हालत तो बीच रास्ते में ही सब कुछ लुटा बैठे यात्री की हो गई थी । वह फटी-फटी आँखों से कभी बनती हुई अर्थी को देख रहे थे और कभी सुलगते उपलों से उठते हुए धुँआ को । विश्वास ही नही होता था कि उनसे आधा फुट ऊँचा ,सलौना सोमनाथ सचमुच ही उन्हें छोड़ कर चला गया है ।लोग कह रहे हैं कि पीलिया निगल गया सोम को । पर राजरज बाबू को यकीन नहीं होता । भला पीलिया भी कोई ऐसी बीमारी होती है जो जान ही ले जाए ?? आँखें और नाखून पीले होजाना ,पेशाब पीली आना ,भूख कम लगना ,ये सारे लक्षण तो आम होते हैं और उन्हें मिटाने के साधारण से ही उपाय --चक्की वाले बाबा से गण्डा-ताबीज बँधवालो ,मंगल-सनीचर झाड़-फूंक करवालो ..बस और हाँ घी ,तेल,मिर्च-मसाले से जरूर परहेज करो । बिना बघारी मूँग की दाल ,उबली लौकी तोरई खाओ । मूली ,गन्ना, फलों का रस और जितना हो सके ग्लूकोज पिलाओ । तमाम लोगों को ठीक होते देखा है । पीलिया ऐसे भाग जाता है जैसे आग की झरप से ततैया ..खुद गोपाल वैद ने भी तो यही कहा कि ऐसी कोई खतरे वाली बात नही है । सुशीलादेवी ने इन उपायों में कोई कसर नही छोड़ी थी । घर में कटहल,करेला पनीर-पकौड़ा, ,पूरी-पराँठे आदि व्यंजन पूरी तरह प्रतिबन्धित होगए थे । सब्जी के नाम बस उबली लौकी--तोरई होती जिसे सब लोग खाते थे । सब्जी मण्डी से सुबह सुबह मूली पालक और चुकन्दर के थैले भर भर कर आ ही जाते थे । पन्द्रह दिन बाद हीमोग्लोबिन नापते हुए डाक्टर ने भी कहा था--"अमेजिंग।" पीलिया से कहीं कोई मरता है क्या ? फिर क्या होगया मेरे लाल को कि हमें यों तड़फने छोड़ गया ।
' सब करमों का खेल है --अन्त में यही एक निष्कर्ष शेष रहता है । वरना बीमारी लौटकर क्यों आती । जब रामपुर से आया था तब उसे पीलिया ने फिर से बुरी तरह जकड़ लिया था । आँखें कनेर के फूल सी पीली होगईं थीं । सारा बदन हल्दी मिले बेसन सा होगया था । बनियान रातोंरात पीली होने लगी थी । पेट गुब्बारे की तरह फूल गया था । पाँव रुई भरे गुड्डे जैसे होगए थे । और हाथ सूखे टटेरे जैसे । भूख तो लगभग खत्म ही होगई थी । मोहित उसे डाक्टर आहूजा के यहाँ ले गया । डाक्टर ने आँखें देखीं पेट-पीठ देखी । छाती ठोक कर बजाई । फूला हुआ पेट देखा ,अल्ट्रासाउण्ड कराया और मोहित को अलग ले जाकर कहा---"आपने बहुत देर करदी बेटा । लीवर काफी खराब हो चुका है । अब कोई कोशिश कामयाब होगी इसका चांस पाँच परसेंट भी नही है ।"
पर कहते हैं कि आशा से आकाश थमा है । बेटे के ठीक होने के उस एक-दो परसेंट चांस को दो माह से अपनी ओर रबर की तरह खींचते रहे । मन के साथ-साथ रामरज जी अपने बैंक-बैलेंस की ताकत भी काफी कुछ खो चुके थे । सूरज हर सुबह सुस्त और सहमा हुआ सा और आशंकाओं के अँधेरे में लिपटा हुआ निकलता था । अन्तिम पन्द्रह दिन तो हर शाम भय से काँपती हुई उतरती थी और रात जैसे लम्बी अँधेरी सुरंग का सफर हो जाती थी ,सोम की हर साँस के साथ आतंक से थर्राती हुई । आखिरी तीन दिन तो बहुत ही कष्ट के थे । पूरा बदन हवा भरे खिलौने सा फूल गया था । आँखें कौड़ी की तरह बाहर निकल आईं थी । साँस पेट में नही बनती थी । बेचैनी के मारे उलट गए तिलचट्टे की तरह तड़फता रहा । डाक्टर रुई जैसे बदन में सुई कोंचते रहे । फेफड़ों में ऑक्सीजन भरते रहे । सोम हर साँस पर आधा फुट उछल जाता था । और एक क्षण ऐसा आया जब डाक्टर में हारे हुए
खिलाड़ी की तरह कहा---" ही इज नो मोर...।"
उम्मीदें गर्म पानी डालने से तडफकर तितर-बितर हुए चींटों के झुण्ड की तरह बिखर गईं । डोर हाथ से छूट गई । इनकम टैक्स ऑफिस में बड़ा रुतबा रखने वाले बड़े बाबू रामरज धम्म सेजमीन पर गिर कर कराहे---सोमनाथ...बैरी कमर तोड़ गया ..। बूढे पिता को सहारा देने की बजाय जवान बहू और दो मासूम बेटियों का भार और कन्धों पर डाल गया । दगा-दुश्मनी और किसे कहते हैं ?"
