गुरुवार, 22 मई 2014

प्रलोभन

बिरमा ने टोकरी में बाँस की एक और तीली फँसाकर सामने नीम के पेड़ की ओर देखा । चबूतरा पर रूपल अभी भी पँचगुट्टे खेलने में मगन थी । बिरमा तीन बार पुकार चुका था पर वह टस से मस नही हुई थी ।
लड़की दिनोंदिन कामचोर होती जा रही है ।“--बिरमा मन ही मन भुनभुनाया—“गाँव वालों की शिकायत पर शिकायतें आ रही हैं---‘ओ बिरमा तीन दिन होगए । कोई सफाई के लिये नही गया ।गली-दरवाजों पर कचरे और गन्दगी के अम्बार लगे हैं । मुफत की खाने की आदत होगई है ना । अगर ऐसा ही रवैया रहा तो हम लालाराम को काम पर लगा लेंगे । हमें तो सफाई चइये । तू करे कि कोई और । फिर तू बैठ कर फिराता रहना भौंरा...
लालाराम !”---बिरमा का मन उस अकिंचन किराएदार जैसा होगया जिसे किराया न दे पाने के कारण मकान खाली करने की सख्त चेतावनी दे दी गई हो ।
चचेरा भाई लालाराम तो बैठा ही इस ताक में है कि वह विरमा के इन पन्द्रह-बीस घरों को भी हथिया ले । इन्ही घरों से तो बिरमा की रोजी--रोटी चल रही है । और कोई काम-धन्धा है भी नही । शहर में तो तमाम काम मिल जाते हैं । कोई इतनी छुआछूत भी नही मानता । उसके कई रिश्तेदार शहर में हैं । उसकी लड़की की नन्द का देवर स्कूल में लगा है । लैटरिंग बगैरा भी साफ करता है और फाइलें भी इधर से उधर पहुँचाता रहता है । मजाल है कि कोई मना करदे उसके हाथों से फाइलें लेने से । बस टेम्पो में सबके साथ बैठ कर जाते हैं वे लोग । बंसी ने तो कई बार कहा कि गाँव में क्यों पड़े हो फूफा । बहुत होगया गुलामों की तरह कीड़े-मकोड़ों की जिन्दगी ..
पर बिरमा का मन कभी तैयार नही हुआ यह गाँव छोडने के लिये । जनम से वह इसी घर में है । आँगन मुँड़ेली छप्पर,पाटौर,गली चबूतरा नीम का पेड सब अभिन्न रूप से उसके साथी हैं। फिर अँधेरे की आदी होगई आँखों को रोशनी का कोई खास मतलब नही होता। रोशनी रास भी नही आती । वैसे भी इन बीस घरों की बदौलत उसकी जिन्दगी आराम से कट रही है फिर वह क्यों कहीं जाए । लेकिन उसके सामने अब अक्सर यह सवाल आ खडा होता है कि काम पर जाए कौन? तीन दिन से वह इसी असमंजस में पड़ा था । 
घरवाली बसन्ती चार दिन से बुखार में भुँज रही है । नीम-गिलोय का काढ़ा दोनों टैम पिलाने पर भी कोई फायदा नही है । चक्कर और आने लगे हैं ।
वसन्ती के होते विरमा को कोई चिन्ता नही होती । मुट्ठी भर की काया है लेकिन नंगे पाँव ही दुनियाभर का काम निपटा आती है । गाँव में उसी की पूछ है । जिसे देखो वही टोकता है---
"बसन्ती भौजी क्यों नही आई । ए रूपा ,तेरी महतारी क्या कहीं गई है ? उसके बिना सफाई सफाई लगती ही नही है ।"
अम्मा बेचारी बूढ़ी होकर भी बैठी नही है । आसपास के जापे-जनेले वही निपटाती है । लोग कहते हैं कि बिरमा की अम्मा का हाथ जैसा सधा हुआ है आजकल के डाक्टर भी फैल हैं उसके आगे । दाईगिरी डिगरी नही 'तजरबा' माँगती है । चालीस साल से सम्हाल रही है अम्मा इस काम को । आज भी वह घर नही लौटी है ।
"कोई केस लम्बा खिच गया शायद"---बिरमा सोच रहा था । लौट भी आती तो उसे गलियों की झाड़ा-बुहारी के लिये तो नही भेज सकता बिरमा । एक तो बूढ़ी, ऊपर से गरीबी से टूटा शरीर । एक बार झुकजाए तो सीधी न होपाए । गाँव वाले तो साइकिल पर बिठा लेजाते हैं और छोड़ भी जाते हैं । खिदमत भी करते हैं । उसे काम के लिये भेजना तो बूढ़े बीमार बैल को हल में जोतना होगा । बिरमा इतना धरमार तो नही है ।
अब कोई सोचे कि बिरमा चला जाए काम पर तो पहली बात तो यह कि बसन्ती के होते उसे काम करने की आदत ही नही है । चबूतरा पर नीम की छाँह में वह ठौर पर ठाकुर बना बैठा बाँस के सूप डलिया बनाता रहता है । शादी-ब्याह के मौके पर बिक्री भी खूब होजाती है । फिर जहाँ खेती-किसानी है अनाज भरी कोठियाँ हैं वहाँ सूप--डलिया तो उतने ही जरूरी हैं जितना साइकिल वाले को हवा भरने का पम्प । पर दूसरी बात ज्यादा सही है कि बिरमा दमा का मरीज है । धूल तो उसके लिये कोबरा का डंक समझो । गली-दरवाजों पर झाड़ू लगाने की बिरमा तो सोच भी नही सकता ।
बचा 'पिरकास' । बिरमा ने उसे घरवालों में गिनना छोड़ दिया है ।
पन्द्रह-सोलह साल का उठती उमर का छोकरा है चाहे तो 'मिन्टों' में सारा काम करके आजाए पर राम भजो । काम के नाम तो उसकी अम्मा मरती है । पेंट-बूट चढाए खुद को 'सनीमा' का हीरो समझता है । शीशे में दस बार चेहरा देख जुलफें सँवारता रहता है । एक कंघा तो हरदम जेब में रहता है । 'काम का न काज का ,दुसमन अनाज का ।' खूब मार-पीट लिया पर अब तो पिटपिट कर गेंडे की खाल होगया है हरामी । जब देखो सीटी बजाना और 'सनीमा' के गीत गाना ...। अपने कपडे धोना तक तो शान के खिलाफ समझता है । गाँव में काम क्या करेगा । उस पर तो जुबान डालना भी कुँए में कंकड़ फेंकना है । ऐसी औलाद किस काम की ?
तो बची है केवल रूपा । बिरमा की नजरें अब इकलौती बेटी रूपल पर ही टिकीं हैं ।
"अरी रुपिया बेटी ,सुन तो जरा बापू की बात..."
ग्यारह साल की रूपा बिरमा की दूसरी बेटी और सबसे छोटी सन्तान है । भोली और चंचल । बड़ी कमली तो पाँच-छह साल पहले ही ब्याहकर ससुराल में रच बस गई । वह तो कभी-कभार तीज-त्यौहारों पर ही आ पाती है । हाथ-पाँव मेंहदी-महावर से रचे होते हैं । और वैसे भी वह अब तो मेहमान है मेहमान से भला कोई काम कराता है । हाँ कभी-गाँव की हमउम्र लड़कियों से बोलने बतियाने या अपनी नई साड़ी और बुन्दे दिखाने के लोभ में कमली रोटी लेने जरूर चली जाती है ।
साँवली-सलौनी रूपल अपने प्रति अभी से काफी जागरूक लगती है । सुबह-सुबह भी उसके बाल सँवरे देखे जासकते हैं और हाथ पाँव साफ ,तेल से चमचमाते हुए । उसे अपने खूबसूरत होने का पूरा यकीन है जो उसकी आम की फाँकों जैसी आँखों में साफ झलकता दिखाई देता है । वह बहुत ही जरूरी होने पर कंजूसी से मुस्कराती है जरा सा । 
दूसरे बच्चों की तरह उसे भी खेलना पसन्द है । गाँव में सफाई के लिये जाना उसे जरा भी पसन्द नही । खासतौर पर इसलिये कि लोग उससे अच्छा बर्ताब नही करते । जब कभी उसे जाना ही पड़ जाता है तो कोई न कोई उसे हिकारत से देखता हुआ टोक ही देता है---"अरे रुपिया , तू आई है । तू क्या सफाई करेगी ! झाड़ू तो ऐसे फेरती है कि कहीं धरती को लग न जाय । कहीं कूड़ा छोड देती है तो कहीं गन्दगी । तेरी अम्मा क्यों नही आती आजकल ? और 'रिसीराज' पंडिज्जी तो एक झिडकी जरूर देते हैं---"काय मौड़ी ,मेरे पूजा पाठ के टैम ही आती है ? आधा घंटा पहले या बाद में नही आसकती ..?"
रुपिया क्या घड़ी बाँधे फिरती है जो टैम की जानकारी रखे ।
उसे गाँव वालों के सामने माँ और दादी का गिड़गिड़ाना जरा भी पसन्द नही । किसी ने अगर थाली भर खाना या पुरानी साड़ी थमादी तो रूपा को अच्छा नही लगता कि वे आशीषों की झड़ी लगा देतीं हैं--"ऐहवाती रहो ,सुखी रहो भगवान तुमाए नाती बेटों को खुश रखे । लम्बी उमर दे..."
अजीब बात है । लोग हमें अगर कपडा खाना या पैसा खैरात में तो नही देते । हम काम भी तो करते हैं । फिर कहो कि काम जितना पैसा भी वे कहाँ देते हैं ! दो दिन काम न हो तो कैसी हाय दैया मचा देते हैं लोग । रूपल का वश चले तो हर घर से महीना के सौ रुपए ले कम से कम ..
रूपल बहुत कुछ जानने समझने लगी है ।
"रुपिया ...ओ रूपल बेटी ..जरा इधर आ । मेरी बात तो सुन लाड़ो ।"—बिरमा ने आवाज को भरसक मीठी बनाकर कहा ।
"वही से कहदो ,क्या कहना है ।" रूपल लापरवाही में गुट्टे उछालती रही ।
"अरी मेरी सयानी बेटी । एक चक्कर गाँव में लगा के तो आजा ।"
"हाँ ..इसीलिये मुझपर इतना लाड़ आ रहा है "--रूपल ने हाथ रोक कर कहा---"अपने लाड़ले से क्यों नही कहते । मैं कहीं नहीं जाने वाली..हाँ... " यह कह कर रूपा फिर गुट्टे उछाल कर लपकने लगी ।
बिरमा एकबारगी सुलग सा उठा । मन हुआ कि झोंटा पकड़कर खींच लाए । लड़की इस हाथ से निकली जारही है । काम के नाम झट से मुकर जाती है । लड़की की जात । यह हेकड़ी कहीं शोभा देती है । पराए घर जाएगी तो नाम डुबाएगी और क्या..
लेकिन बिरमा को जल्दी ही याद आया कि जोर-जबरदस्ती करने पर तो वह और बिफर जाती है फिर करवा तो ले कोई काम । ना यह सख्ती का नही नरमाई और चतुराई का समै है । थोडी 'पौल्सी' से काम लेना पडेगा । वह खूब जान चुका है कि किसन की अम्मा के गुण क्यों गाती रहती है रूपल ।
"तू तो खामखां बिगड़ रही है री रुपिया..। मैं तो तेरे मतलब की बात कह रहा था ..। किसन की अम्मा की बात ."
"किसन की अम्मा.."---रूपल की आँखें चमकीं जैसे किसी ने बुझते दिये में तेल भर दिया हो । और हाथ वहीं रुक गए । गाँवभर में एक किसन की अम्मा ही तो है जो उसे नाम लेकर बुलाती हैं । नही तो लोग "उसे..ए मौड़ी..काए बिरमा की सन्तान.. ओ जमादार की लड़की कहकर ही पुकारते हैं । लेकिन किसन की अम्मा उसका नाम लेकर अक्सर उसे छेड़ती रहती है---"अरी रूपल ,आज तो तू बड़ी सुन्दर लग रही है । ये बालों की खजूरी चोटियाँ किसने बनाईँ ? तूने खुद ने अरे भई वाह । रूपल तो बड़ी चतुर है । .अरे रूपा तेरे लिये मिठाई रखी है ।"
"मिठाई ..कौन लाया ?"--आत्मीयता पाकर रूपा के मन में बरसात के अंकुरों जैसी जिज्ञासाएं फूटने लगतीं हैं ।...क्या बड़े भैया आए हैं ? अम्मा भैया कहीं नौकरी करते हैं ? सुनीता बुआ भी नौकरी करतीं हैं ? कौनसे 'किलास' तक पढ़ीं हैं ? और किसन चाचा भी पढ़ रहे हैं ? फिर वे भी नौकरी करेंगे ।
तू पढ़ेगी । पढ़ाई के प्रति रूपा के मन में वही आकर्षण है जो दूसरे बच्चों में चाकलेट या आइसक्रीम का होता है । पर उसे कौन पढ़ाएगा । घर में किसी को इस बात का ध्यान नही है ।
"अरे तू चिन्ता न कर रूपा । तेरे पढ़ने की व्यवस्था तो मैं कर दूँगी । उसमें क्या है । किताबें पेन पेन्सिल स्लेट और बत्ती बस ...। किसी दिन चलकर स्कूल में नाम भी लिखवा दूँगी ।"
किसन की अम्मा की बातें सुनकर उसकी कल्पनाओं को पंख लग जाते हैं । आकाश में उडती चिड़िया की तरह वह बहुत दूर की चीजें देख लेती है । उसकी नजर काफी साफ और तेज होगई है । उसे यह सोच कर बड़ा अच्छा लगता है कि वह दीवारों पर लिखी सारी बातों को पढ़ सकेगी । खूब सारी कहानियाँ पढ़ेगी फिर जीजी की बेटी को सुनाएगी । दुकान वाले बाबा उससे मोलभाव में हेराफेरी नही कर सकेंगे । और हाँ तब तो वह प्रकाश भैया की पर्चियों को पढ़ सकेगी जिन्हें वह लिख कर और गोल करके फेंकता रहता है । पता नही वह क्यों लिखता है और फिर क्यों फेंक देता है ? जरा पूछने पर कैसे झिड़क देता है --"चल हट ,ये तेरे मतलब की नही हैं ।"
पढ़ लिख कर काबिल बन जाएगी तब उन शैतान बच्चों को भी सबक सिखाएगी जो उसे चिढ़ाते रहते हैं । किसन की अम्मा का तो कोई भी काम रूपा बिना घिनाए या हिचकिचाए कर सकती है । 
"बापू ,किसन चाचा की अम्मा कुछ कह रही थी ? क्या कह रही थीं ?" सारे पँचगुट्टों को एक तरफ सरका कर रूपल पिता के पास आगई ।
"तेरे लिये कुछ लाने की बात कर रहीं थीं ।"
"जरूर मेरे लिये स्लेट और किताबें होंगी .."

