रविवार, 10 जुलाई 2011

मन्दबुद्धि

यह कहानी सन् 1987 में लिखी गई थी । इसे यहाँ प्रस्तुत करने का उद्देश्य किसी बडी विशेष कहानी को सामने लाना नही है । सच तो यह है कि जब 1990 में एक स्वनामधन्य सम्पादक जी ने इसे लौटा दिया था तब मैंने भी इसे आजीवन कारावास दे दिया था । अनेक दूसरी रचनाओं की तरह वर्षों तक मैं इस कहानी को भी पलटकर नही देख नही पाई । कुछ समय पहले जब ''तारे जमीन पर'' देखी तो अचानक मुझे यह कहानी याद आई । और इसे उजाले में लाने का प्रलोभन जागा । फिल्म से इसे नही जोडा जा सकता । यह एक मामूली सी कहानी और वह एक अविस्मरणीय फिल्म । फिर भी कहीं न कही फिल्म का आइडिया इससे मिलता है । पढ़कर देखिये इसीलिये इस कहानी को लगभग ज्यों की त्यों यहाँ आपके साथ बाँटते हुए प्रकाशन की आकांक्षा पूरी कर रही हूँ । आपकी प्रतिक्रियाएं मुझे नए विचार देंगीं ।

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

"कल बिट्टू आ रहा है "---माँ ने बडे उल्लास के साथ मुझे सूचना दी----"बुआ उसे खुद लेकर आ रहीं हैं । शायद उसे छोडने के लिये ही । आज ही उनकी चिट्ठी आई है ।"
अच्छा तो आखिर लौट कर बुद्धू आ ही गए घर , बुआ बेशक उसे छोडने ही आ रहीं होंगी और तय है कि उसमें रत्ती भर भी सुधार नही हुआ होगा ।----मैंने सोचा ।
तीन महीने पहले तो बुआ कितने दावे करके बिट्टू को अपने साथ लेगईं थीं । पर हुआ वही जो पापा ने सोचा था। मैंने सोचा था । यह सूचना मेरे लिये सचमुच काफी हताशा-जनक थी । बिट्टू के लौट आने से मेरा तनाव व उलझन बेशक बढ जाने वाली थी । यह आश्चर्य की बात ही है न कि किसी का इकलौता भाई छह महीने बाद घर लौट रहा हो और वह खुश होने की बजाय निराश होजाए । पर बात ही कुछ ऐसी है कि आप भाई के लिये बडे-बडे सपने पाले बैठी एक बहन की उलझन को शायद समझ सकेंगे । दरअसल बिट्टू मेरा भाई जरूर है , लेकिन बाहर वाले तो इस पर यकीन ही नही करते ।
 मम्मी की सहेलियाँ भी अक्सर मजाक करती हैं--"-अरे सुमि ! तुम्हारी बेटी तो बडी प्यारी है । एकदम परी जैसी बिल्कुल तुम्ही पर गई है लेकिन बेटा....यह किस पर गया है ? तुम्हारे पति भी अच्छे--खासे सुन्दर हैं ।" "शायद अपने दादाजी पर गया है ।"----मम्मी फीकी सी मुस्कराहट के साथ कहतीं हैं । मैं अपनी तारीफ सुन कर जितनी खुश होती हूँ उतनी ही इस बात पर खीज भी आती है । यह है न उलझन व तनाव वाली बात कि कोई मेरे भाई को लेकर हँसी उडाए । पर मेरा भाई आखिर मेरे जैसा क्यों नही । बिट्टू ने भला दादाजी का रंग-रूप ही क्यों चुना...उसे दादाजी पर जाना ही था तो दिमाग में चला जाता । यहाँ स्कूल में जब लडके-लडकियाँ बिट्टू को बनमानुष कह कर बुलाते थे तब मुझ पर क्या गुजरती थी मैं ही जानती हूँ । मैं उसे देख कर सोचती कि काश इसका रंग कुछ हल्का होता । काश ,आँखें कुछ बडीं होतीं और नाक थोडी पतली और लम्बी होती । काश दाँत कुछ कतार बद्ध होते और बाल किसी जिद्दी और मनमौजी बच्चे जैसे होने की बजाय जरा अनुशासित होते , किसी स्टाइल में सँवारे जा सकते तब मुझे कम से कम इतना नही सोचना पडता ।