अन्तिम संस्कार से लौटने तक रामरज का आँगन औरतों से खचाखच भरा रहा । और जैसा कि होता है उस समय सबका ज्ञान और वैराग्य जाग गया था । एक निस्संगता भी कि 'जिन्दगी क्या है । कर्मों का फल भुगतने के लिये...कोई किसी का नहीं । शरीर एक सराय है ,जीवन पानी का बुलबुला है । देखो कल तक जिस शरीर पर कोई खरोंच भी बर्दाश्त न थी उसी को फूँक कर आ रहे हैं ..ना घर तेरा ना घर मेरा चिड़िया रैन बसेरा ...' उस रात मोहल्लाभर में लोग उस ताजी मौत की चर्चाएं करते रहे ----
"चूक गए रामरज भैया । दो साल कुछ होते हैं ! मौत भला इतना वक्त किसी को देती है ? झाड़-फूँक की जगह पहले ही इन्हें डाक्टर को दिखाना था ।"
"अरे होनी जो न कराए ..ऐन वक्त पर आँख कान सब मुँद जाते हैं । पर ,सच्ची हुआ बहुत बुरा । एक अच्छा भला लड़का हाथ से चला गया ।"
"अच्छा भला तो मत कहो महेशबाबू !"---एक पड़ोसी सज्जन बीच में बोल पड़े---"काम धन्धा कुछ करता नही था । उस पर अब नशे में टन्न भी रहने लगा था...।"
"पर शुरु से तो वह ऐसा नही था । रामपुर जाकर हालत ज्यादा बिगड़ गई । ससुराल जाकर गलती करदी ..। घर-जँवाई और देहरी का कुत्ता , दोनों की ही हालत क्या होती है ... ।
"यह तो गलत बात है सोनी जी । आजकल कुत्तों की कदर इन्सान से कही ज्यादा होती है ।" गौतम ने बीच में ही सोनी को टोका तो धीरे से एक ठहाका बुलन्द हुआ ।
उधर रामरज जी के बन्धु-बान्धव भतीजे की मौत के दुख से ज्यादा मौत के कारणों का विश्लेषण कर रहे थे कि , 'बहू का पाँव शुभ नही रहा कि ....वैसा होता तो ऐसा नही होता ..कि आदमी कितना ही अपने आप में भूला रहे पर समय कब बदले पता नही . भैया भाभी ने भी कम कपट नहीं रखा भाइयों से पर जो भी हुआ , नहीं होना चाहिये था ..वगैरा वगैरा ।
लेकिन तमाम विमर्श के बाद भी एक शाश्वत प्रश्न अभी तक अँधेरे में ही था कि सोमनाथ जैसा सुन्दर नौजवान कैसे देखते देखते मौत के गर्त्त में चला गया । जिन्दगी से पलायन कर गया आखिर क्यों ? क्यों उसने जिन्दगी को पुराना बेकार खिलौना समझ कर यों ही फेंक दिया ? डाक्टर के बार-बार चेतावनी देने पर भी उसने शराब पीना कम नही किया बल्कि पहले से ज्यादा लेने लगा था । लगातार उन चीजों को अपनाता रहा जो सेहत खराब करें । बीमारी को बुलाना और उसे पालते-पोसते जाना आत्महत्या नही तो क्या है ? लेकिन आत्महत्या के जितने भी मामले होते हैं उनके पीछे प्रायः आर्थिक तंगी ,बदनामी, साथी की बेवफाई , कोई गहरा आघात , तात्कालिक आवेश ,मानसिक असन्तुलन आदि कारण ही पाए जाते हैं । सोमनाथ के सामने ऐसा कोई संकट तो दिखता नही था ।
"जो दिखता नही वह होता भी नही है , यह पूरा सच तो नही है सुनील भैया । "---मानो सोम ने मेरे कानों में कहा । हम सहपाठी तो नहीं थे पर अच्छे दोस्त थे । स्कूल के दिनों में मेरा उसका साथ काफी दिनों तक रहा था । मैं बहुत कुछ उसे समझता था । मुझे यकीन है कि अगर अपने बारे में वह खुद बताता तो कुछ इसी तरह अपनी बात कहता ---
"हाँ सुनील ,जो दिखाई देता है वह पूरा सच नही होता । हम लोग शरीर के अन्त को ही मौत मानते हैं, पर कई बार ऐसा होता है कि ज़िन्दा दिख रहा इन्सान अन्दर ही अन्दर मर चुका होता है । मै भी लगभग मर चुका था ..। अब तो वैसे भी मुझे खत्म होना ही था । न होता तो मेरे परिजन --माँ , पापा, पत्नी ,भाई, मेरा मल मूत्र और वमन समेटते ,मेरे लगभग निर्जीव होचुके शरीर में दवाएं भरते हुए मुझे उठा लेने के लिये भगवान से मूक प्रार्थना जरूर करते । इसलिये न चाहते हुए भी मैंने सबको अलविदा कहने के लिये खुद को तैयार कर लिया था । पत्नी की नजर में निठल्ला रह कर ,लोगों के ताने सुन-सुनकर और माता--पिता की मेहरबानियों पर परजीवी की तरह पलते रहने से तो मरना ही बेहतर था न ?
'परजीवी' शब्द गलत है '--तुम यही सोच रहे हो न ? माता-पिता ने मेरे ऊपर कितना कुछ लुटा दिया सिर्फ मेरी खुशी और कामयाबी के लिये । रजत और मोहित के बारे में सोचे बिना ही अपनी जमा पूँजी का एक बहुत बड़ा भाग...और मैं खुद के लिये परजीवी शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ ? देखा जाय तो गलत ही है पर वास्तव में यह वह सच है जिसे दुनिया देखती है ।
कितनी अजीब बात है कि अक्सर हमें दो तरह के सचों के बीच जीना पड़ता है । हाथी के दाँतों की तरह । एक खाने के दूसरे दिखाने के । होना और दिखाना ..दो अलग सच्चाइयाँ । इससे याद आया कि अपने घर में होने व दिखाने को अपनाए रखने की प्रवृत्ति मैंने होश सम्हालते ही देखी थी । मम्मी के दादी व चाचा लोगों के साथ काफी झगड़े होते रहते थे पर जब कोई रिश्तेदार आता तो सबके बीच बडा स्नेह दिखाया जाता था । परीक्षा में भले ही मेरी सप्लीमेन्ट्री आती लेकिन लोगों को बताया जाता कि मैं खूब अच्छे नम्बर लेकर पास हुआ हूँ । इसका सबसे बड़ा प्रदर्शन प्रधान मौसाजी के आने पर होता था ।