रूपा उल्लास से भर उठी और जल्दी से डलिया उठा कर बस्ती की ओर चलदी । 
बिरमा ओझल होने तक सजल आँखों से बेटी को देखता रहा ।
('पलाश' (राज्य शिक्षा केन्द्र भोपाल) में प्रकाशित)

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

वो ढाई घण्टे

यह कहानी सन् 1985 में लिखी गई थी । कहानी के पात्र व घटनाएं  भले ही काल्पनिक हैं पर यथार्थ को प्रस्तुत करती यह कहानी आपको कहानी कम रिपोर्ताज अधिक प्रतीत होगी । साथ ही यह कहानी हमारी शिक्षा-व्यवस्था के स्वरूप की जड़ों का भी संकेत करती है ।
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मार्च-अप्रैल का महीना फसल की कटाई ,मडाई का होता है । कटाई चाहे गेहूँ-चना की हो या फिर पाठ्यक्रम की । देखा जाए तो स्कूली शिक्षा का पाठ्यक्रम ही एकमात्र ऐसी फसल है जिसमें बुवाई ,निराई-गुडाई, सिंचाई और देखभाल की बजाय, ध्यान फसल की कटाई पर ही ज्यादा रहता है ।कटाई के लिये पूरा विभाग हँसिया पैने कर तैयार होजाता है । फसल के अच्छे उत्पादन का निर्धारण भी कटाई-कौशल पर ही निर्भर रहता है . 
उधर तो खेतों में गेहूँ-चना मसूर आदि खलिहानों में जमा होगया और इधर स्कूलों में जुलाई में बोई गई पाठ्यक्रम की फसल को काटने परीक्षा के हँसिया तैयार थे । हँसिया ऐसे-वैसे नही संभागीय बोर्ड के धारदार हँसिया थे । यानी आठवीं बोर्ड की परीक्षा थी।
पहला पेपर हिन्दी का था । 
परीक्षा-केन्द्र पर काफी चहल-पहल और गर्मजोशी का वातावरण था । केन्द्राध्यक्ष मि. गौतम की व्यवस्था एकदम दुरुस्त थी । स्कूल-प्रांगण में सामने ही एक बडा ब्लैकबोर्ड रखा था जिस पर परीक्षा सम्बन्धी निर्देश थे--
"परीक्षा-केन्द्र पर किसी बाहरी व्यक्ति का आना निषिद्ध है ।"
"परीक्षा कार्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं गोपनीय है । इसमें अनुशासन व सख्ती बनाए रखें ।"
"किसी भी छात्र-छात्रा पर अनुचित सामग्री मिली तो उसे परीक्षा से वंचित करते हुए कडी कार्यवाही की जावेगी ।"
"अनुचित सामग्री !!"---पर्यवेक्षक रामखिलाडी शर्मा मुस्कराए---"बोर्ड की परीक्षा है और हर कमरे में 'बोर्ड' है ही । सामग्री रखकर क्या कद्दू लेंगे ।"
रामखिलाडी शर्मा दूसरे शिक्षकों की तरह ही बडे 'परिश्रमी' पर्यवेक्षक हैं । हर परीक्षा केन्द्र पर इनकी बडी माँग रहती है । साथ में खूबचन्द गुप्ता है । संकुल के किसी स्कूल से है । झकाझक सफेद धोती-कुरता पहनते है । वे भी 'मेहनती' है लेकिन साथ ही बच्चों को पढाते भी हैं । दोनों एक ही कमरे में थे । उत्तरपुस्तिकाएं बाँटी जाचुकीं थीं । पर्यवेक्षक इधर से उधर लगातार टहल रहे थे ।
"पहले कापियाँ चैक करलो शर्मा जी ।"
"आप ही करलो । क्या फरक पडता है आपने करीं कि मैंने ।" शर्मा कुछ जाँचने व हस्ताक्षर करने से अक्सर कतराता है । 
गुप्ता जी काँपियों पर साइन करने लगे । साथ ही कक्षा की तरह डाँट-फटकार भी ---
"अरे बेटा ,यहाँ नाम नही रोलनम्बर लिखना है ।..अबे घोंचू तूने 5030 को 530 लिख दिया..ओफ्.ओ तूने सोमवार को सुबार लिख दिया है ... अबे उल्लू यहाँ तारीख नही वार लिखना है । पढ लिये बेटा ..बन गए कलेक्टर ..।"
"गुप्ता इतना शोर मत करो । परीक्षा है यह ।"
"क्या पढाते हो यार ।"--गुप्ता झल्लाया-- "ये तो लिखना भी नही जानते । पास हो भी गए तो आगे क्या करेंगे ।"
"करेंगे मेरा सिर---शर्मा भी कुछ खीज कर बोला---"अरे यार ! आम पूछ आम के लक्षण पूछ , यह कोई बात हुई ? आगे क्या करेंगे यह उनके मताई-बाप जानें । सरकार ने नियम बनाया है कि चौथी कक्षा तक कोई फेल नही करना है . ये लो पास करने में कौनसा पहाड़ तोड़ना पड़ता है . चार लिखो कि चालीस ..'मारगसीट' में नम्बर ही तो लिखने होते  हैं .यह तो कही लिखा नही है कि पास करने के लिये इतनी इतनी योग्यता होनी चइये . .प्राइमरी वाले सोचते हैं कि उनके यहाँ से निकल जाएं बस फिर हमें क्या भुगतें मिडिल वाले . 
"अरे यार मिडिल में भी तो बच्चों को जैसे तैसे निकालने की ही रस्साकसी होती है कि जाने हाईस्कूल वाले .. और वहाँ भी यही रिजल्ट बनाने की कबायद ..नही तो दस स्पष्टीकरण दो ,वेतनवृद्धि रुके .. शासन को भी तो वही आँकड़े ही चाहिये .योग्यता की चिन्ता किसे है . ऐसे में नुक्सान होता है बच्चों का ही .."
" शासन क्यों पालक भी तो सिरफ अच्छे नम्बर चाहते हैं . असल नकल से ..कैसे भी आएं .तब हम क्योंं सालों की चिन्ता करें .इसीलिये कह रहा हूँ, लिखादे..लिखादे यार । कोई पहली बार ड्यूटी दे रहे हो क्या । ऐसे गलतियाँ ढूँढोगे तो होगई परीक्षा ..।"
गुप्ता लिखाने लगा---"लिख बेटा स सरौता का । उसपर ओ की मात्रा लगा । म मछली का व वन का उस पर डण्डा तो लगा हाँ ऐसे और फिर रस्सी का र ..।" 
इतने में आठ की घंटी बजी । सुस्त पर्यवेक्षकों में जाग्रति आई। पेपर फडफडाए और जीभ से उँगली गीली कर करके बाँटे जाने लगे । गुप्ता थोडा सुस्त है । दो चिपके पेपरों को अलग करने में कुछ सेकण्ड लगे कि शर्मा ने पेपर छीन लिये---"क्या करते हो यार , बच्चों का एक एक पल कीमती है ।"
पेपर बँटने की देर थी कि तिवारी आ धमका । सहायक शिक्षक तिवारी को शत-प्रतिशत परीक्षा-परिणाम दिलवाने का ठेकेदार माना जाता है । हेडमास्टर जी के साथ-साथ पालकों से भी उसे काफी सम्मान और अधिकार मिला हुआ है । 
"एक ही घंटे में सब कराना है । पहला दिन है । कोई न कोई आएगा जरूर ।"
उधर मि गौतम गोपनीय रूप से हर कमरे में सन्देश पहुँचा रहे थे कि "अपने हाथ बचाते हुए काम करें । कहो तो सब कुछ होने पर भी कुछ न हो और कहो तो छींकने पर ही स्पष्टीकरण माँग लिया जाए । आ पडी तो कोई हाथ नही लगाएगा ..।" 
गुप्ता ने गुन गुनकर पेपर पढा । शर्मा ने आशाभरी नजरों से देखा--" कुछ समझ में आया ?"
"हाँ आ तो गया । ओटी करा देते हैं और क्या..।"
"ठहरो पहले तिवारी के ट्यूशन को देख लिया जाए ।"
"ट्यूशन ?--गुप्ता चौंका---ये तो इसी स्कूल के बच्चे हैं । ट्यूशन अपने ही बच्चों का ? क्लास में क्या करता है तिवारी ?"
"अरे गुपता जी , आप तो निरे भोलानाथ हैं । मास्टर कक्षा में पढाएगा तो टूसन पढने क्या परिन्दे आएंगे ?"
"फिर तो मैं मदद नही करूँगा । तिवारी को भी इसका अहसास होना चाहिये ।"
गाडी चलते-चलते रुक गई एक झटके के साथ । छोटे--छोटे यात्री इस अप्रत्याशित विराम से हैरान थे । दूसरे कमरों में तो गाडी धडल्ले से चल पडी थी ।
एक..दो..तीन..चार..पूरे पाँच मिनट होगए । सभी छात्रों की नजर इन दोनों माँझियों पर टिकी थी जो उन्हें अथाह 'भौसागर' से पार ले जाने वाले थे ।  
"करादो यार .." शर्मा ने बच्चों की कातर दृष्टि से पिघलकर कहा---"ये सब तुम्हारे ही भरोसे बैठे हैं । दूसरे कमरों में तो आधा करा भी दिया होगा ।" 
गुप्ता ने भी दयार्द्र होकर हिसाब लगाया एक गद्य ,एक पद्य एक जीवनी, एक पत्र और एक दो प्रश्न..बस बेडा पार ..। तो रामखिलाडी , यार कुछ तुम भी देखो न ।"
"हें हें ..गुप्ताजी..तुम तो जानते हो हिन्दी मेरा सब्जेक्ट नही है ।"
"हिन्दी किसी का सब्जेक्ट नही रहता "--गुप्ता ने झल्लाकर कहा--"कमजोरी जितनी भी है साली , हिन्दी में ही होती है ।" 
"क्या तुम्हें भी नही आ रहा ..।"
"कमबख्त लेखक का नाम भूल रहा हूँ ।---गुप्ता ने माथे का पसीना पौंछा-- ये बोर्ड वाले भी खूब हैं । भला इतना कठिन पेपर रखने की क्या जरूरत है ।" 
"किसी को बुलालो ..।"
गुप्ता ने खिडकी में झाँककर देखा ही था कि एक लडका लपककर आगया ।
"क्या चाहिये साब । सब बतादो..।"
"पहले तू इस गद्य का अर्थ ले आ । पता नही कौनसे 'दुबेदी' का है । और हाँ बाहर का इन्तजाम तो..।"
"आप चिन्ता मत करौ साब । एक लडका अटारी पर है दूसरा नदी की तरफ नीम के पेडपर और तीसरा दूसरे रास्ते में मन्दिर पर ..। कोई भी जीप गाडी इन्ही दो रास्तों से आएगी । जैसे ही कोई खतरा लगेगा , सीटी बजेगी । आप 'सतरक' होजाना ।"  
थोडी देर में ही गुप्ता के हाथ में कागजों का पुलिन्दा था और फिर इबारत शुरु होगई--"लिखो यह गद्यांश ...द के नीचे छोटा सा तिरछा डण्डा लगादो..और य पर डण्डा और बिन्दी..।....अरे सब एक ही पेज में मत लिखो सालो....मरवाओगे क्या ।"
"माडसाब ,इधर आके बोलो .।" एक लडका रौब से बोला ।
"यार शर्मा--गुप्ता की त्यौरियाँ चढ गईं--- "इस लडके की बडी परेशानी है । लिखना तक तो जानता नही । 
"कुछ मत पूछो । बाप जब देखो पीछे पडा रहता है । पीछे पडा है कि किसी तरह पास करवाओ । जब भी गली से निकलो बिना चाय--सिगरेट के उठने नही देता । 'बीओ' ,'डीओ' सबसे हेलमेल है उसका ।"
" फिर ?"
" फिर क्या , लिखाए बिना गति नही है । वैसे भी इतनी श्रद्धा रखने वाले का बच्चा पास न होगा तो कौन होगा । देखा नही रोज तर माल खाने मिलते हैं । कहाँ से ..?"
"इतनी सजगता पूरे साल पढाई के लिये रहे तो .?"
"सजगता !"--गुप्ता हँसा---"चोर बने हुए हैं हम । पकडे गए तो मुफ्त में मारे जाएंगे । न स्कूल हमारा न लडके हमारे ..।"
"कैसी दिलफटी बात करते हो गुप्ता ? अरे दिल भी तेरा ,हम भी तेरे । नमकीन भी तेरा ,पेडे भी तेरे ..।"--तिवारी ने तुक जोडकर ठहाका लगाया । 
कमरों में भारी सरगर्मी थी । खिडकियों पर फुसफुसाहटें, भागदौड , चिटों का आदान-प्रदान, कानाफूँसियाँ---'अरे साब सबको लिखादो' .निबन्ध होगया ? ..पत्र ले लो । ...क्या कुशवाह मना कर रहा है ? कल से उसकी ड्यूटी लगाना ही मत ..।
शिक्षकों के होंठ कमरे में हिल रहे थे आँखें मुख्य दरवाजे पर और कान सुदूर रास्ते पर चिपके थे । बीच-बीच में मि, गौतम जूतों की चरमराहट के साथ राउण्ड लगाते उस समय हर कमरे से सुनाई देता--"ए सीधे बैठो ,...आवाज मत करो ...शान्त रहो ।" 
उधर माथुर और तिवारी में तूतू मैं मैं होने लगी । माथुर का आरोप था कि तिवारी केवल अपने ट्यूशन वाले बच्चों को व्यक्तिगत तौर पर नकल करा रहा है । तिवारी माथुर पर बच्चों को बरगलाने  का आरोप लगा रहा था । शर्मा ने दोनों को किसी तरह शान्त कराया--"भाई लोगो यह समय व्यक्तिगत टसल को छोडकर बच्चों के हित पर ध्यान दो ।" 
तभी अचानक हडकम्प मचा । खबर हुई कि एक दो सवार वाली 'फटफट' (मोटरसाइकिल) आती देखी गई है । बस 'सफाई' का आन्दोलन सा छिड गया । खामोश रहने की चेतावनी युद्धस्तर पर दी जाने लगी । जिन छात्रों को बडी उदारता से लिखवा रहे थे , कुछ पूछने पर तमाचे रसीद करने लगे -
"कमबख्त ...स्सालो.. हमारी जान पर बनी है और इन्हें लिखने की पडी है । पास होकर बेटा पूछोगे भी नही कि माडसाब मरते हैं कि जीते हैं ..।"
शान्ति स्थापित कर सब दिल थामे उस गाडी का इन्तजार करने लगे । गाडी पास आई ..आई और फर्राटे से निकल गई ।
"अरे कोई ठेकेदार था "--तिवारी ने हँसते हुए बताया ।
"लेकिन पट्ठे ने सबकी हालत पतली करदी । क्यों गुप्ता !"
"मरवाओगे यार । रिजल्ट तुम्हारा बन रहा है ,खतरों से हम खेल रहे हैं ।"
"फिर वही कायरों वाली बात । गुप्ता जी भूलो मत कि आप बच्चों का भाग्य बना रहे हैं ।"

सभी पर्यवेक्षक फिर अपने काम पर तैनात थे । जरा खतरे का अहसास होते ही चिटें गोल होकर जेबों में चली जातीं और खतरा टलते ही फिर खुलकर बाहर आजातीं । इस तरह गोल होने व खुलने से चिटों की हालत खस्ता हो रही थी । लेकिन चिटों को भी यह सन्तोष होगा कि वे छात्रों के भाग्य-निर्माण में शहीद हो रहीं हैं । 
और भाग्य निर्माण में जरा सी कसर रह गई थी कि जिला शिक्षाधिकारी की जीप के आने की सूचना हुई । केन्द्राध्यक्ष सहित सभी पर्यवेक्षकों की साँस अधर में लटक गई । आनन-फानन में अभ्यस्त कलाकारों की तरह एक बार फिर पलक झपकते ही सफाई होगई ।
एक चौराहे पर गाँव के दो चार लोग बतिया रहे थे-- 
"सिन्हा साब अब क्या रेबडी लेंगे यहाँ आकर..?"
"सिन्हा बडा सिद्धान्तवादी है ।"
'हमने बहुत देखे हैं सिद्धान्तवादी । सब इसके ( उँगलियों पर रुपयों का संकेत करते हुए )खेल हैं ।"
"देखते हैं । वैसे चिडिया दाना लेकर उड चुकी है । सिन्हा को कुछ मिलने वाला नही है ।" 
जीप में से आधा दर्जन निरीक्षक उतरे । और एक एक कमरे में किसी आतंकवादी की तरह घुस गए । और बारीकी से तलाश करने लगे । अगर कोई प्रकरण नही बना तो निरीक्षण कैसा । उन्हें विश्वास था कि अपराधी अपराध का कोई न कोई चिह्न जरूर छोडता है फिर नदगवाँ गाँव तो संभागभर में प्रसिद्ध है नकल के लिये । कहा गया है कि कोशिश करने वालों की हार नही होती । सिन्हासाब ने एक छात्र को पकड ही लिया ।
"बेटा क्या नाम है तुम्हारा ?"
"ग गो गोपा....नही असोक..।" सिन्हा साब की पैनी नजर ने सब समझ लिया । और पूछताछ की तो लडके ने सब उगल दिया ।
"साब मेरी गलती नही है मुझे तो..।"
सिन्हा को मसाला मिल गया । लडके को कापी सहित ऑफिस में लेगए ।
"आप क्या सबको बेवकूफ समझते हो मि. गौतम । बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड कर रहे हो । जानते हो यह मामला कितना गंभीर है ।"
"अब जो भी हो साहब...सब आपके हाथ में ...।" 
"कोई हाथ में नही है । वीरेन पूरी रिपोर्ट बनाओ । देश का निर्माण इनके हाथ में है बताओ तो ...ऐसे लोगों के कारण शिक्षा विभाग की बदनामी होरही है ।" 
गौतम की सीधे सिन्हासाब से बात करने की हिम्मत नही हुई । उनके एक सहायक को कोने में लेजाकर मामला निपटाने पर विचार करने लगा । 
"मामला बहुत बडा है गौतम साहब । सस्पेंसन छोडो सीधे 'टर्मीनेसन' का प्रकरण है ।"  
"सर ,अब जो भी है आपके हाथ है । जैसे भी कहो...।"
"पहले नही सोचा यह सब...?"
केन्द्राध्यक्ष अधिकारी के चमचे के हर वार को गजब का धैर्य दिखाते हुए सहते रहे ।
इसके बाद दोनों के बीच क्या बात हुई यह तो पता नही पर सिन्हा अपनी टीम के साथ खुशी-खुशी गौतम जी से विदा ले रहे थे ।
कुछ ही मिनटों बाद धूल का गुबार छोडती हुई जीप ओझल होगई । 
गुप्ता ने अपना रोष पूरे वेग से निकाला--
"कल से हमारी ड्यूटी मत लगाना । आप हमें पागल समझते हैं सर ? हमारे कमरे में इतना बडा घोटाला ? अशोक की जगह गोपाल..! वह भी जिले के अधिकारी ने पकडा ..!"
"अरे भाई ,जिले का हो या संभाग का ..ये अधिकारी बुरी हवा की तरह आते हैं ,चले जाते हैं । इन्हें क्या पता नही कि कहाँ क्या होरहा है । इन्ही के यहाँ सेन्टर और 'सी एस' की दुकान लगती है । मनचाहे केन्द्र की बोली लगती है बोली । समझे । सख्ती को 'सख्ती' के अर्थ में लेना नासमझी है मेरे भाई । चिन्ता क्यों करते हो गुप्ता जी ?"
"अब जल्दी करो । ढाई घंटे की मेहनत के बाद भूख लगी है जोरों की ।" 
तिवारी ने कहा । शर्मा कागज की प्लेटों पर हलवा और पकौडे सजाने लगा । 

सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

कर्जा-वसूली

वर्तमान-साहित्य ( सितम्बर 2010) में प्रकाशित यह कहानी पिछले सप्ताह उज्जैन में प्रेमचन्द सृजन-पीठ द्वारा आयोजित कथा गोष्ठी में भी पढी गई । आप सबके अवलोकनार्थ यहाँ भी प्रस्तुत है ।
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बलीराम बौहरे का हाल वैसा ही था जैसा सरेबाजार जेब कटा बैठे किसी मुसाफिर का होता है । वह ठगा सा खडा रह जाता है । कोई उपाय सूझता ही नही ।
यह तो हद ही होगई । 
रामनाथ ने इस चैत में रुपए लौटाने की कैसी कसमें खाईं थीं कि, " पिरान बेचकर भी तुम्हारे रुपए लौटाऊँगा कक्कू ।" लेकिन वह सब भूलकर मानो बौहरेजी को ठेंगा दिखाता ठाठ से कैलादेवी की जात करने गया है । अकेला नही पूरे कुरमा को लेकर । बस वाला क्या इसका बहनोई है ? कि दुकानवाले चाचा-ताऊ ? जो इसे सेंतमेंत ही मेला करा देंगे । पाँच-सात सौ से क्या कम खर्च होंगे ! फिर रामनाथ का हाथ 'जगन्नाथ का भात.'.। पैसा आया चइये हाथ में ....। 
बलीराम को तो पता भी नही चलता पर सुबह नदी स्नान को जाते समय कलुआ खवास ने घेर लिया---"बौहरेजी इस बार तो रामनाथ ने रुपए लौटा ही दिये होंगे ।"
"नही "...क्यों ?"
"नही बस ऐसे ही । आज तडके ही रामनाथ को गाडी भर कर मेला जाते हुए देखा तो सोचा कि इस बार तो बौहरे का कर्जा को पटा ही दिया होगा उसने । पर सच्ची ?..नही लौटाया ? राम-राम बडी 'धरमारी' है...।" 
बलीराम दुबे का मन जैसे भाड का चना होगया । गाँव का बच्चा-बच्चा जान चुका है कि रामनाथ ने बौहरेजी से रुपए उधार लिये हैं । छह महीने के छह साल होगए हैं पर उसने लौटाने का नाम भी नही लिया है अब तक । और अब यह जात-मेला...।
"यह तो होना ही था ।"---गाँव के लोग आपस में बतराते हैं---"भैया बलीराम काका को 'बौहरगत' का शौक भी हुआ तो रामनाथ के लिये । सब जानते हैं कि रामनाथ को रुपए देकर तो भूल जाना ही ठीक है । वरना वसूली के लिये इतने चक्कर लगवाता है जितने ऑफिस का बाबू क्या लगवाएगा । गाँव में सालों से देखते आरहे बौहरेजी क्या जानते नही थे ।
बेशक जानते थे । सच्ची बात तो यह है कि वे अब लेन-देन का काम भी छो़ड चुके थे । लेन देन का काम तो उसी के वश का है जिसकी लाठी में दम हो । ईमानदार लोग तो खुद ही वादे पर रुपया लौटा जाते हैं पर सब तो इतने ईमानदार नही होते । उनसे रुपया निकलवाने के लिये तो जूता का जोर ही काम आता है । हाँ बलीराम के पिता ,दादा और परदादा को यह व्यवसाय खूब फला-फूला था । लोग न केवल समय पर रुपया लौटाते थे बल्कि एहसान तले दबे हुए बौहरे जी के बहुत से कामों को यों ही खुशी-खुशी करते थे । खाट बुनने, छप्पर छाने ,रस्सी बटने या दीपावली पर गाय-बैलों के लिये मोरपंख के बन्धन बनाने जैसे कामों के लिये बौहरेजी को किसी से कहने की जरूरत नही होती थी । साग-भाजी, गन्ना-गुड, और मौसम की चीजें अपने आप ही उनके घर आजातीं थीं इसीलिये न कि उनके पास लाठी थी ,जूता था ? "ज़र ज़मीन जोर के ,नही तो किसी और के..।" 
बलीराम जी तो नाम के बौहरे (गाँवों में ऋणदाता को बौहरे कहा जाता है ) हैं । उनकी न तिजोरी में दम है न जूता में और ना ही आवाज में । लेन देन का धन्धा ?, राम भजो । 
लेकिन उस दिन आषाढ की भरी दुपहरी में पसीने में लथपथ रामनाथ बलीराम के पैरों में गमछा रखकर रोने लगा तो वे असमंजस में पड गए ।
"मेरी उजडती मडैया को बचालो कक्कू"---रामनाथ गिडगिडा रहा था--"तुम्हारी बहू की 'नबज' भी नही मिल रही है । अस्पताल लेजाने के लिये जेब में एक छदाम भी नही है । एक हजारक रुपए हों तो दे दो काका । तुम्हारा औसान 'जिनगी' भर नही भूलूँगा ।" 
बलीराम बौहरे पल भर के हिचकिचाए पर संकट में फँसे आदमी से ना कहें भी तो कैसे । फिर भी एक बारगी उन्होंने उसकी याचना की धारा से खुद को किनारे करते हुए कहा--- "रुपए लेकर तू लौटाता तो है नही रामनाथ ।" 
"अब वो रामनाथ नही रहा काका । घर की लक्ष्मी जा रही है उसे बचालो । तुम्हारा गुलाम बनकर रहूँगा । 'पिरान' बेचकर भी तुम्हारे रुपए लौटाऊँगा ।" 
 बौहरे जी की तटस्थता कागज की तरह याचना की उस तेज धार में बह गई । पल्लू से आँसू पौंछते हुए पास ही खडी बौहरी राजबाई ने भी सहारा लगाया---"दे दो बिचारे को मुसीबत का मारा है ।" 
बौहरेजी ने बडी हिफाजत से रखे सौ सौ के दस नोट लाकर रामनाथ को थमा दिये । ये रुपए उन्होंने हरिद्वार जाने के लिये अलग से बचा रखे थे । आमदनी का जरिया अब केवल छोटी सी दुकान ही है । । जमीन की आधी उपज तो जमीन में ही लग जाती है । वैसे भी पैसे को वे बहुत सोच-समझकर खर्च करते हैं । उन रुपयों को देते समय उन्हें लगा कि जैसे कोई अपनी जमा की हुई गुल्लक को सौंप रहा हो । रामनाथ ने माथे से लगाकर कहा--
"भगवान ने चाहा तो इसी कातिक में लौटा दूँगा काका । तिली बाजरा ठीक-ठाक होगए तो...नही तो चैत में पक्के ..।"
कार्तिक की फसल आई । बाजरा कुट-फटककर घर आगया । तिली झडाकर कनस्तरों में भर ली गई 
थोडी मूँग भी होगई थी । रोज मँगौडे बनने लगे । तिली गुड के साथ कूटी जाने लगी । महक बलीराम बौहरे की नाक तक पहुँची पर इससे पहले कि वे पैसों का तकाजा करते रामनाथ की घरवाली खुद काकाजू को पल्लू से पाँव छूकर गुड तिली वाली बाजरे की टिकिया और तिलवा लड्डू दे आई । बौहरे जी स्वाद-सम्मान पाकर कह उठे--"वाह" । 
रुपयों की बात भूल ही गए ।
चैत में यह हुआ कि गेहूँ-चना खलिहान से घर पहुँचता इससे पहले ही सियाराम सेठ के आदमी अपना हिसाब चुकाने आधे से ज्यादा अनाज भरकर लेगए । 
"अब तो बच्चों को भी पूरा न पडेगा काका । अभी तो मजबूर हूँ ..।" रामनाथ ने खुद आकर बौहरे जी को बताया । बौहरे जी क्या कहते । बच्चों का निवाला तो नही छीन सकते वे ।
लेकिन तब से कितने चैत कातिक निकल गए । गढी--अनगढी नई-नई कथाओं के साथ । 
कभी बहनोई के भाई को 'टिसनिस' होगई तो कभी साले का बैल ऐन जुताई के मौके पर ही मर गया कभी बुआ के लडके के ससुर का एक्सीडेंट होगया । कभी लडकी कातिक न्हाई है या ससुर का 'चिन्नामित्त' (चरणामृत) लिया है सो उसके सास-ससुर को 'सवागा' (पाँचो कपडों सहित कई उपहार )भेजा है । तो कभी बच्चों के लिये नई रजाइयाँ भरवालीं । 
"अब काका घर-गिरस्ती लेकर बैठे हैं तो नातेदारी भी देखनी पडती है और जिम्मेवारी भी । मजबूरी है लेकिन मैं तुम्हारे रुपयों को भूला नही हूँ ..।"
मजबूरी में बौहरे जी भला क्या कहते और कैसे कहते ! लेकिन लोग हँसते हैं ---
"रामनाथ की बात ,गधे की लात..। बलीराम काका को बौहरगत करने मिला भी तो रामनाथ लुहार?" रामनाथ ,हरीचरन लुहार की निकम्मी औलाद । बाप के पाँवों पर रत्तीभर नही गया । वह बातवाला आदमी था । मेहनती था और पानीदार भी । पाँच--छह बीघा जमीन के अलावा अपना पुश्तैनी धन्धा भी चालू रखे था । जब भी फुरसत मिलती चिमटा-सँडासी, हँसिया-खुरपी, कन्नी-बसूला,  
बना कर गाँववालों को दे देता था । सालभर का अनाज तो ऐसे ही मिलजाता था ।
रामनाथ ने न कभी घन उठाया न हल की मूठ पकडी । दो-तीन बीघा जमीन तो पट्ठा बैठे बैठे ही खागया । रूपवती घरवाली आगई । आए दिन जलेबी--पकौडियाँ छनतीं । खाट में पडे सतरंगे सपने देखे जाते । वह तो एक दिन दुलारी को पता चल गया कि ये मौज-मजे जमीन बेच कर कराए जारहे हैं तो उसने अनशन ठान लिया । बोली--"खेती नही होती तो मिट्टी डालो ,खान में पत्थर तोडो पर काम करो ।"
अब दुलारी है रामनाथ की 'नाक का बाल' । सो बँटाईवाले को हटाकर खुद खेती सम्हाल ली है लेकिन रुपए को वह सुख का साधन मानता है संचय का नही । 
"रुपया तो रुपया है अपना हो या दूसरे का । रुपया हाथ का मैल होता है "---वह अक्सर दार्शनिकों की तरह कहता है---"इसे चिपकाकर क्या रखना । माया महा ठगिनी हम जानी .ये काहू के ना ठहरानी । खूबचन्द काका को ही देखलो जिन्दगी भर जोडते रहे । न ढंग का खाया न पहना । घी शक्कर को ताले में रखते थे । घरवाली के माँगने पर कटोरी भर ही निकालते थे । जब मरे तो गद्दे-तकिया तक से नोट झरे थे जैसे हवा से पके सूखे पत्ते झरते हैं । किसके काम आए । सन्तान को लडने-झगडने का कारन और देगए । रुपया तो खरच करने के लिये होता है ..।"
अपना यह दर्शन रामनाथ को इतना प्रिय है कि रुपया हाथ में आना चाहिये बस..खर्चने के दस रास्ते निकल आते हैं । चन्दा लँहगा-चुन्नी माँगती है उसे तुरन्त बढिया लहँगा-चुन्नी ला दिये जाते हैं । दीना ने घडी माँगी ,उसकी घडी आगई । और जो दुलारी उसाँस भरकर कहदे कि--"जिनगी बीत गई कभी नाक में सोने की लौंग तक न पहनी", तो रामनाथ के कलेजे को लग जाती है उसका वश चले तो लौंग क्या घरवाली को सोने से मढ दे । कहाँ के काका बाबा के रुपए । उनकी तिजोरी में पडे-पडे सड जाएंगे । क्या करेंगे लेकर ? हम उनका उपयोग तो कर रहे हैं कम से कम..।" 
पिछले साल रामनाथ के घर भैंस आगई थी । कहा तो यही कि ससुराल से ले आया है । वहाँ चारे-पानी का इन्तजाम नही था और यहाँ बच्चे दूध-दही को तरसते थे । लोगों ने बौहरेजी को सलाह दी कि तुम रामनाथ के घर से दूध क्यों नही बाँध लेते । नगद रुपए तो पता नही मिलेंगे या नही । रामनाथ ने सुना तो उसने भी यह प्रस्ताव खुशी-खुशी मान लिया । दो-चार दिन दुलारी खुद बढिया 'निपनिया' दूध ले जाकर काकाजू के घर दे आई । पर यह क्रम आठ दिन भी न चला । कभी दुलारी को 'कास्स-बाबा' की खीर चढानी होती तो कभी बेटी के सासरे खोआ भेजना होता । कभी पडिया छूट कर सारा दूध पी गई तो कभी भैंस ही उचक गई । इस तरह बौहरे जी चाय तक को तरस जाते । इससे तो डेरी से ही दूध लेना अच्छा था । मजबूरन वही शुरु कर दिया ।
इधर तो बलीराम इन्तजार करते कि कब रामनाथ अपना करार पूरा करेगा और उधर कोई न कोई सूचना चूल्हे के धुँआ की तरह रामनाथ की पाटौर से निकलकर हवा में फैल ही जातीं थीं और उसकी गन्ध बलीराम बौहरे तक पहुँच ही जाती कि कि रामनाथ के घर 'रेडू' ( रेडियो) बज रहा था कि रामनाथ का लडका आज बढिया 'सुपाडीसूट' (सफारी-सूट) और चमडा के चरमराते जूते पहन कर कहीं गया है । कि दुलारी कल बाजार से नए डिजान की पाजेबें लाई है कि.....भई रामनाथ के तो ठाठ हैं  । ऐसे ही एक दिन अचानक रामनाथ के आँगन में गाया जाने लगा था--"जच्चा मेरी सरद पूनों का चाँद...।"
कैलाबुआ ने नारद की सी भूमिका निभाते हुए राजबाई को सुनाया---"बौहरी सुना तुमने , रामनाथ की लडकी को बेटा हुआ है । खूब तगडे पछ की तैयारियाँ चल रहीं हैं । सबके कपडे ,बच्चे को चाँदी के कंगन ,सोने की हाय दो सूट दो कलसा लड्डू एक में बूँदी के और एक में सोंठ के ।"    
"सोंठ के ?"---राजबाई मन मसोस कर रह गई । दो जापे हुए पर एक बार भी न उसे हरीरा चखने मिला न सोंठ के लड्डू । डाक्टरनी ने साफ कह दिया---"चिकनाई बिल्कुल नहीं । सिर्फ दूध...।"
"दुलारी के हाथ के बने सोंठ के लड्डू तो बस.."..--कैला बुआ ने चटखारे लेकर कहा---"मुझसे तो आधा भी न खाया गया । निचुडवां घी, मेवों की भरमार सोंठ अजवाइन की 'खसबोई' अलग..।"
"तो इस बार भी रामनाथ का वायदा कुम्भ का मेला हुआ समझो ।"--बलीराम ने निराश होकर रामनाथ को बुलवा भेजा ।
"मैं तो खुद ही आ रहा था कक्कू ।"--रामनाथ पाँव छूकर बोला---"तुम्हारा नाती आया है । तुम्हारा 'आसिरबाद' है ।"
"मेरा आशीर्वाद तब मिलेगा रामनाथ जब तू रुपए लौटाएगा ।"--बलीराम ने ताकत लगाकर अपना रोष निकाला---"तूने जैसी मेरी बात खराब की है ,कोई कर नही सकता । जग हँसाई होरही है कि मैं किस फरेबी की सहायता करने चला था । तू एक बार कहदे कि रुपए नही देगा । समझ लूँगा जेब कट गई । उस दिन कैसे बकरी की तरह मिमिया रहा था । और अब रंग ही बदल गया । तेरे जैसा मक्कार आदमी नही देखा ।"    
तुम्हारा गुस्सा बाजिब है काका । पर समधियाने की बात आन पडी है । इसमें मेरी क्या तुम सबकी इज्जत है । पूरे गाँव की ...फिर काकाजू तुम्हारे रुपए तो समझो दूध पी रहे हैं ।
ऐसी-तैसी दूध पी रहे हैं---बौहरे जी बौखलाए---"मुझे अब ये तेरी चिकनी चुपडी नही, ईमानदारी की बात सुननी है आखिरी बार । तू रुपए देगा कि नही । देगा तो कब देगा । अभी बता । फिर जो होगा देखेंगे ।" 
"बस दो महीना बाद ही । गेहूँ चना की फसल आते ही सच्ची । जहाँ मानुस मरे वहाँ सौगन्ध ले लो ..।"--रामनाथ ने छाती पर हाथ रखकर कहा । पीछे से यह भी जोड दिया---" फिर भी कहो तो काका तुम्हारा ही हिसाब कर दूँ । नही भेजूँगा पछ । लडकी को एक धोती भेजकर हाथ जोड लूँगा ।" 
नौटंकी करने में रामनाथ का जबाब नही । जैसे छह साल वैसे दो महीने और सही , यही सोचकर बौहरे जी ने सन्तोष कर लिया पर अब...चैत की फसल आते ही मेला घूमने भी चला गया ठेंगा दिखाकर ।
"लौटेगा तो सही ..आज वह नही कि मैं नही ..।" बौहरे जी तिलमिलाते हुए आँगन में चक्कर काट रहे थे जैसे चौमासे में मक्खियाँ लगने पर बछडा तिलमिलाता है । राजबाई असहाय सी पति को देख रही थी । उसने जानबूझ कर नही बताया था वरना उसे सुबह ही रामो ने बता दिया था । यह भी कि आधीरात से ही दुलारी की कडाही-करछी खनकने लगी थी । 
और कोई मौका होता तो राजबाई कल्पना करती कि कैसे दुलारी के हाथ-पाँव मेंहदी--महावर से रचे होंगे । कैसे ठसके से धरऊआ साडी पहन कर हँसती-गाती गई होगी । ऐसी कल्पना राजबाई को यों तो हमेसा ही भली लगती है लेकिन इस बार उसके मन में उपले से सुलग रहे थे ।
"आग लगे ऐसे मौज-सौख को "--वह पति को सुनाती हुई बोली---"तुम क्यों अपना खून जलाते हो ? वह तो मौज कर रहा होगा पूरे कुनबा के संग..।"
"रुपए तो तूने ही दिलवाए थे अपने बाप को "---बलीराम अपनी पत्नी पर बरस पडे । (हर खटकने वाली चीज उनके लिये राजबाई का बाप होती है चाहे वह बुखार या सिरदर्द ही क्यों न हो ) तब तो कैसे टसुए बहा कर बोली थी दे दो बेचारा मुसीबत में है ...।"
"चलो खाना खा लो । मैंने भरवां भटा और लौकी का रायता बनाया है तुम्हारी पसन्द का..।"
"तू ही खा ले ।" बौहरे ताव से बोले --"मैं तो कौर--ग्रहण उसके हलक में से रुपए निकलवा कर ही करूँगा । भैरों को बुलवाता हूँ । वही इसे ठिकाने पर लाएगा । भय से तो भूत भागते हैं ।"
इधर बौहरे जी रणनीति बना रहे थे उधर रामनाथ सब कुछ भूलकर बाल-बच्चों के साथ मेला घूम रहा था । हाथ में जैसे कुबेर के खजाने की चाबी थी ।
"चन्दा, दीना ,दुलारी जो जो खरीदना हो खरीद ही लो, खाना हो खा लो फिर मत कहना ..उठी हाट मंगलवार को लगती है हाँ नही तो...।"
यही है इनकी जीवनदृष्टि । सुख-दुख बराबर । न दुखों से भागते हैं न खुशी मनाने का मौका छोडते हैं । दुख इनके लिये एक परिवर्तनकारी घटना है जीवन के अभावों और मुश्किलों को भूलने या पीछे छोडने का अवसर । उसे पूरी तरह जीते हैं । दुख चाहे पकी फसल में आग लगने का हो या बछडा मर जाने का । दुलारी खूब डकरा-डकराकर रो लेती है और दुख से मुक्त होजाती है खुशी के लिये मन से तैयार । खुशी चाहे पेड में पहली बार फल आने की हो या गाय 'ब्याने' की । तुलसी और टेसू-झाँझी के विवाह पर वह ऐसे सजती है जैसे उसके बेटे का ब्याह हो । 
जो लोग दुखों को ईमानदारी से नही भोगते वे सुखों का आनन्द नही उठा सकते---इसे अनपढ रामनाथ ने जाने कब कहाँ से सीख लिया है तभी तो बौहरे जी के तकाजों की चिन्ता किये बगैर ,झकाझक सफेद धोती-कमीज पहने ,कानों में कन्नौजिया अतर का फाहा खोंसे शान से मेला घूम रहा था । दुलारी नारियल-बताशे चढाकर मैया को मना रही थी---"हे बहरारेवाली मैया ! जैसे अब बुलाया आगे भी बुलाना..।"
शाम ढले घर लौटते समय दुलारी का मन तृप्त था । वह चन्दा को साथ लेकर गा रही थी---"इन बागनि के फूल मति तोडै माली पत्ते-पत्ते पै बैठी मेरी शेर वाली...।"         
खुसी के चटक रंगों में खोए रामनाथ ने जो अपने चबूतरा पर बलीराम बौहरे के साथ भैरों को बैठे देखा तो सब कुछ समझ में आगया । पत्नी-बच्चों को भीतर जाने को कहकर खुद स्थिति से निपटने  तैयार होगया । भैरों ने उसकी कमीज का कालर पककर कहा--- "क्यों रे भैन के...बेहया ! दूसरों के रुपयों पर गुलछर्रे उडाते जरा भी शरम नही आती ?"
भैरों बलीराम बौहरे का भान्जा ,इलाके का नामी लठैत है । दस-दस आदमियों से अकेले भिडने की ताकत रखता है । मामा के रुपए तो रुपए , वसूलने के लिये उसकी खुद की भी कुछ उधारी थी । एक बार जरा हाथ पकडलेने पर ही दुलारी ने उसकी माँ-बहन को समेटते हुए हंगामा खडा कर दिया था । उसे छिछोरा की उपाधि मिली सो अलग । आज इस सती-सावित्तिरी के गरूर को जरूर देखेगा भैरों । पर देखे किसे । रामनाथ तो पैरों में पडा था ।
"भैरों भैया ! जुबान खराबकर काहे छोटे बनते हो । तुम जो कहोगे करने तैयार हूँ ..।"
कोई सामने अडा हो तो दो दो हाथ करने में मजा आए । गिडगिडाते रामनाथ को देख आधा जोश तो ठंडा ही होगया । फिर भी कडककर बोला---"मामा के रुपए निकाल अभी । बहुत चक्कर लगवा लिये तूने । आज देखता हूँ...।"
"रुपए कहाँ हैं भैया ? चाहो तो मेरे पिरान ले लो ।"
"तेरे प्राणों का क्या अचार डालूँगा ? हमें रुपए चइये अभी ,इसी बखत..नही तो...तो.".--भैरों ने चारों ओर नजर दौडाते हुए कहा और फिर सामने खडी भूरी भैंस को देख आँखें चमकीं--"अरे हरामखोर ! बीस हजार की भैंस बाँध कर बैठा है और कहता है कि पैसे कहाँ हैं..।"
'चाँदुल' ??---एक साथ सबकी छाती पर जैसे किसी ने हथौडा मार दिया हो । दो महीने पहले ही बच्चों के लिये रामनाथ अपनी ससुराल से दूध देने तक के लिये एक भैंस खोल लाया था । वहाँ पहले ही बहुत सारे चौपाए थे । चारा पूरा नही पड रहा था । 'चाँदुल' बच्चों की जान बसती थी लेकिन भैरों जैसे आदमी से कौन जूझे !
भैंरों ने भैस खोल ली । किसी ने चूँ तक न की । गाँव के ज्यादातर लोगों की हमदर्दी बलीराम बौहरे के साथ थी । रामनाथ को सबक मिलना जरूरी है । ठीक किया भैंरों ने ।
भैरों की पीठ होते ही रामनाथ के घर में कोहराम मच गया । दुलारी गा गाकर चिल्ला-चिल्लाकर रोती रही---"अरे राssम ! भला हो इनका । पापी ,मेरे बच्चों के गले पर लात रखकर लेगए । उनके हलक से कौर निकालकर खागए 'धरमार'...।"उज्जैन
"बावरी हुई है क्या !"--रामनाथ समझा रहा था ---"भैंस ही तो ले गए हैं हमारी किस्मत तो नही लेगए । कम से कम रोटी तो चैन से खा सकेंगे । नही तो रुपया..रुपया..रुपया ...। रुपए न हुए बौहरे के प्राण होगए ।" 
उधर बौहरे जी गाँव के दूसरे छोर पर भी मानो सब कुछ साफ-साफ सुन रहे थे । दुलारी के बोल ओले की तरह तड-तड कनपटी से टकरा रहे थे । बच्चों की निगाह बेरी के काँटे सी कसक रही थी । अचानक उन्हें लगा कि उनकी यह उपलब्धि खोखली है सूखी लौकी की तरह । उनसे भैंस की देखभाल नही हो पाएगी । कहाँ बाँधेंगे । कौन दूध दुहेगा । कौन चारा लाएगा । और कौन दुलारी के ताने--उलाहने सुनेगा । भैंस लाकर उन्हें क्या मिला सिर्फ इस तसल्ली के कि होगई कर्जा-वसूली । वह तसल्ली भी भैरों को थी । रुपए तो आए न आए बराबर ही थे । 
जैसे जैसे रात गहरा रही थी बलीराम बौहरे को दुलारी का विलाप ज्यादा सुनाई दे रहा था । इसलिये उन्होंने भैरों को बुलाया और मन पक्का कर बोले---"भैरों ! भैंस को रामनाथ के द्वार पर बाँधकर आ ..हाँ हाँ अभी  इसी बखत..।"       
    