चलिये रंग-रूप को सँवारा जा सकता है । मम्मी ने कोशिश की थी तो कुछ अन्तर आया भी था । मम्मी कहती हैं कि रहन--सहन और उम्र के साथ रंग-रूप भी सँवर जाता है । लेकिन असली परेशानी थी बिट्टू की आदतों की । वह रंग-रूप में न सही ,आदतों व दिमाग में तो मेरे जैसा होता । उसकी एक भी आदत हम लोगों से मेल नही खाती थी । चाल--ढाल, बोल-चाल खाने-पीने का ढंग ,किसी भी सूरत में वह एक कालेज के लेक्चरर पिता और बी.ए. पास माँ का बेटा है । उस पर भी गजब यह कि वह हमारी बातें सुन कर ऐसे देखता था मानो किसी दूसरी अनजानी भाषा में कोई बात उसे सुनादी गई हो । मानना तो दूर की बात । दाँत कुछ बडे होने के कारण वह अपने मुँह को अक्सर खुला रखता था जो मुझे बहुत बुरा लगता था ।
बिट्टू अपने दाँत बन्द रखो ..। इस बात के लिये मैं हमेशा उसे टोकती रहती थी । पर वह पूरा मुँह खोल कर हँसता -----"हा..हा..हा...।"
"यह क्या हा ..हा...ही ..ही ..लगा रखी है । चुपचाप मुँह बन्द करो ..।"
"अच्छा दीदी ।---मेरे चिल्लाने पर वह मुँह बन्द कर लेता पर अगले ही पल फिक् से मुँह खुल जाता ।
उसे गाना नही आता पर गाने का शौक है । शौक होना तो अच्छी बात है लेकिन गाना आना तो चाहिये । यह क्या कि कोई आग्रह करे तो तुरन्त गाना शुरु कर दो । मना भी तो कर सकता था । अब मुझे ही देखो सब कहते हैं कि मैं अच्छा गाती हूँ पर गाती तभी हूँ जब कोई बहुत ज्यादा कहे । होता यह कि वह गाता रहता और लोग हँसी रोके उसे देखते रहते । उसका कोई मजाक बनाए तो क्या मुझे सहन होगा । नाराज होने की बजाय मैं उसे प्यार से समझाती--बिट्टू भैया ,तुम्हें गाना ही है तो दो -चार गाने अच्छी तरह सीख ही लो । ताकि सुनने वाले तीफ करें और कहें कि देखो यही है रीनू का भाई । तो वह उल्टा मुझसे ही पूछता---
"अच्छा दीदी ! पर अगर मैं गाना नही सीख पाया तो फिर मुझे लोग तुम्हारा भाई नही कहेंगे..?"
उफ्....। उसके बेतुके से सवाल मुझे हैरान कर देने वाले होते थे ।
उसकी और भी कई आदतें बर्दाश्त से बाहर की थी जैसे वह रास्ते में पडी बेकार चीजें उठा लेता या किसी भी चीज को एकटक देखता रह जाता था । चाहे वह खाने की चीज ही क्यों न हो । एक दिन हम बाजार में जा रहे थे । अचानक मैंने पाया कि बिट्टू हमारे साथ नही है । पीछे देखा तो हमें बडा खेद हुआ । बिट्टू को एक हलवाई की दुकान पर खडा ललचाई नजरों से बनती हुई इमरतियों को देख रहा था और हलवाई बडी हिकारत से कह रहा था -- "क्या चाहिये ?"
निश्चित ही हलवाई ने बिट्टू के कपडों को देख कर ही कुछ कोमलता से कहा था वरना झिडक कर भगा देता ।
घर जब हम सबने एक स्वर से उसे डाँटा तो उस समय बिल्कुल मूर्ति बना खडा रहा ।
यह भी उसकी बेहद अखरने वाली आदत थी । सवाल करने वाले का धैर्य टूटने की हद तक आजाता पर उसे जबाब नही देना होता तो वह चुपचाप निरपेक्ष--भाव से मूक देखता रहता था । मानो उसने कुछ सुना ही नही या कि कोई बडा रहस्य सीने में दफन किये हो जिसे खोलने से बडा भारी विवाद हो जाने वाला हो । कई बार इस बात पर पिट भी गया था । दो-तीन दिन बाद अपने आप बोला --"मैं तो बस यह देख रहा था कि इतनी सुन्दर इमरतियाँ बनती कैसे हैं !"