रुकिये, आगे की कहानी बताने से पहले मौसाजी यानी प्रवीण कुमार प्रधान के बारे में कुछ बताना प्रासंगिक है और ज़रूरी भी । मेरी इस कहानी में इनकी मुख्य भूमिका तो नही है पर अतिरिक्त भूमिका में भी उनका प्रभाव उतना ही है जितना किसी कहानी में देशकाल और संवाद का होता है । ये मम्मी के दूर के रिश्ते के बहनोई हैं । कद के ऊँचे और शानदार दिखने वाले मौसाजी राज्यमंत्रालय में बड़े अधिकारी थे । उनके दो बेटे हैं--सलिल भैया जो बैंक अधिकारी हैं और मुकुल भैया रेलवे में । दोनों भाभियाँ और गार्गी मौसी जो मम्मी से दो-तीन साल बड़ी थीं ,मम्मी से ज्यादा सुन्दर और रौबीली । कुल मिलाकर उनका छोटा सजा-सँवरा परिवार है । सब लोग साँचों में ढले हुए से एकदम फिट..अप-टू-डेट । मौसाजी पहले भोपाल में थे । रिटायर होने के बाद यहां आकर बस गए । यहाँ अनुपम नगर में उनकी शानदार कोठी है । कोठी से लगा बडा गार्डन ,एक बड़ी शानदार कार ,कीमती कपड़े ,रहन-सहन..मान-सम्मान और वह सब कुछ है जो एक बड़े आदमी के लिये जरूरी होता है । इसके अलावा मौसाजी का सामाजिक दायरा काफी बड़ा है । हर बडे़े अधिकारी तक उनकी पहुँच है । बड़े और पहुँच वाले लोगों से सम्पर्क बनाने के लिये पापा और मम्मी हमेशा ही खासे उत्सुकऔर प्रयासरत रहे हैं । मम्मी में बहुत सारी ऐसी बातें हैं जो परिवार की दूसरी औरतों में नही है । जैसे प्रभावशाली व्यक्तित्त्व, किसी को भी निरुत्तर कर देने वाली वाक्पटुता, जोश-जुझारूपन ,उत्साह ,दावतों की बढ़िया व्यवस्था ,शानदार मेहमाननवाजी । जिसे वे मानती हैं या दिखाना ज़रूरी होता है ,वे बहुत शानदार स्फिवागत व दावत करती हैं । फिर वे तो मम्मी के रिश्तेदार हैं , उस पर बड़े आदमी । उनसे सम्पर्क बनाना तो एक जरूरत भी थी ।
मैंने जो दिखावे की बात की थी , मौसाजी से सम्पर्क बढ़ने के साथ वह बहुत ज्यादा बढ़ गया था । मुझे खूब याद है कि मौसाजी के आने की सूचना पाकर हमारे घर में बड़ी तैयारियाँ होतीं थीं । कमियों को वैसे ही छुपाया जाता था जैसे किसी मंत्री के आगमन पर आनन-फानन में सड़कों के गड्ढे छुपाए जाते हैं । फालतू कपडे ,पुरानी मैली चादरें अलमारियों में ठूँस दी जाती थीं । अन्दर वाले कमरों के पर्दे खींच दिये जाते थे । बक्स में से नई चादर तकिया-कवर ,चटाई और नई क्रॉकरी निकल आती , जो किसी खास मेहमान के लिये ही खरीदी गई थी । साधारणतया हमारे घर में एक ही सब्जी बनती थी , वह भी मौसम की कोई सस्ती सब्जी लेकिन मौसाजी के खाने का खास इन्तज़ाम होता था । सब्जी में मटर-मशरूम , शाही पनीर ,मलाई कोफ्ता यहाँ तक कि उनके लिये चिकन-मटन और मँहगी शराब जैसी चीजें भी जुटाई जाती थीं । शराब की बोतलें उन्हें वे लोग दे जाते थे ,जिनका कुछ खास काम पापा करते थे । पापा को शराब की लत मौसाजी के सम्पर्क में आने के बाद ही पड़ी थी । एक बार पापा ने मना भी किया पर मम्मी कहतीं , " अरे अच्छा लगेगा कि वे अकेले पीते रहें । कुछ नहीं होता । आजकल हर बड़ा आदमी पीता है ।"
"फिर यार यह कोई ठर्रा थोड़ी है जिसे गरीब मजदूर पीते हैं ।"--मौसाजी भी जोड़ देते ।
मौसाजी के आने से पहले हमारी क्लास जरूर लगती थी कि देखो बेटा ,जब वे सब लोग आएं तो उन्हें मुस्कराकर नमस्ते करना ,उनके पाँव छूना । और शोर-शरारत बिल्कुल न हो । उनके बच्चों को देखा है कितने धीमे बोलते हैं । रज्जी मोहित सुनो ! नाश्ते के समय वहीं मत खड़े रहना भुक्खड़ों की तरह । वो खाने को बुलाएं तो भी मना कर देना । बाद में तो तुम्हें सब कुछ मिलेगा ही । सोम तू उन्हें टिंकल-टिंकल वाली कविता जरूर सुनाना ..। मुझे मौसाजी का आना अच्छा लगता था । मौसी जी ,भैया ,भाभी ,..सब घर में मुझे ही ज्यादा पसन्द करते थे । सलिल भैया मुझे हीरो कहते थे। और मौसाजी स्वीट बॉय। पापा-मम्मी मानते थे कि जिसे मौसाजी ने पास कर दिया उसने मानो सारी परीक्षाएं टॉप करलीं । सो हर बात में मेरी ही पसन्द चलती थी । कपड़े कैसे हों ,खाने में सब्जी कौनसी बने, सी.डी. किस फिल्म की मँगवाई जाए ,मम्मी कौनसी साड़ी पहन कर शादी में जाएं ,इन सबमें मेरी ही पसन्द पूछी जाती थी . मैं अपनी नजरों में भी बड़ा और बहुत खास होगया था । मौसाजी आते तो घर में उत्सव का माहौल बन जाता था पर जाते तो एक शून्य सा छोड़ जाते जिसमें हम अपने आपको छोटे सिक्कों वाली रेजगारी महसूस करने लगे थे और रेजगारी को बड़े नोटों में बदलने के मनसूबे भी बनाने लगे थे । मम्मी उनके घर में जैसे पर्दे चादरें सोफा देखतीं वैसे ही बल्कि उनसे अच्छे लाने की कोशिश करतीं । वे पापा को याद कराती रहतीं कि गार्गी जीजी को देखा कितनी सुन्दर सेट पहने थी ..कि तुम दो तीन अच्छे सूट सिलवा लो.. अच्छा नही लगता कि जब देखो एक दो ही जोड़ पहनते हो ..कि बैठक में एक नया सोफा डलवा लो ...और इस तरह उस शून्य को भरने के लिये कोई न कोई नया सामान लाया जाता ...। सच कहूँ तो मौसाजी के आने से पहले हमारा ऐसा कोई सपना नही था जिसे पूरा करने में इतनी जी जान लगायी जाए । दादी और चाचा लोगों सहित हमारे घर का माहौल बहुत ही सादा था । हमारी छोटी छोटी सन्दूकचियों सम्हालकर रखे छोटे-छोटे गिने चुने सपने थे जिन्हें हम आसानी से पूरे कर सकते थे । छोटी-छोटी खुशियाँ थीं जो आसानी से हासिल थीं , जैसे चलाने के लिये एक साइकिल (भले ही सेकिण्ड-हैण्ड) मिल गई, दीपावली पर पर कपडों का नया जोड़ आगया , इमली के झुरमुट में फँसी पतंग उतार ली या पापा हमें बडे पार्क में घुमाने ले गए । फिल्म देखने वीसीआर मँगा लिया । और ज्यादा हुआ तो दस रुपए में दो तीन घंटे के लिये वीडियो गेम ले आए ।