शनिवार, 21 सितंबर 2013

अर्थहीन

यह आमन्त्रण पर लिखी गई दहेज -कथा है । 'इक्कीसवीं सदी की चुनिन्दा दहेज-कथाएं '.-संग्रह ( स.दिनेश पाठक शशि)में शामिल भी है लेकिन आपको पढवाने की लालसावश यहाँ भी दे रही हूँ । आशा है आप पढेंगे और अपनी  बेबाक टिप्पणी से मुझे लाभान्वित करेंगे ।
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वेदप्रकाश को जो दरवाजे पर देखा ,मंजू की छाती में धड-धड होने लगी । चेहरा धूप में मुरझाए पत्ते की तरह लटक गया । 
"अभी पन्द्रह दिन भी नही हुए कि लिवाने भी आ गए ?"--मंजू ने सोचा 
अम्मा जी ने खुद ही तो कहा था कि अबकी बार मंजू को महीना--डेढ--महीना के लिये भेज दूँगी । बेचारी को साल भर से ज्यादा होगया मायके गए । यों साल-दो साल में महीना-पन्द्रह दिन की छूट कोई बडी छूट नही है पर इतनी भी क्या कम है ? 
सात-आठ साल में वह इतना जान चुकी है कि उस घर में बहुओं का मायके जाना कभी सहजता और सरलता से स्वीकार नही किया जाता । लिवाने वाले को एक-दो बार न लौटाया तो ससुराल क्या । ऐसे समय मंजू को सावन का एक लोक गीत याद आता है जिसमें भाई बहन को लिवाने ससुराल आता है । पहले तो सास-ननद की भौंहें तन जातीं हैं । सीधे मुँह बात नही करतीं लेकिन जब बहू खुशामद करती है कि--"तुम कहौ ए सासु पीहर जाउँ ,बारौ बीरन लैवे आइयौ...।" बडी मुश्किल से सासु बहू की बात मानती है पर कई शर्तों के साथ कि "जितनौ ए बहू कोठीनि नाज, उतनौ पीसि धरि जाइयो ,जितनौ ए बहू कुँअलनि नीर उतनौ भरि धरि जाइयो...." .."हे बहू तू मायके जाना चाहती है तो चली जा लेकिन पहले जितना घर में अनाज है सारा पीस कर रख जा । जितना कुओं में पानी है उतना भर कर रख जा..। 
अब जबकि बीसवीं सदी बीतने जा रही है ,ग्वालियर के उस पुराने मोहल्ला में उतनी कठोरता तो नही रही पर बहू के मायके जाने पर आसानी से सहमति तो अब भी नही मिलती । मिल भी जाए तो 'लिबउआ' खातिरदारी के नाम पर  रोककर आज-कल ,आज-कल करके दो-चार दिन तो ऐसे ही निकाल दिये जाते हैं । 
अम्मा की भी तमाम समस्याएं निकल आतीं थीं । दुखी स्वर में कहतीं अब मेरा मन कैसे लगेगा ? कौन भारी-भारी चादरों को धोएगा ? कौन इतनी सुबह ओम का टिफन लगाएगा ? कौन मेरे पैरों में 'नारान ' की मालिश करेगा ? ..
मंजू को खूब याद है कि उसका छोटा भाई इसीलिये उसे लिवाने जाने के लिये तैयार नही होता था ।
छोटे देवर ओमप्रकाश के ब्याह से पहले मंजू को परिवार की इस नीति  और सासु माँ की बातों पर खीज की बजाय हँसी आती थी । रौब और अधिकार भरी ही सही उसे अपने ऊपर सास की और देवरों की निर्भरता बुरी नही लगती थी  बल्कि उसमें अपने  महत्त्व का अनुभव होता था , लेकिन जबसे घर में ओम की बहू आई है उसे वे सभी बातें अखरने लगी हैं । आखिर वे नियम पूजा पर लागू नही क्यों नही होते ?उसका भाई जब चाहे लेने आजाता है और असहमति जताने की बजाय सब पूजा की विदाई तैयारी करने लगते हैं ।
"क्या महीना और क्या पन्द्रह दिन  ! "---वेदप्रकाश मंजू को समझा रहा था--" रहने को तो छह महीना भी कम पड़ेंगे . पर मेरा कुछ ख्याल है कि नही ?"
मंजू की माँ दामाद की बात पर पुलकित हुई । बेटी की सजल आँखें देख प्यार भरी झिडकी दी -- 
"बावरी हुई है क्या ? लल्ला जी का जी नही लगता होगा तेरे बिना । फिर रहना तो तुझे उसी घर में है । क्या चार दिन और क्या चौदह ..। 'घोडी घुडसाल में ही अच्छी लगती है' । समझी ! और यह तो सोच कि  सासरे में तेरी कदर है ,तभी तो ..".
"हाँ खूब कदर है "..मंजू ने कुढते हुए सोचा .
पहले वह भी इसे 'कदर' ही समझती थी भले ही डाँट-डपट और झिडकियों के रूप में । तो क्या हुआ अम्मा के लिये मेरे अलावा और है ही कौन ? माँ कहती है कि डाँटते भी उसी को हैं जिसे सबसे ज्यादा चाहते हैं । लेकिन ओम की बहू के आते ही मंजू को वह कद्र बेकद्री लगने लगी । क्यों ? जिेसे सबसे ज्यादा चाहते हैं क्या सारे छोटे और नीचे काम भी उसी से करवाए जाते हैं ? बर्तन माँजना हो ,बाथरूम साफ करना हो ,रोटियाँ सेकनी हों या कपडे धोने हों ,इन कामों के लिये तो मंजू है और बाजार में खरीददारी करनी हो , मेहमानों से मिलना हो, कहीं रिश्तेदारी में जाना हो तो पूजा .?
मंजू को काम से ऐतराज नही पर भेदभाव कलेजे को छेद कर रख देता है । आखिर पूजा में ऐसा है क्या ?"    
"पूजा भाभी में 'मैनर' है । अक्कल है । लोगों से मिलने ,बात करने का तमीज-तहजीब है । ज्यादा पढी लिखी है ...।"  रमा दीदी को पडोसन से कहते सुना था मंजू ने । 
रमा छोटी ननद है पर वह भाभी को न केवल समझाने का अधिकार रखती है बल्कि अपने नाम से पहले दीदी भी लगवाती है । घर में कितने ही छोटे हों ननद-देवरों का नाम खाली नही बल्कि दीदी और भैया लगाकर लिया जाता है लेकिन यह नियम पूजा के लिये क्यों नही है ? पूजा सबका नाम लेती है .फिर भी पूजा भाभी में 'मैनर' है । लेकिन मंजू खूब समझती है कि यह सब पूजा के मायके के कारण है । पूजा के तीन तो जवान भाई हैं । घर के मजबूत हैं । धौलपुर में बढिया मकान है । तीन-चार दुकानें हैं । पूजा जब भी मायके से आती है साथ में ढेर सारा सामान--दाल, चावल, पापड--बडियाँ ,अचार मुरब्बा कपडे मिठाई लाती है । 
"कुछ भी कहो रिश्तेदार मिलें तो ओम की ससुराल वालों जैसे ।"-- अम्मा की झुर्रियाँ चमक उठतीं हैं । वे सबको सुना कर कहती है । खास तौर पर मंजू को ।
मंजू मन मसोस कर रह जाती है । वह कहाँ से लाए यह सब । उसकी पारिवारिक दशा क्या अम्माजी से छुपी है । बाबूजी हैं नही । मुसीबतें झेलने के लिये अकेली माँ है । बडा भाई एक विधर्मिणी से विवाह करके कहीं दूर जा बसा है । छोटा भाई बिजली का काम करके थोडा बहुत कमा लेता है कुछ माँ कागज की थैलियाँ बना कर कमा लेती है बाकी बाबूजी की पेंशन से गुजारा होजाता है । 
जब रिश्ता हुआ था तब हालात ऐसे थे कि ससुर जी ने खुद बाबूजी से मंजू का हाथ माँगा था । वेदप्रकाश न तो ज्यादा पढे थे ना ही कोई काम-धन्धा करते थे । घरवालों ने सोचा कि शादी करदें बहू आने पर कुछ तो कमाएगा । सो तब सबका ध्यान केवल शादी पर था । देनलेन तो हाशिये पर चला गया था । पर किसन की शादी में जो सामान व नगद रुपया मिला घरवालों का नजरिया बदल गया । मंजू को भूलकर सब पूजा के गुण गाने लगे । जब भी कोई पूजा के मायके से आता है ,बाजार से गरम कचौरियाँ और जलेबियाँ मँगाई जातीं हैं । सौंफ बादाम की ठण्डाई घोंटी जाती है । शुद्ध घी में पूडियाँ तली जातीं हैं । 
बहू के मायके वालों का सम्मान करोगे तभी वह तुम्हारा सम्मान करेगी ।--एक दूर के चाचाजी अक्सर कहते रहते हैं । सभी लोग इसका बराबर पालन करते हैं । लेकिन मंजू के मामले में ऐसा मानने की विवशता किसी के लिये नही है । मंजू का भाई वैसे तो कभी-कभार ही आता है लेकिन उसका वैसा स्वागत कहाँ होता है जैसा पूजा के भाइयों का होता है । 
"गरीब की लुगाई सारे गाँव की भौजाई ।" 
काम के लिये भी हर कोई मंजू पर ही तान तोडता है । 
'पती 'कमाने वाला होता या मायका 'जबर' होता तो उसकी भी पूजा जैसी ही 'पूछ 'होती..। मंजू की भी इच्छा होती है कि पूजा जैसी इज्जत उसे भी मिले ,लेकिन कैसे ? माँ अकेली और असहाय है । कहाँ से क्या करेगी सब...? और उसे अहसास भी कहाँ कि घर में बेटी की पूछ केवल काम के कारण है मजूरों की तरह जाकर जुट जाना है उसी तरह ।  
मंजू की आँखें बरबस छलकी जा रहीं थीं ।
"ना बेटी ,इतनी दुखी मत हो ।"--माँ का दिल भी भर आया । अपने आँसू पौंछ कर बोली--"समधिन जी ने पन्द्रह दिन को भेज दिया यही क्या कम है । उन्हें भी तो बुरा लगता होगा तेरे बिना । तभी तो इतनी जल्दी भेज दिया दामाद को । छोटे का ब्याह होजाएगा तब मैं भी अपनी बहू को अपने से दूर नही रहने दूँगी ।"  यह कहकर अचानक वह उठी और ऊपर से एक बैग लेकर आई ।
"यह क्या है माँ ?"
"इसमें  दो जोडी पेंट शर्ट हैं । दामाद जी और ओम लल्ला के लिये । दो साडियाँ हैं । एक पूजा के लिये । उसके मायके से भी तो तेरे लिये कुछ न कुछ आता रहता है । और एक साडी और पाजेब बिछुआ समधिन जी के लिये ।  होली के बाद गनगौर-पूजन होगा न । थोडी मिठाई और नमकीन और थोडे 'गुना 'भी है...।"
"माँ यह सब ??"---मंजू ने हैरानी से माँ को देखा ।
"अरे कुछ नही ,इस बार तेरे बाबूजी की पेंसन में कुछ रुपए बढ कर मिले सो कुछ सामान ले आई हूँ । समधिन जी को अच्छा लगेगा वैसे भी मैं उनको कहाँ कुछ भेज पाती हूँ । मजबूरियाँ ही ऐसी आ फसीं हैं ।" 
मंजू का दिल भर आया । आजकल तो उल्टे लडकियाँ ही माँ-बाप के लिये कितना कुछ कर रही हैं । और एक वह है जो असहाय अकेली माँ से खर्च करवा रही है । मन हुआ कि मना करदे । कहदे कि अपना खून सुखाकर किसी के लिये कुछ करने की जरूरत नही है माँ । लेकिन उसे सास की सन्तुष्टि इतनी अनिवार्य और महत्त्वपूर्ण लगी कि माँ की मजबूरियाँ छोटी पड गईँ । सारा मलाल हल्का होगया । सोचा चलो इसबार अम्माजी को यह नही लगेगा कि मंजू ऐसे ही चली आती है मायके से । 
"अरे ! आगई !"---मंजू ने अम्माजी के पाँव छुए पिण्डलियाँ दबा-दबाकर । अम्माजी की आँखों में बादलों के बीच की क्षणिक धूप सी चमकी । मंजू ने कुछ पुलक और कुछ गर्व के साथ बैग अम्माजी के आगे रख दिया ।
"इसमें क्या है ?"
"माँ ने आपके लिये 'गनगौर' भेजी है ।"
"अरे ! इस बार समधिनजी को हमारी याद कैसे आगई ?" अम्मा ने कटाक्ष के साथ मुस्कराकर कहा  
"अम्माजी , माँ तो आपको हमेशा याद करती है । लेकिन..".
"मैं समझती हूँ मंजू ।"--अम्मा बीच में ही बोल पडी---"बेकार ही माँ को परेशान किया । क्या जरूरत थी खर्च करने की ? तुझे मना कर देना चाहिये था ।"
"मैंने मना किया था अम्माजी लेकिन माँ नही मानी । बडे मन से भेजा है उन्होंने ।"
"सब मन से ही भेजते हैं बेटा ।"--अम्मा ने बडप्पन के साथ कहा । 
"गनगौर तो पूजा के मायके से दो दिन पहले ही आगई थी । बेचारी माँ को तूने बेकार ही परेशान किया ...।"
मंजू का सारा उत्साह राख होगया । अम्माजी ने माँ के स्नेहमय बडप्पन को उसी तरह नकार दिया ,जिस तरह कम्प्यूटर गलत पासवर्ड को नकार देता है । कलेजा काटकर किये गए खर्च की ऐसी अवमानना देख उसका मन ग्लानि से भर गया । यहाँ बल्व के उजाले में उसने व्यर्थ ही दीपक जलाया है । वह दीपक माँ के अँधेरे कमरे को उजाले से भर सकता था न  !! 