उसके खाने का तरीका मुझे बडा आपत्तिजनक लगता था । लाख सिखाने के बावजूद वह बडा ग्रास ही तोडता और पूरा मुँह खोल कर ही चबाता था । इस बात पर पापा ने एक बार पूरी रोटी ही उसके मुँह में ठूँसदी थी और कहा था----ले अब चबा ..। उसके बाद उसने हमारे साथ खाना ही बन्द कर दिया । पर सही तरीका सीखा तो नही न ।
मुझे दुख होता था कि बिट्टू इतना जिद्दी व मनमौजी क्यों है । अच्छे बच्चों की तरह बडों की बात क्यों नही मान लेता । पहले पापा का विचार था कि बिट्टू को अपने साथ ले जाना चाहिये । बाहर निकलेगा ,दूसरे बच्चों से मिलेगा तो इसकी झिझक दूर होगी और कुछ तौर--तरीके सीखेगा पर उनका विचार फेल होगया था । क्योंकि बिट्टू का अपना रंग है जिस पर दूसरा रंग नही चढता । एक बार हम सुनीता आंटी के घर गए । मैंने बिट्टू को समझाया ---"सुनो बिट्टू ! जब आंटी नाश्ता लगाएं तो भुक्खड की तरह टूट मत पडना जैसे घर में करता है वरना तेरी खैर नही । दूसरी जगह कभी खाने--पीने में में हडबडाहट व जल्दबाजी नही करते और जरा सा ही खाते हैं । समझे..।"
"अच्छा ..लेकिन जब खाना ही नही है तो लोग इतनी सारी चीजें मेज पर सजा कर क्यों रखते हैं दीदी ?" उसने बडी मासूमियत से पूछा ।
"वे सब दिखाने की होतीं हैं । और....वह सब तेरे समझने की चीज नही है । बस जो मैंने कहा है उसे मानना है ।"
बिट्टू ने मेरी बात मानी पर इस तरह कि मेरी पूरी सीख पर पानी फिर गया । बिट्टू खाने की चीजों से इस तरह मुँह फेर कर बैठा रहा कि आंटी को टोकना ही पडा --"अरे बिट्टू खाओ न बेटा ,क्या ये बिस्किट और मिठाई अच्छी नही लगती ।"
"अच्छी तो बहुत लगती है ,पर दीदी ने मना किया है ।" बिट्टू बिना किसी लाग--लपेट के बोल पडा । बोला । मैं तो जैसे जमीन में गढ गई । यह लडका भी न...!
"क्या कहा ?"
"कहा कि वहाँ कुछ खाना नही वरना पिटाई करूँगी ।"
आन्टी व्यंग्य से मुस्करा कर बोलीं---"अरी रीनू यह तो गन्दी बात है । क्यों टोकती है बच्चे को ! हाँ !! बिट्टू ,खा ले बेटा ...।"
खामखां उनके सामने भद्द हुई मेरी । मैं खिसिया गई ---"मम्मी, आइन्दा इसे किसी के घर मत ले जाना । बेसऊर लडका..। इसे कुछ भी सिखाना बेकार है ।"
अब ये तो हुईं दिखावे वाली बातें पर असली समस्या थी बिट्टू के आन्तरिक विकास की । यह तो तय है कि अगर सिखाने-समझाने पर भी बच्चा बडों की बात नही मानता तो वह या तो बेहद निरंकुश और अनियन्त्रित विचारों का है या उसमें अनुकरण की क्षमता नही है । पर हमारे लिये दोनों ही बातें दुखद थीं । पापा बिट्टू के भविष्य को लेकर काफी चिन्तित रहते थे । मम्मी कहतीं थी कि अभी छोटा है आगे सब सीख जाएगा...।
"छोटा है ?" --पापा चिढ कर कहते ---"रीनू को देखा था चार साल की उम्र में उसने ढेर सारी कविताएं याद करलीं थीं । स्कूल से कभी कोई शिकायत नही आई । जो भी काम उसे मिलता था तुरन्त कर देती थी । मम्मी निःशब्द होजातीं थीं और मैं फूल कर गुब्बारा ..।"
पापा की खीज स्वाभाविक थी । बिट्टू को पापा माने हुए दो स्कूलों में भेज चुके थे । पहले सरकारी स्कूल में वह सिर्फ दो दिन पढने गया । उसके बाद उस पर डाँटने पीटने ,बहुत सारी चीजों से वंचित करने की धमकियाँ और बहुत सारे उपहार देने के प्रलोभन दिये गए पर वह टस से मस नही हुआ । हार कर पापा ने दूसरे एक प्राइवेट स्कूल में भर्ती करा दिया ,जहाँ खेलकूद के कई साधन थे । बैठने के लिये मेज-कुर्सियाँ थीं । पर वहाँ भी, पापा जब उसके बारे में जानकारी लेने गए ,मास्टर जी ने बिट्टू से कई शिकायतें कीं----उमेश बाबू , आपके बच्चे के साथ बडी समस्याएं हैं ।