लेकिन होने व दिखाने का फर्क जैसे जैसे बढ़ता गया , हमारे छोटे से घर में अरमानों और सपनों की कतारें लग गई। हमें अपनी स्थिति किसी बड़ी कोठी के सामने पुरानी शैली में चूना-माटी से बने छोटे से घर जैसी लगने लगी और उस घर को कोठी में बदलने की कवायद शुरु होगई, बिना किसी आवाज के । होने व दिखने के अंतर को समझे बिना ही हम सब सीख रहे थे कि पैसा और चमक दमक का होना जीवन में कितना जरूरी है । फिर चाहे जैसे भी आए । हालाँकि आकांक्षाओं को विस्तार देना और सपने बुनना गलत नही है । खुद मौसाजी कहा करते थे कि सपने जरूर देखना चाहिये , देखोगे तभी पूरे कर सकोगे । लेकिन उन्होंने यह नही बताया और हमने जानना भी नही चाहा कि सपनों को पूरा करने का एक सही रास्ता भी मालूम होना चाहिये । कि साइकिल पर कार के साथ रेस लगाकर सपने पूरे नही किये जाते ,वह भी बिना अपनी क्षमता का अनुमान लगाए..। यह समझे बिना कि यथार्थ और सपनों के बीच एक लम्बा और श्रमसाध्य मार्ग होता है जिसे तय करने के लिये मार्ग की सही जानकारी ,संकल्प और अनवरत चलते रहने की जरूरत ही सबसे जरूरी होती है ।
हमारी इस समझ के लिये मौसाजी को जिम्मेदार हरगिज नही माना जा सकता लेकिन इससे इन्कार भी नही किया जा सकता कि उनके सम्पर्क का प्रभाव हमारे ऊपर वैसा ही हो रहा था जैसा एकता कपूर टाइप टी.वी. सीरियलों का कस्बाई निम्न-मध्यम परिवारों के लड़के-लड़कियों पर हो रहा है । मुझे अब साफ महसूस हो रहा है कि किसी को भी दो तरह के लोगों के सम्पर्क से बचना चाहिये । एक जिनके सामने हमें श्रेष्ठता का अनुभव होता है और दूसरे जिनके सामने हीनता और निम्नता का । वास्तव में आप सबसे ज्यादा कंगाल तब होते हैं जब आपके पास अपने विचार ,दृष्टिकोण और अपने मौलिक सपने न हों । खुद की बोई उगाई खुशियाँ न हों और वैसी खुशियों की ललक और कोशिश न हों । हमारे घर में एक अनकही सी खींचतान शुरु होगई थी । जिन्दगी हमारी थी पर उसे जीना चाहते थे दूसरों की तरह । कथित बड़े लोगों की तरह । यह तो बहुत बाद में जाना कि ऐसी खींचतान से पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाती है और पता भी नही चल पाता । जब हमारा ध्यान सिर्फ उड़ानों पर होता है ,तब पैरों के नीचे से जमीन छूटने लगती है । मैं बिना पंखों की ऐसी ही उड़ानों का एक भयावह परिणाम हूँ मैं ।
मैं , पापा-मम्मी का सबसे प्यारा बेटा । उनकी अपेक्षाओँ का केन्द्र । मुझे लेकर ही आगे बढ़ने और जिन्दगी को ऊँचाइयों पर ले जाने के ख्वाब देखे जाते थे । मुझसे बड़े भैया रजत प्राइमरी से आगे नही पढ़ पाए और मोहित छोटा भी था और कुछ कमअक्ल भी । रमा मेरी इकलौती बहन तो इस गिनती में थी ही नही । हमारे घर में लड़कियों को हमेशा से ही पराया-धन माना जाता रहा है । केवल मैं था जिसपर पर उम्मीदों का दबाब था ,स्मार्ट और सफल होने का दबाब था । लेकिन सफलाएं क्या केवल सोचने और दूसरों की तरह सोचने से मिल जातीं हैं ।
जिस जमीन पर खड़ा रह कर उन अपेक्षाओं को पूरी करने का पाठ सीखता ,वह जमीन बड़ी ही दलदलीय थी । कोई उस पर खड़े होने की भी नही सोच सकता था । चलना तो दूर...। बहुत छुटपन से ही मैं धरातल से दूर जिन नाजुक हवाओं में पल रहा था वहाँ कुछ था ही नही मेरे करने के लिये । बाहर के काम पापा करते थे । घर में मम्मी और रमा । रमा पूरे घर की सफाई करती थी । लड़की थी न । पापा ने हमें सड़क क्या मोहल्ले की जानी-पहचानी गलियों तक में जाने की मनाही कर रखी थी । मुझे कई सालों तक नही मालूम हुआ कि मम्मी के बालों की मेंहदी किस दुकान से आती है या डाक्टर गौतम अंकल का क्लीनिक कौनसी गली में है । संघर्ष और मेहनत से कभी परिचय हुआ ही नही मेरा । पढ़ने का कोई दबाब नही था । आसपास के स्कूलों में पापा की खासी जान-पहचान थी । बिना कुछ ज्यादा हाथ पाँव मारे हायर सेकेण्डरी परीक्षा पास करली ।
एक बार एक सर ने पापा से कहा था कि --"बाबू रामरज जी बच्चों की पढ़ाई पर जरा ध्यान दीजिये कुछ कमजोर हैं ।"
पापा ने कहा--"अरे मास्टर साहब , ठीक है । जितना पढ़लें तो पढलें नही तो मैं इतना तो कमा कर दे ही जाऊँगा कि मेरे बच्चे ब्याज से ही मजे में दाल-रोटी खाते रहें । अगर नौकरी भी करानी होगी तो बहुत बड़े बड़े लोग आए दिन मिलते रहते हैं, किसी भी फैक्ट्री-मालिक से कह दूँगा तो वह ना नही कर सकेगा ।"
ऐसे समर्थ और बच्चों की इतनी चिन्ता करने वाले पापा के होते मुझे कुछ सोचने की जरूरत ही कहाँ थी । आगे जरूरत पड़ भी सकती है , ऐसा मैंने या किसी ने सोचा ही नही । बी ए पास करना कोई मुश्किल नही था । हमारे यहाँ पढ़ाई और परीक्षा का हाल यह है कि चुटकी में आजाने वाली सीरीज को एक रात पढ़लो और पास होजाओ । मैं भी ग्रेजुएट होगया । घर में सबसे पढा-लिखे होने का अहसास अलग ही था । और तभी एक विशेष घटना घटी । वह यह कि मेरा विवाह होगया । ऐसा नही है कि घर में यह पहला विवाह था । हमारे परिवार में जैसे भी हो सन्तान की शादी कर देना सबसे जरूरी और लगभग अन्तिम जिम्मेदारी मानी जाती रही है । चाहे लड़का उस लायक हो न हो । मेरी दादी यह दुख लेकर मरीं कि उनके सामने एक चाचा की शादी नही हो पाईं । हालांकि चाचा ठीक से बोल भी नही पाते थे और पढ़ाई पाँचवी तक मुश्किल से की थी । कोई काम भी नही था । बाद में वे किसी गंभीर बीमारी के कारण चल बसे थे वरना पापा उनकी भी शादी करा ही देते किसी तरह । वाक् पटुता