बुधवार, 5 जून 2013

साहब के यहाँ तो.....


'इमरती अभी तक नही आई !'--
रसीदन कनेर की छाँव से समय का अन्दाज लगाते हुए बडबडाई । 
अब तो दो--ढाई का टैम होने को होगा । 'रेसिट' होने ही वाली है और 'रेसिट' के बाद उसके आने का मतलब भी क्या है । खास और जरूरी काम तो लंच होने तक निपटा ही लिये जाते हैं । सभी जरूरी डाक लंच से पहले ही सब जगह लगादी जातीं हैं । क्या तो बाबूजी और क्या मैडम और सर लोग लंच से पहले जितनी चिन्ता और लगन से काम करते हैं, बाद में कहाँ करते हैं । बाबूजी मेज पर कागज फैलाए दस बार चिरोंजी गोपी को बुलाते हैं । 'किलास-टीचरों' का अलग बुलावा---'अरे गोपी यह लैटर लेकर तारागंज जा और चिरोंजी तू गुब्बारा फाटक चला जा...। इन लडकों के माता-पिता को बुलाकर ला । नाम लिखाने के बाद साले चैक लेने के लिये ही स्कूल आते हैं । जैसे सरकार पर कर्जा है इनका ।'..
सुबह-सुबह स्कूल में चपरासियों की कितनी जरूरत होती है ,इसे रसीदनबाई खूब जानती है । साफ-सफाई और पानी भरने जैसे काम जो चपरासी लोगों को ही करने होते हैं, वे तो स्कूल शुरु होने से पहले ही होने होते है । 
'प्रेंसीपलसाब' के आने पर उनके टेबल की घंटी भी जब देखो 'टन्न टन्न' बजती ही रहती है । तब चपरासियों की कितनी टेर मचती है और यह इमरती है कि...!" 
। 
पैंतीस साल की चपरासिन रसीदनबाई भाग्य के साथ-साथ गठिया की भी सताई हुई है । बैठ जाती है तो उठ नही पाती । काले-काले और सूखे टटेरे जैसे हाथों को घुटनों पर टेकती हुई ,मुट्ठी भर की काया को भी कठिनाई से सम्हालते हुए चलने में उसे खासी मुश्किल आती है फिर भी वह ग्यारह बजे से पाँच मिनट पहले ही स्कूल आ जाती है और लोहे के भारी दरवाजे को पूरी ताकत से ठेल कर सबसे पहले देखती है कि गोपी ने अभी तक सफाई शुरु नही की । सफाई के बाद ही तो वह 'पिराथना' की घंटी बजाएगी । एकाध दिन वह लेट होजाती है तो गोपी रसीदन को खूब 'अफसरी' दिखाता है---"अब आ रही है ? यह टैम है आने का ?" 
गलती पर डाँट खाना रसीदन को बुरा नही लगता । आखिर नौकरी तो नौकरी है । जिसका खाते हैं उसकी तो बजानी ही चाहिये न ? आते ही वह सबसे पहले घडी देखती है और समय से दस मिनट पहले आकर चैन की गहरी साँस लेती है । 
तो भैया कायदे से देखा जाए तो लंच के बाद तो स्कूल में आना आना नही होता है कि नही ।--रसीदन गोपी और चिरोंजी से अपनी बात का समर्थन माँगती हुई कहती है ---फिर हम चपरासियों को इतनी छूट देता भी कौन है ? लेकिन यह इमरती तो ....। 
"तू बराबरी करेगी इमरती से ?"--- गोपी उसे झिडकता है --"जान कर भी इतनी अनजानी मत बनाकर । समझी !! और तू कभी पूछ भी मत बैठियो । नही तो ...।"
इमरती भी रसीदनबाई की तरह ही इस शासकीय हाई-स्कूल लालगंज में दैनिक वेतन भोगी भृत्या है । फर्क इतना है कि पैंतीस की उम्र में ही बुढा सी गई रसीदन जहाँ स्कूल की धूल फाँकती हुई, दिनभर कोई न कोई काम करती हुई भी सबकी उपेक्षा का शिकार रहती है वहीं इमरती पूर्व शिक्षामंत्री यादव के वातानुकूलित बँगले पर काम करती है और स्कूल में सिर्फ सूरत दिखाने के लिये आती है फिर भी लोग उसे विशेष जगह देते हैं ।
इमरती की पहुँच सीधे मंत्री जी तक है उसकी सिफारिश या शिकायत किसी के भी ग्रह-नक्षत्र बदल सकती है ,यही सोचता है हर कोई । रसीदनबाई इतना आगे जाकर नही सोच पाती । 
गोपी की बात पर रसीदन कुछ सहमकर तम्बाकू से रचे बडे-बडे दाँतों को होंठों में छुपा लेती है पर अन्दर ईर्ष्या भरा शोर होता रहता है । 
" मंत्री जी ने नौकरी लगाई है पर नाम तो हमारे रजिस्टर में लिखा है उसका । तनखा तो यही से निकलती है न । बल्कि डबल काम करके हमसे ज्यादा ही कमाती होगी फिर भी काम और टैम की छूट उसे क्यों दे रक्खी है प्रेंसीपलसाब ने । हमें तो आधा घंटे की भी मोहलत नही है ।' 
फिर जब तनखा यहाँ से निकलती है तो उसे ज्यादा काम यहीं करना चाहिये ना । पर यहाँ धूल-धक्कड में काम इमरती नही करेगी गोपी भैया ! मंत्री जी के यहाँ काहे की धूल ,काहे का पसीना । मार्बल के 'फरस' पर झट् से पौंछा फेर देती होगी । गैस पर पट् से सबजी-रोटी, 'दाच्चाबल' ,'पुरी-पराँमटे' पका देती होगी । तर माल खाने को मिलते ही होंगे । मौज-मजे की बढिया नौकरी है । ऊपर से 'जबर' का आसरा । सब 'किसमित' का खेल है ..।"  
जब तक यादव मंत्रीपद पर जमे रहे ,इमरती केवल उन्ही का काम करती थी और प्रिंसिपल पाण्डे बराबर उसकी तनखा निकालते रहे । एक बार मन में विरोध का कीडा कुलबुलाया भी कि 'काम चले मंत्री जी का और वेतन निकाले प्रिंसिपल केशव प्रसाद पाण्डे ?' यह तो सरासर गलत है । लेकिन उनकी छठी इन्द्रिय ने उन्हें समझा दिया कि जल में रह कर मगर से बैर करना निरा पागलपन है । सो जैसा कि मंत्री जी का निर्देश था ,इमरती दो-चार महीनों में रजिस्टर में हस्ताक्षर करने स्कूल-टाइम के बाद स्कूल आ जाती थी । या फिर कभी-कभी गोपनीय रूप से रजिस्टर मंत्री जी के बँगले पर पहुँचा दिया जाता था । इस तरह वह बँगले से ही स्कूल के रजिस्टर में बराबर उपस्थित रही । इसकी जानकारी भी बाबू और प्राचार्य के अलावा स्टाफ में कुछ लोगों को थी और कुछ को नही । जिनको जानकारी थी वे भी इस मुद्दे पर कानाफूँसी करके ही सन्तुष्ट हो लेते थे ।
रसीदन बाई दूसरे टाइप के लोगों में थी जिन्हें अर्जुन की तरह हस्ताक्षर करते समय मछली की आँख जैसा केवल अपना ही कालम दिखाई देता है । आजू-बाजू में कौन किस दिन नही आया ,किसकी 'सी एल' लगी और किसकी 'फ्रेंच-लीव' हुई उन्हें कोई खबर नही होती । 
लेकिन एक दिन इमरती स्कूल में साकार उपस्थित होगई । हुआ यों कि उधर तो यादव जी के हाथ से मंत्री-पद छूट गया और इधर पाण्डे जी के आदर्शों ने जोर मारा । उन्हेंने इमरती से साफ कह दिया कि अब ऐसा नही चलेगा । पूरे स्टाफ की तरह समय पर रोज स्कूल आना पडेगा । अब नए मंत्री जी हैं आखिर मुझे भी तो जबाब देना होगा । यादव जी को भी पाण्डे जी की बात माननी पडी । आपसी व्यवहार में इतनी समझ तो रखनी पडती है न । लेकिन पता नही रातों-रात किसने ,किससे ,क्या कहा कि पाण्डे जी के पास संचालक जी का फोन आगया । उनके कडे सिद्धान्त फिर उसी तरह नरम हो गए जिस तरह दबाने कर गदराया लेकिन ठोस आम पिलपिला कर नरम हो जाता है । तय हुआ कि इमरती को स्कूल में आना तो रोज पडेगा लेकिन अपनी सुविधानुसार से दो-तीन बजे तक आकर साइन कर जाए । इस तरह यादव जी की सेवा होती रहेगी और स्कूल की ड्यूटी भी । 
इमरती का इस तरह अवतरण क्या हुआ स्टाफ में रोज की नई कथाएं शुरु होगईं ।  
"आज तो दो-पन्द्रह पर आई है इमरती । लेकिन तीन बजे से ज्यादा थोडी रुकेगी ।...भई पावर है हाथ में । देखो तो कैसी साफ-सुथरी ,चमक-दमक और ठसके से आती है ।....आज फिर नई साडी पहनी है इमरती ने ।....बालों में कहाँ से नित नई किलपें लगाती है ?...इसकी हँसी स्कूल की घंटी की तरह कैसी बुलन्द और सुरीली है ! कोई टेंसन जो नही है । बातों में देखो, कितने लटके-झटके हैं ! ऐसे लटके-झटके दिखा कर ही तो ...। हाँ जी ,इमरती को मंत्री जी का 'सपोट' है तभी हवा में उडती रहती है । सैंया भए कोतवाल अब डर काहे का..।"
"स्कूल क्या आती है ,इसी बहाने थोडी सैर होजाती है ।"---चिरोंजी भी बहती गंगा में हाथ धोना नही भूलता---वैसे यादव साहब अपनी मिसेज के साथ-साथ 'इन्नोवा' में इमरती को भी ले जाते हैं कभी-कभी । भाई नौकरी हो तो ऐसी ..।
"तू भी साथ लग जाया कर मरे..।" रसीदन चिरोंजी को झिडकती है । 
तरह की कथाओं से उसका मन वैसे ही सिकुड जाता है जैसे धूप में पड-पडा बैंगन सिकुड जाता है । गज़ब की मट्ठर औरत है यह इमरती । देर से आकर भी गलती 'फील' नही करती । उल्टे अपने काम और थकान का रोना रोती है । जैसे कि स्कूल में आकर गोपी चिरोंजी या रसीदन पर ही नही सारे स्टाफ पर एहसान करती है । यह मंत्री जी की शह का नतीजा है । हो चुके कामों में भी दस 'नुकस'  निकाल देती है कामों --- 
"अरे रसीदन ! बहन ! झाडू क्या तूने लगाया है ? जरा देख तो पाँव किसकिसा रहे हैं रेत और धूल के मारे । फिर कोनों ने तो कभी झाडू के दर्शन ही नही किये होंगे शायद ।... चिरोंजी भैया ! तुम क्या बैठे-बैठे क्या बढ रहे हो ? लम्बा बाँस या झाडू लाकर ये छत के जाले तो निकालो । गोपी ! देख तो जरा गिलासों को । कितने मटमैलेपन हो रहे हैं ! सहाब के यहाँ तो ऐसे गिलासों को 'डस्टबिन' में डाल देते हैं । काँच के गिलासों में आर पार साफ न दिखे तो कैसी सफाई । रसीदनबाई ! सहाब के कमरे में बिना पूछे भला जाते हैं जो तू जब चाहे मुँह उठाए चल देती है । कदर-कायदा सीखना है तो सहाब जैसे लोगों से सीखो ।...चिरोंजी भैया रे ! जरा इस मेजपोश को दो दिन का आराम भी दे दो । दूसरा बिछादो । इसे मुझे दे देना और नही तो क्या । धोकर ले आऊँगी । गन्दगी मुझे जरा नही सुहाती । सफाई देखनी है तो सहाब के यहाँ देखो । फर्श में अपना चेहरा देखलो ...।"
"चेहरा तो तू खुद ही देखले अपना इमरती रानी " ---- रसीदन नाक सिकोडती हैं ।
यह तो वही बात हुई ना कि 'खाय खसम का ,गीत गाए भैया के' । 
अकड कितनी भरी है । एक औरत होकर भी अपने बराबर की औरत को जरा भाव नही देती । एक दिन उसने तो इमरती को उसके भले के लिये ही समझाया था कि---"बहन ,अपने हाथ बचाकर रखना । नौकरी है तो सब कुछ है । यह रोज-रोज लेट आना भी तुझे दिक्कित में डाल सकता है ।" तो ..! इमरती ने उसका मुँह सा तोडते हुए तडाक् से जबाब दिया था---