 वह कक्षा के दूसरे बच्चों के साथ न रह कर अलग अपनी मर्जी के काम करता रहता है । जैसे जब सारे बच्चे बारहखडी सीखते हैं, आपका बेटा खिडकी से बाहर सडक पर गुजरती गाडियों को गिनता रहता है । गिनती याद करने की बजाय कभी मैदान में कंकड बीनता है तो कभी हवाईजहाज की आवाज सुनता है तो कक्षा छोड कर बाहर आजाता है । उसके साथ दूसरे बच्चे भी बाहर निकल पडते हैं । कक्षा की व्यवस्था भंग होती है । यही नही ,कक्षा में दिये काम को कभी पूरा करके नही लाता ।
दूसरे पालक भी कई शिकायतें लाते रहते हैं जैसे कि बिट्टू उनके बच्चों के बस्तों में से बत्तियाँ निकाल लेता है । बिट्टू बच्चों को पढने नही देता । चलते समय बीच में टाँग अडा कर गिरा देता है और कभी किसी के जूते में चुपचाप कंकड डाल देता है । डाँटो तो एकदम गुमसुम होजाता है । और सबसे बुरी बात तो यह है कि पढने में उसका जरा भी ध्यान नही है । वह कोई बात सीखना ही नही चाहता । तब आप ही बताएं कि हम उसे क्या सिखाएं और क्या पढाएं ।
मुझे और पापा को शिक्षकों की एक भी बात गलत नही लगी । घर में भी तो उसका समय पढने -लिखने या कुछ याद करने की बजाय कागज के कौए या फिरकी बनाने में और चिडियों के अण्डों की हिफाजत करने में जाता था । एक दिन जब बारिश होने वाली थी तब जहाँ मैं पापा से यह सीख रही थी कि वर्षा क्यों होती है । बादल कैसे बनते है ,बिट्टू महाशय पंडुकी के घोंसले की चिन्ता कर रहे थे कि तेज वर्षा में उसके अण्डों का क्या होगा । और जब तक उसने टहनियों के ऊपर मोमजामा नही तान दिया चैन से नही बैठा ।
इसका होगा क्या !!-पापा अक्सर चिन्तित हो उठते थे --लडका कापी-किताबों की बजाय चिडियों व जानवरों में मन लगाता है ।ऐसे हालात से तो लगता है कि यह अनपढ ही रह जाएगा । भला अनपढ लोगों की कोई जिन्दगी होती है । कई बार पापा गुस्से में उसे पीट भी देते थे । पर पिटाई के बाद तो वह और भी सत्याग्रही होजाता था । दिन-दिन भर खाना खाए बिना बैठा रहता था ।पापा को बाद में दुख भी होता था ।पर चिन्ता तो कम नही होती थी न ।
एक दिन हमारी बुआ आईं । बेटी बुआ । अरे ,बेटी उनका नाम है । पापा से बडीं हैं । उनकी शादी एक बडे प्रतिष्ठित परिवार में हुई है । फूफाजी एक प्राइमरी स्कूल में पढाते है । बडे कलाकार हैं और बच्चों का खासतौर पर ध्यान रखते हैं । माँ ने प्रसंगवश जब बिट्टू के बारे में चिन्ता जताई तो बुआ कुछ देर सोचतीं रहीं फिर तपाक से बोलीं----"इसे हमारे पास क्यों नही छोड देते ! सच कह रही हूँ सुमिता ! भुवन और अतुल तो अपनी--अपनी नौकरी पर गए । मैं और तुम्हारे जीजाजी ही तो रह गए हैं । बिट्टू हमारे पास रहेगा तो हमें भी अच्छा लगेगा ।"
"दीदी ! तुम बेकार ही परेशान हो जाओगी ।" --पापा ने अविश्वास के साथ कहा । हो सकता है माँ की तरह उन्हें भी बेटे को दूर करने में बुरा लग रहा हो । सच कहूँ तो अच्छा तो मुझे भी नही लगने वाला था ।जैसा भी है पर वह मेरा भाई है । बस मैं चाहती थी कि कैसे भी हो ,बिट्टू पढने में निकल जाए । हो सकता है फूफाजी इसे राह पर ले आएं आखिर मैं अपने भाई का भला ही तो चाहती थी ।
इस तरह बुआ बिट्टू को अपने साथ ले गईं थीं ।