और व्यवहार कुशलता में मेरे पापा का कोई मुकाबला नही । उनकी मेहमान नवाजी से लोग प्रभावित हुए बिना नही रह सकते । मम्मी बताती हैं कि पापा के इसी व्यवहार के कारण सभी चाचा लोगों की शादियाँ हो सकी थीं । उस समय जब हम लोगों का अपना घर भी नही था । पापा के अलावा सब लोग ब्रेड या अखबार बाँटने जैसे कामों से सौ--दो सौ रुपए कमाकर सर्विस वाले होने का अहसास पाले हुए थे । यह पापा का ही कमाल था कि छोटे से कमरे में सब के रिश्ते तय हुए । शानदार जलपान के साथ अपनी दिलचस्प बातों और शेरो शायरी से आगन्तुक को ऐसा लुभाते थे कि वह बिना हाँ किये उठ ही नही पाता था । शादी के बाद तो सारा दारोमदार उनकी लड़की पर ही होता । जैसे भी हो , सम्हाले अपना घर-वर..। चार साल पहले बेरोजगार रजत भैया का विवाह पापा के इसी कौशल के कारण ही तो हुआ । और सच कहूँ तो मेरा विवाह भी । हालाँकि मेरे विवाह तक हालात काफी बदल गए थे । लड़की वालों से कुछ ज्यादा नही छुपाना पड़ा था । हमारा अपना बढिया मकान था । मैं बी.ए. पास नौजवान था .सुन्दर हृष्ट पुष्ट । सभी मानते थे कि शादी नही ,अच्छी शादी के लिये इतना होना बहुत है । एक निम्न मध्यमवर्गीय अच्छी शादी का मतलब तो आप जानते ही होंगे । रंगीन टी.वी.,फ्रिज़, अलमारी ,वाशिंग मशीन ,गाडी (फोर व्हीलर नही तो कम से कम बाइक ) जेवर, बारात का अच्छा स्वागत के साथ इतनी नगद राशि कि वरपक्ष के खर्च की आपूर्ति के अलावा कुछ राशि बच भी जाए और इन सबके साथ सुन्दर सुशील निर्दोष लड़की । तब आप मान सकते हैं कि मेरी शादी एक अच्छी शादी थी । परिवार में हुई अब तक की सबसे अच्छी शादी । हमारे घर के इतिहास में कभी कोई हनीमून नही गया था पर मैंने रंजना के साथ कश्मीर की वादियों में खूबसूरत आठ दिन बिताए । मेरे लिये यह एक बड़ी उपलब्धि थी । सजी-सँवरी सुन्दर पत्नी हर समय मीठी मुस्कान से स्वागत करे किसी भी माँग को पूरी करने तत्पर रहे ,एक पति की इससे बडी उपलब्धि और क्या होगी । सभी परिजन रंजना से खुश थे । सबसे बड़ी बात कि मम्मी खुश थीं । मेरे दिन तो जैसे पंख लगा कर उड़ ही चले थे । इससे आगे मुझे सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ी थी तब तक । पर खुशियाँ तितली जैसी होतीं हैं । एक जगह रहती ही कहाँ हैं । कुछ ही समय बीता कि उड़ानों में एक छोटे से कीड़े ने बाधा डाली --" आपने कितने दिन की छुट्टी ली है ? ऑफिस कब से जाना है ?"। -रंजना ने एक दिन मेरी शर्ट में बटन लगाते हुए पूछ ही लिया ।
"ऑफिस ?...जॅाब ?..." -मेरा दिमाग घूम गया । पापा ने रिश्ता तय करते समय जरूर मेरी कोई शानदार नौकरी बताई होगी । पर सच तो यही था कि मैं बेरोजगार था । दरअसल किसी रोजगार के लिये न मेरे मन में उत्सुकता थी न ही पापा को इसकी फिक्र । फिर किसी चाची ने चाचा लोगों से कभी नौकरी संबधी सवाल नहीं किये । दरअसल हमारे परिवार में पत्नी को पति की नौकरी और वेतन के बारे में जानने का हक कभी किसी ने नही दिया था । पति जो भी कमाए ,लाकर माँ को दे दे या न भी कमाए और पापा के वेतन से माँ ही घर चलाए । पत्नी तो बस खाना पका कर सबको खिलाए फिर खुद खाए और बर्तन धोकर दूसरे पत्नी-धर्म निभाए । मम्मी का भी यह नियम सख्ती से चला आ रहा था घर में । एक बार भाभी ने रजत भैया से कुछ काम करने को क्या कह दिया मम्मी ने उन्हें आड़े हाथों लिया --"क्यों री सीमा ! तुझे क्या पड़ी है कि कौन कहाँ ,क्या करता है कि नही करता। तुझे तो कोई कमी नही है न? " मम्मी को जरा भी पसन्द नही कि उनके बेटे से कोई भी ऐसे वैसे सवाल करे । माँ का इस तरह बेटों की ढाल बनना परम्परा थी । लेकिन रंजना दूसरी चाचियों और भाभी जैसी तो थी नही कि जो पति से कभी सवाल ही न करे. उसने परम्परा तोड़ते हुए मुझसे साधिकार सवाल किया और मैं असहाय सा उत्तर तलाशने लगा ।
" जाना क्यों नही ! बस सोच रहा था कि तुम्हारे साथ कुछ और समय बितालूँ फिर तो काम से बात करने की फुरसत भी न मिलेगी । "
"यह तो अच्छी बात है । मैं तो बस ऐसे ही जानना चाहती थी कि आपका ऑफिस है कहाँ ?"
" होगा यही कोई आठ-दस कि. मी.।"
" कौनसी कम्पनी में ? "
हद होगई । रंजना को यह भी जानना है । कोई बात नही । कई जगह नौकरी के लिये ट्राई तो किया ही था । मिली नही यह अलग बात है । एक दो जगह मिली भी पर पापा ने मना कर दिया । कहा -"भला इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के बड़े बाबू रामरज शर्मा , जिसके सामने बड़े बड़े लोग हाथ बाँधे खड़े रहते हैं , का ग्रेजुएट बेटा दो-चार हजार रुपल्ली की नौकरी करेगा ! " हाँ कम्पनियों फैक्ट्रियों के नाम मुझे याद थे ही तपाक् से बता दिया --"जे.के.टायर्स में । "--मैंने कह तो दिया पर नहीं मालूम था कि रंजना तहकीकात पर उतर आएगी । खुश होकर बोली --
"अरे कम्पनी तो बढिया है । आप वहाँ किस पोस्ट पर हैं? "
"ओह..पोस्ट भी !..ऐसे सवालों से तो कभी सामना ही नही हुआ था मेरा कि उत्तर देता । ऐसे में पापा का ही एक तरीका अपनाया जिसे वे मम्मी को चुप कराने के लिये अपनाते थे । मैं झल्लाकर बोला --
" भरोसा नही है तो कभी खुद आकर पूरी छानबीन कर लेना । "
रंजना संकोच के साथ बोली--"सॅारी , मुझे मालूम नहीं था कि यों बुरा मान जाओगे ।"
" इतना सन्देह करेगी तो बुरा तो लगेगा न ?"