"अपनी नौकरी की चिन्ता तुझसे तो ज्यादा ही होगी रसीदन बाई । रहा मेरे लेट आने का सवाल तो इसे 'पिरेंसीफल' जी भी जानते हैं कि मैं यादव साहब के यहाँ काम करती हूँ । और यहाँ मेरे बिना कौनसा काम रुकता है बोल ? काम है ही कितना ,पर वहाँ न जाऊँ तो उनकी गिरस्ती की गाडी जैसे खडी रह जाती है 'टेसन' पर । समझी ।"
"मंत्री जी का हाथ सिर पर क्या रखा है उड रही है आसमान में ।--रसीदन खुद को तसल्ली देती है  ---पर अब तो यादव मंत्री नही है ।"
"साहब मंत्री नही है तो क्या हुआ चलती तो उन्ही की है । उनका एक फोन ही काम कर जाता है आज भी ।" इमरती गर्व से कहती है । 
" भैया रे ,अब भी मिलने वालों की भीड लगी रहती है बँगले पर । उनकी शान-शौकत, खाना-पीना ,गाडी चौकीदार, नौकर तीनचार कुत्ते ...सब कुछ वैसा ही है । जाने कितनी एजेन्सियाँ हैं साहब की । रौब ऐसा कि इधर हुकम हुआ और उधर काम । साहब अगर आम को नीबू कहदें तो किसी की मजाल नही कि उसे आम कह जाय । घर में सफाई ऐसी कि मक्खी भी जाने में शरमाए । "
इमरती की बातों को सब ऐसे सुनते हैं जैसे बच्चे सिंहासन -बत्तीसी की कहानियों को सुनते हैं । स्टाफ में रौनक बढ जाती है । रसीदनबाई उदास होजाती है । 
"यह तो सरासर अंधेर है री माई ..।"
अपने हिस्से के काम निपटाकर रसीदन कनेर की विरल सी छाया में दो पल बैठ कर सुस्ता लेती है । इन कुछ पलों में वह दिमाग को खँगालती रहती है । घर से लेकर स्कूल तक सब उसी की खिंचाई करते हैं । घर में अब्बा ने उसे सुबह चाय बनाने और भतीजे-भतीजियों को स्कूल के लिये तैयार करने और उन्हें टिफिन बना कर देने का काम सौंपा है पर भाभियाँ उसे कपडे प्रेस करने ,बर्तन माँजने और सबका नाश्ता बनाने का काम भी दे देतीं हैं । 
स्कूल में भी उसका काम घडी देख कर प्रेयर और हर 'पीरेड' की घंटी समय पर बजाना और मैडम और सर लोगों को पानी पिलाना है । पाण्डे जी ने खुद उसकी हालत देख कर ये ही काम दिये हैं लेकिन उसे प्रायः गोपी और चिरोंजी के पेडों में पानी देने जैसे काम भी करने पड जाते हैं । चिरोंजी स्कूल की डाक लगाता है और इसी बहाने चाहे जब घर भी हो आता है । गोपी सर लोगों के पास बैठा गप्पें हाँकता रहता है और उनकी जरूरतों जैसे पुडिया सिगरेट लाना ,मैडमों को समोसा-कचौरी या सब्जी लाकर देना आदि करके दो-चार रुपए भी कमा लेता है । साथ ही मीठी बातों से रसीदन को भी 'पोट' लेता है--"अरे मेरी बडी बहन ! जरा गुलमोहर के पौधे को पानी पिलादे । बेचारा सुबह से प्यासा खडा है । तेरा बडा 'पुन्न' होगा । ओ जीजीबाई, जरा उस नीयतखोर बकरिया को तो खदेड कर आ । रोज ही आजाती है बेसरम ।" 
"निकम्मे ,आलसी !"---रसीदन का गुस्सा बनाबटी होता है । उसकी  आदत नही है काम से मना करने की ,पर कोई इसे माने तो ! तारीफ के दो बोल तो बोल दे ! पर नही, उल्टे अगर कोई काम छूट जाए तो गोपी उसे रौब जरूर दिखाता है । ऐसा ही रौबीला है तो अपनी अम्मा इमरती को रौब दिखाकर बताए । गुसाईं जी कह तो गए हैं कि "टेढि जानि संका सब काहू..।" अकेली रसीदन मिल गई है फालतू ही हुकम चलाने..। रसीदन जब हलकान होजाती है तब ऐसा ही कुछ सोचती है ।
'पिच्च'...रसीदन ने पीक थूक कर चुन्नी से होंठ पौंछे । तम्बाकू के साथ जैसे उसने मन की कडवाहट को भी थूक दिया पर गड्ढे में से झाँकती सी आँखें जैसे निकल कर बरबस गेट तक पहुँच ही जातीं थीं । कनेर की छाया लम्बी होती जा रही थी । 
"अभी तक तो कोई अता-पता नही है महारानी का । लंच तक भी आ जाएं तो भी मेहरबानी ही समझो । पट्ठी शान से दो--ढाई बजे तक आती है और दन्न से दसखत ठोकती है रजिस्टर में । हमें तो एक दिन को भी कभी छूट नही मिलती ..।"
"तो कुढ-कुढ कर तू क्यों सूखी जा रही है ?"--गोपाल रसीदन का चेहरा पढ लेता है ।
" सझती क्यों नही कि असली नौकरी तो उसकी अब भी यादव साहब के यहाँ ही है । यहाँ तो रजिस्टर में बस चिडिया बैठाने आती है ।"
रसीदन के कलेजे में एक असंभव सी इच्छा जागी---कितना अच्छा होता कि उसे भी ऐसे ही किसी सहाब के यहाँ काम करने का मौका मिल जाता । सारे 'दलिद्दर' दूर होजाते ..।
"इमरती आगई ।"--स्कूल के कर्मचारी ही नही जैसे दीवारें और पेड-पौधे भी बोल पडे । 
सबने घडी पर नजर डाली । दो बज कर पचास मिनट हो चुके थे । पाँचवा पीरेड भी खत्म होने को  था । यह भी कोई टाइम है आने का ।
"इमरती आजकल तो कुछ ज्यादा ही छूट चल रही है क्या बात है ?" सब देख रहे हैं प्रिंसिपल साहब ने इमरती को डाँटा है । वह सिर झुकाए खडी है । कुछ बुझी-बुझी सी लग रही है नही तो हँस कर ऐसा जबाब देती है कि सामने वाले का गुस्सा उडन-छू होजाता है । 
रसीदन को कुछ ठण्डक का सा अहसास हुआ । आखिर असली नौकरी तो यहीं है । तनखा भी तो यहीं से निकलती है । साहब का डाँटना बाजिब है ।
"क्या बात है इमरती । आज बडी चुप-चुप है ।"--गोपी ने पूछा ।
रसीदन के भीतर आवाज उभरी कि डाँट से बचने के नखरे हैं और क्या..। पर बोल पडा चिरोंजी ---
" इमरती तबियत खराब है क्या ? कुछ परेसान है ।"
"इस चिरोंजी को कुछ ज्यादा ही चिन्ता होती है । 'लुगमेहरा.'...।"--रसीदन और भी कुढ उठी । 
"लेकिन इमरती की आँखों के कोर कुछ गीले तो हैं । सचमुच परेशान तो है । हमेशा खनखनाती सी हँसी बिखराने वाली इमरती । गर्व से तन कर बात करने वाली इमरती । आज क्यों पेड से खींच कर हटाई गई बेल की तरह लग रही है । खुशी का कारण कोई पूछे न पूछे दुख का जरूर पूछता है । रसीदन का बडप्पन जागा ।
"क्या बात है इमरती बहन ।"
"क्या है कुछ भी तो नही ।"--इमरती हँसी । एक फीकी सी हँसी । 
"अरे ,परेशान है तभी तो पूछ रहे हैं री । हमें न बताएगी तो किसे बताएगी !" 
"क्या बताऊँ बहन । तबियत ठीक नही है । हाथ--पैरों से जान सी निकल गई है । उधर छोटा लडका कल सीढियों से गिर पडा सो उसके पैर में गहरी चोट आगई । रात भर दर्द से तडफता रहा । उस मारे सो भी नही पाई । "
रसीदन के मन में कौनसा भाव जागा यह तो पता नही पर उसने इमरती का हाथ थाम कर सान्त्वना दी और कुछ अचरज से बोली-- 
"अरे ..तुझे तो बुखार भी है री ।" 
हाँ ..होगा ।
"होगा क्या । छुट्टी ले लेनी थी ना ।"--रसीदन के भीतर बडी बहन जैसा ममत्त्व उमडा ।
"कैसे ले ले लूँ बहन ? नौकरी भी तो है । कल भी पाण्डे जी ने खूब सुनाईं थीं ।"
'ऐसी बडी नौकरी वाली है । जो काम नही करते वे ही काम का सबसे ज्यादा दिखावा करते हैं ।' रसीदन ने क्षणभर सोचा लेकिन कहा नही ।
बस एक स्नेहमय झिडकी निकली--
"ऐसी कौनसी इमरजेंसी है री ? नौकरी शरीर से बडी तो नही है न । और तेरा बेटा भी तो तकलीफ में है । उसका ख्याल तो कर ।"
"कैसे करूँ ख्याल ? तू ही बता ।---इमरती कुछ असहाय सी होगई--- यहाँ से तो छुट्टी ले भी लूँगी ,लेकिन सहाब के यहाँ तो सात बजे से डेढ-दो बजे तक की 'डूटी' बजानी ही बजानी है ।"
"तकलीफ हो तो भी ?"
"तुझे कभी इस तरह किसी सहाब के यहाँ काम नही करना पडा ना इसलिये । तकलीफ क्या करेगी ,तुम्हें काम तो करना ही है मरो चाहे गिरो ।" 
"ऐसे कैसे ?" अन्तिम शब्दों ने रसीदन के अन्तर-द्वारे खोले---"मर गिर कर कोई नौकरी होती है क्या ? उनके यहाँ ऐसी कौनसी मजबूरी है तेरी ?"  
"मजबूरी"---इमरती उपहास से हँसी । 
"मजबूरी की क्या बात है रसीदनबाई । उन्होंने नौकरी लगवाई है उसका 'औसान' तो चुकाना ही पडेगा कि नही ?"
" ऐहसान कैसा । कोई बिठाल कर खिला रहा है क्या । और अब तो तू परमानेंट होने वाली है और फिर यादव साब अब तो मंत्री भी नही है ।" रसीदन ने उसका मन टटोला । 
"अरे बहन ! अभी परमानेंट हुई तो नही हूँ । फिर बडे लोगों के हाथ बडे लम्बे होते हैं । नौकरी लगवा सकते हैं तो क्या छुटवा नही सकते । एक दिन लेट हो जाती हूँ तो चौकीदार बुलाने आजाता है तुरन्त । ना कहने का तो सवाल ही नही होता । मेरे भरोसे कितने काम पडे रहते हैं उनके ..।"
सन्तुष्टि बडप्पन लाती है । इमरती की बातों ने रसीदन को कुछ ऊँचाई दी लेकिन आखिरी वाक्य ने उसे फिर धम्म से नीचे जमीन पर बिठा दिया । मन में जमीन को कुरेद कर ही कुछ मनमाफिक पाने की चाह जागी । बात बदली--
" चल छोड । मैं तेरी मजबूरी समझती हूँ । जहाँ बात फँसी हो निभानी ही पडती है । पर तनखा तो वहाँ तुझे ठीक-ठाक मिल जाती होगी कि नही । पैसा ठीक मिले तो काम में मन भी लगता है । अपन लोग मेहनत से कब डरते हैं बहन ।"
"तनखा ?"..इमरती हँसी जैसे रसीदन ने बडी नासमझी की बात कहदी हो । 
"एक पैसा तो अलग से मिलता नही और तू तनखा की बात कर रही है । इसी एक तनखा पर दो जगह पिस रही हूँ । माना कि यहाँ कुछ खास काम नही है पर तीन-चार मील आना तो पडता है । दस--पन्द्रह रुपए रोज अलग से तो किराया लगता है । पहले तो वहाँ सौ--दो सौ रुपए दे भी देते थे पर अब तो तीज-त्यौहारों पर भी कुछ नही मिलता । छूछी साग-पूडी पकडा देते हैं वह भी रात की बची हुई । लेकिन काम तो करना पडता है ना । कभी--कभी तो.....।" इमरती आगे कहते--कहते रुक गई । सबसे हर बात तो नही न कही जाती । 
"य़ह तू क्या कह रही है इमरती ?" रसीदन ने जैसे आगे की बात का भी अनुमान लगा लिया । इससे वह सचमुच चकित थी । हमदर्दी से भरी भी ।
"दूसरे की खिचडी में घी ज्यादा लगता ही है । कौन जानता है कि नौकरी को बचाने के लिये मुझे कितना कहाँ पिसना पडता है ।" 
कुछ देर तक उस लम्बे बरामदे में मौन पसरा रहा । फिर अचानक इमरती की हँसी खनकी । हमेशा की तरह पूरे प्रांगण में गूँजती हुई । गोपी को समझाते हुए बोली ---"अरे बाबरे ! अभी तक कुछ नही सीखा तूने । 'पिरेंसीफल' साब के लिये ट्रे में गिलास रख कर लेजाते हैं पानी । सहाब के यहाँ तो....।"
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शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

