कथा-कहानी

काकाजी (मेरे पिता)की प्रथम पुण्यतिथि( 19मई2011)पर यह नया ब्लाग शुरु कर रही हूँ जिसमें मेरी अधूरी पडी कहानियों में से कुछ कहानियाँ प्रस्तुत करूँगी । कहानी 'मास्टरसाब'जो पाँच वर्ष पहले अधूरी छोड दी थी ,काफी कुछ काकाजी से ही प्रेरित है । शिक्षक वाले प्रसंग तो पूरी तरह उन्ही के हैं । कहानी को परिपूर्ण तो नही कहा जासकता लेकिन आप सबके विचार मुझे कभी उस स्तर पर ले जाएंगे । इसलिये कृपया मेरी कहानियों को पढें और प्रतिक्रिया भी अवश्य ही दें मेरा उत्साह तो बढेगा ही , एक दिशा भी मिलेगी ।

मंगलवार, 19 नवंबर 2024

बेदखल

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  “ बाबूजी ! ” शिवकुमार ने दरवाजे की तरफ से आई वह पतली और हल्की आवाज सुनी नहीं थी या सुनकर अनसुनी करदी थी यह नहीं ठीक से तो नहीं कहा जा स...
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शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

जाने क्यों

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  मन नही होता मिलने का अब सुख और आराम से क्या हुआ , जो आज खड़े हैं द्वार पर ही   पहले जब मैं उनकी राह देखती थी किसी प्रेयसी की...
6 टिप्‍पणियां:
शनिवार, 6 जनवरी 2024

गूँज

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  दरवाजे पर दस्तक हुई तो गीतिका का मन कह उठा--- " शायद विनीत आगया . ” तीन दिन हुए जब विनीत इन्टरव्यू के लिये दिल्ली गया था . कम्पनी व...
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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
जीवन के छह दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ ।अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है । दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्रायः हाशिये पर ही रहती आई हूँ ।फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है ।
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