वह सिर झुका कर चली गई । मैंने पलभर को चैन की साँस ली । पर वास्तव में चैन तो मेरा अब खत्म होने वाला था। अब जे.के. फैक्ट्री में काम करने वाला मैं एक बडा और जिम्मेदार कर्मचारी घर कैसे बैठा रह सकता था ? उसे इतनी छुट्टियाँ भी क्यों मिलेंगी ? ये कई सवाल थे जो मुझे रोज सुबह टिफिन बनवा कर घर से जाने को मजबूर करने लगे थे । मैं दिनभर कहीं समय बिताता और शाम को ऑफिस से आने की थकान दिखाता । रंजना मेरी सेवा में जुट जाती । और मैं शर्म की बौछारों से माटी के घरोंदे को बचाने की कोशिशें करता रहता । कभी उसे फिल्म दिखा कर , कभी फूलबाग चौपाटी पर आलू -टिक्की खिलाकर । मम्मी से इतना खर्च तो मुझे बिना माँगे ही मिल जाता था ।
सच कहूँ तो मैं सोमनाथ और वह झूठ कपट के साथ जीने वाला सोमनाथ एक बिल्कुल नही थे । मैं बड़ा सरल और भावुक इन्सान था । झूठ बोलने में तकलीफ होती थी लेकिन मैं रंजना को निराश नही करना चाहता था । उसका मुझपर जो विश्वास था उसे तोड़ने का साहस मुझमें नही था । सच कैसे कहता । इस बीच एक नन्ही परी ने आकर मुझे पिता का खिताब भी दे दिया । दादी कहतीं थीं कि , 'लडकी के जन्म से पिता के कन्धे झुक जाते हैं ।' लेकिन मेरे कन्धे मेरी बच्ची नही ,मेरी बेरोजगारी झुकाने लगी थी । मेरे रोम-रोम से चिपके सपने अब मुझे कचोटने लगे थे। अब सचमुच नौकरी की तलाश में यहाँ वहाँ चक्कर काटने लगा था । लेकिन जो काम मुझे मिलता ,उसे मैं नही कर सकता था क्योंकि शुरु से ही कुछ छोटा सोचने व करने की आदत ही नहीं थी और जहाँ मैं नौकरी करना चाहता था वहां मुझे कोई पूछता भी नही था । उन्ही दिनों मुझे तनाव से उबरने के लिये शराब का सहारा लेने की आदत पड़ गई जो उन दिनों घर में सहज ही उपलब्ध थी । रंजना से छुपकर हर हफ्ते दो-तीन लिफाफे स्पीड-पोस्ट से भेजता था । कम्प्टीशन एग्जाम भी देता था पर उसमें पास होने के लिये पढ़ाई व तैयारी भी तो चाहिये होती है । मैं असफल होता रहा और माँ चुपचाप मेरी असफलता और हताशा पर वात्सल्य का लेप लगातीं रहीं---"मेरे बेटे की मेहनत में कोई कसर नही । भाग्य ही साथ नहीं दे रहा । कहते हैं औरत के भाग्य से भी पती की ग्रहदशा सुधर जाती है पर रंजना का भाग्य भी तो ऐसा नहीं निकला । ब्याह से पहले तुम्हारे पापा की नौकरी नही थी । मेरे आने के महीना भीतर नौकरी का आदेश होगया था... ।" रंजना सिर झुकाए सुनती रहती थी पर मैं उसकी मनोदशा समझकर भी कुछ नही कर पा रहा था . पापा की सिफारिश पर मुझे एक जगह नौकरी मिली भी । हिसाब लिखने का काम था । जगह भी ठीक थी पर पता चला कि मेरी हैसियत वहाँ चपरासियों जैसी थी । भला मैं सोमनाथ शर्मा ,रामरज शर्मा का बेटा किस सहाब के झूठे गिलास उठाएगा । किसके लिये पान-सिगरेट लाएगा । किसकी मेज का कपडा बदलेगा और क्यों ..। क्या मैंने ऐसा सपना देखा था जीवन का !.. पापा ने सुना तो बोले --
" ऐसी--तैसी में जाए ऐसी नौकरी । मैं कोई दूसरा इन्तजाम करता हूँ ।"
पापा को हमेशा यही विश्वास रहा कि पैसे से कुछ भी हासिल किया जा सकता है । सच कहूँ तो इसी विश्वास ने मुझे वहाँ लाकर खड़ा कर दिया था जिसके आगे कोई रास्ता था ही नही । पर उन्हीं दिनों एक रास्ता मिलने की उम्मीद जागी थी । पापा के ही किसी रिश्तेदार ने बताया कि एक सुनहरा मौका है सोमनाथ के लिये । "
पापा ने कहा --"जितना भी रुपया लगेगा दूँगा बशर्ते नौकरी पक्की हो वैसे नौकरी कौनसी है ?”
"पक्की ? अजी साहब एक सौ दस परसेंट पक्की । रेलवे में टी.सी. की जगह है । "
रेलवे में ?--पापा के मन में सूरज सा चमका । यानी कि सेन्ट्रल की नौकरी । यहाँ तो स्टेट की नौकरी के ही लाले पड़े थे । देश भर में घूमो आराम से । वेतन भी अच्छा ही है । और फिर खालिस वेतन पर काम आजकल कौन करता है । वेतन पर ही निर्भर होकर क्या पापा तिमंजिला मकान तान पाते ? क्या रिश्तेदारों में इतनी इज्जत बना पाते ? पापा ने मेरी उस नौकरी के लिये तीन लाख रुपए ऐसे दे दिये मानो वे नौकरी नही मनपसन्द मिठाई खरीद रहे हैं । मुझे हैरानी हुई कि सब्जी तक के लिये पैसों की तंगी बताने वाली मम्मी को तीन लाख रुपए अखरे नहीं बल्कि खुश होकर सबसे कहतीं --"देखना हमारा बेटा जिस दिन नौकरी पर जाएगा मैं भजन मण्डली को बुलाऊँगी । माता का जागरण होगा और शुद्ध घी की बूँदी बाँटूगी...।"
उन दिनों हमारा घर बरसाती डबरों की तरह उत्साह से लबालब भर गया । मम्मी ,हर दुख को पूरी तरह जीती हैं उसी तरह खुशी का भी खुले मन से स्वागत करतीं हैं । हाँ वे नही देखतीं कि दुख या चिन्ता का कारण कितना उथला है या खुशी का आधार कितना खोखला । वह आधार सचमुच खोखला था । किसी ने इस रिश्वत-काण्ड को थाने तक पहुँचा दिया । पापा ने अपने आपको तो किसी तरह बचाए रखा पर हमारा सारा पैसा जैसे गटर में बह गया । मम्मी ने उन अनजाने दुश्मनों को जी भर कर कोसते हुए कहा—“लोगों को दूसरों की चढ़ती बेल नहीं सुहाती है । मरों का नाश हो...”
इधर स्थितियाँ कई स्तरों पर बदलने लगीं । पापा के रिटायरमेंट का समय नजदीक आता जारहा था । रजत भैया कुछ करते नही थे । दरअसल उनके पास कोई सर्टिफेकेट या योग्यता तो थी नही और छोटे मोटे और मजदूरी जैसे काम पापा की इज्जत के खिलाफ थे । भाभी, उनके दो बच्चे , हम तीन और पापा मम्मी और मोहित ..इतने लोगों के बीच कमाने वाला एक...। मम्मी भाभी पर अपनी खीज उतारतीं तो भाभी मुझे सुनाकर कह देतीं ---“हमारी रूखी-सूखी रोटियाँ भी अखर रही हैं और जिसके ऊपर लाखों रुपये लुटा दिये उससे कोई शिकायत नही ?”
मेरे पास चुपचाप शर्मिन्दा और हताश होने के अलावा कोई चारा नही था । तभी हमें एक और जबरदस्त झटका लगा । मँझले चाचा का लड़का सी ए होगया । और छोटे चाचा की लड़की सरकारी स्कूल में शिक्षिका बन गई । ये वे ही चाचा थे जिनके ब्रेड दूध बाँटने ,और ऑटो चलाने जैसे छोटे मोटे कामों और निम्नस्तरीय रहन-सहन को पापा मम्मी अपने परिवार की बेइज्जती समझते थे । कभी मौसाजी को उनके बारे में नहीं बताया था और उनसे एक निश्चित दूरी बनाए रखते थे । मोहल्ला वाले कहने लगे कि-“ जो भी हो शिबचरन और हरेश के बच्चों ने बढ़िया लाइन पकड़ ली । भाई, माँ-बाप ने पूरी ईमानदारी से मेहनत भी तो की है । भगवान ऐसे लोगों की नहीं सुनेगा तो किसकी सुनेगा ?”