उसके लायक

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है यहाँ अधिकांश कहानियाँ वे हैं( कुछ कहानियों को छोड कर ) जो या तो अधूरी पडीं हैं अब तक या कहीं किसी फाइल में गुमनाम । यह कहानी सन् 1989 में लिखी थी । एक दो जगह भेजी पर बात नही बनी । कुछ सुधार के बाद यहाँ दे रही हूँ ।
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वह जिस दिन पहली बार कक्षा में आई थी ,उस दिन तो सबने ऐसा मुँह बना लिया था जैसे धोखे से कडवी ककडी चबा गए हों .....
दो माह पहले मैं शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्रांगण में कचनार के पेड के नीचे बैठा  अनायास ही पन्द्रह साल पहले के उन दिनों को याद करने लगा था जब मैं आठवीं कक्षा पास कर आगे की पढाई के लिये बुआ के पास सुजानगढ में रहा था ।
कस्बा कम देहात ज्यादा लगने वाला सुजानगढ मुख्य सडक से दूर एक पहाडी कस्बा है । गढ के नाम पर एक छोटा सा किला है जहाँ कभी राजा रहा करते थे । तब तो उनका ही राज चलता था पर अब वहां स्कूल ,बैंक और डिस्पेंसरी चलती है । पहाडी के नीचे एक छोटी सी नदी बहती है । इन पन्द्रह सालों में वहाँ इतना अन्तर आया है कि गोपू हलवाई की दुकान बीच बाजार से हट कर बस-स्टैंड पर आगई है और उसके पेडों में अब वह बात नही जो कभी सुजानगढ की पहचान थी । नदी में जहाँ पानी होना चाहिये वहाँ पानी की जगह बच्चे क्रिकेट खेलते हैं और लडकियाँ जो दुपट्टा को कन्धों पर फैला कर और गर्दन को कन्धों के समानान्तर रख कर बहुत जरूरी होने पर ही सडक पर निकलतीं थीं वे निस्संकोच खूब हँसती-बतियाती हुई स्कूल जातीं हैं और हर तरह के बिल भरने तक का काम करतीं हैं । जो बात आज भी वहाँ के लोगों में देखी जाती है वह है लोगों की बेफिक्री व मौजमस्ती । कहो तो ताश खेलते-हँसते पूरा दिन गुजार दें और कहो तो जरा सी बात पर विधानसभा में हंगामा खडा करदें । खैर यह सब मेरी कहानी का हिस्सा बिल्कुल नही है । मेरी कहानी सोलह-सत्रह साल पहले के केवल अपने स्कूल पर केन्द्रित है । स्कूल में भी  हमारी कक्षा और कक्षा में भी उस एकमात्र लडकी पर केन्द्रित है जो मेरे साथ स्कूल में पढी थी हालाँकि नियमित रूप से एक-डेढ साल ही कक्षा में आई थी । बाकी डेढ साल उसने कैसे पढाई की । और परीक्षा-परिणाम क्या रहा ,तब तक मुझे नही मालूम था ।
पहले यह बतादूँ कि जी.पी. कॅालेज के प्रांगण में मैं इस तरह अतीत की गलियों में गुजरने के लिये नही बैठा था । वहाँ मैं एक प्रतियोगी परीक्षा के लिये आया था और मेरे लिये एक-एक पल महत्त्वपूर्ण था । बस नौ बजे ही मुरैना पहुँच गई थी और परीक्षा प्रारंभ होने में अभी एक डेढ घंटा था । तब तक यही बेहतर था कि इधर-उधर भटककर समय गुजारने की बजाय याद किये हुए को दोहरा लूँ ।
सच पूछा जाए तो परीक्षा से ठीक पहले कुछ पढना या याद करना तेज चलती ट्रेन के डिब्बे गिनने जैसी कोशिश करना है । कुछ पल्ले ही नहीं पडता । लेकिन जब तक कोई हाथ से किताब छीन कर न रखदे छोडने का मन भी तो नही होता । लगता है कि कुछ और समय मिल जाए तो पूरी तैयारी हो ही जाएगी । जैसे कि उन पलों की तैयारी पर ही सारी सफलता टिकी होती है । जो भी हो वह परीक्षा मेरे कैरियर की दिशा में बडी महत्त्वपूर्ण ही नही बल्कि अन्तिम परीक्षा भी थी । कुछ ही महीनों बाद मैं ओवरएज जो होने वाला था । और आपको आज यह बात बडी खुशी के साथ बता रहा हूँ कि अब मैं उस परीक्षा में सफल भी हो चुका हूँ । आज ही परिणाम की सूचना मिली है और इस सफलता के बाद तो और भी जरूरी है कि मैं आपको वह सब बताऊँ जो कहीं न कहीं इस परीक्षा से जुडा है । क्योंकि परीक्षा के दौरान जो कुछ हुआ उसके तार मेरे स्कूली जीवन से भी जुडे है ।
जीवन की कई घटनाएं अप्रत्यक्ष रूप से आपस में जुडी होतीं हैं । समय आने पर उनके जुडे होने का अहसास हमें रोमांचित करता है ।
हाँ तो मैं बता रहा था कि मैं कालेज के प्रांगण में एक पेड के नीचे अकेला ही बैठा था और गाइड खोल कर कुछ और भी पढने--समझने की कोशिश कर रहा था कि एक महिला  वहाँ से गुजरी । मैं उसका  चेहरा तो ठीक से नही देख सका पर पर जाने कैसे अचानक मुझे अपनी क्लासमेट सरिता का ध्यान आया । मैं अनायास ही स्मृतियों की उन गलियों में पहुँच गया जहाँ उम्र के वसन्त में हर टहनी पर कलियाँ फूट निकलने को आतुर होतीं हैं । सूरज क्षितिज की बाँहों से छूट कर पूरे आसमान में फैल जाने को उत्साहित रहता है ।
मिडिल स्कूल के छोटे से दायरे से निकल कर बडे स्कूल में पहुँचना मेरे लिये काफी रोमांचक था । नए दोस्त ,नया माहौल ,नए शिक्षक और उम्र के नए अहसास...। अभी पढाई विधिवत् शुरु नही हुई थी । केवल प्रेजेन्ट लेने हिन्दी वाले सर आते थे और नागरिकशास्त्र वाले सर संविधान की कुछ चलताऊ कहानियाँ सुना कर चले जाते थे । बाकी समय में हम लोग या तो चुटकुले सुनाते रहते या स्कूल से भागने की योजना पर अमल करने की सोचते रहते थे तभी एक दिन एक सहपाठी घनश्याम ने एक सूचना दी ----"अरे भाइयो सुनो-सुनो ,ध्यान लगा कर सुनो । अभी-अभी पता चला है कि हमारे क्लास में एक लडकी भी आने वाली है । उसके पिताजी आज ही उसका फार्म व फीस जमा करने आए हैं ।"
उन दिनों किसी लडकी का पढने जाना और वह भी लडकों के स्कूल में किसी ब्रेकिंग न्यूज जैसा था
उस सूचना पर हम सब ऐसे केन्द्रित होगए थे जैसे बरसाती रात में जलते बल्ब के आसपास कीडे-मकोडे जमा होजाते हैं ।
घनश्याम हमारे क्लास का मसखरा था । मस्त व बेफिक्र । बात बात पर चुटकुले सुनाना ,गीत गा गाकर कमर-कूल्हे मटकाना और मिमिक्री करना--ये सारी खूबियाँ उसे खूब लोकप्रिय बनातीं थी । दूसरे स्थानों पर हो न हो लेकिन सुजानगढ के स्कूल में लडकी के पढने आने की बात सचमुच एक खास घटना थी । सुदूर अंचलों में किसी बिसाती के पहुँचने जैसी । पूरे इलाके में एक ही हायर सेकेन्डरी स्कूल था । लडकियों की पढाई के लिये भी वही एक स्कूल था । इसके बावजूद लडकियाँ वहाँ कम ही पढने आतीं थीं । तब देहात में तो लडकियों को कोई पढाता भी नही था । पर सुजानगढ के पढे-लिखे अच्छे घरों की लडकियाँ भी नाम लिखाने के बाद सीधी परीक्षाओं में ही दिखतीं थी । बात यह थी कि सुजानगढ का स्कूल हुल्लडबाजी के लिये जिलेभर में जाना जाता था । वहाँ आकर बाहर गाँवों के सीधे लडकों के भी मानो सींग निकल आते थे ।
'क्या बात कर रहा है तू ।'-- जगदीश एकदम उछल पडा । उस सूचना ने लगभग सभी को जिज्ञासा से भर दिया था ।
"अरे घनश्याम जी बडी मीठी सी खबर लाए हो । जरा हमें तो बताओ कि लडकी कौन है कैसी है ?"-मुंशी ने शरारती अन्दाज में पूछा ।
" जल्दी काहे की बेटा !"--- सुरेश मुस्कराया फिर धीरे से बोला---अरे यार लडकी है तो अच्छी ही होगी"  ।
मुंशी ,जगदीश ,ओम, सुरेश वगैरा दो-दो साल के फेलुअर थे । उनका काम नए लडकों पर रौब चलाना ,शरारतें करना और लडकि'यों पर फब्तियाँ कसना था । रात-रात में जंगल से लकडियाँ काट बेच कर सुबह तक सुजानगढ लौट आते थे । मैं कक्षा में सबसे छोटा था । अपेक्षाकृत होशियार और स्मार्ट भी माना जाता था । इस कारण वे सब मुझे प्रिंस कहते थे । और इसी बहाने अपने छूटे हुए काम मुझसे करवा लेते थे । घनश्याम की बात सुनने के बाद से सब यही सोच रहे थे कि कक्षा में लडकी रहेगी तो रौनक तो रहेगी ही । यही नही बैठने की जगह ,उसकी मदद और उसके साथ जोडी भी बनाने की योजनाएं विधिवत् बना ली गई थीं । जोडी बनाने की बात पर खूब खींचतान हुई । मुंशी उस पर अपना दावा करता और जगदीश अपना । सुरेश ने मेरा भी नाम उसके साथ जोड दिया । मुझे ऐसा सोचना काफी अच्छा भी लगा था । अच्छा और नया ।
लेकिन पहली बार जब वह कक्षा में आई ,उसे देख कर पहले तो यही हुआ कि सबकी हालत फूँक मार कर बुझाई हुई बत्ती जैसी होगई । जो कुछ आँखों के सामने था वह कल्पना से एकदम उल्टा था । एकदम अनगढ पत्थर सी वह लडकी तो लडकी नाम को भी लजा रही थी । न रंग की न रूप की । किसी भी कोण से आकर्षक नही । ऊपर से खींच कर बाँधी गईं चोटियों के कारण आँखें खिंची--खिंची सी होगईं थीं । चेहरे पर चमकता तेल ,पुरानी फ्राक ,प्लास्टिक की सफेद जूतियाँ और कन्धे में टँगा हुआ हाथ का सिला थैला...कुल मिला कर वह एक फूहड और गँवारू लग रही थी । उसे देख कर हमारी आशा व जिज्ञासा दोनों ही मन से निकल गईँ । टायर से जैसे हवा निकल जाती है ।
हमें जल्दी ही पता लग गया कि वह चार-पाँच कि.मी. दूर देहात से पैदल चल कर आती थी । कभी--कभी साइकिल से भी आती थी । उसकी साइकिल काफी पुरानी व जंग खाई थी । उसके हिसाब से काफी ऊँची भी थी । शायद उसके पिता की होगी । उसके पाँव पैडलों तक ठीक से नही पहुँचते थे । पूरा पैडल घुमाने के लिये उसे लगभग आठ-आठ इंच आजू-बाजू झुकना पडता था ।
उसके पिता प्राइमरी स्कूल के मास्टर हैं । सो इतना जरूर समझते होंगे कि भगवान ने अगर रंगरूप देने में कमी करदी है तो उसे पढा-लिखा कर पूरी किया जा सकता है । तभी तो अकेली लडकी को इस तरह पढने भेज दिया है ।----सुरेश ने बताया । उसकी पूरी पत्रिका उन लोगों के पास आ चुकी थी
और सीधा हमारे सिर पर ठीकरा फोड दिया है ।
"यार घनश्याम यह क्या जलेबियों की जगह रूखी रोटियाँ ले आया वह भी बाजरे की ।-"-जैसे ही वह पहली बार कक्षा में आई थी मुंशी रोने की मुद्रा बनाकर बोला । सबको हास-परिहास के लिये बढिया विषय मिल गया । टाइमपास ।
सुरेश ने पुचकारा--"-वत्स चिन्तित न हो । इसके लिये हमारा सुरेन्द्र है न । एकदम फिट । राम मिलाई जोडी एक अंधा एक कोढी ।"
सब लडके हँसने लगे । लडकी चकित सी सबकी ओर देखने लगी ।
सुरेन्द्र हमारी कक्षा का सबसे कुरूप लडका था । गहरा स्याह रंग ,पीले कंचे जैसी आँखें और नाक आँखों के बीच पूरी तरह गायब रह कर सीधी होठों के ऊपर निकली थी । डेल्टा के आकार में । उसके घर में आटा माँगने का काम होता था इसलिये मुंशी उसे चुकट्या कहता था जिसका वह उतना बुरा नही मानता था जितना उसे उस लडकी के साथ जुडने की बात सुन कर लगा । तिलमिला कर बोला---
अच्छा , तो तुम लोगों ने मुझे बस उसके लायक ही समझा है और खुद को सलमान खान समझते हो । कि तुम्हारे लिये कोई माधुरी दीक्षित आएगी ..।
वह वह सहमी सी चुपचाप एक तरफ बैठ गई । उसके बगल वाले लडके इधर-उधर भागने लगे तो हँसी का एक फव्वारा फूट कर बह चला । और कक्षा में इस तरह स्वागत हुआ उस लडकी गँवई सरिता का ।
 सरिता...हाँ यही नाम था उसका । पर लडके उसे सरीता कहते थे । बाद में वह सरीता से सरौंता भी होगई । हाँ मैंने जरूर आज से पहले उसे उसके नाम से कभी नही पुकारा । मुझे लगता है कि नाम लेने का आधार अच्छी जान-पहचान व अपनापन होता है । नही भी होता है तो बनने लगता है । मेरे साथ न तो पहली स्थिति थी न ही दूसरी बनने वाली थी । मेरे लिये तो वह मात्र एक 'परसन' थी । एक लडकी । बस और कुछ नही । उसके लिये अगर कोई भाव था तो वह था उसके समग्र व्यक्तित्त्व से वितृष्णा का । कुछ--कुछ हेयता का भी । यह भाव दो कारणों से था । एक तो यही कि वह लडकी होकर भी लडकों के स्कूल में पढने आगई थी । लडकी का लडकों के साथ बैठ कर पढना यानी लडकों को बदतमीजी करने तथा उसके बदनाम होने के पूरे सौ परसेंट चान्स । दूसरे उसकी बोलचाल व बर्ताव बडा ही उजड्ड व गँवारू सा था । लडकियों वाली कोई बात ही नही थी ।
स्कूल में एक-दो लडकियाँ और भी थीं पर वे थीं काफी सम्पन्न घराने की और सलीके वालीं लडकियाँ  । उनके घरों में न केवल एक-दो लोग अच्छी नौकरियों पर थे और अंग्रेजी बोल सकते थे बल्कि थाने से लेकर मंत्रालय तक उनकी पहुँच थी । उनके विषय में किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने का साहस भी नही था किसी में । उनमें एक लडकी बहुत खूबसूरत भी थी । मुंशी वगैरा उसे दबी जुबान से आपस में ही मृगनयनी कहा करते थे । वे लडकियाँ जब भी स्कूल आतीं ,सरिता को ऐसे देखतीं थीं जैसे किसी शानदार मॅाल में कोई ठेठ अनपढ देहाती घुस आया हो । वह एकदम फूहड किस्म की देहातिन लगती भी थी । उसके बालों व फ्राक की जेबों में घास के तिनके या कुट्टी के टुकडे मिलते थे । शायद घर में भैंस-गाय होंगी । उसके होंठ खुले रहते थे । और कभी-कभी नाक भी भरी हुई रहती थी । कपडे भी एक ही जोड थे क्योंकि कई बार उसका पाजामा मुचडा या अधसूखा होता था ।
वह या तो बिल्कुल ही नासमझ थी या फिर नासमझी का दिखावा करती थी हालाँकि दिखावा करने लायक अक्ल उसमें लगती नही थी । क्योंकि वह हमारी उपेक्षा से अनजान लडकों से ही कई तरह के सवाल करने में नही हिचकिचाती थी जैसे कि , "चार बजे यहाँ से कौनसी बस जाती है । कि अँग्रेजी में सर ने कितना पढा दिया है । या कि एक दिन के लिये अपनी कापी दे दो भैया ..।"
"भैया...अरे यार क्या मजाक है ? यह तो बहन-भाई का रिश्ता जोडने लगी "--मुंशी रुआँसी मुद्रा में कहता । सुरेश हँसता--"अच्छा है न । दूसरे रिश्ते लायक वह है भी नही । "
फिर भी वह लडकी थी । हमसे बिल्कुल अलग । उसकी मौजूदगी को  नजरअन्दाज भी तो नही कर सकते थे । यही नही जगदीश ,मुंशी और दूसरे लडके अक्सर उसे सुनाने के लिये बहुत ही फालतू से कमेंन्ट्स करते रहते थे । जैसे कि---
" यार सुरेश पेड में ढंग से पानी नही दिया होगा वरना इसमें भी अब तक फूल--फल तो आ ही जाते ।"
" एक तो गिलोय ऊपर से नीम चढी यार कैसे पीसें और पियें । "
यही नही वह आकर जहाँ भी बैठती कोई न कोई अपनी किताबें रख देता वह खडी रहती । शिक्षक जब क्लास में आते तो चुपके से जगह खाली कर देते । यह सब वह चुपचाप देखती रहती पर किसी से कोई शिकायत करना ही नही जानती थी । उसे अपने होने का कोई भान ही नही था जैसे । तभी तो लडकों की गोलमोल सी टिप्पणियों को सुन कर प्रतिक्रियाहीन बनी रहती थी ।
एकदिन तो गजब ही होगया---
मुंशी लडकी की ओर इशारा कर जगदीश से कह रहा था---"ए टेक माइ पेन्....।"
जगदीश को पूरा यकीन था कि मुंशी ने इसके आगे भी कुछ अक्षर जोडे थे जिन्हें वह साँसों में ही बोल गया था सो ढिठाई से हँसता हुआ बोला---"मुझे नही चाहिये । मेरे पास तो अपना है । उसे दे दे जिसको जरूरत हो । जगदीश का इशारा भी लडकी की तरफ था ।"
"चल हट मेरी चीज ऐसे-वैसे लोगों के लिये नही है ..।"
सुन कर सब हँस पडे । वह लडकी भी हँस पडी । एक अबोध सी हँसी । जगदीश बोला---"यह तो सचमुच निरी बेवकूफ है ।
अभी बच्ची है ।"--सुरेश ने भी दया दिखाई ।
इस तरह अनगढ पत्थर सी वह नासमझ लडकी हमारे किसी काम की नही थी । कक्षा में उसके होने न होने का कोई अर्थ नही था । पूरे साल वह इस तरह कक्षा में बनी रही जिस तरह किसी के बाजू वाले फ्लैट में कोई सालों साल रह जाता है पर न कोई विवाद और नही कोई संवाद ।  
 दादी के शब्दों में उसे---बिल्ली का गू ,कहा जासकता था । न लीपने का न थापने का ।
जोडी बनाने की बात पर सबने एक दूसरे को जलती आखों से देखा ।