तो बुआ ने भी आखिर हथियार डाल ही दिये ।-- माँ ने जब बिट्टू को लेकर बुआ के आने की सूचना दी तो मुझे निराशा हुई । क्योंकि मेरी एक उम्मीद टूट गई थी । हालाँकि मुझे पहले ही लग रहा था कि जब पापा सफल नही हुए तो बुआ और फूफाजी कहाँ ..।
दोपहर की गाडी से जब बिट्टू उतरा तो मुझे देख कर हल्का सा मुस्कराया । जैसे कोई महा कंजूस अपनी जेब से पैसे निकालता है । मुझे उसका मुस्कराना अच्छा तो लगा पर बाकी सब कुछ वैसा ही था । वैसे ही अडियल जिद्दी से बाल ,निरंकुश से दाँत ..। वैसा ही चेहरे से झलकने वाला बुद्धूपना । हाँ आँखों में हल्की सी चमक थी पर यह तो बाहर रह कर लौटे किसी भी बच्चे या बडे में हो सकती है । पर उसने , जिसकी मैं उम्मीद कर रही थी , मुझसे कोई बात नही की । और घर के पिछवाडे में जाकर बुलबुल के घोंसले को देखने लगा । शाम को खाना खाने के बाद जब हम सब बैठे तो पापा ने कहा----"अच्छा हुआ तुम आगईं दीदी ।"। बुआ के आने की सूचना से शायद उन्हें बुआ की असफलता का अहसास होगया था । इसलिये उसे घर पर पढाने के लिये एक अच्छे शिक्षक से बात होगई थी । वैसे यह भी ठीक है कि माता--पिता को बिना किसी बडी वजह के अपने बच्चे को दूर नही करना चाहिये ।
"मैंने एक और अच्छे स्कूल में भी बात करली है । वहाँ कल इसका इन्टरव्यू होगा । शायद यहाँ कुछ उम्मीद बने...।
"अरे ,इसकी क्या जरूरत है । वैसे भी परसों तो हम वापस जा ही रहे हैं ।--बुआ ने हम सबको चौंकाते हुए कहा --वह तो बिट्टू तुम सबकी याद कर रहा था । मैंने सोचा कि इस बहाने मैं भी मिल आऊँ । वो तो इसे भेजने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे ।"
"तो तुम इसे छोडने नही आईं ?"
"छोडने क्यों आऊँगी भला ! अरे मैं बताना ही भूल गई और तुमने भी नही पूछा कि बिट्टू के क्या हाल-चाल हैं । अब मैं बता रही हूँ कि बिट्टू बडा प्रतिभाशाली है । चित्र बनाने में तो उसका मुकाबला नही है । महीने भर में ही यह ऐसे चित्र बनाने लगा है कि लोग देखते रह जाते हैं । जिले व संभाग स्तर पर इसके चित्रों को पहला इनाम मिला है । अब राज्य-स्तर की बारी है । इसलिये अभ्यास कराने के साथ कुछ और सिखाना होगा । होगा इसके फूफाजी कह रहे थे कि वे इसे राष्ट्र-स्तर पर भी पहले स्थान पर देखने की आशा रखते हैं । और उन्हें पूरा विश्वास है कि ऐसा होगा ।"
" चित्र !! ---मैंने निराशा व व्यंग्य से कहा----लो...! अब पढाई की जगह चित्रकारी करेंगे हमारे बिट्टू जी । पढाई में तो आज भी वही ढाक के तीन पात ..?"
"असल में पढना किसे कहा जाता है रीनू बेटा ! अन्दर की क्षमताओं के विकास का नाम ही तो सही शिक्षा है । और अब तो तुम इसकी पढाई भी देखना । वास्तव में बच्चे को किस तरह सिखाया जा सकता है यह शिक्षक पर निर्भर है । अगर बच्चे को पहले उसका पसन्दीदा काम ही सिखाया जाए तो उसके लिये सीखना आसान व रोचक हो जाएगा । पढने-लिखने में उसकी रुचि अपने आप ही जागेगी । सबको एक ही लाठी से नही हाँका जासकता । इसके फूफाजी कहते हैं कि जिद्दी और अन्तर्मुखी बच्चों का दिमाग काफी अलग होता है । सही तरीके से उसे सही रास्ता बताया जाए तो वह बहुत आगे जाता है । हमारा बिट्टू ऐसा ही है । सब ऐसा ही चलता रहा तो देखना अपने बिट्टू को ..।
मुझे बुआ के विश्वास ने एक नई दृष्टि दे दी । और उस दृष्टि से मैंने पहली बार अपने भाई को खूबसूरत पाया । मैं अब अच्छी तरह समझने लगी हूँ कि असल में मन्दबुद्धि किसे कहा जाना चाहिये ।