अब हमारे घर में फिर से वैसे ही अभाव रोज पैदा होने लगे, अपेक्षाकृत पीड़ादायक और कलहकारक अभाव । मैं ग्लानि में डूब जाता । यह सब मेरे कारण ही तो हो रहा था । कई बार सोचता कि अपनी समस्या मौसाजी या चाचा को बताऊँ कुछ सलाह मागूँ पर मम्मी की हम सभी को सख्त हिदायत थी कि खबरदार ,घर की बात कभी बाहर मत कहना । बन्द मुट्ठी तो लाख की खुल गई तो फिर खाक की । मम्मी क्या जानें कि मेरा तो सब कुछ खाक हुआ जा रहा था । मन को उड़ने की आदत होगई थी और पंख जैसे बढने से पहले ही काट दिये गए थे । उधर तमाम सुरक्षा के बावजूद रंजना दूसरी बार गर्भवती होगई । मम्मी तो खुश हो गईं । उन्हें पोता मिलने की उम्मीद जागी पर हुई बेटी । मैं बेटी के जन्म को निराशा से बिल्कुल नही देखता लेकिन उसे पालने पढ़ाने की कुब्बत भी तो होनी चाहिये । बढ़ते हुए खर्चे घर में अशान्ति फैलाते जारहे थे । पर सबसे बडा कारण कि जिन लोगों से मैंने छुपकर थोड़ा बहुत पैसा उधार लिया था वे अब घर आकर तमाशा करने की धमकी देने लगे थे । इज्जत खाक में मिल जाने का भय अलग । तब मैं क्या करता । कहाँ से लौटाता पैसा ? वे मेरी शानदार घड़ी और बाइक जो मुझे ससुराल से मिली थी छीनकर ले गए ।
"बाइक चोरी होगई ."–-मैंने घर आकर पसीना पौंछते हुए कहा । मम्मी पापा ने ज्यादा कुछ नही पूछा पर रंजना की मूक उपेक्षा कह रही थी कि मेरी कहानी में कोई दम नहीं । उसने मेरे ऊपर गहरा वार करते हुए कहा --“ मेरे घरवालों को ही नहीं मुझे भी तुमने धोखा दिया है । मेरे घरवाले क्या जानें कि उनका दामाद इंजीनियर तो क्या चपरासी भी नही है ।" मैं रंजना को क्या कहता । उसकी एक एक बात सही थी । पर उसे सहन करना भी तो आसान नही था । मैं अकेला पड़ गया । ऐसे में मेरा सहारा केवल शराब थी । उन्ही दिनों मुझ पर पीलिया ने हमला किया । हालाँकि पापा-मम्मी के प्रयासों के कारण ठीक तो होगया लेकिन शराब लेना मेरी जरूरत बनता जा रहा था जिसे डाक्टर ने मेरे लिये ज़हर बताया था । घर में वह आसानी से उपलब्ध भी थी पर घर में न भी मिलती तो कैसे भी बाहर से लेता । लड़खड़ाता हुआ घर आता । रंजना सबके सामने शान्त रहती पर अकेले में खुद पर ,बच्ची पर और मुझ पर गुस्सा उतारती थी । मैं उसका अपराधी था । दोस्तों का कर्जदार था , माता पिता पर भी बोझ ही था । मुझे खुद से इतनी निराशा हुई कि अपना अन्त करना ही सही लगा और एक दिन मैंने फाँसी लगाकर समस्याओं को अलविदा कहना चाहा ।
फाँसी ...हे भगवान , कितना कष्टमय होता है यूँ मरना । जैसे पूरा शरीर नाक और आँखों से एक साथ निकलना चाहता है । रोमरोम चीखना चाहता है पर गला कस जाता है उफ्...। पर रमा ने देखा तो चिल्ला उठी । मुझे ऐन वक्त पर बचा लिया गया । उस समय मम्मी मेरे ज्यादा करीब थीं पर रंजना उतनी ही दूर । उसने दुख और हिकारत के साथ कहा --“यों जिन्दगी से भागना बुजदिली है । अगर हमसे जरा भी लगाव हो तो कुछ करो । बेकार भटकते हुए वक्त मत गुजारो । मैं अब और ज्यादा नही सह सकती । रामपुर में भैया ने अच्छी नौकरी देख रखी है । माँ का पल्ला छोड़करअपने पाँव पर खड़े होना सीखलो । दो बेटियों के बाप हो...
यह मुझे शर्मिन्दा करने और झकझोरने के लिये काफी था । मैं पिछले साल रामपुर चला गया । वहाँ एक कम्पनी में सेल्समैन की नौकरी थी । रहने के लिये रंजना के भाई ने ही एक कमरा हमें दे दिया था । एक गृहस्थ के रूप में वह मेरे जीवन की पहली सीढ़ी थी । पर मैं सन्तुष्ट नही था मेरे लिये वह बहुत कमजोर और छोटी सीढ़ी थी जो छत तक नही पहुँचाती थी । दो बच्चों व पत्नी के साथ एक परिपूर्ण व्यक्ति के जीवन की क्या ऐसी कल्पना की थी मैंने ? घर से ,मम्मी और पूरे परिवार से दूर रहने की जरा भी आदत नही थी मुझे । अकेले ही पथरीले कर्तव्य-पथ पर चलने का अभ्यास ही कहाँ था ? मुझे नही मालूम कि काँटे हटा कर रास्ता कैसे साफ किया जाता है ? मुश्किलों का दरिया कैसे पार किया जाता है ? जाने कैसे होते हैं वे लोग जो देश क्या परदेश में भी बड़े मजे से रह लेते हैं ? शाम को मैं थका-हारा घर लौटता तो रंजना मुझे हौसला देने व प्यार मनुहार करने की बजाय़ निस्संगता से सब्जी का थैला या दवाइयों का पर्चा पकड़ा देती । मुझे मम्मी की याद आती . -“उफ्...एक व्यक्ति की जिन्दगी ऐसी होती है ? क्या ऐसी होनी चाहिये थी ”
“तुमने अभी मिट्टी-गारा ढोने वाले या पत्थर तोड़ने वाले मजदूर नही देखे वरना समझ जाते कि तुम लाखों लोगों से बहुत अच्छा जीवन जी रहे हो ।“--रंजना मुझे एक संवेदन शून्य शिक्षक की तरह समझाती थी । काश मम्मी पास होतीं । काश कुछ पल उनकी गोद में लेट पाता । पापा के एक दोस्त ने एक बार कहा था कि अगर किसी से बदला लेना है तो उसके बेरोजगार बेटे का विवाह करादो । मैं यह जोड़ता हूँ कि यह बदला पिता से ही नही उसके बेटे से भी लेना होता है । अगर शादी न हुई होती तो मैं इस नौकरी को लात मार कर अपने घर चला जाता । मम्मी पापा के बिना मैं बहुत अकेला होगया । रंजना मम्मी के नाम से चिढ़ने लगी थी । इसलिये नही कि यह सास के लिये बहू की एक परम्परागत वितृष्णा थी बल्कि उसका मानना था कि मम्मी ने ही मेरी जिन्दगी बरबाद की है । मुझे कुछ बनना और अपने पैरों पर खड़ा होना सीखने ही नही दिया । अब मुझे मम्मी से मुक्त होकर जीने की आदत डालनी होगी । रंजना की ऐसी बातें मुझे दुख पहुँचातीं । अब मुझे वह पत्नी नही एक अजनबी औरत नजर आती थी जो कोई बैर निकालने का प्रण लेकर सामने खड़ी थी । ऐसी पत्नियाँ होतीं हैं जो सहानुभूति दिखाने की जगह ताने मारें ? पर यह कहने का अधिकार मुझे नही था । रंजना , उसके भाइयों और माँ की नजर में मैं केवल एक झूठा और निकम्मा इन्सान था ।