लेकिन दसवीं पास करते-करते कहानी में मोड और दिलचस्पी आई ।
उम्र के साथ चेहरे में कुछ लोच और आकर्षण भी आगया और फिर  साथ रहने वाले तो जानवर के प्रति भी एक जुडाव सा होजाता है फिर वह तो एक लडकी थी । असुन्दर ही सही पर चढती नई उम्र में लडकी वसन्त की टहनी सी आकर्षक लगती है । उस पर अकेली । उसके प्रति लडकों का नजरिया भी धीरे-धीरे बदल गया । मुंशी उससे कोई परेशानी होने पर बेझिझक मदद माँगने का आग्रह करता तो जगदीश उससे किसी न किसी अधूरे रहे होमवर्क के बारे में पूछता । तो सुरेश ,जब भी वह कुछ पढती सबको ऊँची आवाज में निर्देश देता--"अरे यार डिस्टर्ब मत करो । पढने वालों को पढने दो ।"
लेकिन वह गजब की मट्ठर थी । इन गतिविधियों से बेअसर जैसे भारी वर्षा में कोलतार की सडक । व्यवहार में नाम का भी लोच नही आया । मदद माँगना तो दूर ,अब वह एक दूरी सायास बनाए रखती थी तथा सबसे अलग अनजान बनी सी अपनी किताबें पढती रहती थी । हालाँकि मेरी नजर में एक लडकी के लिये यह उचित भी था । मेरा तो यह भी मानना था कि वह इन लोगों की बातों से बचने के लिये ही व्यस्त रहने का दिखावा करती थी । पढाई क्या खाक करती होगी । पर उसका यों कट कर रहने के लिये पढने का बहाना खोजना मुंशी और उसी जैसे दूसरे लडकों को अपना अपमान लगने लगा । ऐसा कैसे हो सकता था कि एक लडकी उनके होते हुए न केवल पढती रहे , बल्कि उन्हें नजरअन्दाज भी करती रहे । उनके कमेंट्स पर भी ध्यान न दे । अकड और गरूर तो सिर्फ खूबसूरत लडकियों को शोभा देता है ।यह किस बात पर अकड दिखाती है । उस पर यह भी गजब कि कक्षा में वही सबसे पहले अपना काम पूरा करके शाबासी पाती । सर लोग हम सब लडकों को सम्बोधित कर कहते--
"सरिता को देखो और सीखो कि जब काम करना ही होता है तो कोई बहाना नही चलता । यह लडकी होकर भी गाँव से पढने आती है घर के काम करती है और तुम सबसे अच्छा काम करके दिखाती है।"
"अच्छा तो अब इसके कारण हमें बेइज्जती भी सहनी होगी ..।"--हमें अहसास हुआ ।
एक दिन बात बहुत बढ गई । हुआ यह कि पीरियड खाली था । मुंशी रजिस्टर से तबला बजा कर  भद्दा सा गीत गाने लगा ---हाय करिहा के दरद ने ....। लडके ताली पीटने लगे ।
वह लडकी क्लास से बाहर जाकर आफिस के पास पडे स्टूल पर बैठ कर पढने लगी । गुप्ता सर ने उसे यही निर्देश दे रखा था । लेकिन हमारी बदकिस्मती से सिंह साहब (प्रिंसिपल) ने यह सब देख लिया । यानी लडकी को कक्षा से बाहर बैठे और हमें गाते बजाते । सिंह साहब अपने अनुशासन के लिये जिले भर में जाने जाते थे । बस हम चार-पाँच लडकों को बुलवाया । जरूर पहले से भी उन तक कोई जानकारी पहुँच रही थी  हमारे बारे में वरना नाम लेकर हमें ही क्यों बुलवाते । बुलाकर उन्होंने हमें पहले खूब लताडा फिर एक लम्बी नसीहत व चेतावनी दीं कि अगर ऐसी वैसी हरकतें कीं ,  लडकी को परेशान किया तो ठीक नही होगा । सारा लफंगापन निकाल देंगे ।  स्कूल से रेस्टीकेट कर देंगे आदि..।
इस घटना के बाद मैं और सुरेन्द्र जैसे भलमनसाहत का लेबल चिपकाए बैठे लडके तो मामले से चुपचाप दूर खिसक लिये पर ओम के मन में तो जैसे आग ही सुलग उठी । ओमपाल शर्मा तेजपाल शर्मा का बेटा था जो सुजानगढ के जाने माने लोगों में से था और जनपद अध्यक्ष भी । यह जाना-माना-पन केवल धन का ही नही तमाम हथकण्डों का भी था जिनके बल पर अपनी सत्ता जमाए था । सत्ता को बनाए रखना सत्ता हासिल करने से कम कठिन नही होता ।
"अब तो यह अपना  प्रस्टेज पाइंट बन गया समझो । दो कौडी की लडकी के कारण हम अपमानित हो रहे हैं ।'--मुंशी ने दाँत चबाते हुए कहा--- "परेशान अब तक तो नही किया था पर अब करके दिखाएंगे । नदी में रह कर मगर से बैर । अब यह सुजानगढ में नही पढ पाएगी । हमने सोचा था कि चलो गाँव की सीधी-सादी लडकी है ..। पर यह तो हमें ही रास्ता बताने लगी ।"
इसके बाद ऊपर से सब शान्त पर भीतर भारी उथल-पुथल । संकल्प । पुरुष को जो सबसे ज्यादा अखरता है वह है स्त्री की अपराजेयता । उसे तोडना ही उसके लिये जैसे सबसे जरूरी काम होजाता है । फिर सचमुच उसके लिये बहुत सारी मुश्किलें पैदा की गईं । कभी उसकी किताबें गायब की जाने लगीं । कभी उसके नाम चिट्ठियाँ डाली जाने लगीं । यही नही उसके नाम के साथ दीवारों ,फर्श ,छत और रास्ते में कहीं भी अश्लील बातें लिखी जाने लगीं । पहले तो स्कूल में खूब हलचल मची । सर लोगों को लाख कोशिशों के बाद कोई सबूत हाथ नही लगा । क्योंकि राइटिंग किसी से मेल ही नही खाती थी । बिना सबूत के तो चोर राजा बराबर ही होता है । धीरे-धीरे पूरे सुजानगढ में इसकी चर्चा होने लगी । लडकी जिधर से भी निकलती ,उसे देखते ही हर कोई कहता ---"अरे देखो वो लडकी है जिसका नाम कोई बडे गन्दे तरीके से लिख जाता है । बाप जी उसे बनाने चले थे' पिराम मिनस्टर '। हमारी भी तो लडकियाँ हैं ।"
उस लडकी के गाँव के दूसरे लडके भी पढने आते थे । उन्होंने हमें बताया कि थू-थू हो रही है सब जगह । गाँव में जहाँ देखो यही कहा जा रहा है कि मास्टर से  कितनी मना करी थी कि लडकी को मत पढाओ । जमाना खराब है पर कान्तीलाल को तो धुन सवार हुई कि लडकी को पढा लिखा कर काबिल बनाना ही है । अब देखो कालिख पुत रही है कि नही । कोई भला आदमी तो ब्याहने भी राजी नही होगा । कुशल चाहो तो अपनी लडकियों को दूर ही रखना उससे । मजे की बात यह कि लगभग सभी ने दोषी अपशब्द लिखने वाले को नही बल्कि उस लडकी को माना जिसके लिये वह सब लिखा गया । आखिर बदनामी लडकी की ही होती है न ।तो चिन्ता भी उसी को करनी चाहिये कि नही ।
इस सबका असर यह हुआ कि वह अकेली पड गई । स्कूल में तो वह अकेली थी ही पर अब गाँव से भी उसके साथ कोई नही आता था । सुनसान रास्तों से अकेली कब तक स्कूल जाती । आखिर लडकी ही तो थी ।
और अन्ततः उस लडकी का स्कूल आना बन्द हो ही गया । मुंशी ने सिकन्दर की तरह सबको देखा । छाती ठोकी । मुझे लगा कि लडकी ने यह ठीक ही किया । पढ लिख कर भी वह कौनसी इन्दिरा गान्धी बन जाती । इतनी बदनामी झेल कर पढना क्या जरूरी है । कम से कम लडकी के लिये तो बिल्कुल नही ।
हैरानी की बात यह हुई कि उसके घर से कोई शिकायत करने भी नही आया । अगर उसके पिता ने कोई सख्त कदम उठा या होता तो शायद  हम लडके कमजोर पड जाते ।यह हमारी जीत थी ।
"कौन आता ! पिता तो वैसे ही शर्म के मारे गर्दन झुकाए बैठा होगा ।"--जगदीश बोला --मेरी दादी कहती थी कि रूप और गुणहीन कन्या का पिता सबसे ज्यादा बेचारा होता है फिर यह तो बदनाम भी होगई थी । हाँ परीक्षा देने के लिये वह जरूर आई थी लेकिन वैसे ही जैसे कोई सुरक्षा के बीच कोई अपराधी लाया जाता है । इसके बाद क्या हुआ । वह पास हुई या फेल ( वैसे फेल होने के चांस ही ज्यादा लग रहे थे ।) शादी हुई या नही कुछ पता नही चला । इसकी कोई जरूरत भी नही थी । हमारे लिये वह गए साल के कैलेण्डर की तारीख भर थी । पर उस साल के गुजर जाने का कही हल्का सा भी मलाल नही था ,यह कहना भी मुश्किल था । दूब की जड की तरह वह घटना मन की जमीन में कहीं दबी थी तभी तो एक महिला को देख कर एकदम हरियाने लगी थी । हालाँकि यहाँ इतने बडे कालेज में उसके मिलने की कल्पना मुझे एक बारगी निरर्थक ही लगी ।
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परीक्षा प्रारंभ हुई । पेपर देख कर मुझे पहले तो पसीना ही आगया । उसमें हिन्दी वाला भाग मुझे सबसे ज्यादा मुश्किल लगा । वैसे जितनी भी कठिनाइयाँ हैं वह हिन्दी में ही आतीं हैं । वह भी साहित्य के इतिहास और काव्य सिद्धान्त में । मैं खीज उठा । अब इससे क्या फर्क पडता है कि दुष्यन्त कुमार गीतकार हैं या गजलकार कि निराला जी छायावाद के कवि हैं । पर उनकी कविताओं में प्रगतिवाद के स्वर सबसे ज्यादा हैं कि ध्वनि सिद्धान्त क्या है, और साधारणीकरण किसका होता है । किस काम के हैं ये सवाल ?
अब समझ आ रहा है कि लडके-लडकियाँ ऐसे सवालों को छोड क्यों तकनीकी शिक्षा में जा रहे हैं ।उन्हें हिन्दी आए न आए पर अशिक्षित मजदूर वर्ग में बच्चों की पैदावार की तरह ही उग रहीं कम्पनियाँ उन्हें धडाधड नियुक्तियाँ दे रही है । मैं सोच रहा था कि क्यों नही मैंने भी उस तरफ ध्यान क्यों नही दिया । खैर....।
पिछली बार की अपेक्षा इस बार पेपर कुछ ठीक रहा और मैं उम्मीद के साथ लिखने में व्यस्त था कि एक गुलशन ग्रोवर टाइप एक व्यक्ति ने अचानक आकर मेरी कापी उठाली और कडक कर कहा --"आउट । अब भी ऐसी बचकानी हरकतें कर रहे हो ।" उसे मेरे पास ही पडी दो चिटें मिलीं थी और संयोग से मैं वही सब लिख भी रहा था ।
"सर वो मेरी नही हैं । आप यकीन करें मैंने कुछ नही किया ।"--मैंने गिडगिडाते हुए कहा ।
ऐसे में कैसी दयनीय हालत हो जाती है । पर वह मुझसे फार्म भरवाने अडा ही रहा ।
"फार्म भर कर तो मेरा कैरीयर चौपट हो जाएगा सर ।"--मैं फिर गिडगिडाया ।
"यह पहले नही सोचा था ?"-- वह बोला । वह सचमुच बडा ही कठोर अधिकारी था । जरा नही पिघला  ।  एक-दो लोग और भी आगए । मन का ज्वाला मुखी ठंडा पड चुका था । वरना इतना सुनने के बाद कौन चुप रहता । मैं इस तरह अपनी बेइज्जती सहने का आदी कहाँ था । पर गरज जो थी । पिताजी व माँ की उम्मीदभरी आँखें मन में ज्वार उठा रही थी । मैंने असहाय होकर चारों ओर देखा । बचने का कोई उपाय नजर नही आ रहा था । काश यहाँ अपना कोई परिचित होता ...। तभी एक पतली मगर मजबूत आवाज आई----"राजीव जी, वहाँ मैं देखती हूँ आप इधर आइये...। आपको हिन्दी के विभागाध्यक्ष श्री तोमर साहब याद कर रहे हैं ।"
मैं चौंका । यह तो वही महिला थी जो प्रांगण में मेरे सामने से गुजरी थी । जिसे देख कर मुझे सरिता वर्मा का ध्यान आया । अब वह ध्यान और भी निरन्तर होगया । इसकी तो आवाज भी सरिता जैसी है । कहीं यह वही तो नही ...। हाँ वही तो है । एकदम सरिता वर्मा । बाकी कमी उसकी टिप्पणी ने करदी जो बात में अतीत को चिपकाती हुई मुखर हुई----"यह क्या है ? आप अपने कैरियर के प्रति आज भी सचेत नही हैं ?
मैं मुश्किल से ही उसे देख पाया । वह काफी सुलझी सँवरीथी । सुरुचिपूर्ण वेश में शालीन भी लग रही थी । यहाँ उसकी ऐसी स्थिति है कि उसकी आवाज पर ही निरीक्षक मेरे नकल प्रकरण को छोड कर उसके पीछे चला गया । मेरे लिये यह सब अप्रत्याशित था । और दिल--दिमाग पर पूरी तरह छा जाने वाला भी पर वह समय केवल परीक्षा देने का था । मैं कुछ समय सब कुछ भूलकर उत्तर लिखने लगा । लेकिन उसकी बात अन्त तक दिमाग में गूँजती रही ।
परीक्षा देकर जैसे ही मैं बाहर जाने लगा ,एक आदमी ने मुझे पुकारा---"ओ भाई ,आपको वो मैडम बुला रहीं हैं । छह न.वाले रूम में ।"
उसी आदमी से मुझे पता चला कि सरिता यहाँ असिस्टेंट प्रोफेसर है । उसके पति भी इसी कालेज में ही हैं । वाह सरिता वर्मा कैसी हार उपहार में दी है तुमने । मुझे याद आया कि लडके उसे व्यंग्यवश मैडम क्यूरी , लैक्चरारनी , प्रोफेसरनी ..और न जाने किन किन उपाधियों से नवाजते थे । जगदीश कहता---"इतना मत जलो ,मास्टरनी तो वह बन जाएगी ।"
"अरे भाई जगदीश की बातें हैं ...वरना यह मुँह और मसूर की दाल..।"
मैं कक्ष में जाने में झिझक रहा था । किस मुँह से सामने जाऊँ । पुरानी बातें पीछे छोड भी दे तो इस हाल की बात पर क्या शर्मिन्दा न करेगी यह सरिता वर्मा ।
"अन्दर आओ । "--उसने मुझे दरवाजे पर ही खडा झिझकता हुए देख लिया ।
उसकी आवाज पर मैं फिर चौंक उठा । वह कह रही थी ---"मैंने तुम्हें देखते ही पहचान लिया । अन्दर आओ ।" मैंने कृतज्ञता दिखाते हुए अभिवादन किया ।
आप यहाँ । मैडम ...वाह क्या बात है एकदम अप्रत्याशित । कहाँ तो  वे .... और कहाँ आप...। मैं तो एकदम ....।
"अरे वह सब छोडो ।--उसने मेरी बात को पीछे करके पूछा--- यह बताओ पेपर कैसा गया ? कौनसा अटेम्प्ट है यह ?
"मैडम आखिरी है बस । देखते हैं...।"
"इस बार तो निकल जाओगे मेरा विश्वास है । लेकिन वह क्या मामला था जो भदौरिया जी कापी छीन रहे थे । उन्हें मैंने ही वहाँ से हटाया था । वैसे सचमुच तो चीटिंग नही थी कहीं "---वह हल्का सा मुस्कराई । पर मैं अभी भी संकुचित था ।
" जी नही यकीनन उसमें मेरी गलती नही थी मैडम ..।"
"अरे, यह मैडम--मैडम क्या लगा रखी है ? मैं सरिता हूँ भाई । आपकी क्लासमेट । ..और उन लोगों के क्या हाल हैं ? मुंशी ,सुरेश ..जगदीश.. ओम..।"
"ये लोग बडे शरारती थे-"--हँसते हुए उसने अपने पति को बताया---"दिमाग में जाने क्या-क्या चलता रहता था । एकदम निरर्थक । लेकिन मुश्किल यह है कि असल में भविष्य के तय होने का समय भी वही होता है न ! "
मैं अवाक् था । उसकी बातों में सहजता थी । अतीत की कोई स्मृति , कटुता या मलाल नही था । आज भी अगर वह न होती तो....।
उस दिन मुझे लगा कि अचानक मेरा कद बहुत छोटा होगया है । बौना कहलाने लायक । मुझे एक बार फिर याद आया कि सुरेन्द्र जैसा लडका भी सरिता वर्मा को अपने लायक नही समझता था लेकिन आज यह सच साबित हो ही गया कि उसके लायक तो वहाँ कोई था ही नही । न सुजानगढ के सर्वसम्पन्न और प्रतिष्ठित घर का ओम और न ही स्कूल भर में प्रिंस कहाने वाला मैं ।
"रिजल्ट आए तो बताना जरूर---" ग्लानिबोध के साथ जब मैं पीछा छुडाता हुआ सा वहाँ से भाग रहा था ,उसकी आवाज मेरा पीछा कर रही थी ।