यह मेरे लिये अजनबी चौराहे पर खड़े होने की स्थिति थी जहाँ मैं दूसरों को फर्राटे से गुजरते हुए देख रहा था क्योंकि मुझे अपना रास्ता मालूम ही न था । एक पौधे को जैसे उखाड़कर दूसरी जगह रोप दिया गया था जहाँ जमने उसके लिये अनुकूल मिट्टी पानी तो था ही नही । वह मुरझा रहा था जिसकी किसी को परवाह नही थी । वहाँ सब लोग मुझे ऐसे देखते थे जैसे कोई प्रसाद के लिये हाथ फैलाए हुए भिखारी को देखता था । मेरे लिये जिन्दगी के प्याले का शरबत कड़वा होगया था । एक शानदार जीवन का सपना मेरे लिये सात तालों के भीतर रखे हीरे जैसा था । मेरे पास तो एक भी ताले की चाबी न थी । मैं घर से बाहर सड़क पर खड़ा महसूस कर रहा था खुद को । फिर पता नही मुझे कब पीलिया ने फिर से घेर लिया । भूख खत्म होगई । रंजना ज्यादा झल्लाने लगी थी । उसकी क्या गलती । वह मेरी गलतियों की सजा भुगत रही थी । फिर भी वह डाक्टर को दिखाने की सलाह देती रहती थी । एक-दो बार दिखाने भी ले गई । पर दवाएं काम ही नही कर रहीं थी । जब जीने का ज़ज्बा ही न रहे तो दवाएं क्या करेंगी । काश रंजना मुझे मम्मी की तरह घुटनों पर लिटाकर ,छाती से लगाकर कह देती कि 'चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा मैं हूँ न तुम्हारे साथ ?'
पर वह अबला क्या करती । वह भी घुट रही थी ।मैं अन्दर से बुझ रहा था । बाहर की रोशनी का अर्थ ही क्या था मेरे लिये । मैं कभी समझ नही पाया कि मुश्किलों में भी जीने का उल्लास लोग कहाँ से लाते हैं । कठिनाइयों में भी कुछ कर दिखाने का जोश कहाँ, किस बाजार में मिलता है । लोग कहाँ सीखते हैं ठोकर खाकर भी हँसने का हुनर । मुझे हँसना न सही जीना तो आ जाता । मौत का रास्ता तो नही तलाशना पड़ता । किस हवा ने मन की पूरी नमी सोख डाली थी ? लोग कहते हैं कि मुझे शराब ने मार दिया । कि पीलिया में इलाज की लापरवाही से मेरी मौत हुई । या कि बेरोजगारी की चिन्ता में मैं घुल गया । पर इन सबके ऊपर जो कारण था वह तो केवल मुझे ही समझ आ रहा था. घर जाने का मन तो होता था पर हिम्मत नही होती थी ।
रंजना कहती थी कि मम्मी-पापा को अपनी परेशानी बताना कर्ज में डूबे हुए व्यक्ति से उधार माँगने जैसा होगा । मुझे भी लगा कि सच ही तो कहती है रंजना । मम्मी-पापा को और परेशान करना ठीक भी नही है । हो सकता है मम्मी ताने भी मारें कि जाओ और ससुराल में जाकर कमाओ । कितना कमा लिया देखें तो जरा..। धीरे-धीरे बीमारी सिर चढ़कर बोलने लगी । जीने की कोई चाह नही रह गई थी मन में । एक दिन अचानक मोहित मुझे देखने चला आया और मुझे घर ले गया । पता नही मोहित किसी काम से आगया था या यह खून की पुकार थी ।
मम्मी--पापा मुझे देखकर बेहाल होगए । पर मुझे कुछ चैन मिला । बहुत दिन तक बाहर भटक रहे व्यक्ति के घर आने जैसा । हालांकि मेरी तरह ही किसी को यह नही मालूम था कि मैं मुश्किल से एक-माह का ही मेहमान हूँ । मोहित ने यह बात अपने सीने में अंगारे की तरह छुपा ली थी जिससे खुद झुलसता रहा अकेला । यह कैसी बिडम्बना थी कि जब मन में उजाले में सब कुछ देखने की चाह जागी मेरी जिन्दगी की गाड़ी अँधेरी अन्तहीन सुरंग में प्रवेश कर चुकी थी । मेरा लीवर गल चुका था । खून बनना बन्द होगया था । मैं असहाय मम्मी और रंजना को और कभी-कभी मोहित को भी किवाड़ के पीछे रोते हुए देख लेता था । अन्दर ऐंठन सी होती । पछतावा भी कि क्यों मैं खुद को खत्म करता रहा ? क्यों अपनों से,अपने-आप से प्रेम नहीं कर पाया ? क्यों जिन्दगी को दूसरों के नजरिए से बनाना चाहता रहा ? क्यों नही समझ पाया कि बिना उद्यम के मनचाहा कुछ नही मिलता ? मिल भी जाए तो हथेली पर रखे बर्फ के टुकड़े की तरह जल्दी ही विलीन होजाता है । पर तब यह सब सोचना बे मतलब ही था ।
सुनील , तभी मैंने कहा कि जो दिखता है वही हमेशा सच नही होता । दुनिया ने शायद यह नही देखा कि मैंने जब खुद खड़ा होना चाहा ,मेरे सामने सिर्फ एक अँधेरा था ,अन्तहीन सा अँधेरा । मुझे बड़ी शिद्दत से महसूस हुआ कि मुझे अपने पाँवों की सख्त जरूरत है ,जो किसी काम के ही नही थे । अपनी ही जिन्दगी जैसे पराई लगने लगी थी । ऐसे लोगों का जीना न जीना कोई मायने नही रखता । उन्हें प्रकृति भी बर्दाश्त नही करती ...सच कहता हूँ मेरी मौत न शराब से हुई है न बीमारी से । .मैंने खुद ही खत्म किया है अपने आपको ।